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Sri Navadurga Stotram – नवदुर्गास्तोत्रम् (श्रीजगन्नाथ रविशास्त्री विरचितम्)

Sri Navadurga Stotram – नवदुर्गास्तोत्रम् (श्रीजगन्नाथ रविशास्त्री विरचितम्)
॥ नवदुर्गास्तोत्रम् ॥ सच्चित्कला भगवती प्रथमं सुसूक्ष्मा विद्योतते सुकृतिनां हृदये पराख्या । भर्गाख्यया सवितृमण्डलमध्यसस्था सा बुद्धिचोदनपरा भवतु वरेण्या ॥ १॥ ध्यायन्ति यां सहृदया हृदये प्रभाते गायन्ति यां सुकवयो ललितैर्वचोभिः । यां योगिनः सुहृदये परिशीलयन्ति तां मोक्षदां भगवतीं शरणं प्रपद्ये ॥ २॥ शैलात्मजा कमलभूषितहंसयाना दुर्गा च दुर्गतिहरा भवनौ सुतारा । नारायणेन सुकृतैः स्मृतनामधेया विघ्नान्निवारयतु द्वादशषड् भुजाढ्या ॥ ३॥ हे वासुदेवसहजे! प्रतार्तिहर्त्रि ! हे नन्दगोपजयदे ! वसुदेवनीते ! । हे कंसराजदलिनि! श्रितव्योम मार्गे! देवैस्तुते! भगवति! वरदे नमोऽस्तु ॥ ४॥ श्रीनीलकण्ठस्य हृतार्धकाया पद्मे सहस्रे धृतपद्मपादा । योगीन्द्रवर्यैर्विहितप्रणामा शैलात्मजा विन्ध्यनिवासिनी सा ॥ ५॥ पूर्णेन्दुवक्त्रा शरदिन्दुशुभ्रा भोगेन्द्रहारा नवद्विभुजाढ्या । सिंहाधिरूढा सुविशालनेत्रा सा शैलपुत्री भवतु प्रसन्ना ॥ ६॥ या षट् सरोजे च कृताधिवासा तारं जपन्ती प्रणवं प्रमोदात् । सार्धत्रिवृत्या च समुल्लसन्ती सा वेदमाता भवतु प्रसन्ना ॥ ७॥ या चन्द्रभाला कमलासने स्वे विन्यस्य पादौ धृतकोणहस्ता । कुक्षौ दधाना च सुशुभ्रवीणा सा शारदा नो वरदा सदास्तु ॥ ८॥ कुमारमाता द्विरदाननार्चिता शब्दात्मिका गद्यपदैरुदीरिता । उद्गीथबीजा प्रणवस्वरूपिणी सा पद्महस्ता भवतु प्रसन्ना ॥ ९॥ (१) गायत्री (२) मोक्षदा (३) दुर्गा, (४) वरदा (५) विन्ध्यवासिनी । (६) शैलजा (७) वेदमाता च, (८) शारदा (९) पद्मधारिणी ॥ १०॥ नवद्वारमयेहर्म्ये गीयतेऽहर्निशं बुधैः । हंसीवहंस सहगा खेचरीखगगामिनी ॥ ११॥ मूलाधाराद्विधेरन्ध्रं प्राप्य सहस्रदलेस्थिता । नवभिर्गीयते पद्यैर्नवदुर्गा भयापहा ॥ १२॥ ॥ इति श्रीजगन्नाथ रविशास्त्रीविरचितम् नवदुर्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

परिचय: नवदुर्गास्तोत्रम् और इसका तात्विक रहस्य

नवदुर्गास्तोत्रम् (Navadurga Stotram), जिसकी रचना महान विद्वान और साधक श्री जगन्नाथ रविशास्त्री द्वारा की गई है, शाक्त परंपरा का एक अत्यंत रहस्यमयी और प्रज्ञा-वर्धक स्तोत्र है। सामान्यतः जब हम 'नवदुर्गा' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में मार्कण्डेय पुराण में वर्णित नौ देवियों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) का स्मरण होता है। परंतु, यह स्तोत्र एक सर्वथा भिन्न और उच्च आध्यात्मिक धरातल पर खड़ा है। इसमें माँ भगवती के नौ ऐसे स्वरूपों का वंदन किया गया है, जो सीधे तौर पर वैदिक ज्ञान, योग शास्त्र और तांत्रिक साधना से जुड़े हैं। ये नौ नाम हैं— १. गायत्री, २. मोक्षदा, ३. दुर्गा, ४. वरदा, ५. विन्ध्यवासिनी, ६. शैलजा, ७. वेदमाता, ८. शारदा, और ९. पद्मधारिणी (श्लोक १०)।

