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Sri Dakshinamurthy Mantrarna Ashtottara Shatanama Stotram – श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Dakshinamurthy Mantrarna Ashtottara Shatanama Stotram – श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ श्रीदेव्युवाच । भगवन् देवदेवेश मन्त्रार्णस्तवमुत्तमम् । दक्षिणामूर्तिदेवस्य कृपया वद मे प्रभो ॥ १ ॥ श्रीमहादेव उवाच । साधु पृष्टं महादेवि सर्वलोकहिताय ते । वक्ष्यामि परमं गुह्यं मन्त्रार्णस्तवमुत्तमम् ॥ २ ॥ ऋषिश्छन्दो देवताङ्गन्यासादिकमनुत्तमम् । मूलमन्त्रपदस्यापि द्रष्टव्यं सकलं हि तत् ॥ ३ ॥ ॥ ध्यानम् ॥ भस्मव्यापाण्डुराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला- -वीणापुस्तैर्विराजत्करकमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णे मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्यालः कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥ ४ ॥ इति ध्यात्वा महादेवं मन्त्रार्णस्तवमुत्तमम् । जपेत् त्रिसन्ध्यं नियतो भस्मरुद्राक्षभूषितः ॥ ५ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ओम् । ओङ्काराचलसिंहेन्द्रः ओङ्कारोद्यानकोकिलः । ओङ्कारनीडशुकराडोङ्कारारण्यकुञ्जरः ॥ ६ ॥ नगराजसुताजानिर्नगराजनिजालयः । नवमाणिक्यमालाढ्यो नवचन्द्रशिखामणिः ॥ ७ ॥ नन्दिताशेषमौनीन्द्रो नन्दीशादिमदेशिकः । मोहानलसुधाधारो मोहाम्बुजसुधाकरः ॥ ८ ॥ मोहान्धकारतरणिर्मोहोत्पलनभोमणिः । भक्तज्ञानाब्धशीतांशुः भक्ताज्ञानतृणानलः ॥ ९ ॥ भक्ताम्भोजसहस्रांशुः भक्तकेकिघनाघनः । भक्तकैरवराकेन्दुः भक्तकोकदिवाकरः ॥ १० ॥ गजाननादिसम्पूज्यो गजचर्मोज्ज्वलाकृतिः । गङ्गाधवलदिव्याङ्गो गङ्गाभङ्गलसज्जटः ॥ ११ ॥ गगनाम्बरसंवीतो गगनामुक्तमूर्धजः । वदनाब्जजितश्रीश्च वदनेन्दुस्फुरद्दिशः ॥ १२ ॥ वरदानैकनिपुणो वरवीणोज्ज्वलत्करः । वनवाससमुल्लासी वनलीलैकलोलुपः ॥ १३ ॥ तेजःपुञ्जघनाकारो तेजसामविभासकः । तेजःप्रदो विधेयानां तेजोमयनिजाश्रमः ॥ १४ ॥ दमितानङ्गसङ्ग्रामो दरहासोज्ज्वलन्मुखः । दयारससुधासिन्धुः दरिद्रधनशेवधिः ॥ १५ ॥ क्षीरेन्दुस्फटिकाकारः क्षितीन्द्रमकुटोज्ज्वलः । क्षीरोपहाररसिकः क्षिप्रैश्वर्यफलप्रदः ॥ १६ ॥ नानाभरणमुक्ताङ्गो नारीसम्मोहनाकृतिः । नादब्रह्मरसास्वादी नागभूषणभूषितः ॥ १७ ॥ मूर्तिनिन्दितकन्दर्पो मूर्तामूर्तजगद्वपुः । मूकाज्ञानतमोभानुः मूर्तिमत्कल्पपादपः ॥ १८ ॥ तरुणादित्यसङ्काशः तन्त्रीवादनतत्परः । तरुमूलैकनिलयः तप्तजाम्बूनदप्रभः ॥ १९ ॥ तत्त्वपुस्तोल्लसत्पाणिः तपनोडुपलोचनः । यमसन्नुतसत्कीर्तिः यमसम्यमसम्युतः ॥ २० ॥ यतिरूपधरो मौनमुनीन्द्रोपास्यविग्रहः । मन्दारहाररुचिरो मदनायुतसुन्दरः ॥ २१ ॥ मन्दस्मितलसद्वक्त्रो मधुराधरपल्लवः । मञ्जीरमञ्जुपादाब्जो मणिपट्टोलसत्कटिः ॥ २२ ॥ हस्ताङ्कुरितचिन्मुद्रो हंसयोगपटूत्तमः । हंसजप्याक्षमालाढ्यो हंसेन्द्राराध्यपादुकः ॥ २३ ॥ मेरुशृङ्गसमुल्लासी मेघश्याममनोहरः । मेघाङ्कुरालवालाग्र्यो मेधापक्वफलद्रुमः ॥ २४ ॥ धार्मिकान्तकृतावासो धर्ममार्गप्रवर्तकः । धामत्रयनिजारामो धरोत्तममहारथः ॥ २५ ॥ प्रबोधोदारदीपश्रीः प्रकाशितजगत्त्रयः । प्रज्ञाचन्द्रशिलाचन्द्रः प्रज्ञामणिलसत्करः ॥ २६ ॥ ज्ञानिहृद्भासमानात्मा ज्ञातॄणामविदूरगः । ज्ञानायादृतदिव्याङ्गो ज्ञातिजातिकुलातिगः ॥ २७ ॥ प्रपन्नपारिजाताग्र्यः प्रणतार्त्यब्धिबाडबः । प्रमाणभूतो भूतानां प्रपञ्चहितकारकः ॥ २८ ॥ यमिसत्तमसंसेव्यो यक्षगेयात्मवैभवः । यज्ञाधिदेवतामूर्तिः यजमानवपुर्धरः ॥ २९ ॥ छत्राधिपदिगीशश्च छत्रचामरसेवितः । छन्दः शास्त्रादिनिपुणश्छलजात्यादिदूरगः ॥ ३० ॥ स्वाभाविकसुखैकात्मा स्वानुभूतिरसोदधिः । स्वाराज्यसम्पदध्यक्षः स्वात्माराममहामतिः ॥ ३१ ॥ हाटकाभजटाजूटो हासोदस्तारिमण्डलः । हालाहलोज्ज्वलगलो हारायितभुजङ्गमः ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् — विस्तृत परिचय (Introduction)

