श्री केतु स्तोत्रम् (पुराणोक्तम्)
Sri Ketu Stotram — 12 Names for Health & Eclipse Protection

श्री केतु स्तोत्रम् (पुराणोक्त) — परिचय
श्री केतु स्तोत्रम् पुराणों में वर्णित एक अत्यंत प्रभावशाली और "गुह्य" (Secret) प्रार्थना है। यह स्तोत्र एक संवाद के रूप में है, जहाँ गौतम ऋषि ने सूत जी (पुराण वक्ता) से एक ऐसा उपाय पूछा जो "सर्व रोग नाशक" (Sarva Roga Haram) हो। उत्तर में सूत जी ने यह स्तोत्र सुनाया, जिसे पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा जी ने कहा था।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह केतु के "सौम्य" रूप की नहीं, बल्कि "उग्र और महाक्रूर" रूपों की चर्चा करता है। यह स्वीकार करता है कि केतु के पास सूर्य और चन्द्रमा को भी ग्रसने (Eclipse) की शक्ति है। केतु की इस विध्वंसक शक्ति को नमन करके उसे शांत किया जाता है।
ऋषि परिचय: इस स्तोत्र के ऋषि वामदेव हैं। वामदेव भगवान शिव के पंचमुखी स्वरूपों में से एक हैं और अघोर/तंत्र विद्या के प्रवर्तक हैं। केतु भी एक मोक्षकारक और रहस्यमयी ग्रह है, इसलिए वामदेव का ऋषित्व अत्यंत सार्थक है।
केतु के 12 नाम और उनका अर्थ
इस स्तोत्र में केतु के 12 नाम (Dwadasha Nama) बताए गए हैं, जो उनके विभिन्न लक्षणों को दर्शाते हैं:
अन्य नाम: कपिलाक्ष, हिमगर्भ, कृत्तकण्ठ (कटे गले वाला), नरपीठग (मनुष्य की सवारी करने वाला), श्रीकण्ठ, गदायुध (गदा धारण करने वाला)।
कुलुत्थ और षट्कोण मंडल (Tantric Ritual)
श्लोक 8 और 9 में केतु की शांति के लिए एक विशेष तांत्रिक विधि बताई गई है:
- कुलुत्थ धान्य (Horse Gram): केतु का प्रिय अनाज 'कुलथी' है। विधि के अनुसार, जमीन पर कुलथी फैलाकर उस पर षट्कोण (Six-pointed star) बनाना चाहिए।
- नील घट (Blue Pot): षट्कोण के ऊपर एक नीला घड़ा स्थापित करें।
- दिवाकर-निशाकर: उस मंडल में सूर्य और चन्द्रमा की भी स्थापना करें, क्योंकि केतु का प्रभाव इन्हीं पर (ग्रहण के रूप में) सबसे अधिक होता है।
- चित्रा नक्षत्र: श्लोक 11 में 'चित्रातारे प्रदापयेत्' कहा गया है। अर्थात, जब आकाश में 'चित्रा' नक्षत्र हो, उस समय ब्राह्मण को दान देना चाहिए। चित्रा नक्षत्र मंगल का नक्षत्र है, और केतु मंगलवत (Mars-like) है।
इस विधि का पालन करने से केतु जनित भय समाप्त होता है। यदि आप विधि नहीं कर सकते, तो केतु मङ्गल स्तोत्र का सरल पाठ भी लाभकारी है।
ग्रहण और रोग निवारण (Eclipse & Disease)
इस स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है — "पर्वकाले पीडयन्ति दिवाकरनिशाकरौ"। केतु अमावस्या और पूर्णिमा (पर्व काल) पर सूर्य और चन्द्रमा को पीड़ा देता है, जिससे ग्रहण लगता है।
जब केतु (रोग कारक) सूर्य (आत्मा/सेहत) को ग्रसता है, तो शरीर में ऐसे रोग उत्पन्न होते हैं जिनका निदान (Diagnosis) मुश्किल होता है। इस स्तोत्र का पाठ उन "अदृश्य बाधाओं" और "असाध्य रोगों" को काटने के लिए अमोघ अस्त्र है। केतु को प्रसन्न करने से वह शरीर से विष (Toxins) और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकाल देता है।