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श्री नृसिंह करुणारस स्तोत्रम्

श्री नृसिंह करुणारस स्तोत्रम्

श्रीनृसिंहाय नमः ।

याचेऽहं करुणासिन्धो यावज्जीवमिदं तव । अदैन्यं देहदार्द्धं च त्वत्पादाम्बुजसद्गतिम् ॥ १॥ अनाद्यनन्तकालेषु भृत्योऽहं त्वं हि मे प्रभुः । त्वं तुष्टोवाथ रुष्टो वा त्वां विना मे गतिर्नहि ॥ २॥ तुष्टोऽसि त्वं दयासिन्धो किमन्यैर्मम रक्षणे । रुष्टोऽसि त्वं दयासिन्धो किमन्यैर्मम रक्षणे ॥ ३॥ दोषाणां च सहिष्णुत्वे त्वत्समो नास्ति भूतले । मत्समो नहि देवेश कृतघ्नो वञ्चकोऽपि वा ॥ ४॥ प्रसिद्धशुक्लदासोऽहं शश्वत्तव जगत्पते । किं भयं किमु मे लक्ष्यं सर्वेष्वपि धुरन्धर ॥ ५॥ ईशस्य पूर्णकामस्य किमसाध्यं वदाच्युत । ममेष्टं च कियन्मात्रं किमेतावद्विलम्बनम् ॥ ६॥ जगत्स्वामी कृपापूर्णः सम्भवेन्निर्दयापरः । का तदा गतिरस्माकं गरदायां स्वमातरि ॥ ७॥ त्वमेवैको जगत्राता दाता ज्ञाता दयान्वितः । त्वां विना कः पुमान्कर्ता ह्यस्माकं तु मनोरथम् ॥ ८॥ उदारगुणशीलस्य साम्यं सर्वत्र वै तव । कस्मालक्ष्मीपतेः श्रीमन् मयि श्रीमन् लोभः किमीदृशः ॥ ९॥ आर्तबन्धुरिति ज्ञात्वा त्वामहं शरणं गतः । रक्ष मां अथवा सम्यक् त्वं यशो मुञ्च शाश्वतम् ॥ १०॥ दीनबन्धो दयासिन्धो सुहृद्वन्धो जगत्पते । संसारार्णवमग्नं मामिन्दिरेश समुद्धर ॥ ११॥ श्रीनृसिंह दयामूर्ते मय्यार्ते निर्दयाकृता । को धर्मः किमिदं भाग्यं किं यशो लोकविश्रुतम् ॥ १२॥ सुकृतीनां मदीयत्वं करोषि त्वं किमद्भुतम् । तत्कृतं चेन्मयि हरे तदैव विपुलं यशः ॥ १३॥ निर्गुणेष्वपि सर्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनि ॥ १४॥ प्रसीद मे श्रियः कान्त सुप्रसीद दयानिधे । पुनः पुनः प्रसीद त्वं प्रसीदं वरदो भव ॥ १५॥ ॥ इति श्रीपञ्चरात्रागमोक्त नृसिंहकरुणारसस्तोत्रं समाप्तम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और 'करुण रस'

श्री नृसिंह करुणारस स्तोत्रम् वैष्णव परंपरा के सबसे भावुक और हृदयस्पर्शी स्तोत्रों में से एक है। प्रायः भगवान नृसिंह को उनके 'रौद्र' (उग्र) रूप के लिए जाना जाता है, लेकिन यह स्तोत्र उनके करुणा (Compassion) और वात्सल्य (Affection) पक्ष को उजागर करता है। इसकी रचना पाञ्चरात्र आगम (Pancharatra Agama) में मिलती है। भक्त इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान से शक्ति या धन नहीं मांगता, बल्कि एक बालक की तरह अपनी माँ (भगवान) से संरक्षण और प्रेम की याचना करता है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

इस स्तोत्र में शरणागति (Total Surrender) के सिद्धांत को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है:
  • अदैन्यं और देहदार्द्धं: पहले श्लोक में भक्त कहता है—"मैं आपसे केवल इतना मांगता हूँ कि मेरा शरीर स्वस्थ रहे (देहदार्द्धं) ताकि मैं आपकी सेवा कर सकूँ, और मुझे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े (अदैन्यं)।"
  • अनन्य आश्रय: दूसरे और तीसरे श्लोक का भाव अत्यंत गहरा है—"हे प्रभु! आप प्रसन्न हों या रुष्ट (नाराज), मेरे पास आपके सिवा कोई दूसरा ठिकाना नहीं है।" (त्वं तुष्टोवाथ रुष्टो वा)। यह एक निश्छल प्रेम की पराकाष्ठा है।
  • चन्द्र और चाण्डाल: १४वें श्लोक में एक अद्भुत उपमा दी गई है—"न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनि"। जैसे चंद्रमा अपनी चांदनी चाण्डाल के घर पर भी समान रूप से बिखेरता है, वैसे ही साधु (भगवान) पापी पर भी अपनी दया नहीं रोकते।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

यद्यपि यह स्तोत्र निष्काम भक्ति के लिए है, फिर भी इसके पाठ से साधक को स्वतः ही अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • भय और असुरक्षा का नाश: जो व्यक्ति जीवन में अकेलापन या असुरक्षा महसूस करता है, उसे यह स्तोत्र 'सनाथ' (Having a Protector) होने का अनुभव कराता है।
  • आत्मग्लानि से मुक्ति: ४थे श्लोक में भक्त कहता है—"मेरे समान कोई पापी नहीं और आप समान कोई पाप-नाशक नहीं।" यह स्वीकारोक्ति मन के बोझ और अपराध-बोध (Guilt) को धो देती है।
  • सद्गति (Spiritual Elevation): इसका नित्य पाठ अंत समय में भगवान के चरणों में स्थान (सद्गति) सुनिश्चित करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • प्रदोष काल (Twilight): भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूलि बेला में हुआ था, अतः संध्या के समय इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ है।
  • भगवान नृसिंह के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं और उन्हें लाल पुष्प अर्पित करें।
  • यदि आप किसी गंभीर संकट या बीमारी से जूझ रहे हैं, तो शनिवार (Saturday) या स्वाति नक्षत्र में इसका १०८ बार पाठ करें।
  • पाठ करते समय आँखों में आंसू और हृदय में करुणा का भाव होना ही इसकी सबसे बड़ी विधि है।