Sri Rajarajeshwari Mantra Matrika Stavah – श्रीराजराजेश्वरी मन्त्रमातृकास्तवः

श्रीराजराजेश्वरी मन्त्रमातृकास्तवः — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक रहस्य (Introduction & Significance)
श्रीराजराजेश्वरी मन्त्रमातृकास्तवः (Sri Rajarajeshwari Mantra Matrika Stavah) शाक्त दर्शन, श्री विद्या तंत्र और विशेषकर 'वामाचार' (Vamachara) परंपरा का एक अत्यंत रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक स्तोत्र है। इस स्तोत्र की रचना महान विद्वान और शाक्त सिद्धांत के प्रतिष्ठापक 'आचार्य शंकरानन्द' द्वारा की गई है। यह स्तोत्र मुख्य रूप से 'मातृका' (Matrika) अर्थात् संस्कृत वर्णमाला के 50 अक्षरों (अ से क्ष तक) के तांत्रिक स्वरूप की व्याख्या करता है। तंत्र शास्त्र में माना जाता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति ध्वनि (नाद) से हुई है, और संस्कृत के 50 अक्षर इस ब्रह्मांड की स्वतंत्र शक्तियाँ (Shaktis) हैं, जिन्हें 'मातृका' कहा जाता है।
मातृका और देवी का तादात्म्य: श्लोक 2 में देवी को "एकारादिसमस्तवर्णविविधाकारैकचिद्रूपिणीं" (अकार आदि समस्त वर्णों के विविध आकारों में व्याप्त एक मात्र चिद्रूपिणी) कहा गया है। श्लोक 13 में इसी बात को और स्पष्ट करते हुए "कादिक्षान्तसुवर्णबिन्दुसुतनुं" कहा गया है, जिसका अर्थ है 'क' से लेकर 'क्ष' तक के सभी वर्ण ही देवी के स्वर्णिम शरीर (सुतनु) का निर्माण करते हैं। जब एक साधक अपने शरीर के विभिन्न चक्रों में इन अक्षरों का न्यास (Matrika Nyasa) करता है, तो वह स्वयं को साक्षात् देवी के स्वरूप में परिवर्तित कर लेता है।
श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा (The Essence of Bindu Tarpana): इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का अंत एक ही महावाक्य से होता है — "श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरां श्रीराजराजेश्वरीम्"। इसका अर्थ है, "वह भगवती राजराजेश्वरी जो श्रीचक्र (Sri Chakra) के मध्य स्थित 'बिंदु' (Bindu) में किए गए तर्पण (समर्पण/Oblations) से सर्वाधिक प्रसन्न होती हैं।" बिंदु शिव और शक्ति के पूर्ण अद्वैत (Absolute Union) का प्रतीक है। जो साधक बाहरी कर्मकांड से ऊपर उठकर अपनी चेतना (सहस्रार चक्र) को ही 'बिंदु' मानकर वहां देवी का ध्यान करता है, वह सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त होता है।
वामाचार और कौल सिद्धांत: श्लोक 8 और 15 में देवी को "वामाचारपरायणीं सुकुलजां" और "कौलिनीं" कहा गया है। तंत्र में 'वाम' का अर्थ केवल 'बायां' नहीं, बल्कि 'वमन' (उगलना या विपरीत दिशा) है — अर्थात् संसार की बाहरी भागदौड़ (Pravritti) से मुड़कर भीतर आत्मा की ओर जाना (Nivritti)। यह स्तोत्र उसी गुह्य कौल मार्ग के साधकों का मुख्य तर्पण मंत्र है।
स्तोत्र का विशिष्ट तांत्रिक अर्थ (Specific Tantric Meanings)
इस स्तोत्र में केवल अक्षरों का ही नहीं, बल्कि शब्द-ब्रह्म (Shabda Brahman) की चार अवस्थाओं का भी अद्भुत वर्णन है। श्लोक 3 में देवी को "परां पश्यन्तीं तनुमध्यमां विलसिनीं श्रीवैखरीरूपिणीम्" कहा गया है। नाभि में उत्पन्न होने वाली सूक्ष्मतम ध्वनि 'परा' है, हृदय में आते ही वह 'पश्यंती' बनती है, कंठ में 'मध्यमा', और होठों से जो स्पष्ट शब्द निकलते हैं वह 'वैखरी' है। भगवती स्वयं ही इन चारों वाणियों की अधिष्ठात्री (वाग्देवी) हैं।
