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Sri Lakshmyashtottara Shatanama Stotram (Naradiya Purana) – श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

Sri Lakshmyashtottara Shatanama Stotram (Naradiya Purana) – श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
॥ श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ॥ ॥ पूर्वपीठिका ॥ एतत्स्तोत्रं महालक्ष्मीर्महेशना इत्यारब्धस्य सहस्रनामस्तोत्रस्याङ्गभूतम् । ॥ स्तोत्रम् ॥ ब्रह्मजा ब्रह्मसुखदा ब्रह्मण्या ब्रह्मरूपिणी । सुमतिः सुभगा सुन्दा प्रयतिर्नियतिर्यतिः ॥ १॥ सर्वप्राणस्वरूपा च सर्वेन्द्रियसुखप्रदा । संविन्मयी सदाचारा सदातुष्टा सदानता ॥ २॥ कौमुदी कुमुदानन्दा कुः कुत्सिततमोहरी । हृदयार्तिहरी हारशोभिनी हानिवारिणी ॥ ३॥ सम्भाज्या संविभज्याऽऽज्ञा ज्यायसी जनिहारिणी । महाक्रोधा महातर्षा महर्षिजनसेविता ॥ ४॥ कैटभारिप्रिया कीर्तिः कीर्तिता कैतवोज्झिता । कौमुदी शीतलमनाः कौसल्यासुतभामिनी ॥ ५॥ कासारनाभिः का सा याऽऽप्येषेयत्ताविवर्जिता । अन्तिकस्थाऽतिदूरस्था हृदयस्थाऽम्बुजस्थिता ॥ ६॥ मुनिचित्तस्थिता मौनिगम्या मान्धातृपूजिता । मतिस्थिरीकर्तृकार्यनित्यनिर्वहणोत्सुका ॥ ७॥ महीस्थिता च मध्यस्था द्युस्थिताऽधःस्थितोर्ध्वग । भूतिर्विभूतिः सुरभिः सुरसिद्धार्तिहारिणी ॥ ८॥ अतिभोगाऽतिदानाऽतिरूपाऽतिकरुणाऽतिभाः । विज्वरा वियदाभोगा वितन्द्रा विरहासहा ॥ ९॥ शूर्पकारातिजननी शून्यदोषा शुचिप्रिया । निःस्पृहा सस्पृहा नीलासपत्नी निधिदायिनी ॥ १०॥ कुम्भस्तनी कुन्दरदा कुङ्कुमालेपिता कुजा । शास्त्रज्ञा शास्त्रजननी शास्त्रज्ञेया शरीरगा ॥ ११॥ सत्यभास्सत्यसङ्कल्पा सत्यकामा सरोजिनी । चन्द्रप्रिया चन्द्रगता चन्द्रा चन्द्रसहोदरी ॥ १२॥ औदर्यौपयिकी प्रीता गीता चौता गिरिस्थिता । अनन्विताऽप्यमूलार्तिध्वान्तपुञ्जरविप्रभा ॥ १३॥ मङ्गला मङ्गलपरा मृग्या मङ्गलदेवता । कोमला च महालक्ष्मीः नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १४॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ नारद उवाच- इत्येवं नामसाहस्रं साष्टोत्तरशतं श्रियः । कथितं ते महाराज भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १॥ भूतानामवताराणां तथा विष्णोर्भविष्यताम् । लक्ष्म्या नित्यानुगामिन्याः गुणकर्मानुसारतः ॥ २॥ उदाहृतानि नामानि सारभूतानि सर्वतः । इदन्तु नामसाहस्रं ब्रह्मणा कथितं मम ॥ ३॥ उपांशुवाचिकजपैः प्रीयेतास्य हरिप्रिया । लक्ष्मीनामसहस्रेण श्रुतेन पठितेन वा ॥ ४॥ धर्मार्थी धर्मलाभी स्यात् अर्थार्थी चार्थवान् भवेत् । कामार्थी लभते कामान् सुखार्थी लभते सुखम् ॥ ५॥ इहामुत्र च सौख्याय लक्ष्मीभक्तिहितङ्करी । इदं श्रीनामसाहस्रं रहस्यानां रहस्यकम् ॥ ६॥ गोप्यं त्वया प्रयत्नेन अपचारभयाच्छ्रियः । नैतद्व्रात्याय वक्तव्यं न मूर्खाय न दम्भिने ॥ ७॥ न नास्तिकाय नो वेदशास्त्रविक्रयकारिणे । वक्तव्यं भक्तियुक्ताय दरिद्राय च सीदते ॥ ८॥ सकृत्पठित्व श्रीदेव्याः नामसाहस्रमुत्तमम् । दारिद्र्यान्मुच्यते पुर्वं जन्मकोटिभवान्नरः ॥ ९॥ त्रिवारपठनादस्याः सर्वपापक्षयो भवेत् । पञ्चचत्वारिंशदहं सायं प्रातः पठेत्तु यः ॥ १०॥ तस्य सन्निहिता लक्ष्मीः किमतोऽधिकमाप्यते । अमायां पौर्णमास्यां च भृगुवारेषु सङ्क्रमे ॥ ११॥ प्रातः स्नात्वा नित्यकर्म यथाविधि समाप्य च । स्वर्णपात्रेऽथ रजते कांस्यपात्रेऽथवा द्विजः ॥ १२॥ निक्षिप्य कुङ्कुमं तत्र लिखित्वाऽष्टदलाम्बुजम् । कर्णिकामध्यतो लक्ष्मीं बीजं साधु विलिख्य च ॥ १३॥ प्रागादिषु दलेष्वस्य वाणीब्राह्म्यादिमातृकाः । विलिख्य वर्णतोऽथेदं नामसाहस्रमादरात् ॥ १४॥ यः पठेत् तस्य लोकस्तु सर्वेऽपि वशगास्ततः । राज्यलाभः पुत्रपौत्रलाभः शत्रुजयस्तथा ॥ १५॥ सङ्कल्पादेव तस्य स्यात् नात्र कार्या विचारणा । अनेन नामसहस्रेणार्चयेत् कमलां यदि ॥ १६॥ कुङ्कुमेनाथ पुष्पैर्वा न तस्य स्यात्पराभवः । उत्तमोत्तमता प्रोक्ता कमलानामिहार्चने ॥ १७॥ तदभावे कुङ्कुमं स्यात् मल्लीपुष्पाञ्जलिस्ततः । जातीपुष्पाणि च ततः ततो मरुवकावलिः ॥ १८॥ पद्मानामेव रक्तत्वं श्लाघितं मुनिसत्तमैः । अन्येषां कुसुमानान्तु शौक्ल्यमेव शिवार्चने ॥ १९॥ प्रशस्तं नृपतिश्रेष्ठ तस्माद्यत्नपरो भवेत् । किमिहात्र बहूक्तेन लक्ष्मीनामसहस्रकम् ॥ २०॥ वेदानां सरहस्यानां सर्वशास्त्रगिरामपि । तन्त्राणामपि सर्वेषां सारभूतं न संशयः ॥ २१॥ सर्वपापक्षयकरं सर्वशत्रुविनाशनम् । दारिद्र्यध्वंसनकरं पराभवनिवर्तकम् ॥ २२॥ विश्लिष्टबन्धुसंश्लेषकारकं सद्गतिप्रदम् । तन्वन्ते चिन्मयात्म्यैक्यबोधादानन्ददायकम् ॥ २३॥ लक्ष्मीनामसहस्रं तत् नरोऽवश्यं पठेत्सदा । योऽसौ तात्पर्यतः पाठी सर्वज्ञः सुखितो भवेत् ॥ २४॥ अकारादिक्षकारान्तनामभिः पूजयेत्सुधीः । तस्य सर्वेप्सितार्थसिद्धिर्भवति निश्चितम् ॥ २५॥ श्रियं वर्चसमारोग्यं शोभनं धान्यसम्पदः । पशूनां बहुपुत्राणां लाभश्च सम्भावेद्ध्रुवम् ॥ २६॥ शतसंवत्सरं विंशत्युतरं जीवितं भवेत् । मङ्गलानि तनोत्येषा श्रीविद्यामङ्गला शुभा ॥ २७॥ ॥ इति नारदीयोपपुराणान्तर्गतं श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् — एक महा-रहस्य का उद्घाटन

