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Sri Mangala Chandika Stotram – श्री मङ्गलचण्डिका स्तोत्रम् | For Auspiciousness

Sri Mangala Chandika Stotram – श्री मङ्गलचण्डिका स्तोत्रम् | For Auspiciousness
॥ श्री मङ्गलचण्डिका स्तोत्रम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ देवीं षोडशवर्षीयां रम्यां सुस्थिरयौवनाम् । सर्वरूपगुणाढ्यां च कोमलाङ्गीं मनोहराम् ॥ १ ॥ श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ॥ २ ॥ बिभ्रतीं कबरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् । बिम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥ ३ ॥ ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् । जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥ ४ ॥ संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे ॥ ५ ॥ ॥ मूल स्तोत्रम् ॥ देव्याश्च ध्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने । प्रयतः सङ्कटग्रस्तो येन तुष्टाव शङ्करः ॥ ६ ॥ शङ्कर उवाच । रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मङ्गलचण्डिके । संहर्त्रि विपदां राशेर्हर्षमङ्गलकारिके ॥ ७ ॥ हर्षमङ्गलदक्षे च हर्षमङ्गलचण्डिके । शुभे मङ्गलदक्षे च शुभमङ्गलचण्डिके ॥ ८ ॥ मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्वमङ्गलमङ्गले । सतां मङ्गलदे देवि सर्वेषां मङ्गलालये ॥ ९ ॥ पूज्या मङ्गलवारे च मङ्गलाभीष्टदैवते । पूज्ये मङ्गलभूपस्य मनुवंशस्य सन्ततम् ॥ १० ॥ मङ्गलाधिष्ठातृदेवि मङ्गलानां च मङ्गले । संसारमङ्गलाधारे मोक्षमङ्गलदायिनि ॥ ११ ॥ सारे च मङ्गलाधारे पारे त्वं सर्वकर्मणाम् । प्रतिमङ्गलवारे च पूज्ये त्वं मङ्गलप्रदे ॥ १२ ॥ स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मङ्गलचण्डिकाम् । प्रतिमङ्गलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ॥ १३ ॥ देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रं यः शृणोति समाहितः । तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमङ्गलम् ॥ १४ ॥ प्रथमे पूजिता देवी शम्भुना सर्वमङ्गला । द्वितीये पूजिता देवी मङ्गलेन ग्रहेण च ॥ १५ ॥ तृतीये पूजिता भद्रा मङ्गलेन नृपेण च । चतुर्थे मङ्गले वारे सुन्दरीभिश्च पूजिता । पञ्चमे मङ्गलाकाङ्क्षैर्नरैर्मङ्गलचण्डिका ॥ १६ ॥ पूजिता प्रतिविश्वेषु विश्वेशैः पूजिता सदा । ततः सर्वत्र सम्पूज्य सा बभूव सुरेश्वरी ॥ १७ ॥ देवादिभिश्च मुनिभिर्मनुभिर्मानवैर्मुने । देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रं यः शृणोति समाहितः ॥ १८ ॥ तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमङ्गलम् । वर्धन्ते तत्पुत्रपौत्रा मङ्गलं च दिने दिने ॥ १९ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसंवादे मङ्गलचण्डिका स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

मङ्गलचण्डिका स्वरूप और महत्व

'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के प्रकृति खंड में इस स्तोत्र का वर्णन मिलता है। एक बार जब भगवान शिव को 'त्रिपुर' नामक असुर का वध करने में कठिनाई हो रही थी और वे संकटग्रस्त हो गए थे, तब भगवान विष्णु की सलाह पर उन्होंने देवी मङ्गलचण्डिका का ध्यान और स्तवन किया था।

देवी की कृपा से शिवजी को विजय प्राप्त हुई। तब से यह परंपरा बन गई कि किसी भी कार्य की सिद्धि और अमंगल (Bad luck) को दूर करने के लिए मंगलवार को देवी की पूजा की जाती है।

नाम और ध्यान का अर्थ (Meaning)

1. मङ्गलचण्डिका (Mangala Chandika)

इस नाम के दो भाग हैं - 'मंगल' और 'चंडिका'। 'मंगल' का अर्थ है शुभता देने वाली और 'चंडिका' का अर्थ है कोप (Anger) करने वाली। अर्थात, जो दुष्टों पर कोप करके भक्तों का मंगल करती हैं, वे मङ्गलचण्डिका हैं।

2. ध्यान (Dhyana)

स्तोत्र के आरंभ में देवी का अद्भुत ध्यान है। वे 'षोडशवर्षीयां' (16 वर्ष की कन्या के समान) नित्य यौवन वाली हैं। उनका वर्ण 'श्वेतचम्पक' (सफ़ेद चंपा के फूल) जैसा है और वे 'जगद्धात्री' (जगत का पालन करने वाली) हैं।

3. संसार रूपी सागर की नौका

श्लोक 5 में कहा गया है - 'संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे'। अर्थात, इस कठिन संसार रूपी सागर को पार करने के लिए देवी एक मजबूत नौका (Ship) के समान हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

सर्व अमंगल नाश

श्लोक 19 कहता है - 'तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमङ्गलम्'। यानी इस स्तोत्र को सुनने/पढ़ने वाले का हमेशा मंगल ही होता है, कभी अमंगल नहीं होता।

मंगल ग्रह शांति

श्लोक 15 में वर्णन है कि 'मंगल ग्रह' (Mars) ने भी देवी की पूजा की थी। अत: जिनकी कुंडली में मंगल भारी हो, उन्हें यह पाठ अवश्य करना चाहिए।

संतान और वंश वृद्धि

'वर्धन्ते तत्पुत्रपौत्रा' - इस पाठ से पुत्र-पौत्र और वंश की वृद्धि होती है।

विवाह और सौभाग्य

स्त्रियां अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याएं उत्तम वर प्राप्ति के लिए मंगलवार को यह व्रत/पाठ करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मङ्गलचण्डिका का अर्थ क्या है?

'मंगल' का अर्थ है शुभ/कल्याण और 'चंडिका' का अर्थ है दक्ष/कुशल या उग्र। जो देवी भक्तों का मंगल करने में दक्ष हैं, उन्हें मङ्गलचण्डिका कहते हैं।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सबसे पहले भगवान शिव (शङ्कर) ने देवी की स्तुति इस स्तोत्र द्वारा की थी जब त्रिपुर दैत्य के साथ युद्ध में संकट आया था।

3. इसका पाठ कब करना चाहिए?

मंगलवार (Tuesday) को इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा नवरात्रि में और किसी भी नए कार्य के आरंभ से पहले इसे पढ़ा जा सकता है।

4. क्या यह मंगल दोष में लाभकारी है?

हाँ, कुंडली में मंगल दोष (Mangal Dosha) की शांति के लिए और विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए यह स्तोत्र रामबाण उपाय है।

5. इसके मुख्य लाभ क्या हैं?

सर्वत्र विजय, शत्रुओं का नाश, संतान प्राप्ति, धन-वैभव और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति इसके मुख्य फल हैं।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ अपने सौभाग्य (सुहाग) की रक्षा और परिवार के कल्याण के लिए इसका पाठ विशेष रूप से करती हैं।