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श्री महागणपति स्तोत्रम् (Sri Maha Ganapathi Stotram) - राघवनचैतन्य कृत

Sri Maha Ganapathi Stotram

श्री महागणपति स्तोत्रम् (Sri Maha Ganapathi Stotram) - राघवनचैतन्य कृत
॥ श्री महागणपति स्तोत्रम् ॥ योगं योगविदां विधूतविविधव्यासङ्गशुद्धाशय प्रादुर्भूतसुधारसप्रसृमरध्यानास्पदाध्यासिनाम् । आनन्दप्लवमानबोधमधुरामोदच्छटामेदुरं तं भूमानमुपास्महे परिणतं दन्तावलास्यात्मना ॥ १ ॥ तारश्रीपरशक्तिकामवसुधारूपानुगं यं विदु- -स्तस्मै स्तात्प्रणतिर्गणाधिपतये यो रागिणाभ्यर्थ्यते । आमन्त्र्य प्रथमं वरेति वरदेत्यार्तेन सर्वं जनं स्वामिन्मे वशमानयेति सततं स्वाहादिभिः पूजितः ॥ २ ॥ कल्लोलाञ्चलचुम्बिताम्बुदतताविक्षुद्रवाम्भोनिधौ द्वीपे रत्नमये सुरद्रुमवनामोदैकमेदस्विनि । मूले कल्पतरोर्महामणिमये पीठेऽक्षराम्भोरुहे षट्कोणाकलितत्रिकोणरचनासत्कर्णिकेऽमुं भजे ॥ ३ ॥ चक्रप्रासरसालकार्मुकगदासद्बीजपूरद्विज- -व्रीह्यग्रोत्पलपाशपङ्कजकरं शुण्डाग्रजाग्रद्घटम् । आश्लिष्टं प्रियया सरोजकरया रत्नस्फुरद्भूषया माणिक्यप्रतिमं महागणपतिं विश्वेशमाशास्महे ॥ ४ ॥ दानाम्भःपरिमेदुरप्रसृमरव्यालम्बिरोलम्बभृ- -त्सिन्दूरारुणगण्डमण्डलयुगव्याजात्प्रशस्तिद्वयम् । त्रैलोक्येष्टविधानवर्णसुभगं यः पद्मरागोपमं धत्ते स श्रियमातनोतु सततं देवो गणानां पतिः ॥ ५ ॥ भ्राम्यन्मन्दरघूर्णनापरवशक्षीराब्धिवीचिच्छटा सच्छायाश्चलचामरव्यतिकरश्रीगर्वसर्वङ्कषाः । दिक्कान्ताघनसारचन्दनरसासाराः श्रयन्तां मनः स्वच्छन्दप्रसरप्रलिप्तवियतो हेरम्बदन्तत्विषः ॥ ६ ॥ मुक्ताजालकरम्बितप्रविकसन्माणिक्यपुञ्जच्छटा कान्ताः कम्बुकदम्बचुम्बितवनाभोगप्रवालोपमाः । ज्योत्स्नापूरतरङ्गमन्थरतरत्सन्ध्यावयस्याश्चिरं हेरम्बस्य जयन्ति दन्तकिरणाकीर्णाः शरीरत्विषः ॥ ७ ॥ शुण्डाग्राकलितेन हेमकलशेनावर्जितेन क्षर- -न्नानारत्नचयेन साधकजनान्सम्भावयन्कोटिशः । दानामोदविनोदलुब्धमधुपप्रोत्सारणाविर्भव- -त्कर्णान्दोलनखेलनो विजयते देवो गणग्रामणीः ॥ ८ ॥ हेरम्बं प्रणमामि यस्य पुरतः शाण्डिल्यमूले श्रिया बिभ्रत्याम्बुरुहे समं मधुरिपुस्ते शङ्खचक्रे वहन् । न्यग्रोधस्य तले सहाद्रिसुतया शम्भुस्तया दक्षिणे बिभ्राणः परशुं त्रिशूलमितया देव्या धरण्या सह ॥ ९ ॥ पश्चात्पिप्पलमाश्रितो रतिपतिर्देवस्य रत्योत्पले बिभ्रत्या सममैक्षवं धनुरिषून्पौष्पान्वहन्पञ्च च । वामे चक्रगदाधरः स भगवान्क्रोडः प्रियाङ्गोस्तले हस्तोद्यच्छुकशालिमञ्जरिकया देव्या धरण्या सह ॥ १० ॥ षट्कोणाश्रिषु षट्सु षड्गजमुखाः पाशाङ्कुशाभीवरा- -न्बिभ्राणाः प्रमदासखाः पृथुमहाशोणाश्मपुञ्जत्विषः । आमोदः पुरतः प्रमोदसुमुखौ तं चाभितो दुर्मुखः पश्चात्पार्श्वगतोऽस्य विघ्न इति यो यो विघ्नकर्तेति च ॥ ११ ॥ आमोदादिगणेश्वरप्रियतमास्तत्रैव नित्यं स्थिताः कान्ताश्लेषरसज्ञमन्थरदृशः सिद्धिः समृद्धिस्ततः । कान्तिर्या मदनावतीत्यपि तथा कल्पेषु या गीयते सान्या यापि मदद्रवा तदपरा द्राविण्यमूः पूजिताः ॥ १२ ॥ आश्लिष्टौ वसुधेत्यथो वसुमती ताभ्यां सितालोहितौ वर्षन्तौ वसुपार्श्वयोर्विलसतस्तौ शङ्खपद्मौ निधी । अङ्गान्यन्वथ मातरश्च परितः शक्रादयोऽब्जाश्रया- -स्तद्बाह्येः कुलिशादयः परिपतत्कालानलज्योतिषः ॥ १३ ॥ इत्थं विष्णुशिवादितत्त्वतनवे श्रीवक्रतुण्डाय हुं- -काराक्षिप्तसमस्तदैत्य पृतनाव्राताय दीप्तत्विषे । आनन्दैकरसावबोधलहरी विध्वस्तसर्वोर्मये सर्वत्र प्रथमानमुग्धमहसे तस्मै परस्मै नमः ॥ १४ ॥ सेवा हेवाकिदेवासुरनरनिकरस्फारकोटीरकोटी काटिव्याटीकमानद्युमणिसममणिश्रेणिभावेणिकानाम् । राजन्नीराजनश्रीसुखचरणनखद्योतविद्योतमानः श्रेयः स्थेयः स देयान्मम विमलदृशो बन्धुरं सिन्धुरास्यः ॥ १५ ॥ एतेन प्रकटरहस्यमन्त्रमाला- -गर्भेण स्फुटतरसंविदा स्तवेन । यः स्तौति प्रचुरतरं महागणेशं तस्येयं भवति वशंवदा त्रिलोकी ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्यवर्य श्रीराघवचैतन्य विरचितं महागणपति स्तोत्रम् ।।

