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Sri Narayana Namavali Stotram (Mahabharatam) – श्री नारायण नामावलि स्तोत्रम् (महाभारते)

Sri Narayana Namavali Stotram (Mahabharatam) – श्री नारायण नामावलि स्तोत्रम् (महाभारते)
॥ श्री नारायण नामावलि स्तोत्रम् (महाभारते) ॥ नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च । भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये ॥ १ ॥ शिवयोनेः शिवाद्यायि शिवपूज्यतमाय च । घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च ॥ २ ॥ विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने । सहस्रोदरपादाय सहस्रनयनाय च ॥ ३ ॥ सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च । शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च ॥ ४ ॥ ऋग्यजुःसामवक्त्राय अथर्वशिरसे नमः । हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च ॥ ५ ॥ बृहद्वेगाय तार्क्ष्याय वराहायैकशृङ्गिणे । शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने ॥ ६ ॥ हुताशायोर्ध्ववक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे । सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नमः ॥ ७ ॥ गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधर्माय वृषाकृते । सम्राडुग्रे सङ्कृतये विरजे सम्भवे भवे ॥ ८ ॥ वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च । दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च ॥ ९ ॥ अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च । जिष्णवे पुरुहूताय वसिष्ठाय वराय च ॥ १० ॥ सत्येशाय सुरेशाय हरयेऽथ शिखण्डिने । बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे ॥ ११ ॥ किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे । बृहदुक्थ्यसुषेणाय युग्मे दुन्दुभये तथा ॥ १२ ॥ भयेसखाय विभवे भरद्वाजेऽभयाय च । भास्कराय च चन्द्राय पद्मनाभाय भूरिणे ॥ १३ ॥ पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च । वषट्काराय स्वाहाय स्वधाय निधनाय च ॥ १४ ॥ ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः । श्रीपद्मायात्मसदृशे धरणीधारणे परे ॥ १५ ॥ सौम्यासौम्यस्वरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः । विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च ॥ १६ ॥ केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे । हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे ॥ १७ ॥ नारायणाग्र्यवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे । वर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे ॥ १८ ॥ मुनये ज्वरमुक्तायि ज्वराधिपतये नमः । अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विडूर्मिणे ॥ १९ ॥ तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नमः । शरणाय शरण्याय भक्तेष्टशरणाय च ॥ २० ॥ नमः सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च । पाहि मां देवदेवेश कोऽप्यजोऽसि सनातनः ॥ २१ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ एवं गतोऽस्मि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनाम् । स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत्तमो मे प्रणश्यत ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्याये श्री नारायण नामावलि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: महाभारत की दिव्य धरोहर — श्री नारायण नामावलि (Introduction)

श्री नारायण नामावलि स्तोत्रम् (Sri Narayana Namavali Stotram) महर्षि वेदव्यास रचित कालजयी ग्रंथ 'महाभारत' के अनुशासन पर्व (अध्याय ४२) से उद्धृत है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के उस विराट और सर्वव्यापी स्वरूप का गान करता है जो संपूर्ण सृष्टि का आधार है। महाभारत का 'अनुशासन पर्व' मुख्य रूप से धर्म, नैतिकता और दार्शनिक सत्यों के उपदेशों के लिए जाना जाता है, जहाँ पितामह भीष्म युधिष्ठिर को जीवन के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराते हैं। इसी श्रृंखला में नारायण की यह नामावलि भक्त को सीधे उस परम तत्व से जोड़ती है जो 'शुद्ध', 'शाश्वत' और 'ध्रुव' (अचल) है।

