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Sri Lalita Ashtottara Shatanama Divya Stotram – श्रीललिताऽष्टोत्तरशतनामदिव्यस्तोत्रम्

Sri Lalita Ashtottara Shatanama Divya Stotram – श्रीललिताऽष्टोत्तरशतनामदिव्यस्तोत्रम्
॥ श्रीः ॥ ॥ अथ श्रीललिताऽष्टोत्तरशतनामदिव्यस्तोत्रम् ॥ शिवप्रियाशिवाराध्या शिवेष्टा शिवकोमला । शिवोत्सवा शिवरसा शिवदिव्यशिखामणिः ॥ १॥ शिवपूर्णा शिवघना शिवस्था शिववल्लभा । शिवाभिन्ना शिवार्धाङ्गी शिवाधीना शिवंकरी ॥ २॥ शिवनामजपासक्ता शिवसांनिध्यकारिणी । शिवशक्तिः शिवाध्यक्षा शिवकामेश्वरी शिवा ॥ ३॥ शिवयोगीश्वरीदेवी शिवाज्ञावशवर्तिनी । शिवविद्यातिनिपुणा शिवपञ्चाक्षरप्रिया ॥ ४॥ शिवसौभाग्यसम्पन्ना शिवकैङ्कर्यकारिणी । शिवाङ्कस्था शिवासक्ता शिवकैवल्यदायिनी ॥ ५॥ शिवक्रीडा शिवनिधिः शिवाश्रयसमन्विता । शिवलीला शिवकला शिवकान्ता शिवप्रदा ॥ ६॥ शिवश्रीललितादेवी शिवस्य नयनामृता । शिवचिन्तामणिपदा शिवस्य हृदयोज्ज्वला ॥ ७॥ शिवोत्तमा शिवाकारा शिवकामप्रपूरिणी । शिवलिङ्गार्चनपरा शिवालिङ्गनकौतुकी ॥ ८॥ शिवालोकनसंतुष्टा शिवलोकनिवासिनी । शिवकैलासनगरस्वामिनी शिवरञ्जिनी ॥ ९॥ शिवस्याहोपुरुषिका शिवसंकल्पपूरका । शिवसौन्दर्यसर्वाङ्गी शिवसौभाग्यदायिनी ॥ १०॥ शिवशब्दैकनिरता शिवध्यानपरायणा । शिवभक्तैकसुलभा शिवभक्तजनप्रिया ॥ ११॥ शिवानुग्रहसम्पूर्णा शिवानन्दरसार्णवा । शिवप्रकाशसंतुष्टा शिवशैलकुमारिका ॥ १२॥ शिवास्यपङ्कजार्काभा शिवान्तःपुरवासिनी । शिवजीवातुकलिका शिवपुण्यपरंपरा ॥ १३॥ शिवाक्षमालासंतृप्ता शिवनित्यमनोहरा । शिवभक्तशिवज्ञानप्रदा शिवविलासिनी ॥ १४॥ शिवसंमोहनकरी शिवसांराज्यशालिनी । शिवसाक्षाद्ब्रह्मविद्या शिवताण्डवसाक्षिणी ॥ १५॥ शिवागमार्थतत्त्वज्ञा शिवमान्या शिवात्मिका । शिवकार्यैकचतुरा शिवशास्त्रप्रवर्तका ॥ १६॥ शिवप्रसादजननी शिवस्य हितकारिणी । शिवोज्ज्वला शिवज्योतिः शिवभोगसुखंकरी ॥ १७॥ शिवस्य नित्यतरुणी शिवकल्पकवल्लरी । शिवबिल्वार्चनकरी शिवभक्तार्तिभञ्जनी ॥ १८॥ शिवाक्षिकुमुदज्योत्स्ना शिवश्रीकरुणाकरा । शिवानन्दसुधापूर्णा शिवभाग्याब्धिचन्द्रिका ॥ १९॥ शिवशक्त्यैक्यललिता शिवक्रीडारसोज्ज्वला । शिवप्रेममहारत्नकाठिन्यकलशस्तनी ॥ २०॥ शिवलालितळाक्षार्द्रचरणांबुजकोमला । शिवचित्तैकहरणव्यालोलघनवेणिका ॥ २१॥ शिवाभीष्टप्रदानश्रीकल्पवल्लीकरांबुजा । शिवेतरमहातापनिर्मूलामृतवर्षिणी ॥ २२॥ शिवयोगीन्द्रदुर्वासमहिम्नस्तुतितोषिता । शिवसम्पूर्णविमलज्ञानदुग्धाब्धिशायिनी ॥ २३॥ शिवभक्ताग्रगण्येशविष्णुब्रह्मेन्द्रवन्दिता । शिवमायासमाक्रान्तमहिषासुरमर्दिनी । शिवदत्तबलोन्मत्तशुम्भाद्यसुरनाशिनी ॥ २४॥ शिवद्विजार्भकस्तन्यज्ञानक्षीरप्रदायिनी । शिवातिप्रियभक्तादिनन्दिभृङ्गिरिटिस्तुता ॥ २५॥ शिवानलसमुद्भूतभस्मोद्धूलितविग्रहा । शिवज्ञानाब्धिपारज्ञमहात्रिपुरसुन्दरी ॥ २६॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इत्येतल्ललितानाम्नामष्टोत्तरशतं मुने । अनेकजन्मपापघ्नं ललिताप्रीतिदायकम् ॥ २७॥ सर्वैश्वर्यप्रदं नॄणामाधिव्याधिनिवारणम् । यो मर्त्यः पठते नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ २८॥ ॥ इतिश्रीललितोपाख्याने स्तोत्रखण्डे श्रीललिताष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