नारदीय उपपुराण में वर्णित यह 108 नामों का स्तोत्र सामान्य नामावली नहीं है। पूर्वपीठिका में स्पष्ट उल्लेख है—"एतत्स्तोत्रं महालक्ष्मीर्महेशना इत्यारब्धस्य सहस्रनामस्तोत्रस्याङ्गभूतम्"। इसका अर्थ है कि यह उन 1000 नामों (सहस्रनाम) का सार (Essence) है जिसकी शुरुआत 'महालक्ष्मीर्महेशना' से होती है। जो साधक समयाभाव के कारण 1000 नाम नहीं पढ़ सकते, वे यदि इन 108 नामों का पाठ करें, तो उन्हें संपूर्ण 1000 नामों की ऊर्जा और फल प्राप्त होता है।

अष्ट-ऐश्वर्य और चतुर्वर्ग प्रदाता: नारद जी कहते हैं (श्लोक 5) कि इस पाठ को करने वाला व्यक्ति जो चाहता है, वही पाता है। "धर्मार्थी धर्मलाभी स्यात् अर्थार्थी चार्थवान् भवेत्" — धर्म की इच्छा रखने वाले को धर्म, धन चाहने वाले को धन, कामनाओं वाले को काम और सुख चाहने वाले को परम सुख (मोक्ष) मिलता है।

गोपनीयता और पात्रता: श्लोक 7 और 8 में एक अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी दी गई है — "रहस्यानां रहस्यकम्" (यह रहस्यों का भी रहस्य है)। इसे घमंडी (दम्भिने), मूर्ख, नास्तिक और वेदों का व्यापार करने वालों (वेदशास्त्रविक्रयकारिणे) को नहीं देना चाहिए। यह केवल सच्चे आस्तिक और दरिद्रता से पीड़ित भक्तों (दरिद्राय च सीदते) का दुख दूर करने के लिए है।

यंत्र पूजा और विशेष साधना विधान (The Secret Yantra Worship)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 12 से 14) में एक अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली 'यंत्र साधना' का विधान बताया गया है, जो किसी भी साधक को रंक से राजा बना सकता है:

  • यंत्र निर्माण: प्रातःकाल स्नान करके एक सोने (स्वर्ण), चांदी (रजत), या कांसे (कांस्य) की थाली लें। उसमें शुद्ध कुमकुम घोलकर एक 'अष्टदल कमल' (8 पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएं।
  • बीज मंत्र स्थापन: उस कमल के बीच (कर्णिका) में माता लक्ष्मी का महाबीज मंत्र 'श्रीं' लिखें।
  • मातृका स्थापन: कमल की आठों पंखुड़ियों पर पूर्व दिशा से शुरू करके 'ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी' (अष्टमातृका) का ध्यान करें।
  • 45-दिवसीय अनुष्ठान (Mandala): "पञ्चचत्वारिंशदहं सायं प्रातः पठेत्तु यः" (श्लोक 10) — जो साधक इस यंत्र के सामने लगातार 45 दिनों तक सुबह और शाम इस स्तोत्र का पाठ करता है, माँ लक्ष्मी साक्षात उसके घर में सान्निध्य (निवास) ग्रहण करती हैं।

लाल कमल का महात्म्य (Importance of Red Lotus)

माँ लक्ष्मी की पूजा में पुष्पों का बहुत महत्व है, जिसका वर्णन श्लोक 17-19 में किया गया है:

