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Sri Indira Ashtottara Shatanama Stotram – 108 Names of Indira (Lakshmi)

Sri Indira Ashtottara Shatanama Stotram – 108 Names of Indira (Lakshmi)
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ इन्दिरा विष्णुहृदयमन्दिरा पद्मसुन्दरा । नन्दिताऽखिलभक्तश्रीर्नन्दिकेश्वरवन्दिता ॥ १ ॥ (जो परम "इन्दिरा" (ऐश्वर्यशाली) हैं, जो भगवान विष्णु के हृदय रूपी मंदिर में निवास करती हैं। जो कमल के समान सुंदर हैं, जो समस्त भक्तों को आनंदित करती हैं और नन्दिकेश्वर (शिव के गण) द्वारा वंदित हैं।) केशवप्रियचारित्रा केवलानन्दरूपिणी । केयूरहारमञ्जीरा केतकीपुष्पधारणी ॥ २ ॥ (जिनका चरित्र केशव (कृष्ण/विष्णु) को अत्यंत प्रिय है, जो केवल "आनंद" स्वरूप हैं। जो बाजूबंद, हार और नूपुर धारण करती हैं तथा (शिव पूजा में वर्जित) केतकी पुष्प को भी स्वीकार करती हैं।) कारुण्यकवितापाङ्गी कामितार्थप्रदायनी । कामधुक्सदृशा शक्तिः कालकर्मविधायिनी ॥ ३ ॥ (जिनके नेत्रों के कोने करुणा से भरे हैं, जो भक्तों की हर मनचाही इच्छा पूरी करती हैं। जो कामधेनु के समान शक्ति हैं और जो "काल" (समय) तथा "कर्म" का विधान रचती हैं।) जितदारिद्र्यसन्दोहा धृतपङ्केरुहद्वयी । कृतविद्ध्यण्डसंरक्षा नतापत्परिहारिणी ॥ ४ ॥ (जिन्होंने दरिद्रता के समूह को जीत लिया है (नष्ट कर दिया है), जो दो कमल धारण करती हैं। जो ब्रह्मांड की रक्षा करती हैं और नमन करने वालों की विपत्तियों (आपद) का हरण करती हैं।) नीलाभ्राङ्गसरोनेत्रा नीलोत्पलसुचन्द्रिका । नीलकण्ठमुखाराध्या नीलाम्बरमुखस्तुता ॥ ५ ॥ (जिनका अंग "नीले बादल" के समान (श्याम) है और आँखें सरोवर जैसी हैं। जो नीलकमल की तरह सुंदर हैं। जिनकी आराधना स्वयं नीलकंठ (शिव) करते हैं और जिनकी स्तुति नीलांबर (बलराम/शनि) करते हैं।) सर्ववेदान्तसन्दोहशुक्तिमुक्ताफलायिता । समुद्रतनया सर्वसुरकान्तोपसेविता ॥ ६ ॥ (जो समस्त वेदान्त रूपी सीपियों (Oysters) में "मोती" (Pearl) के समान अमूल्य हैं। जो समुद्र की पुत्री हैं और समस्त देवताओं की पत्नियों द्वारा सेवित हैं।) भार्गवी भानुमत्यादिभाविता भार्गवात्मजा । भास्वत्कनकताटङ्का भानुकोट्यधिकप्रभा ॥ ७ ॥ (जो भृगु ऋषि की पुत्री (भार्गवी) हैं। जिनके कानों में चमकते हुए सोने के कुंडल हैं और जिनकी आभा (तेज) करोड़ों सूर्यों से भी अधिक है।) पद्मसद्मपवित्राङ्गी पद्मास्या च परात्परा । पद्मनाभप्रियसती पद्मभूस्तन्यदायिनी ॥ ८ ॥ (जिनका घर कमल है, जिनका अंग पवित्र है और मुख कमल जैसा है। जो "परात्परा" (सर्वोच्च शक्ति) हैं। जो पद्मनाभ (विष्णु) की प्रिय पत्नी हैं और जिन्होंने ब्रह्मा (पद्मभू) को भी (माता रूप में) अपना दूध पिलाया।) भक्तदारिद्र्यशमनी मुक्तिसाधकदायिनी । भुक्तिभोग्यप्रदा भव्यशक्तिमदीश्वरी ॥ ९ ॥ (जो भक्तों की गरीबी का शमन (नाश) करती हैं। जो मुक्ति चाहने वालों को साधन देती हैं और भोग चाहने वालों को भोग-विलास प्रदान करती हैं।) जन्ममृत्युज्वरत्रस्तजनजीवातुलोचना । जगन्माता जयकरी जयशीला सुखप्रदा ॥ १० ॥ (जो जन्म-मृत्यु रूपी बुखार से डरे हुए लोगों के लिए "संजीवन-बूटी" (जीवातु) समान हैं। जो जगत की माता हैं, सदा विजय करने वाली और सुख देने वाली हैं।) चारुसौभाग्यसद्विद्या चामरद्वयशोभिता । चामीकरप्रभा सर्वचातुर्यफलरूपिणी ॥ ११ ॥ (जो सुंदर सौभाग्य और "सद्विद्या" (ब्रह्मविद्या) देने वाली हैं। जिन पर दो चंवर डुलाए जा रहे हैं। जो सोने (चामीकर) जैसी चमक वाली हैं और सभी तरह की चतुराई (Cleverness/Skill) का फल हैं।) राजीवनयनारम्या रामणीयकजन्मभूः । राजराजार्चितपदा राजमुद्रास्वरूपिणी ॥ १२ ॥ (जिनके नेत्र राजीव (कमल) जैसे सुंदर हैं। जो सुंदरता की जन्मभूमि (स्रोत) हैं। कुबेर (राजराज) जिनके चरणों की पूजा करते हैं, और जो "राजमुद्रा" (Royal Authority) स्वरूप हैं।) तारुण्यवनसारङ्गी तापसार्चितपादुका । तात्त्विकी तारकेशार्कताटङ्कद्वयमण्डिता ॥ १३ ॥ (जो यौवन रूपी वन में विहार करने वाली हिरणी जैसी चंचल हैं। तपस्वी जिनकी चरण-पादुका पूजते हैं। जो सूर्य और चंद्रमा (तारकेश+अर्क) रूपी कर्णफूल (Earrings) धारण करती हैं।) भव्यविश्राणनोद्युक्ता सव्यक्तसुखविग्रहा । दिव्यवैभवसम्पूर्णा नव्यभक्तिशुभोदया ॥ १४ ॥ (जो भव्य दान देने के लिए सदा तैयार (उद्युक्त) रहती हैं। जिनका शरीर साक्षात् सुख स्वरूप है। जो दिव्य वैभव से परिपूर्ण हैं और नवीन भक्ति का उदय करती हैं।) तरुणादित्यताम्रश्रीः करुणारसवाहिनी । शरणागतसन्त्राणचरणा करुणेक्षणा ॥ १५ ॥ (जिनकी कांति उगते हुए सूर्य (तरुण आदित्य) जैसी तांबे के रंग की है। जो करुणा रस की नदी हैं। जिनके चरण शरण में आए लोगों की रक्षा करते हैं।) वित्तदारिद्र्यशमनी वित्तक्लेशनिवारिणी । मत्तहंसगतिः सर्वसत्तासामान्यरूपिणी ॥ १६ ॥ (जो धन की कमी (वित्त-दारिद्र्य) को मिटाती हैं और धन से जुड़े कलेश (विवाद) दूर करती हैं। जिनकी चाल मदमस्त हंस जैसी है और जो "सर्व-सत्ता" (Supreme Existence) हैं।) वाल्मीकिव्यासदुर्वासोवालखिल्यादिवाञ्छिता । वारिजेक्षणहृत्केकिवारिदायितविग्रहा ॥ १७ ॥ (वाल्मीकि, व्यास, दुर्वासा और बालखिल्य जैसे ऋषि जिनकी इच्छा (आराधना) करते हैं। जो कमल नयन (विष्णु) के हृदय रूपी मयूर (मोर) के लिए बादल (वारिद) के समान हैं - अर्थात विष्णु को आनंदित करती हैं।) दृष्ट्याऽऽसादितविद्ध्यण्डा सृष्ट्यादिमहिमोच्छ्रया । आस्तिक्यपुष्पभृङ्गी च नास्तिकोन्मूलनक्षमा ॥ १८ ॥ (जो अपनी एक दृष्टि से ब्रह्मांड को चलाती हैं। सृष्टि रचना जिनकी महिमा है। जो आस्तिकता रूपी फूल पर भौंरे (Bee) की तरह हैं और जो नास्तिकता को जड़ से उखाड़ने में सक्षम हैं।) कृतसद्भक्तिसन्तोषा कृत्तदुर्जनपौरुषा । सञ्जीविताशेषभाषा सर्वाकर्षमतिस्नुषा ॥ १९ ॥ (जो सच्ची भक्ति से ही संतोष पाती हैं। जो दुष्टों के पौरुष (अहंकार) को काट देती हैं। जिन्होंने समस्त भाषाओं को जीवित (Sanjivita) किया है, अर्थात वाणी की देवी।) नित्यशुद्धा परा बुद्धा सत्या संविदनामया । विजया विष्णुरमणी विमला विजयप्रदा ॥ २० ॥ (जो नित्य शुद्ध, परम ज्ञान (बुद्धा) और सत्य स्वरूप हैं। जो "रोग-मुक्त" (अनामय) चेतना हैं। जो विष्णु की पत्नी (विजया) हैं और भक्तों को सदा विजय (Victory) प्रदान करती हैं।) श्रीङ्कारकामदोग्ध्री च ह्रीङ्कारतरुकोकिला । ऐङ्कारपद्मलोलम्बा क्लीङ्कारामृतनिम्नगा ॥ २१ ॥ (जो "श्रीं" बीज रूप में कामनाओं को दुहने वाली कामधेनु हैं। "ह्रीं" बीज रूपी वृक्ष पर कोकिला हैं। "ऐं" बीज रूपी कमल पर भ्रमरी हैं और "क्लीं" बीज रूपी अमृत की नदी हैं। (तांत्रिक महामंत्र)) तपनीयाभसुतनुः कमनीयस्मितानना । गणनीयगुणग्रामा शयनीयोरगेश्वरा ॥ २२ ॥ (जिनका शरीर तपे हुए सोने (Tapaniya) जैसा है, जिनके मुख पर मनमोहक मुस्कान है। जिनके गुण गिने नहीं जा सकते और जो शेषनाग (उरगेश्वर) की शय्या पर विष्णु के साथ विराजती हैं।) रमणीयसुवेषाढ्या करणीयक्रियेश्वरी । स्मरणीयचरित्रा च तरुणी यज्ञरूपिणी ॥ २३ ॥ (जो सुंदर वेशभूषा से युक्त हैं। जो "करने योग्य" सभी कार्यों की ईश्वर (प्रेरणा) हैं। जिनका चरित्र स्मरण करने योग्य है और जो नित्य तरुणी (Young) तथा यज्ञ स्वरूप हैं।) श्रीवृक्षवासिनी योगिधीवृत्तिपरिभाविता । प्रावृड्भार्गववारार्च्या संवृतामरभामिनी ॥ २४ ॥ (जो श्री वृक्ष (बिल्व/तुलसी) में निवास करती हैं। योगी अपनी बुद्धि (धी-वृत्ति) में जिनका ध्यान करते हैं। वर्षा ऋतु में जिनकी विशेष पूजा होती है।) तनुमध्या भगवती मनुजापिवरप्रदा । लक्ष्मी बिल्वाश्रिता पातु सोऽष्टोत्तरशतस्तुता ॥ २५ ॥ (जिनकी कमर पतली (तनुमध्या) है, जो मनुष्यों को भी वरदान देती हैं। वह बिल्व में रहने वाली "माँ लक्ष्मी" इन 108 नामों की स्तुति से प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करें।) ॥ इति इन्दिराष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
बीज मंत्रों का रहस्य (Secrets of Verse 21)
श्लोक 21 इस पूरे स्तोत्र का प्राण है। इसमें माँ लक्ष्मी के 4 प्रमुख तांत्रिक बीज मंत्र छिपे हैं।
बीजश्लोक में नामशक्ति और लाभ (Power & Benefit)
श्रीं (Shreem)श्रीङ्कार कामदोग्ध्रीमूल लक्ष्मी बीज। यह कामधेनु की तरह सभी भौतिक इच्छाओं (Wealth) को पूरा करता है।
ह्रीं (Hreem)ह्रीङ्कार तरुकोकिलाभुवनेश्वरी/माया बीज। यह आकर्षण शक्ति और राज-सत्ता (Power) दिलाता है।
ऐं (Aim)ऐङ्कार पद्मलोलम्बासरस्वती/वाग् बीज। यह वाणी में सिद्धि (Speech) और ज्ञान देता है।
क्लीं (Kleem)क्लीङ्कार अमृतनिम्नगाकामराज/कृष्ण बीज। यह सौन्दर्य, प्रेम और सम्मोहन (Magnetism) का प्रतीक है।
इन्दिरा: नील और स्वर्ण स्वरूप (Blue & Golden Forms)
नील स्वरूप (Verse 5):

माँ यहाँ 'नीलाभ' (Blue Cloud) और 'नीलकमल' जैसी हैं। यह उनका 'पापनाशक' और उग्र-सौम्य रूप है, जो शिव (नीलकण्ठ) को प्रिय है। यह रूप तंत्र साधना में शीघ्र फल देता है।

स्वर्ण स्वरूप (Verse 11):

श्लोक 11 में वे 'चामीकरप्रभा' (Pure Gold radiance) हैं। यह उनका 'धनदायक' रूप है, जो गृहस्थों के लिए समृद्धि का स्रोत है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. इन्दिरा अष्टोत्तर का पाठ कब करना चाहिए?
