Sri Pratyangira Stotram 3 – श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (शत्रु नाशक मंत्र)

॥ श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् ॥
प्रत्यङ्गिरां आश्रितकल्पवल्लीं
अनन्तकल्याणगुणाभिरामाम् ।
सुरासुरेशार्चित पादपद्मां
सच्चित् परानन्दमयीं नमामि ॥ १ ॥
प्रत्यङ्गिरां सर्वजगत् प्रसूतिं
सर्वेश्वरीं सर्वभयापहन्त्रीम् ।
समस्त सम्पत् सुखदां समस्त-
-शरीरिणीं सर्वदृशां नमामि ॥ २ ॥
प्रत्यङ्गिरां कामदुघां निजाङ्घ्रि-
-पद्माश्रितानां परिपन्धि भीमाम् ।
श्यामां शिवां शङ्करदिव्यदीप्तिं
सिंहाकृतिं सिंहमुखीं नमामि ॥ ३ ॥
यन्त्राणि तन्त्राणि च मन्त्रजालं
कृत्याः परेषां च महोग्रकृत्ये ।
प्रत्यङ्गिरे ध्वंसय यन्त्र-तन्त्र-
-मन्त्रान् स्वकीयान् प्रकटी कुरुष्व ॥ ४ ॥
कुटुम्बवृद्धिं धनधान्यवृद्धिं
समस्त भोगान् अमितान् श्रियं च ।
समस्त विद्या सुविशारदत्वं
मतिं च मे देहि महोग्रकृत्ये ॥ ५ ॥
समस्त देशाधिपतीन् ममाशु
वशे शिवे स्थापय शत्रुसङ्घान् ।
हनाशु मे देवि महोग्रकृत्ये
प्रसीद देवेश्वरि भुक्ति मुक्तिः ॥ ६ ॥
जय प्रत्यङ्गिरे देवि जय विश्वमये शिवे ।
जय दुर्गे महादेवि महाकृत्ये नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥
जय प्रत्यङ्गिरे विष्णुविरिञ्चिशिवपूजिते ।
सत्यज्ञानानन्दमयि सर्वेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥
ब्रह्माण्डानां अशेषानां शरण्ये जगदम्बिके ।
अशेषजगदाराध्ये नमः प्रत्यङ्गिरेऽस्तु ते ॥ ९ ॥
प्रत्यङ्गिरे महाकृत्ये दुस्तरापन्निवारिणि ।
सकलापन्निवृत्तिं मे सर्वदा कुरु सर्वदे ॥ १० ॥
प्रत्यङ्गिरे जगन्मातर्जय श्री परमेश्वरि ।
तीव्रदारिद्र्यदुःखं मे क्षिप्रमेव हराम्बिके ॥ ११ ॥
प्रत्यङ्गिरे महामाये भीमे भीमपराक्रमे ।
मम शत्रूनशेषांस्त्वं दुष्टान्नाशय नाशय ॥ १२ ॥
प्रत्यङ्गिरे महादेवि ज्वालामालोज्वलानने ।
क्रूरग्रहान् अशेषान् त्वं दह खादाग्निलोचने ॥ १३ ॥
प्रत्यङ्गिरे महाघोरे परमन्त्रांश्च कृत्रिमान् ।
परकृत्या यन्त्रतन्त्रजालं छेदय छेदय ॥ १४ ॥
प्रत्यङ्गिरे विशालाक्षि परात्परतरे शिवे ।
देहि मे पुत्रपौत्रादि पारम्पर्योच्छ्रितां श्रियम् ॥ १५ ॥
प्रत्यङ्गिरे महादुर्गे भोगमोक्षफलप्रदे ।
सकलाभीष्टसिद्धिं मे देहि सर्वेश्वरेश्वरी ॥ १६ ॥
प्रत्यङ्गिरे महादेवि महादेवमनःप्रिये ।
मङ्गलं मे प्रयच्छाशु मनसा त्वां नमाम्यहम् ॥ १७ ॥
॥ इति श्री प्रत्यङ्गिरा परमेश्वरि स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥
श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् - परिचय
श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् माँ आदिशक्ति के उस उग्रतम स्वरूप की आराधना है, जिसका प्राकट्य भगवान नरसिंह के क्रोध को शांत करने और शरभेश्वर भगवान की सहायता के लिए हुआ था। माँ प्रत्यङ्गिरा को 'अथर्वण भद्रकाली' और 'नरसिंही' भी कहा जाता है। इनका मुख सिंह का और शरीर स्त्री का है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है।
यह स्तोत्र विशेष रूप से उन साधकों के लिए एक ढाल का काम करता है जो तांत्रिक बाधाओं, काले जादू, बुरी नजर या अज्ञात शत्रुओं से घिरे हुए हैं। इसमें देवी को 'महोग्रकृत्ये' (महान उग्र कर्म करने वाली), 'परिपन्धिभीमाम्' (शत्रुओं के लिए भयानक) और 'यन्त्र-तन्त्र-मन्त्र ध्वंसिनी' (शत्रुओं के तंत्र-मंत्र को नष्ट करने वाली) कहा गया है।
साथ ही, श्लोक 1 में उन्हें 'आश्रितकल्पवल्लीं' (शरणागतों के लिए कल्पलता) और 'सच्चित् परानन्दमयीं' (सच्चिदानंद स्वरूपिणी) कहकर उनके सौम्य और कल्याणकारी रूप की भी स्तुति की गई है। यह स्तोत्र भय से अभय की ओर ले जाने वाला महामंत्र है।
स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)
इस शक्तिशाली स्तोत्र के पाठ से जीवन में निम्नलिखित चमत्कारी परिवर्तन आते हैं:
- शत्रु नाश: श्लोक 12 में स्पष्ट प्रार्थना है - 'मम शत्रूनशेषांस्त्वं दुष्टान्नाशय नाशय'। यह स्तोत्र गुप्त और प्रत्यक्ष दोनों प्रकार के शत्रुओं का दमन करता है।
- तंत्र बाधा निवारण: श्लोक 14 में 'परकृत्या यन्त्रतन्त्रजालं छेदय छेदय' का मंत्र है, जो दूसरों द्वारा किए गए काले जादू, टोने-टोटके और यंत्र बाधा को काटता है।
