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श्री केतु स्तोत्रम् (पुराणोक्तम्)

Sri Ketu Stotram — 12 Names for Health & Eclipse Protection

श्री केतु स्तोत्रम् (पुराणोक्तम्)
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ अथ केतुस्तोत्रम् ॥ विनियोगः ॐ अस्य श्रीकेतुस्तोत्रमहामन्त्रस्य वामदेव ॠषिः । अनुष्टुप्छन्दः । केतुर्देवता । केतुप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ॥ पीठिका (संवाद) ॥ गौतम उवाच । मुनीन्द्र सूत तत्त्वज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । सर्वरोगहरं ब्रूहि केतोः स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ १॥ सूत उवाच । शृणु गौतम वक्ष्यामि स्तोत्रमेतदनुत्तमम् । गुह्याद्गुह्यतमं केतोः ब्रह्मणा कीर्तितं पुरा ॥ २॥ ॥ केतु द्वादश नाम स्तोत्रम् ॥ आद्यः करालवदनो द्वितीयो रक्तलोचनः । तृतीयः पिङ्गलाक्षश्च चतुर्थो ज्ञानदायकः ॥ ३॥ पञ्चमः कपिलाक्षश्च षष्ठः कालाग्निसन्निभः । सप्तमो हिमगर्भश्च धूम्रवर्णोष्टमस्तथा ॥ ४॥ नवमः कृत्तकण्ठश्च दशमः नरपीठगः । एकादशस्तु श्रीकण्ठः द्वादशस्तु गदायुधः ॥ ५॥ ॥ माहात्म्य (Importance) ॥ द्वादशैते महाक्रूराः सर्वोपद्रवकारकाः । पर्वकाले पीडयन्ति दिवाकरनिशाकरौ ॥ ६॥ नामद्वादशकं स्तोत्रं केतोरेतन्महात्मनः । पठन्ति येऽन्वहं भक्त्या तेभ्यः केतुः प्रसीदति ॥ ७॥ ॥ पूजन विधि (Ritual) ॥ कुलुक्थधान्ये विलिखेत् षट्कोणं मण्डलं शुभम् । पद्ममष्टदलं तत्र विलिखेच्च विधानतः ॥ ८॥ नीलं घटं च संस्थाप्य दिवाकरनिशाकरौ । केतुं च तत्र निक्षिप्य पूजयित्वा विधानतः ॥ ९॥ स्तोत्रमेतत्पठित्वा च ध्यायन् केतुं वरप्रदम् । ब्राह्मणं श्रोत्रियं शान्तं पूजयित्वा कुटुम्बिनम् ॥ १०॥ केतोः करालवक्त्रस्य प्रतिमां वस्त्रसंयुताम् । कुम्भादिभिश्च संयुक्तां चित्रातारे प्रदापयेत् ॥ ११॥ ॥ फलश्रुति ॥ दानेनानेन सुप्रीतः केतुः स्यात्तस्य सौख्यदः । वत्सरं प्रयता भूत्वा पूजयित्वा विधानतः ॥ १२॥ मूलमष्टोत्तरशतं ये जपन्ति नरोत्तमाः । तेषां केतुप्रसादेन न कदाचिद्भयं भवेत् ॥ १३॥ ॥ इति केतुस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री केतु स्तोत्रम् (पुराणोक्त) — परिचय

श्री केतु स्तोत्रम् पुराणों में वर्णित एक अत्यंत प्रभावशाली और "गुह्य" (Secret) प्रार्थना है। यह स्तोत्र एक संवाद के रूप में है, जहाँ गौतम ऋषि ने सूत जी (पुराण वक्ता) से एक ऐसा उपाय पूछा जो "सर्व रोग नाशक" (Sarva Roga Haram) हो। उत्तर में सूत जी ने यह स्तोत्र सुनाया, जिसे पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा जी ने कहा था।

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह केतु के "सौम्य" रूप की नहीं, बल्कि "उग्र और महाक्रूर" रूपों की चर्चा करता है। यह स्वीकार करता है कि केतु के पास सूर्य और चन्द्रमा को भी ग्रसने (Eclipse) की शक्ति है। केतु की इस विध्वंसक शक्ति को नमन करके उसे शांत किया जाता है।

ऋषि परिचय: इस स्तोत्र के ऋषि वामदेव हैं। वामदेव भगवान शिव के पंचमुखी स्वरूपों में से एक हैं और अघोर/तंत्र विद्या के प्रवर्तक हैं। केतु भी एक मोक्षकारक और रहस्यमयी ग्रह है, इसलिए वामदेव का ऋषित्व अत्यंत सार्थक है।

केतु के 12 नाम और उनका अर्थ

इस स्तोत्र में केतु के 12 नाम (Dwadasha Nama) बताए गए हैं, जो उनके विभिन्न लक्षणों को दर्शाते हैं:

1. करालवदन (Karalavadana)
भयानक मुख वाला। यह केतु के डरावने स्वरूप को दर्शाता है।
2. रक्तलोचन (Raktalochana)
लाल नेत्रों वाला। क्रोध और ऊर्जा का प्रतीक।
3. पिङ्गलाक्ष (Pingalaksha)
पीली/भूरी आँखों वाला (Owl-eyed)। रहस्यमयी दृष्टि।
4. ज्ञानदायक (Gyanadayaka)
सबसे महत्वपूर्ण नाम। इतना क्रूर होने के बाद भी केतु ही 'मोक्ष' और 'आत्मज्ञान' का दाता है।
5. कालाग्निसन्निभ
प्रलय काल की अग्नि के समान। जो कर्मों को जलाकर भस्म कर दे।
6. धूम्रवर्ण (Dhumravarna)
धुएं के रंग वाला। यह केतु की 'छाया ग्रह' (Shadow Planet) प्रकृति है।