'नारायण' शब्द का अर्थ ही अत्यंत गंभीर है— 'नार' (जीव/जल) और 'अयन' (आश्रय), अर्थात् वह सत्ता जो समस्त जीवों का एकमात्र अंतिम आश्रय है। इस स्तोत्र में भगवान के नामों को एक विशिष्ट क्रम में सजाया गया है जो न केवल उनके शांत और सौम्य स्वरूप को दिखाते हैं, बल्कि 'घोररूपाय' (प्रलयंकारी) स्वरूप का भी वर्णन करते हैं। यह दार्शनिक रूप से सिद्ध करता है कि ईश्वर ही सृजन, पालन और संहार के केंद्र हैं। श्लोक संख्या १ और २ में उन्हें 'शिवाय शिवमूर्तये' और 'शिवयोनेः' कहा गया है, जो वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच के तात्विक सामंजस्य (Hari-Hara unity) को प्रकट करता है।

इस नामावलि की विशिष्टता इसकी ध्वन्यात्मक शक्ति में है। इसमें प्रयुक्त नाम जैसे 'सहस्रशीर्षिणं', 'सहस्राक्षं' और 'सहस्रपादम' वेदों के प्रसिद्ध 'पुरुष सूक्त' की प्रतिध्वनि हैं। यह पाठ साधक को यह अनुभव कराता है कि वह जिस भगवान की पूजा कर रहा है, वह उसके चारों ओर प्रत्येक जीव, कण और दिशा में व्याप्त है। शोधपरक दृष्टि से, महाभारत के ये श्लोक कलयुग के जीवों के लिए 'मोक्ष की कुंजी' के समान हैं क्योंकि इनमें जटिल कर्मकांडों के स्थान पर केवल 'नाम-स्मरण' के महत्व को प्रतिपादित किया गया है।

ऐतिहासिक रूप से, इस स्तोत्र का पाठ महान राजाओं और ऋषियों द्वारा राज्य की शांति और अकाल-मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए किया जाता रहा है। जब साधक श्लोक २३ में कहता है— "स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत्तमो मे प्रणश्यत" (इस स्तुति को करने वाले मेरे भीतर का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट हो जाए), तो यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संकल्प बन जाता है। यह स्तोत्र मानव चेतना को 'तम' (अंधकार) से 'ज्योति' (प्रकाश) की ओर ले जाने वाला एक सशक्त माध्यम है।

विशिष्ट महत्व: नारायण और सृष्टि का अभिन्न संबंध (Significance)

नारायण नामावलि का महत्व इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति में निहित है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के उन रूपों की वंदना करता है जो वेदों और पुराणों का सार हैं:

  • वेदात्मा स्वरूप: श्लोक ५ में उन्हें 'ऋग्यजुःसामवक्त्राय' और 'अथर्वशिरसे' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि चारों वेद उन्हीं के मुख से निसृत हुए हैं।
  • ब्रह्मांडीय काल: उन्हें 'ऋतुसंवत्सराय' और 'युगपर्यायिणे' (ऋतुओं और वर्षों के रूप में काल का चक्र) माना गया है, जो समय पर उनकी सत्ता को दर्शाता है।
  • प्राकृतिक संतुलन: 'सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने' कहकर उन्हें समुद्र और वर्षा का अधिपति बताया गया है, जो पर्यावरण और जीवन की निरंतरता के रक्षक हैं।
  • आरोग्य प्रदाता: श्लोक १९ में प्रयुक्त 'ज्वरमुक्तायि ज्वराधिपतये' उन्हें रोगों और विशेषकर ताप (बुखार/संताप) से मुक्ति दिलाने वाला महावैद्य घोषित करता है।

दार्शनिक रूप से, यह नामावलि साधक को 'अद्वैत' के शिखर पर ले जाती है, जहाँ वह अनुभव करता है कि 'सर्वमेतच्चराचरम्' (सब कुछ नारायणमय है)। यह बोध व्यक्ति के भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और मोह को जड़ से समाप्त कर देता है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits from Phala Shruti)