परिचय: ललितोपाख्यान का दिव्य रहस्य

श्रीललिताऽष्टोत्तरशतनामदिव्यस्तोत्रम् हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र और रहस्यमयी ग्रंथों में से एक 'ब्रह्माण्ड पुराण' के 'ललितोपाख्यान' खण्ड से लिया गया है। यह वही खण्ड है जहाँ से विश्व प्रसिद्ध 'श्री ललिता सहस्रनाम' (1000 नाम) और 'श्री ललिता त्रिशती' (300 नाम) की उत्पत्ति हुई है। भगवान हयग्रीव (ज्ञान के अवतार विष्णु) और महर्षि अगस्त्य के बीच हुए उस महान संवाद में माँ ललिता की महिमा का अनंत गान किया गया है। उसी महान परंपरा का एक रत्न यह 'दिव्य स्तोत्र' है, जो मात्र २६ श्लोकों में देवी के १०८ नामों का संकलन करता है।

इस स्तोत्र को "दिव्य स्तोत्र" की उपाधि दी गई है, और इसका एक बहुत बड़ा कारण इसकी अद्वितीय संरचना है। इस स्तोत्र का प्रत्येक नाम "श" (Sha) अक्षर से आरंभ होता है, और अधिक स्पष्ट रूप से कहा जाए तो लगभग हर नाम "शिव" शब्द से शुरू होता है (जैसे- शिवप्रिया, शिवाराध्या, शिवघना, शिवार्धाङ्गी आदि)। संस्कृत में 'श' अक्षर कल्याण, शांति और परम मंगल का प्रतीक है। इसलिए इसे 'शकारादि स्तोत्र' (वह स्तोत्र जो 'श' अक्षर से शुरू होता है) भी कहा जाता है।

तांत्रिक और आगमिक दर्शन (विशेषकर श्रीविद्या) में यह स्थापित सिद्धांत है कि "शिव और शक्ति एक ही हैं"। चेतना (शिव) और उस चेतना की रचनात्मक ऊर्जा (शक्ति) को अलग नहीं किया जा सकता। जैसे अग्नि और उसका ताप, या सूर्य और उसका प्रकाश अभिन्न हैं, वैसे ही शिव और ललिता अभिन्न हैं। यह 'शिव-प्रधान' स्तोत्र इसी परम सत्य का काव्यात्मक उद्घोष है। जब साधक इन नामों का पाठ करता है, तो वह एक साथ भगवान शिव और माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी दोनों की आराधना कर रहा होता है।

विशिष्ट महत्व: शिव और शक्ति के अद्वैत का दर्शन

यह स्तोत्र केवल देवी की स्तुति नहीं है, बल्कि यह परब्रह्म के उस स्वरूप का वर्णन है जहाँ पुरुष और प्रकृति एकाकार हो जाते हैं। इस स्तोत्र के विशिष्ट नामों में बहुत गहरे आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं:

