Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Natesha Stava – श्री नटेश स्तवः

Sri Natesha Stava – श्री नटेश स्तवः
॥ श्री नटेश स्तवः ॥ ह्रीमत्या शिवया विराण्मयमजं हृत्पङ्कजस्थं सदा ह्रीणाना शिवकीर्तने हितकरं हेलाहृदा मानिनाम् । होबेरादिसुगन्धवस्तुरुचिरं हेमाद्रिबाणासनं ह्रीङ्कारादिकपादपीठममलं हृद्यं नटेशं भजे ॥ १ ॥ श्रीमज्ज्ञानसभान्तरे प्रविलसच्छ्रीपञ्चवर्णाकृतिं श्रीवाणीविनुतापदाननिचयं श्रीवल्लभेनार्चितम् । श्रीविद्यामनुमोदिनं श्रितजनश्रीदायकं श्रीधरं श्रीचक्रान्तरवासिनं शिवमहं श्रीमन्नटेशं भजे ॥ २ ॥ नव्याम्भोजमुखं नमज्जननिधिं नारायणेनार्चितं नाकौकोनगरीनटीलसितकं नागादिनालङ्कृतम् । नानारूपकनर्तनादिचतुरं नालीकजान्वेषितं नादात्मानमहं नगेन्द्रतनयानाथं नटेशं भजे ॥ ३ ॥ मध्यस्थं मधुवैरिमार्गितपदं मद्वंशनाथं प्रभुं मारातीतमतीव मञ्जुवपुषं मन्दारगौरप्रभम् । मायातीतमशेषमङ्गलनिधिं मद्भावनाभावितं मध्येव्योमसभागुहान्तमखिलाकाशं नटेशं भजे ॥ ४ ॥ शिष्टैः पूजितपादुकं शिवकरं शीतांशुरेखाधरं शिल्पं भक्तजनावने शिथिलिताघौघं शिवायाः प्रियम् । शिक्षारक्षणमम्बुजासनशिरः संहारशीलप्रभुं शीतापाङ्गविलोचनं शिवमहं श्रीमन्नटेशं भजे ॥ ५ ॥ वाणीवल्लभवन्द्यवैभवयुतं वन्दारुचिन्तामणिं वाताशाधिपभूषणं परकृपावारान्निधिं योगिनाम् । वाञ्छापूर्तिकरं वलारिविनुतं वाहीकृताम्नायकं वामङ्गात्तवराङ्गनं मम हृदावासं नटेशं भजे ॥ ६ ॥ यक्षाधीशसखं यमप्रमथनं यामिन्यधीशासनं यज्ञध्वंसकरं यतीन्द्रविनुतं यज्ञक्रियादीश्वरम् । याज्यं याजकरूपिणं यमधनैर्यत्नोपलभ्याङ्घ्रिकं वाजीभूतवृषं सदा हृदि ममायत्तं नटेशं भजे ॥ ७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ मायाश्रीविलसच्चिदम्बरमहापञ्चाक्षरैरङ्कितान् श्लोकान् सप्त पठन्ति येऽनुदिवसं चिन्तामणीनामकान् । तेषां भाग्यमनेकमायुरधिकान् विद्वद्वरान् सत्सुतान् सर्वाभीष्टमसौ ददाति सहसा श्रीमत्सभाधीश्वरः ॥ ८ ॥ ॥ इति श्री नटेश स्तवः सम्पूर्णम् ॥

श्री नटेश स्तवः — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक रहस्य (Introduction)

श्री नटेश स्तवः (Sri Natesha Stava) भगवान शिव के 'नटराज' स्वरूप की एक परम रहस्यमयी और ऊर्जावान स्तुति है। यह स्तोत्र तमिलनाडु के प्रसिद्ध चिदम्बरम् क्षेत्र में विराजमान भगवान शिव की 'चित्सभा' (चेतना की सभा) के अधिपति को समर्पित है। 'नटेश' शब्द का अर्थ है—'नृत्य के ईश्वर'। सनातन परंपरा में भगवान शिव का यह स्वरूप ब्रह्मांडीय ऊर्जा के निरंतर प्रवाह, सृजन और संहार का प्रतीक माना जाता है। नटराज का नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के पाँच मूलभूत कार्यों—सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह का जीवंत चित्रण है।