श्लोक 16 में भगवती को "पञ्चप्रणवद्विरेफनलिनी" कहा गया है। साधारणतया 'ॐ' (Om) को प्रणव कहा जाता है, परंतु शाक्त तंत्र में 'ह्रीं' (Hreem), 'श्रीं' (Shreem), 'क्लीं' (Kleem), 'ऐं' (Aim) और 'सौः' (Sauh) को 'पञ्च प्रणव' (Five Pranavas) माना जाता है। देवी इन्हीं बीज मंत्रों रूपी कमलों (नलिनी) पर भ्रमर (द्विरेफ) के समान निवास करती हैं।
स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits of Chanting)
यद्यपि इस तांत्रिक स्तोत्र में कोई लौकिक फलश्रुति का अलग से अध्याय नहीं है, परंतु इसके श्लोकों में प्रयुक्त देवी के विशेषण ही इसके असीम लाभों को स्पष्ट करते हैं:
- वाक सिद्धि (Power of Speech): चूँकि यह मातृका (अक्षरों) और नाद (ध्वनि) का स्तोत्र है, इसका नित्य पाठ करने वाले साधक को 'सरस्वती सिद्धि' या 'वाक सिद्धि' प्राप्त होती है। उसकी कही हुई बात कभी असत्य नहीं होती।
- अज्ञान और संशय का नाश: "आत्मानात्मविचारिणीं" (श्लोक 3) — यह स्तोत्र साधक को आत्म-ज्ञान प्रदान करता है, जिससे आत्मा और अनात्मा के बीच का भेद स्पष्ट हो जाता है और माया का आवरण कट जाता है।
- सर्व मनोकामना पूर्ति: "सद्भक्तिचिन्तामणिं" (श्लोक 2) — देवी अपने भक्तों के लिए 'चिंतामणि' (सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली जादुई मणि) के समान हैं।
- कुंडलिनी जागरण: 'कादिक्षान्त' मातृका वर्णों का ध्यान जब शरीर के षट्चक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र तक) में किया जाता है, तो कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर सहस्रार की ओर प्रवाहित होती है।
- भय मुक्ति और विजय: "भद्रां भद्रवरप्रदां" (श्लोक 4) — देवी कल्याण करने वाली और भद्र (शुभ) वरदान देने वाली हैं। वे साधक के जीवन से सभी प्रकार के भयों (शत्रु, रोग, मृत्यु) को नष्ट कर देती हैं।
पाठ विधि एवं बिंदु तर्पण अनुष्ठान (Ritual Method & Bindu Tarpana)
यह स्तोत्र मुख्य रूप से 'विद्यार्चन पद्धति' (Sri Vidya Worship) का हिस्सा है। इसे नित्य पूजा या विशेष अनुष्ठान दोनों में पढ़ा जा सकता है।
- आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके कुशा या लाल ऊनी आसन पर बैठें।
- श्रीयंत्र स्थापना: प्राण-प्रतिष्ठित 'श्रीयंत्र' (Sri Yantra) को ताम्रपात्र में स्थापित करें।
- बिंदु तर्पण (Tarpana Process): एक छोटी कटोरी में शुद्ध जल, कच्चा दूध, या विशेष अर्घ्य जल लें। "श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरां श्रीराजराजेश्वरीम्" — इस पंक्ति का उच्चारण करते हुए एक विशेष मुद्रा (अंगूठे और मध्यमा/अनामिका उंगली के प्रयोग से) द्वारा श्रीचक्र के बिल्कुल मध्य (बिंदु) पर जल की एक बूँद अर्पित करें। यह क्रिया प्रत्येक श्लोक के बाद दोहराएं।
- मातृका न्यास: पाठ से पूर्व या पाठ के दौरान 'अ' से 'क्ष' तक 50 अक्षरों का मानसिक ध्यान अपने शरीर के विभिन्न अंगों (सिर, मुख, कंठ, हृदय आदि) पर करें।
- विशेष सामग्री: भगवती राजराजेश्वरी को लाल पुष्प, कुमकुम, और कर्पूर अत्यंत प्रिय हैं। तर्पण के समय लाल चंदन मिले हुए जल का उपयोग भी किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)