श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Dakshinamurthy Mantrarna Ashtottara Shatanama Stotram) भगवान शिव के उस परमोच्च गुरु स्वरूप की आराधना है, जिन्हें जगत का 'आदि-गुरु' माना जाता है। इस स्तोत्र की विशेषता इसके नाम में ही निहित है — 'मन्त्रार्ण'। 'मन्त्र' और 'अर्ण' (अक्षर) का यह संगम इंगित करता है कि यह स्तोत्र भगवान दक्षिणामूर्ति के मूल मन्त्रों के बीजाक्षरों और उनके दिव्य स्वरूप के १०८ नामों से गुंफित है। तंत्र शास्त्र और आगम परंपरा में, दक्षिणामूर्ति को ज्ञान, विद्या, संगीत और योग के अधिष्ठाता देव के रूप में पूजा जाता है।

संवाद और उद्भव: यह स्तोत्र भगवान महादेव और माता पार्वती के दिव्य संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। श्लोक १-३ में देवी पार्वती शिवजी से प्रार्थना करती हैं कि वे लोक कल्याण हेतु दक्षिणामूर्ति देव के उस गोपनीय 'मन्त्रार्णस्तव' का उपदेश दें, जो सभी सिद्धियों को देने वाला है। इसके उत्तर में भगवान शिव कहते हैं कि यह स्तोत्र अत्यंत गुह्य (रहस्यमयी) है और केवल उन भक्तों को दिया जाना चाहिए जो भक्ति मार्ग पर अडिग हैं।

प्रतीकात्मक अर्थ: दक्षिणामूर्ति शब्द 'दक्षिण' और 'अमूर्ति' से बना है। 'दक्षिण' का अर्थ है 'कुशल' या 'ज्ञानवान', और 'अमूर्ति' का अर्थ है 'रूप रहित' या 'दिव्य रूप'। भगवान शिव का यह स्वरूप दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए वटवृक्ष (बनियान ट्री) के नीचे विराजमान है। दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यमराज की दिशा माना जाता है, और दक्षिणामूर्ति का मुख उस ओर होना यह दर्शाता है कि वे मृत्यु के भय और अज्ञान का नाश करने वाले 'मृत्युंजय गुरु' हैं।