चिदम्बरम् और आकाश तत्व: भगवान नटराज को 'पञ्च-भूत' लिंगों में से 'आकाश लिंग' के रूप में पूजा जाता है। चिदम्बरम् शब्द की व्युत्पत्ति 'चित्' (चेतना) और 'अम्बर' (आकाश) से हुई है। इसका आध्यात्मिक अर्थ है—शुद्ध चेतना का अनंत आकाश। श्री नटेश स्तवः हमें उसी आकाश तत्व से जुड़ने की प्रेरणा देता है। श्लोक ४ में उल्लेख है—"मध्येव्योमसभागुहान्तमखिलाकाशं नटेशं भजे", जहाँ शिव को समस्त आकाश और व्योम सभा के केंद्र में स्थित बताया गया है। यह दर्शाता है कि शिव हमारे हृदय के भीतर स्थित उस 'दहराकाश' (हृदय के आकाश) में नृत्य कर रहे हैं।

मन्त्रात्मक संरचना: इस स्तोत्र की एक विशेष तांत्रिक महत्ता यह है कि इसके सात श्लोक "चिदम्बर महा-पञ्चाक्षर" और विशिष्ट बीज मन्त्रों से आबद्ध हैं। श्लोक १ का आरम्भ 'ह्रीं' (माया बीज) से होता है, जो देवी भुवनेश्वरी और शिव की शक्ति का प्रतीक है। श्लोक २ में 'श्री' मन्त्र का बाहुल्य है, जो सौभाग्य और लक्ष्मी का प्रदाता है। यह मन्त्र विज्ञान की वह पराकाष्ठा है जहाँ शब्द केवल अर्थ नहीं, बल्कि साक्षात ऊर्जा का संचार करते हैं।

स्वरूप का तांत्रिक विवेचन: स्तोत्र में शिव के विभिन्न अलंकारों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन है। उन्हें "हेमाद्रिबाणासनं" (सुमेरु पर्वत का धनुष धारण करने वाला) और "नागादिनालङ्कृतम्" (सर्पों से अलंकृत) कहा गया है। श्लोक ३ में उन्हें "नादात्मानम्" (नाद रूपी आत्मा) कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि समस्त संगीत और ध्वनियाँ शिव के डमरू से ही उत्पन्न हुई हैं। वे "नारायणेनार्चितं" (विष्णु द्वारा पूजित) हैं, जो शैव और वैष्णव मतों के सुंदर सामंजस्य को दर्शाता है।

दार्शनिक गहराई: यह स्तव अद्वैत वेदांत की उस स्थिति को व्यक्त करता है जहाँ शिव 'मायातीत' (माया से परे) और 'मद्भावनाभावित' (भक्त की भावनाओं द्वारा साक्षात होने वाले) हैं। श्लोक ५ में उन्हें "शिक्षारक्षणम्" और "अम्बुजासनशिरः संहारशील" कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे एक ओर सृष्टि के पोषक हैं, तो दूसरी ओर अहंकार (ब्रह्मा के पांचवें सिर के प्रतीक) का नाश करने वाले भी हैं।

आधुनिक युग में मानसिक शांति और बौद्धिक स्पष्टता प्राप्त करने के लिए श्री नटेश स्तवः एक दिव्य औषधि है। यह पाठ न केवल हमें शिव के 'आनंद ताण्डव' का अनुभव कराता है, बल्कि हमारी आंतरिक जड़ता को समाप्त कर हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में 'नटराज' की तरह कुशल बनाता है। ८ श्लोकों की यह 'चिन्तामणि' माला वास्तव में मोक्ष की सीढ़ी है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

भगवान नटराज की उपासना में श्री नटेश स्तवः का महत्व इसकी 'पञ्चाक्षर' शुद्धि में निहित है। स्तोत्र के ८वें श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'चिदम्बर महा-पञ्चाक्षर' से अंकित है। यह पाठ करने वाले के चारों ओर एक सुरक्षात्मक ऊर्जा मंडल (Aura) निर्मित कर देता है।

इस स्तव का पाठ करने से 'श्री चक्र' की ऊर्जा भी जाग्रत होती है (श्लोक २ - श्रीचक्रान्तरवासिनं), जो धन, धान्य और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री है। यह उन दुर्लभ स्तोत्रों में से एक है जो ज्ञान (सरस्वती) और वैभव (लक्ष्मी) दोनों का आशीर्वाद एक साथ प्रदान करते हैं।

नटेश स्तव के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (श्लोक ८) के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन इन ७ मुख्य श्लोकों का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित फलों की प्राप्ति होती है:

