Sri Mangala Chandika Stotram – श्री मङ्गलचण्डिका स्तोत्रम् | For Auspiciousness

मङ्गलचण्डिका स्वरूप और महत्व
'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के प्रकृति खंड में इस स्तोत्र का वर्णन मिलता है। एक बार जब भगवान शिव को 'त्रिपुर' नामक असुर का वध करने में कठिनाई हो रही थी और वे संकटग्रस्त हो गए थे, तब भगवान विष्णु की सलाह पर उन्होंने देवी मङ्गलचण्डिका का ध्यान और स्तवन किया था।
देवी की कृपा से शिवजी को विजय प्राप्त हुई। तब से यह परंपरा बन गई कि किसी भी कार्य की सिद्धि और अमंगल (Bad luck) को दूर करने के लिए मंगलवार को देवी की पूजा की जाती है।
नाम और ध्यान का अर्थ (Meaning)
1. मङ्गलचण्डिका (Mangala Chandika)
इस नाम के दो भाग हैं - 'मंगल' और 'चंडिका'। 'मंगल' का अर्थ है शुभता देने वाली और 'चंडिका' का अर्थ है कोप (Anger) करने वाली। अर्थात, जो दुष्टों पर कोप करके भक्तों का मंगल करती हैं, वे मङ्गलचण्डिका हैं।
2. ध्यान (Dhyana)
स्तोत्र के आरंभ में देवी का अद्भुत ध्यान है। वे 'षोडशवर्षीयां' (16 वर्ष की कन्या के समान) नित्य यौवन वाली हैं। उनका वर्ण 'श्वेतचम्पक' (सफ़ेद चंपा के फूल) जैसा है और वे 'जगद्धात्री' (जगत का पालन करने वाली) हैं।
3. संसार रूपी सागर की नौका
श्लोक 5 में कहा गया है - 'संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे'। अर्थात, इस कठिन संसार रूपी सागर को पार करने के लिए देवी एक मजबूत नौका (Ship) के समान हैं।
पाठ के लाभ (Benefits)
सर्व अमंगल नाश
श्लोक 19 कहता है - 'तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमङ्गलम्'। यानी इस स्तोत्र को सुनने/पढ़ने वाले का हमेशा मंगल ही होता है, कभी अमंगल नहीं होता।
मंगल ग्रह शांति
श्लोक 15 में वर्णन है कि 'मंगल ग्रह' (Mars) ने भी देवी की पूजा की थी। अत: जिनकी कुंडली में मंगल भारी हो, उन्हें यह पाठ अवश्य करना चाहिए।
संतान और वंश वृद्धि
'वर्धन्ते तत्पुत्रपौत्रा' - इस पाठ से पुत्र-पौत्र और वंश की वृद्धि होती है।
विवाह और सौभाग्य
स्त्रियां अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याएं उत्तम वर प्राप्ति के लिए मंगलवार को यह व्रत/पाठ करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मङ्गलचण्डिका का अर्थ क्या है?
'मंगल' का अर्थ है शुभ/कल्याण और 'चंडिका' का अर्थ है दक्ष/कुशल या उग्र। जो देवी भक्तों का मंगल करने में दक्ष हैं, उन्हें मङ्गलचण्डिका कहते हैं।
2. इस स्तोत्र की रचना किसने की?
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सबसे पहले भगवान शिव (शङ्कर) ने देवी की स्तुति इस स्तोत्र द्वारा की थी जब त्रिपुर दैत्य के साथ युद्ध में संकट आया था।
3. इसका पाठ कब करना चाहिए?
मंगलवार (Tuesday) को इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा नवरात्रि में और किसी भी नए कार्य के आरंभ से पहले इसे पढ़ा जा सकता है।
4. क्या यह मंगल दोष में लाभकारी है?
हाँ, कुंडली में मंगल दोष (Mangal Dosha) की शांति के लिए और विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए यह स्तोत्र रामबाण उपाय है।
5. इसके मुख्य लाभ क्या हैं?
सर्वत्र विजय, शत्रुओं का नाश, संतान प्राप्ति, धन-वैभव और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति इसके मुख्य फल हैं।
6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, स्त्रियाँ अपने सौभाग्य (सुहाग) की रक्षा और परिवार के कल्याण के लिए इसका पाठ विशेष रूप से करती हैं।