श्री महागणपति स्तोत्र: एक परिचय

श्री महागणपति स्तोत्रम् (Sri Maha Ganapathi Stotram) श्री राघवचैतन्य द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। यह साधारण स्तोत्र नहीं, बल्कि एक 'मंत्र-गर्भ' (Mantra-Garbha) स्तोत्र है, जिसके श्लोकों में रहस्यमयी बीज मंत्र छिपे हुए हैं।

इसमें भगवान गणेश के उस विराट और मधुर स्वरूप का वर्णन है जो योगियों के ध्यान का केंद्र है। वे यहाँ केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि 'आनन्दप्लवमान' (आनंद में तैरते हुए) परब्रह्म हैं।

स्तोत्र का महत्व (Significance)

इस स्तोत्र का तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है:
  • तांत्रिक स्वरूप: श्लोक 3 और 4 में गणेश जी के 'रत्नमय द्वीप' (Island of Gems) पर स्थित कल्पवृक्ष के नीचे बैठे स्वरूप का ध्यान है, जो श्री विद्या (Sri Vidya) उपासना जैसा है।

  • वशीकरण शक्ति: श्लोक 2 में "मे वशमानय" (मुझे वश में लाओ/सबको मेरे वश में करो) की प्रार्थना है। यह आकर्षण और सम्मोहन (सकारात्मक अर्थ में) के लिए प्रसिद्ध है।

स्तोत्र के लाभ (Benefits)

साधक को इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित दिव्य फल प्राप्त होते हैं:

1. त्रिलोकी वशीकरण (Attraction & Influence)