  • स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति: "भाग्यमनेकम्" — साधक के जीवन में धन, समृद्धि और सौभाग्य की निरंतर वृद्धि होती है।
  • दीर्घायु और आरोग्य: "मायुरधिकान्" — इस पाठ से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और लम्बी आयु प्राप्त होती है।
  • विद्वत्ता और ज्ञान: "विद्वद्वरान्" — भगवान नटराज साक्षात विद्या के स्वामी हैं, अतः उनका पाठ साधक को शास्त्रों का ज्ञाता और प्रज्ञावान बनाता है।
  • सुयोग्य संतान: "सत्सुतान्" — परिवार में श्रेष्ठ और सुसंस्कृत संतान की प्राप्ति के लिए यह पाठ अमोघ माना गया है।
  • सर्व अभीष्ट पूर्ति: "सर्वाभीष्टमसौ ददाति" — भगवान नटेश भक्त की समस्त सात्विक कामनाओं को तत्काल पूर्ण करते हैं।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे 'प्रदोष काल' में पढ़ना सबसे उत्तम है।

साधना के नियम

  • समय: सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) या प्रातः काल पाठ करें। प्रदोष के समय शिव आनंद ताण्डव करते हैं, अतः उस समय पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मस्तक पर भस्म (Vibhuti) का त्रिपुण्ड धारण करना शिव साधना में श्रेष्ठ है।
  • दिशा: उत्तर (शिव की दिशा) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: पाठ से पूर्व शिव के नटराज स्वरूप का ध्यान करें। शिवलिंग पर जल, दूध या बिल्वपत्र अर्पित करना फलदायी है।
  • लय: चूंकि यह स्तोत्र नृत्य की लय पर आधारित है, इसे गाकर या एक निश्चित लय (Rhythm) में पढ़ना अत्यंत प्रभावशाली होता है।

विशेष अवसर

  • महाशिवरात्रि: इस दिन रात्रि के चारों प्रहर में नटेश स्तव का पाठ करने से विशेष सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  • सोमवार और प्रदोष: प्रत्येक सोमवार या प्रदोष तिथि को पाठ करने से आर्थिक और मानसिक बाधाएं दूर होती हैं।
  • आर्द्रा नक्षत्र: यह भगवान नटराज का जन्म नक्षत्र है, इस दिन पाठ करना अनंत गुना फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'नटेश' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

'नट' का अर्थ नृत्य करने वाला और 'ईश' का अर्थ स्वामी है। नटेश वह ईश्वर है जो ब्रह्मांडीय लय और ताण्डव के अधिपति हैं।

2. यह स्तोत्र किस मंदिर से विशेष रूप से संबंधित है?

यह मुख्य रूप से तमिलनाडु के 'चिदम्बरम् नटराज मंदिर' से संबंधित है, जो पञ्च-भूतों के 'आकाश तत्व' का प्रतीक है।

3. क्या इस पाठ से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है?

हाँ, श्लोक ८ (फलश्रुति) में स्पष्ट उल्लेख है कि 'हरिप्रिया' (लक्ष्मी) का उस साधक के घर में स्थायी वास होता है।

4. 'प्रदोष काल' में पाठ करने का क्या महत्व है?

प्रदोष काल वह समय है जब महादेव ताण्डव मुद्रा में अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इस समय किया गया पाठ कोटि गुना फल प्रदान करता है।

5. 'चिदम्बर महा-पञ्चाक्षर' क्या है?

यह शिव का गुप्त मन्त्राक्षर समूह है जो चिदम्बरम् मंदिर की तांत्रिक विद्या से जुड़ा है। इस स्तोत्र के श्लोक इन्ही अक्षरों से अभिमंत्रित हैं।

6. क्या विद्यार्थी एकाग्रता के लिए इसका पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ। चूंकि यह 'वाणी' और 'विद्वत्ता' का वरदान देता है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए यह मेधा शक्ति बढ़ाने का उत्तम मार्ग है।

7. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान शिव की किसी भी स्तुति के लिए रुद्राक्ष की माला (Rudraksha Mala) ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत मानी गई है।

8. 'मद्वंशनाथं' शब्द का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'मेरे वंश के नाथ'। यह दर्शाता है कि शिव केवल व्यक्ति के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कुल के रक्षक और स्वामी हैं।

9. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, शिव भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। स्त्रियाँ भी पूरी श्रद्धा, शुद्धि और नियमों के पालन के साथ इस स्तव का पाठ कर सकती हैं।

10. 'श्रीमत्सभाधीश्वर' किसे कहा गया है?

यह भगवान नटराज को कहा गया है, जो 'चित्सभा' (चेतना की दिव्य सभा) के परम अधिपति और ईश्वर हैं।