- ग्रह दोष शांति: 'क्रूरग्रहान् अशेषान् त्वं दह खादाग्निलोचने' (श्लोक 13) - यह शनि, राहु और केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव को जलाकर भस्म कर देता है।
- दरिद्रता नाश: 'तीव्रदारिद्र्यदुःखं मे क्षिप्रमेव हराम्बिके' (श्लोक 11) - देवी तुरंत ही घोर दरिद्रता और आर्थिक संकटों को दूर करती हैं।
- सर्व कार्य सिद्धि: 'सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति' - इसके प्रभाव से अटके हुए कार्य पूर्ण होते हैं और साधक को 'अमितान् भोगान्' (अपार सुख) की प्राप्ति होती है।
- रक्षा कवच: यह स्तोत्र साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बना देता है, जिससे 'भयं क्वापि न विद्यते' (कहीं भी भय नहीं रहता)।
पाठ विधि (Recitation Method)
माँ प्रत्यङ्गिरा की साधना अत्यंत प्रभावशाली होती है। इसे निम्नलिखित विधि से करें:
- समय: अमावस्या, पूर्णिमा, या अष्टमी तिथि की रात्रि (निशीथ काल) सर्वश्रेष्ठ है। सामान्य दिनों में संध्या काल या रात्रि में पाठ करें।
- आसन और वस्त्र: उग्र साधना के लिए लाल या काले रंग के वस्त्र और ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- दिशा: दक्षिण दिशा (शत्रु नाश के लिए) या पूर्व दिशा (सामान्य पूजा के लिए) की ओर मुख करें।
- नैवेद्य: देवी को गुड़हल का फूल (लाल), नींबू, और गुड़-पान का भोग अत्यंत प्रिय है। 'पानीय' (जल/शरबत) और 'मद्य' (तामसिक साधना में) का भी विधान है, किन्तु सात्विक पूजा में मीठा पेय अर्पित करें।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर अपने शत्रु या समस्या का नाम लें और देवी से रक्षा की प्रार्थना करके पाठ आरम्भ करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री प्रत्यङ्गिरा देवी कौन हैं?
माँ प्रत्यङ्गिरा, जिन्हें 'नरसिंही' भी कहा जाता है, शक्ति का एक उग्र स्वरूप हैं। उनका मुख सिंह का और शरीर स्त्री का है। वे भगवान नरसिंह की शक्ति मानी जाती हैं और शत्रुओं का नाश करने वाली हैं।
2. इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य शत्रुओं से रक्षा, तंत्र-मंत्र और काले जादू के प्रभाव को नष्ट करना, और जीवन में आने वाली भयानक बाधाओं को दूर करना है।
3. क्या गृहस्थ लोग इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ, गृहस्थ लोग भी अपनी रक्षा के लिए इसका पाठ कर सकते हैं, लेकिन इसे पूर्ण पवित्रता और सात्विक भाव से करना चाहिए। उग्र साधना के लिए गुरु का मार्गदर्शन उचित रहता है।
4. 'प्रत्यङ्गिरा' नाम का क्या अर्थ है?
'प्रति' का अर्थ है विपरीत और 'अंगिरा' का अर्थ है हमला करने वाला। जो शक्ति शत्रुओं के हमलों को उलट कर उन्हीं पर वापस भेज देती है, वह प्रत्यङ्गिरा है।
5. पाठ करने का सबसे उत्तम समय क्या है?
अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार और रविवार की रात्रि इस पाठ के लिए विशेष फलदायी मानी जाती है। ग्रहण काल में इसका पाठ सिद्धिकारक होता है।
6. क्या यह स्वास्थ्य समस्याओं में मदद करता है?
हाँ, श्लोक 13 में 'क्रूरग्रहान्' और 'रोगान्' के नाश की बात है। यह असाध्य रोगों और मानसिक भय को दूर करने में सहायक है।
7. पूजा में कौन से फूल प्रिय हैं?
माँ प्रत्यङ्गिरा को लाल रंग के फूल जैसे गुड़हल (Hibiscus) और कनेर अत्यंत प्रिय हैं। इसके अलावा नींबू की माला भी अर्पित की जाती है।
8. क्या यह धन संबंधी समस्याओं को दूर करता है?
बिल्कुल, श्लोक 11 में 'तीव्रदारिद्र्यदुःखं मे क्षिप्रमेव हराम्बिके' कहा गया है। यह दरिद्रता और आर्थिक कष्टों को तुरंत हरने वाला है।
9. क्या इसे बिना गुरु दीक्षा के पढ़ा जा सकता है?
सामान्य स्तोत्र पाठ भक्ति भाव से किया जा सकता है। लेकिन यदि किसी विशेष तांत्रिक प्रयोग या सिद्धि के लिए कर रहे हैं, तो गुरु दीक्षा अनिवार्य है।
10. 'चंद्ररूपिण्यै' का क्या तात्पर्य है?
यद्यपि देवी उग्र हैं, फिर भी भक्तों के लिए वे चंद्रमा के समान शीतल और आनंदमयी ('सच्चित् परानन्दमयीं') हैं। यह उनके सौम्य और उग्र दोनों पक्षों का संतुलन है।