इस स्तोत्र का प्रारंभ अत्यंत ओजस्वी और दार्शनिक श्लोक से होता है: "सच्चित्कला भगवती प्रथमं सुसूक्ष्मा..."। यहाँ देवी को वह 'सत्' (सत्य) और 'चित्' (चेतना) माना गया है जो पुण्यवानों के हृदय में अत्यंत सूक्ष्म रूप से निवास करती है। उन्हें 'भर्ग' (पाप नाशक तेज) कहकर सूर्य मण्डल के मध्य स्थित माना गया है, जो गायत्री मंत्र का साक्षात् स्वरूप है और जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती हैं। यह श्लोक देवी को केवल एक स्त्री स्वरूप तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें परब्रह्म की उस मूल शक्ति के रूप में स्थापित करता है जिससे पूरा ब्रह्मांड संचालित है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका पौराणिक कथाओं और योग विज्ञान का अद्भुत समन्वय है। एक ओर श्लोक ४ में देवी को 'वासुदेव-सहजे' (भगवान कृष्ण की बहन) और 'कंसराजदलिनि' (कंस का मर्दन करने वाली योगमाया) कहा गया है, जो श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण की कथाओं की ओर संकेत करता है। वहीं दूसरी ओर, अंतिम श्लोकों (११ और १२) में पूर्णतः तांत्रिक योग का रहस्य उद्घाटित किया गया है। "नवद्वारमये हर्म्ये" (नौ द्वारों वाला यह शरीर रूपी महल) और "मूलाधाराद्विधेरन्ध्रं प्राप्य सहस्रदले स्थिता" (मूलाधार चक्र से ब्रह्मरंध्र को पार कर सहस्रार चक्र में स्थित होने वाली कुण्डलिनी शक्ति) जैसे वाक्य इस स्तोत्र को 'कुण्डलिनी जागरण' का एक महामंत्र बना देते हैं।

आधुनिक जीवन में, जहाँ मनुष्य नौ द्वारों वाले इस शरीर में बाहरी विषयों के प्रति आसक्त होकर तनाव और पीड़ा झेल रहा है, यह स्तोत्र अंतर्मुखी होने का मार्ग प्रशस्त करता है। श्री जगन्नाथ रविशास्त्री जी ने इस १२ श्लोकों की स्तुति में यह स्पष्ट किया है कि जब साधक की कुण्डलिनी जाग्रत होकर 'सहस्रार' (मस्तिष्क के सर्वोच्च केंद्र) में पहुँचती है, तब उसे उस परमानंद की प्राप्ति होती है जो 'मोक्षदा' और 'भयापहा' (भय का नाश करने वाली) है। यह स्तोत्र केवल पाठ के लिए नहीं, बल्कि ध्यान (Meditation) और स्वाध्याय के लिए एक उत्तम ग्रंथ है।

विशिष्ट महत्व: वेद, तंत्र और पुराण का संगम (Significance)

इस नवदुर्गा स्तोत्र का महत्व इसके बहुआयामी दृष्टिकोण में छिपा है। इसे केवल एक संप्रदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके प्रमुख आध्यात्मिक पहलू निम्नलिखित हैं:

  • कुण्डलिनी योग: श्लोक ७ में "षट् सरोजे च कृताधिवासा" कहा गया है, जिसका अर्थ है छह चक्रों (षटचक्रों) के कमलों में निवास करने वाली और 'प्रणव' (ॐ) का जप करने वाली शक्ति। साढ़े तीन फेरे (सार्धत्रिवृत्या) लेकर सोई हुई यह कुण्डलिनी शक्ति ही देवी का तात्विक रूप है।
  • हरि-हर-अभेदा: श्लोक ३ और ४ में नारायण द्वारा उनकी स्तुति और कृष्ण की बहन के रूप में उनका वर्णन वैष्णव और शाक्त मत के सामंजस्य को दर्शाता है। वहीं श्लोक ५ में उन्हें 'नीलकण्ठस्य हृतार्धकाया' (शिव के आधे शरीर को हरने वाली—अर्धनारीश्वर स्वरूप) कहा गया है।
  • ज्ञान और प्रज्ञा का स्रोत: 'शारदा', 'वेदमाता', और 'गायत्री' के रूप में यह स्तुति बुद्धि के विकास और विद्या प्राप्ति के लिए एक अचूक साधन है।

फलश्रुति: नवदुर्गा स्तोत्र पाठ के दिव्य लाभ

स्तोत्र के मूल भाव और तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक इस स्तोत्र का अर्थ सहित मनन और पाठ करता है, उसे निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • बुद्धि और मेधा का जागरण: "बुद्धिचोदनपरा" (बुद्धि को प्रेरित करने वाली) भगवती की कृपा से विद्यार्थी और ज्ञान पिपासुओं की एकाग्रता और प्रज्ञा में अद्भुत वृद्धि होती है।
  • भय और विघ्न का नाश: "विघ्नान्निवारयतु" और "भयापहा" शब्दों के प्रभाव से जीवन में आने वाली शारीरिक और मानसिक बाधाएँ, तथा अज्ञात भय समूल नष्ट हो जाते हैं।
  • कुण्डलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन: जो योगी ध्यान के साथ इसका पाठ करते हैं, उनकी प्राण शक्ति मूलाधार से उठकर सहस्रार तक पहुँचने में सहायता प्राप्त करती है।
  • आवागमन से मुक्ति: 'मोक्षदां भगवतीं' की निरंतर स्तुति जीव को जन्म और मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर परम शांति (निर्वाण) प्रदान करती है।
  • वाक् सिद्धि और कला: 'शारदा' और 'शब्दात्मिका' स्वरूप की आराधना से संगीत, काव्य और कला के क्षेत्र में साधक को यश प्राप्त होता है।