शुक्रवार और पूर्णिमा इसके लिए विशेष शुभ हैं। नवरात्रि की रात्रियों में इसका पाठ 'वाक सिद्धि' (वाणी की शक्ति) और अपार धन वर्षा कराता है।
2. 'नास्तिकोन्मूलनक्षमा' (श्लोक 18) का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है - 'नास्तिकता को जड़ से उखाड़ने में सक्षम'। माँ लक्ष्मी केवल धन नहीं देतीं, वे मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा (Faith) भी जगाती हैं। धन पाकर जो अहंकार आता है, यह स्तोत्र उसका नाश करता है।
3. क्या बीज मंत्रों (श्रीं ह्रीं...) का अलग से जाप करें?
श्लोक 21 का पाठ करते समय यदि आप इन बीज मंत्रों पर थोड़ा रुककर (Pause) ध्यान करें, तो यह पूरे स्तोत्र की शक्ति को 100 गुना बढ़ा देता है। अलग से जाप की आवश्यकता नहीं है, स्तोत्र ही पर्याप्त है।
4. 'केतकीपुष्पधारणी' (श्लोक 2) का क्या महत्व है?
केतकी का फूल शिव पूजा में वर्जित है (शाप के कारण), लेकिन माँ लक्ष्मी उसे धारण करती हैं। यह दर्शाता है कि लक्ष्मी जी नियमों से परे हैं और वे 'शाप-मुक्त' करने वाली शक्ति हैं।
5. विद्यार्थियों के लिए यह कैसे उपयोगी है?
श्लोक 11 में उन्हें 'सद्विद्या' और 'चातुर्यफलरूपिणी' (चतुराई देने वाली) कहा गया है। साथ ही 'ऐं' बीज (सरस्वती) की उपस्थिति इसे छात्रों के लिए बुद्धि और मेमोरी बढ़ाने वाला बनाती है।
6. क्या यह नामकरण (Naming) के लिए प्रयुक्त होता है?
हाँ। इसमें आए नाम (जैसे - नन्दिता, भव्यशक्ति, चारु, विमला) बच्चियों के नामकरण के लिए बहुत शुभ माने जाते हैं।
7. 'राजमुद्रास्वरूपिणी' (श्लोक 12) का अर्थ?
इसका अर्थ है - 'राजकीय मुहर' (Royal Seal) जैसी अधिकार सम्पन्न। जो लोग सरकारी नौकरी, उच्च पद (Promotion) या राजनीति में सफलता चाहते हैं, उन्हें इस नाम का ध्यान करना चाहिए।
8. क्या बिल्व पत्र से पूजा कर सकते हैं?
हाँ। अंतिम श्लोक (25) में कहा गया है - 'लक्ष्मी बिल्वाश्रिता'। बिल्व पत्र से पूजा करने पर यह स्तोत्र अमोघ फल देता है।
9. 'विजयप्रदा' (श्लोक 20) से क्या लाभ है?
यह नाम कोर्ट-कचहरी (Legal cases) और शत्रुओं पर विजय दिलाता है। जीवन के हर संघर्ष में जीत के लिए इसका पाठ करें।
10. 'सञ्जीविताशेषभाषा' (श्लोक 19) का क्या रहस्य है?
इसका अर्थ है - 'सभी भाषाओं को जीवित करने वाली'। जो लोग लेखक, कवि, वक्ता या गायक (Singers) हैं, उनके लिए यह इन्दिरा स्तोत्र वरदान है।