  • पूर्ण अद्वैत का बोध: श्लोक २ में देवी को 'शिवाभिन्ना' (शिव से अभिन्न), 'शिवार्धाङ्गी' (शिव का आधा अंग अर्थात् अर्धनारीश्वर), और 'शिवाधीना' (शिव के अधीन या शिव से जुड़ी हुई) कहा गया है। यह दर्शाता है कि देवी का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है, वे शिव का ही स्पंदन हैं।
  • भक्ति की पराकाष्ठा: यद्यपि देवी स्वयं परमेश्वर हैं, लेकिन श्लोक ४ में उन्हें 'शिवपञ्चाक्षरप्रिया' (शिव के पंचाक्षरी मंत्र "नमः शिवाय" से प्रेम करने वाली) और श्लोक ८ में 'शिवलिङ्गार्चनपरा' (शिवलिंग की पूजा में लीन रहने वाली) कहा गया है। यह देवी का वह सगुण रूप है जो भक्तों को सिखाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण कैसा होना चाहिए।
  • सृष्टि और प्रलय का रहस्य: श्लोक १५ में उन्हें 'शिवताण्डवसाक्षिणी' कहा गया है। जब महाप्रलय के समय भगवान शिव अपना संहारक तांडव नृत्य करते हैं और पूरा ब्रह्मांड लीन हो जाता है, तब केवल और केवल माँ ललिता ही उस दृश्य की एकमात्र साक्षी (देखने वाली) के रूप में उपस्थित रहती हैं।
  • ज्ञान प्रदात्री: श्लोक १४ में उन्हें 'शिवभक्तशिवज्ञानप्रदा' कहा गया है। जो लोग भगवान शिव के भक्त हैं, उन्हें साक्षात 'शिव-ज्ञान' (ब्रह्मज्ञान) प्रदान करने का कार्य माता ललिता ही करती हैं। बिना शक्ति की कृपा के शिव-तत्त्व को समझा नहीं जा सकता।

फलश्रुति लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र के अंत में (श्लोक २७-२८) महर्षि अगस्त्य को संबोधित करते हुए स्वयं भगवान हयग्रीव ने इसके पाठ के दिव्य लाभों (फलश्रुति) का वर्णन किया है:

  • पापों का नाश: "अनेकजन्मपापघ्नं" - यह स्तोत्र इतना शक्तिशाली है कि इसके नित्य पाठ से व्यक्ति के अनेक जन्मों के संचित पाप और बुरे कर्म भस्म हो जाते हैं।
  • देवी की कृपा प्राप्ति: "ललिताप्रीतिदायकम्" - यह स्तोत्र माता ललिता को अत्यंत प्रिय है। इसका पाठ करने वाले साधक पर देवी बहुत शीघ्र प्रसन्न होती हैं और अपना प्रेम बरसाती हैं।
  • सर्वैश्वर्य की प्राप्ति: "सर्वैश्वर्यप्रदं नॄणाम्" - यह मनुष्यों को सभी प्रकार के ऐश्वर्य (धन, धान्य, सुख, शांति और समृद्धि) प्रदान करने वाला है।
  • आधि और व्याधि का निवारण: "आधिव्याधिनिवारणम्" - 'आधि' का अर्थ है मानसिक रोग (चिंता, तनाव, डिप्रेशन) और 'व्याधि' का अर्थ है शारीरिक रोग। यह स्तोत्र मन और शरीर दोनों के रोगों को जड़ से समाप्त कर देता है।
  • सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: "यो मर्त्यः पठते नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्" - जो भी मनुष्य इस दिव्य स्तोत्र का नित्य (प्रतिदिन) पाठ करता है, उसकी सभी जायज़ इच्छाएं और कामनाएं निश्चित रूप से पूर्ण होती हैं।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

यह 'शिव-प्रधान' स्तोत्र होने के कारण इसका पाठ शिव और शक्ति दोनों की उपासना का फल देता है। इसके पूर्ण लाभ के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जा सकती है:

  • पवित्रता और समय: प्रातःकाल या संध्यकाल (विशेष रूप से प्रदोष काल, जो शिव पूजा के लिए सर्वोत्तम है) में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • शिव-शक्ति का ध्यान: पाठ से पूर्व अर्धनारीश्वर स्वरूप या शिव के वाम भाग में विराजमान माँ ललिता का ध्यान करें। सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • समर्पण: चूँकि देवी को शिव और शिव-पूजन प्रिय है (शिवबिल्वार्चनकरी - श्लोक १८), इसलिए पाठ करते समय या पाठ के बाद देवी के चित्र या शिवलिंग पर बिल्व पत्र (बेलपत्र) और लाल फूल (गुड़हल/गुलाब) अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • विशेष दिन: वैसे तो फलश्रुति में 'नित्य' (रोज़) पाठ करने को कहा गया है, लेकिन शुक्रवार, सोमवार, पूर्णिमा, अष्टमी और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र को 'दिव्य स्तोत्र' क्यों कहा गया है?