अंतिम श्लोक का स्पष्ट कथन है - "तस्येयं भवति वशंवदा त्रिलोकी"। इसका पाठ करने वाले की वाणी और व्यक्तित्व में इतना तेज आ जाता है कि तीनों लोक उसके वश में हो जाते हैं।

2. अपार धन और समृद्धि (Immense Wealth)

श्लोक 13 में बताया गया है कि महागणपति के दोनों ओर 'शंख' और 'पद्म' निधियां धन की वर्षा कर रही हैं। यह साधक को कुबेर के समान वैभवशाली बनाता है।

3. राज-सम्मान (Royal Honor)

श्लोक 15 में वर्णन है कि देवताओं और असुरों के मुकुट मणियां (Crown Jewels) गणेश जी के चरणों में झुक रही हैं। इसके पाठ से समाज और राज्य में उच्च सम्मान मिलता है।

4. बाधाओं का पूर्ण नाश

'हुंकार' मात्र से दैत्य सेना को उड़ा देने वाले (श्लोक 14) गणेश जी साधक की सभी विघ्न-बाधाओं को जड़ से नष्ट कर देते हैं।

पाठ विधि (Recitation Method)

• समय: ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है।
• दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर मुख करके बैठें।
• आसन: लाल रंग का आसन (Red Mat) प्रयोग करें क्योंकि महागणपति की आभा 'माणिक्य' (Ruby) जैसी लाल है।
• विशेष प्रयोग: 40 दिनों तक लगातार पाठ करने से विशेष कार्य सिद्धि होती है। पाठ के अंत में गणेश जी को गुड़-नारियल का भोग लगाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री महागणपति स्तोत्रम् क्या है?

यह श्री राघव चैतन्य द्वारा रचित भगवान गणेश की एक अत्यंत प्रभावशाली और तांत्रिक महत्व वाली स्तुति है। यह गणेश जी के 'महागणपति' स्वरूप को समर्पित है, जो दस भुजाओं वाले और अपनी शक्ति (वल्लभा/सिद्धि) के साथ विराजमान हैं।

2. इसके रचयिता 'राघव चैतन्य' कौन थे?

श्री राघव चैतन्य एक महान सिद्ध और परमहंस परिव्राजकाचार्य थे। उनकी रचनाओं में गहरा दार्शनिक और तांत्रिक अर्थ छिपा होता है।

3. 'योगं योगविदां' श्लोक का क्या अर्थ है?

यह इसका पहला और सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। इसमें गणेश जी को योगियों (Yogis) का परम लक्ष्य 'योग' कहा गया है। वे 'आनंद' के सागर हैं और गजमुख होते हुए भी 'परब्रह्म' हैं।

4. इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ है?

अंतिम श्लोक (16) के अनुसार, इसके पाठ से 'त्रिलोकी वशंवदा' होती है, यानी तीनों लोक वश में हो जाते हैं। यह साधक को आकर्षण शक्ति, राज-सम्मान और परम शांति प्रदान करता है।

5. क्या यह धन प्राप्ति के लिए भी है?

हाँ, श्लोक 13 में 'शंख' और 'पद्म' निधियों की वर्षा का वर्णन है। यह स्तोत्र भौतिक समृद्धि (Samriddhi) और आध्यात्मिक सिद्धि (Siddhi) दोनों देता है।

6. श्लोक 11 में 'षड्गजमुखाः' कौन हैं?

यहाँ गणेश यंत्र के षट्कोण (Six corners) पर स्थित 6 अन्य गणेश रूपों (आमोद, प्रमोद, सुमुख, दुर्मुख, विघ्न, विघ्नकर्ता) का वर्णन है, जो मुख्य देवता की सेवा में हैं।

7. पाठ करने की सही विधि क्या है?

इसे प्रतिदिन प्रातः काल शुद्ध होकर पढ़ना चाहिए। विशेष कार्य सिद्धि के लिए इसे 40 दिनों तक नियमित रूप से पढ़ने का विधान है।

8. 'वल्लभेश' और 'महागणपति' में क्या अंतर है?

दोनों स्वरूपों में समानता है, लेकिन महागणपति स्वरूप में वे अपनी शक्ति (देवी) के साथ आलिंगनबद्ध (Embraced) दिखाए जाते हैं, जो सृजन और पालन की शक्ति का प्रतीक है।