इस स्तोत्र के १०८ नाम केवल संज्ञाएं नहीं हैं, बल्कि वे शिव के अनंत गुणों के रहस्य खोलते हैं। जैसे श्लोक ६ में उन्हें "ओङ्काराचलसिंहेन्द्रः" (ओंकार रूपी पर्वत के सिंह) कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे समस्त वेदों और ध्वनियों के मूल स्रोत हैं। आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में दक्षिणामूर्ति के 'मौन व्याख्यान' का विशेष महत्व है, जहाँ वे बिना शब्द बोले ही शिष्यों के गहनतम संशयों का निवारण कर देते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ साधक की आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है और उसे आत्म-ज्ञान (Self-Realization) की ओर ले जाता है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, यह स्तोत्र मानसिक शांति, मेधा शक्ति (Intellectual Power) और एकाग्रता के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। जो विद्यार्थी या साधक अपनी बुद्धि को प्रखर करना चाहते हैं, उनके लिए यह 'मन्त्रार्ण स्तोत्र' एक सिद्ध मार्ग है। यह पाठ न केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय है, बल्कि यह ध्वनि विज्ञान (Sound Science) और मन्त्र विज्ञान का एक अद्भुत मेल है जो मनुष्य के अंतर्मन को शिवमय कर देता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

इस स्तोत्र का महत्व इसकी तांत्रिक संरचना में है। भगवान शिव के १०८ नामों का संकलन इस प्रकार किया गया है कि प्रत्येक नाम साधक के चक्रों और नाड़ियों पर प्रभाव डालता है। 'मन्त्रार्ण' परंपरा का पालन करते हुए, इसमें बीजाक्षरों की शक्ति का समावेश है, जो इसे अन्य साधारण स्तोत्रों से अधिक प्रभावशाली बनाता है।

भगवान दक्षिणामूर्ति के हाथों में स्थित ज्ञान मुद्रा (Chin Mudra), अक्षमाला (Rosary), वीणा और पुस्तक (Manuscript) का वर्णन श्लोक ४ (ध्यानम्) में किया गया है। ये प्रतीक क्रमशः ब्रह्म-ज्ञान, काल-नियंत्रण, नाद-ब्रह्म और समस्त विद्याओं के सूचक हैं। यह स्तोत्र इन सभी शक्तियों को साधक के जीवन में समाहित करने का माध्यम है।

पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र के नियमित पाठ से प्राप्त होने वाले लाभों का विवरण शास्त्रों में इस प्रकार है:

  • मेधा और प्रज्ञा की प्राप्ति: जैसा कि श्लोक २४ में कहा गया है "मेधापक्वफलद्रुमः" — भगवान दक्षिणामूर्ति मेधा रूपी वृक्ष के पके हुए फल के समान हैं। उनके पाठ से बुद्धि अत्यंत प्रखर और सूक्ष्म होती है।

  • अज्ञान और मोह का नाश: श्लोक ८ और ९ में उन्हें "मोहान्धकारतरणिः" कहा गया है। यह स्तोत्र अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान है, जिससे साधक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होता है।

  • मानसिक शांति और स्थिरता: भगवान का 'मौन' स्वरूप पाठ करने वाले के अशांत मन को स्थिर करता है और उसे गहन ध्यान (Meditation) की स्थिति में ले जाता है।

  • समस्त विद्याओं में निपुणता: 'पुस्तक' और 'वीणा' धारण करने वाले शिव की आराधना से संगीत, कला और शैक्षणिक विषयों में सफलता प्राप्त होती है।

  • पाप मुक्ति और मोक्ष: 'त्रिसन्ध्यं' (तीनों काल) में पाठ करने से साधक के ज्ञात-अज्ञात पापों का शमन होता है और अंततः उसे शिवत्व की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