इसे 'दिव्य स्तोत्र' इसलिए कहा गया है क्योंकि इसका प्रत्येक नाम 'श' अक्षर और 'शिव' शब्द से शुरू होता है। यह एक अत्यंत दुर्लभ काव्यात्मक और आध्यात्मिक संरचना है जो शिव और शक्ति के पूर्ण अद्वैत (एक होने) को सिद्ध करती है।

2. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'ब्रह्माण्ड पुराण' के 'ललितोपाख्यान' खण्ड से उद्धृत है। यह वही महान ग्रंथ है जिसमें भगवान हयग्रीव और अगस्त्य मुनि के बीच माँ ललिता की महिमा का संवाद है।

3. क्या शिव भक्त भी माँ ललिता के इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, बिल्कुल। श्लोक 14 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि माँ ललिता "शिवभक्तशिवज्ञानप्रदा" हैं, अर्थात वे शिव भक्तों को शिव-तत्त्व का परम ज्ञान प्रदान करती हैं। शिव की पूर्ण कृपा पाने के लिए शक्ति की उपासना आवश्यक है।

4. स्तोत्र और नामावली में क्या अंतर है?

यह एक 'स्तोत्र' है, जो श्लोकों (छंदों) के रूप में एक काव्यात्मक स्तुति है जिसे लयबद्ध तरीके से गाया या पढ़ा जाता है। 'नामावली' में इन्हीं नामों को "ॐ [नाम] नमः" के रूप में अलग-अलग सूचीबद्ध किया जाता है, जिसका उपयोग पूजा में फूल या कुमकुम चढ़ाने (अर्चना) के लिए होता है।

5. फलश्रुति में 'आधि-व्याधि' का क्या अर्थ है?

'आधि' का अर्थ है मन की बीमारियां जैसे चिंता, तनाव, डिप्रेशन, और डर। 'व्याधि' का अर्थ है शरीर की बीमारियां और रोग। इस स्तोत्र का पाठ इन दोनों प्रकार के कष्टों का निवारण करता है।

6. श्लोक 15 में 'शिवताण्डवसाक्षिणी' का क्या रहस्य है?

महाप्रलय के समय जब सब कुछ नष्ट हो जाता है और भगवान शिव अपना संहारक तांडव करते हैं, तब कोई भी देवता उसे देखने के लिए जीवित नहीं रहता। केवल आद्या शक्ति माँ ललिता ही उस महा-तांडव की एकमात्र साक्षी (देखने वाली) होती हैं।

7. क्या मैं इस स्तोत्र का पाठ बिना दीक्षा के कर सकता हूँ?

हाँ। स्तोत्र पाठ के लिए किसी विशेष तांत्रिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती है। कोई भी श्रद्धालु पुरुष या महिला भक्ति भाव से इस कल्याणकारी स्तोत्र का पाठ कर सकता है।

8. 'शिवाहोपुरुषिका' (श्लोक 10) का क्या तात्पर्य है?

'अहोपुरुषिका' का अर्थ है गर्व, शक्ति या सामर्थ्य का प्रदर्शन। इसका अर्थ है कि देवी ललिता ही भगवान शिव का वास्तविक गर्व और उनकी शक्ति हैं। शिव का जो भी सामर्थ्य है, वह शक्ति के कारण ही है।

9. इस पाठ से वैवाहिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

चूँकि यह स्तोत्र शिव और पार्वती (ललिता) के आदर्श और शाश्वत प्रेम का वर्णन करता है (जैसे- शिवार्धाङ्गी, शिववल्लभा), इसका नियमित पाठ पति-पत्नी के बीच प्रेम, एकता और समझ को बढ़ाता है।

10. 108 नामों के पाठ में कितना समय लगता है?

यह स्तोत्र बहुत ही संक्षिप्त (केवल 26 श्लोक) और सरल है। एक बार इसके उच्चारण का अभ्यास हो जाने पर, इसे पढ़ने में मात्र 5 से 7 मिनट का समय लगता है, जिससे इसे नित्य पूजा में आसानी से शामिल किया जा सकता है।