  • लाल कमल: "पद्मानामेव रक्तत्वं श्लाघितं मुनिसत्तमैः" — मुनियों ने माँ लक्ष्मी की पूजा के लिए 'लाल कमल' को सर्वश्रेष्ठ (उत्तमोत्तम) माना है। यदि लाल कमल से 108 नामों का अर्चन किया जाए, तो जीवन में कभी पराजय (पराभव) नहीं होती।
  • विकल्प: यदि लाल कमल उपलब्ध न हो, तो कुमकुम चढ़ाना चाहिए। कुमकुम भी न हो तो चमेली (मल्ली), जूही (जाती), या मरुवक के पुष्पों से अंजलि देनी चाहिए।
  • शिवजी की पूजा में सफेद फूल (शौक्ल्यमेव शिवार्चने) शुभ होते हैं, लेकिन माँ लक्ष्मी 'लाल रंग' से सर्वाधिक प्रसन्न होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'नारदीय उपपुराण' (Naradiya Upapurana) से उद्धृत है। यह देवर्षि नारद द्वारा एक राजा को सुनाया गया अत्यंत गुप्त और परम कल्याणकारी उपदेश है।

2. इस स्तोत्र का 'सहस्रनाम' से क्या संबंध है?

स्तोत्र के आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है कि यह 108 नाम 'महालक्ष्मीर्महेशना' से आरंभ होने वाले 1000 नामों (सहस्रनाम) का सार या अंग है। इसे पढ़ने से संपूर्ण 1000 नामों का फल मिलता है।

3. इस पाठ को कितनी बार करने से क्या लाभ होता है?

फलश्रुति के अनुसार, 1 बार पढ़ने से करोड़ों जन्मों की दरिद्रता मिटती है, 3 बार पढ़ने से सभी पाप नष्ट होते हैं, और 45 दिनों तक सुबह-शाम पढ़ने से माँ लक्ष्मी घर में साक्षात निवास करती हैं।

4. इस स्तोत्र में कौन सी 'यंत्र पूजा' बताई गई है?

सोने, चांदी या कांसे के बर्तन में कुमकुम से 'अष्टदल कमल' बनाएं। बीच में लक्ष्मी का बीज मंत्र (श्रीं) लिखें और उसकी पूजा करें। यह विधान अचूक राजयोग देता है।

5. महालक्ष्मी की पूजा में कौन सा पुष्प सर्वश्रेष्ठ बताया गया है?

श्लोक 19 में स्पष्ट कहा गया है 'पद्मानामेव रक्तत्वं श्लाघितं मुनिसत्तमैः' अर्थात् मुनियों ने माँ की पूजा में 'लाल कमल' (Red Lotus) को ही सर्वश्रेष्ठ माना है।

6. यदि लाल कमल न हो, तो किन पुष्पों का उपयोग करें?

श्लोक 18 के अनुसार, कमल के अभाव में कुमकुम, चमेली (मल्ली), जूही (जाती), या मरुवक के पुष्पों से अंजलि देनी चाहिए।

7. क्या यह स्तोत्र किसी को भी सुनाया जा सकता है?

नहीं, श्लोक 7-8 में चेतावनी है कि यह रहस्यमयी स्तोत्र नास्तिक, मूर्ख, घमंडी, या वेदों का व्यापार करने वालों को नहीं बताना चाहिए। इसे केवल आस्तिक, भक्त और दरिद्रता से पीड़ित व्यक्ति को ही दें।

8. क्या इस पाठ से संतान सुख प्राप्त होता है?

जी हाँ, श्लोक 15 और 26 में 'पुत्रपौत्रलाभः' और 'बहुपुत्राणां लाभश्च' कहा गया है। यह वंश वृद्धि और उत्तम संतान प्राप्ति के लिए सिद्ध पाठ है।

9. इस स्तोत्र का पाठ करने से कितनी आयु प्राप्त होती है?

श्लोक 27 के अनुसार, जो व्यक्ति इस स्तोत्र का निष्ठापूर्वक पाठ करता है, वह 120 वर्ष (शतसंवत्सरं विंशत्युतरं) की पूर्ण और स्वस्थ आयु प्राप्त करता है।

10. श्लोक 25 में 'अकारादिक्षकारान्तनामभिः' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'अ' (A) से लेकर 'क्ष' (Ksha) तक के सभी वर्णों (Alphabets) से युक्त नामों से पूजा करना। यह दर्शाता है कि माँ लक्ष्मी साक्षात 'शब्द-ब्रह्म' या वाग्देवी स्वरूपा हैं, जो समस्त वेदों और मंत्रों की जननी हैं।