महाभारत के अनुशासन पर्व और परंपरा के अनुसार, इस नामावलि के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • अज्ञान और अंधकार का नाश: "तत्तमो मे प्रणश्यत" — इस पाठ से बुद्धि की जड़ता और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है, जिससे साधक सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।
  • मानसिक शांति और अभय: 'भयेसखाय' और 'अभयाय' स्वरूप की वंदना साधक के मन से मृत्यु, रोग और अज्ञात शत्रुओं का भय समूल नष्ट कर देती है।
  • पाप प्रक्षालन: भगवान के 'शुद्ध' और 'शाश्वत' नामों का संकीर्तन अनजाने में किए गए पापों का शमन करता है और अंतःकरण को निर्मल बनाता है।
  • वैकुंठ की प्राप्ति: "शरणं शरण्यं" — जो प्रभु की इस नामावलि के साथ शरणागत होता है, उसे अंत समय में नारायण के परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
  • कार्य सिद्धि और विजय: 'जिष्णवे' (सदा विजयी) और 'पुरुहूताय' के स्मरण से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सफलता मिलती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

श्री नारायण नामावलि का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे नियमपूर्वक और शुद्ध भाव से करना चाहिए:

  • ब्रह्म मुहूर्त (Timing): पाठ के लिए प्रातः काल सूर्योदय के समय का मुहूर्त सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त संध्या काल में भी इसका पाठ अत्यंत मंगलकारी होता है।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान विष्णु को विशेष प्रिय है।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: भगवान नारायण की प्रतिमा या शालिग्राम जी के सम्मुख घी का दीपक जलाएं और प्रभु को तुलसी दल अर्पित करें।
  • एकाग्रता: पाठ करते समय प्रत्येक नाम के अर्थ का मनन करें। अंतिम श्लोक "पाहि मां देवदेवेश" (हे देवताओं के देव! मेरी रक्षा करें) कहते समय पूर्ण शरणागति का अनुभव करें।

विशेष अवसर: एकादशी, गुरुवार, पूर्णिमा और विष्णु पर्वों पर १०८ बार या ११ पाठ करने से विशेष कामनाएं पूर्ण होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री नारायण नामावलि स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के अनुशासन पर्व के ४२वें अध्याय से लिया गया है।

2. 'नारायण' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

नारायण का अर्थ है वह जो जल (नार) पर शयन करता है या वह जो समस्त मनुष्यों (नार) के हृदय में निवास करता है और उनका अंतिम आश्रय (अयन) है।

3. इस स्तोत्र में 'शिवाद्यायि' और 'शिवमूर्तये' का क्या महत्व है?

ये शब्द यह सिद्ध करते हैं कि नारायण और शिव एक ही परम सत्य के दो रूप हैं। यह स्तोत्र संप्रदायों के भेदभाव को मिटाकर 'हरि-हर' की एकता का संदेश देता है।

4. क्या इस स्तोत्र का पाठ रोगों से मुक्ति दिलाता है?

जी हाँ, श्लोक १९ में भगवान को 'ज्वराधिपतये' (रोगों के स्वामी) कहा गया है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से शारीरिक और मानसिक कष्टों का शमन होता है।

5. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवान की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकता है।

6. 'सहस्रनयनाय' का दार्शनिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है "हजारों आँखों वाले"। यह प्रभु की सर्वव्यापकता को दर्शाता है कि वे ब्रह्मांड के हर कोने को एक साथ देख रहे हैं (Omniscient)।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

यद्यपि नित्य पाठ श्रेष्ठ है, परंतु गुरुवार (विष्णु का दिन) और एकादशी तिथि पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है।

8. क्या केवल सुनने (श्रवण) से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, महाभारत के अनुसार इन दिव्य नामों का श्रवण भी अज्ञान के अंधकार को दूर करने और चित्त को शुद्ध करने में उतना ही सक्षम है।

9. 'ब्रह्मयोनिनाम्' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि नारायण ही ब्रह्मा के भी जन्मदाता (योनि) हैं। वे ही सृष्टि के मूल बीज और सृजनकर्ता हैं।

10. क्या बच्चों के लिए यह पाठ उपयोगी है?

बिल्कुल, यह स्तोत्र एकाग्रता बढ़ाने और बच्चों के मन से भय को दूर करने के लिए बहुत प्रभावी है। इससे सात्विक बुद्धि का विकास होता है।