श्लोक ५ में स्वयं महादेव ने पाठ की विधि का संकेत दिया है — "जपेत् त्रिसन्ध्यं नियतो भस्मरुद्राक्षभूषितः"। इसका विस्तृत विधान निम्न है:

साधना के नियम

  • समय: सर्वोत्तम फल के लिए प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल (त्रिसन्ध्या) पाठ करें। ब्रह्म मुहूर्त का समय गुरु-उपासना के लिए श्रेष्ठ है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात भस्म (विभूति) का त्रिपुण्ड लगाएं और रुद्राक्ष की माला धारण करें।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • भोग: भगवान शिव को सफ़ेद फूल, चन्दन और नैवेद्य के रूप में दूध या फल अर्पित करें।
  • ध्यान: पाठ से पूर्व श्लोक ४ में वर्णित 'ध्यानम्' का उच्चारण करते हुए भगवान दक्षिणामूर्ति के दिव्य स्वरूप का हृदय में स्मरण करें।

विशेष अवसर

  • गुरु पूर्णिमा: इस दिन आदि गुरु दक्षिणामूर्ति का पाठ विशेष कृपा और गुरु-तत्व की प्राप्ति कराता है।
  • सोमवार और प्रदोष: भगवान शिव के इन प्रिय दिनों में पाठ करने से मानसिक अशांति और दोष दूर होते हैं।
  • महाशिवरात्रि: इस महान रात्रि में १०८ नामों के साथ हवन या अर्चन करना सिद्धदायक माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'मन्त्रार्ण' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

'मन्त्र' का अर्थ पवित्र ध्वनि और 'अर्ण' का अर्थ वर्ण या अक्षर है। यह स्तोत्र भगवान के मन्त्रों के बीजाक्षरों की शक्ति से युक्त है, इसलिए इसे मन्त्रार्ण कहा जाता है।

2. दक्षिणामूर्ति शिव के चरणों के नीचे कौन है?

उनके दाहिने पैर के नीचे 'अपस्मार' नामक असुर है। यह असुर अज्ञान, प्रमाद और अहंकार का प्रतीक है। शिव उसे दबाकर यह दर्शाते हैं कि ज्ञान द्वारा ही अज्ञान पर विजय संभव है।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ विद्यार्थी कर सकते हैं?

जी हाँ, विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र अत्यंत फलदायी है। यह स्मृति शक्ति, एकाग्रता और शैक्षणिक सफलता में सहायक मेधा शक्ति को बढ़ाता है।

4. 'मौन व्याख्यान' का क्या अर्थ है?

यह दक्षिणामूर्ति स्वरूप की सबसे बड़ी विशेषता है। वे बिना शब्द बोले, केवल अपनी मौन उपस्थिति और चेतना द्वारा शिष्यों के संशयों को जड़ से समाप्त कर देते हैं।

5. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

यह स्तोत्र भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में पौराणिक ग्रंथों और आगम परंपराओं से प्राप्त हुआ है।

6. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य पाठ और भक्ति हेतु दीक्षा अनिवार्य नहीं है, क्योंकि शिव स्वयं आदि गुरु हैं। हालांकि, तांत्रिक प्रयोगों हेतु गुरु मार्गदर्शन आवश्यक माना जाता है।

7. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान शिव की आराधना के लिए 'रुद्राक्ष की माला' (Rudraksha Mala) ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत है।

8. 'मन्त्रार्ण स्तव' के १०८ नामों का क्या महत्व है?

प्रत्येक नाम भगवान के एक विशिष्ट गुण और शक्ति का बोध कराता है। १०८ नामों का पूर्ण पाठ ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ साधक का तालमेल बिठाता है।

9. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवान दक्षिणामूर्ति के इस ज्ञानप्रद स्वरूप की उपासना कोई भी श्रद्धालु स्त्री या पुरुष पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ कर सकता है।

10. दक्षिणामूर्ति को 'पीताम्बरा' या 'भस्मभूषित' क्यों कहा जाता है?

वे वैराग्य के देवता हैं, इसलिए भस्म धारण करते हैं। हालांकि, कुछ परंपराओं में उन्हें स्वर्ण के समान दीप्तिमान वस्त्रों (पीताम्बर) में भी दिखाया गया है, जो ज्ञान की महिमा का प्रतीक है।