पाठ विधि एवं ध्यान की प्रक्रिया (Ritual Method & Meditation)

यह नवदुर्गा स्तोत्र एक यौगिक स्तोत्र है, अतः इसका पाठ केवल वाणी से नहीं, बल्कि ध्यान के साथ करना चाहिए:

  • समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में स्नान के उपरांत इसका पाठ सर्वाधिक फलदायी है। श्लोक २ स्वयं कहता है— "ध्यायन्ति यां... प्रभाते" (ज्ञानी जन प्रातःकाल जिनका ध्यान करते हैं)।
  • आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी (Spine) बिल्कुल सीधी होनी चाहिए।
  • ध्यान की विधि: पाठ करते समय अपनी चेतना को रीढ़ की हड्डी के निचले भाग (मूलाधार) से लेकर मस्तक के ऊपरी भाग (सहस्रार) तक ऊपर की ओर उठता हुआ महसूस करें।
  • पूजन: माँ भगवती के चित्र या मूर्ति के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। कुमकुम, लाल पुष्प और अक्षत अर्पित करें।
  • नियम: नित्य कम से कम १ बार पाठ करें। नवरात्र के नौ दिनों में इसके ९ पाठ प्रतिदिन करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस नवदुर्गा स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस विलक्षण और ज्ञानवर्धक स्तोत्र की रचना विद्वान श्री जगन्नाथ रविशास्त्री जी ने की है।

2. इसमें नवदुर्गा के कौन से ९ नाम बताए गए हैं?

श्लोक १० के अनुसार वे नौ नाम हैं— १. गायत्री, २. मोक्षदा, ३. दुर्गा, ४. वरदा, ५. विन्ध्यवासिनी, ६. शैलजा, ७. वेदमाता, ८. शारदा, और ९. पद्मधारिणी।

3. 'वासुदेव-सहजे' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "भगवान वासुदेव (कृष्ण) की बहन"। यह देवी योगमाया (विन्ध्यवासिनी) की ओर संकेत करता है जिन्होंने कृष्ण के जन्म के समय यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था।

4. स्तोत्र में 'नवद्वारमये हर्म्ये' किसे कहा गया है?

'नवद्वार' का अर्थ है नौ दरवाजे। यह मानव शरीर का प्रतीक है जिसमें नौ द्वार (दो आँखें, दो कान, दो नथुने, एक मुख और दो मल-मूत्र द्वार) होते हैं। इसी शरीर रूपी महल में चेतना रूपी देवी निवास करती हैं।

5. 'सार्धत्रिवृत्या' का कुण्डलिनी योग से क्या संबंध है?

कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में साढ़े तीन फेरे (सार्ध-त्रि-वृत्या) लगाकर सोई हुई सर्पिणी के रूप में रहती है। यह श्लोक उसी तांत्रिक रहस्य को उद्घाटित करता है।

6. क्या विद्यार्थी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, यह स्तोत्र विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है क्योंकि इसमें 'गायत्री', 'वेदमाता' और 'शारदा' (सरस्वती) स्वरूपों की वंदना है, जो बुद्धि को प्रखर बनाती है।

7. क्या इस पाठ के लिए कोई तांत्रिक दीक्षा आवश्यक है?

यद्यपि इसमें कुण्डलिनी योग का वर्णन है, परंतु यह एक स्तुति है। कोई भी श्रद्धालु जो माता में भक्ति रखता है, वह बिना किसी विशेष दीक्षा के भी इसे पढ़ सकता है।

8. 'मूलाधाराद्विधेरन्ध्रं प्राप्य' का क्या अभिप्राय है?

इसका अर्थ है कि भगवती कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र से उठकर ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपरी भाग) को पार करते हुए सहस्रार चक्र (सहस्रदले) में स्थापित होती हैं।

9. क्या इस पाठ से भय दूर होता है?

हाँ, स्तोत्र के अंतिम श्लोक में देवी को स्पष्ट रूप से "भयापहा" (सभी भयों को हरने वाली) कहा गया है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

देवी की उपासना में लाल रंग को उर्जा और शक्ति का प्रतीक माना गया है, अतः लाल वस्त्र धारण कर पाठ करना अत्यंत शुभ होता है।