अन्य नाम: कपिलाक्ष, हिमगर्भ, कृत्तकण्ठ (कटे गले वाला), नरपीठग (मनुष्य की सवारी करने वाला), श्रीकण्ठ, गदायुध (गदा धारण करने वाला)।

कुलुत्थ और षट्कोण मंडल (Tantric Ritual)

श्लोक 8 और 9 में केतु की शांति के लिए एक विशेष तांत्रिक विधि बताई गई है:

  • कुलुत्थ धान्य (Horse Gram): केतु का प्रिय अनाज 'कुलथी' है। विधि के अनुसार, जमीन पर कुलथी फैलाकर उस पर षट्कोण (Six-pointed star) बनाना चाहिए।
  • नील घट (Blue Pot): षट्कोण के ऊपर एक नीला घड़ा स्थापित करें।
  • दिवाकर-निशाकर: उस मंडल में सूर्य और चन्द्रमा की भी स्थापना करें, क्योंकि केतु का प्रभाव इन्हीं पर (ग्रहण के रूप में) सबसे अधिक होता है।
  • चित्रा नक्षत्र: श्लोक 11 में 'चित्रातारे प्रदापयेत्' कहा गया है। अर्थात, जब आकाश में 'चित्रा' नक्षत्र हो, उस समय ब्राह्मण को दान देना चाहिए। चित्रा नक्षत्र मंगल का नक्षत्र है, और केतु मंगलवत (Mars-like) है।

इस विधि का पालन करने से केतु जनित भय समाप्त होता है। यदि आप विधि नहीं कर सकते, तो केतु मङ्गल स्तोत्र का सरल पाठ भी लाभकारी है।

ग्रहण और रोग निवारण (Eclipse & Disease)

इस स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है — "पर्वकाले पीडयन्ति दिवाकरनिशाकरौ"। केतु अमावस्या और पूर्णिमा (पर्व काल) पर सूर्य और चन्द्रमा को पीड़ा देता है, जिससे ग्रहण लगता है।

जब केतु (रोग कारक) सूर्य (आत्मा/सेहत) को ग्रसता है, तो शरीर में ऐसे रोग उत्पन्न होते हैं जिनका निदान (Diagnosis) मुश्किल होता है। इस स्तोत्र का पाठ उन "अदृश्य बाधाओं" और "असाध्य रोगों" को काटने के लिए अमोघ अस्त्र है। केतु को प्रसन्न करने से वह शरीर से विष (Toxins) और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकाल देता है।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह केतु स्तोत्र अन्य मंत्रों से कैसे भिन्न है?

सामान्यतः केतु का बीज मंत्र जपा जाता है, लेकिन यह स्तोत्र एक 'संवाद' (Dialogue) है जिसमें केतु के 12 विशिष्ट नामों का उल्लेख है। इसे विशेष रूप से 'सर्व रोग हरं' (सभी रोगों को हरने वाला) कहा गया है और इसमें तांत्रिक विधि भी वर्णित है।

2. इस स्तोत्र में केतु को 'महाक्रूर' क्यों कहा गया है?

श्लोक 6 में उन्हें 'महाक्रूर' इसलिए कहा गया है क्योंकि ग्रहण (Eclipse) के समय वे सूर्य और चन्द्रमा जैसे प्रत्यक्ष देवताओं को भी पीड़ित करते हैं। यह केतु की प्रचंड और अनियंत्रित शक्ति को दर्शाता है।

3. कुलुत्थ (Kuluktha) धान्य क्या है और इसका प्रयोग कैसे करें?

'कुलुत्थ' का अर्थ है 'कुलथी' (Horse Gram)। यह गहरे भूरे/काले रंग की दाल होती है। केतु की शांति के लिए कुलथी के ढेर पर षट्कोण (Hexagram) बनाकर पूजा करने या कुलथी का दान करने का विधान है।

4. चित्रा नक्षत्र में दान का क्या महत्व है?

चित्रा नक्षत्र के स्वामी मंगल देव हैं। ज्योतिष में 'कुजवत केतु' कहा गया है, अर्थात केतु मंगल की तरह फल देता है। इसलिए चित्रा नक्षत्र में केतु निमित्त दान करना सीधे केतु को शांत करता है।

5. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

ग्रहण काल (Solar/Lunar Eclipse) के दौरान, केतु की महादशा-अंतर्दशा में, या जब कोई अज्ञात बीमारी (Undiagnosed Disease) परेशान कर रही हो, तब इसका पाठ करना चाहिए।

6. क्या केतु केवल कष्ट देते हैं?

नहीं, इन 12 नामों में चौथा नाम 'ज्ञानदायक' है। केतु कष्ट देकर सांसारिक मोह भंग करते हैं और परम ज्ञान (Moksha) प्रदान करते हैं। वे मोक्ष के द्वारपाल हैं।

7. कालाग्निसन्निभ का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'प्रलय काल की अग्नि के समान'। यह केतु की विध्वंसक ऊर्जा को दर्शाता है जो पुराने और सड़े-गले कर्मों को जलाकर भस्म कर देती है ताकि नया सृजन हो सके।

8. वामदेव ऋषि का इस स्तोत्र से क्या संबंध है?

इस स्तोत्र के विनियोग में 'वामदेव' को इसका ऋषि बताया गया है। वामदेव भगवान शिव का ही एक रूप है, जो वैराग्य और अघोर विद्या के स्वामी हैं। केतु शिव के गणों के समान ही विचित्र और शक्तिशाली हैं।

9. 'कृत्तकण्ठ' नाम का क्या रहस्य है?

'कृत्तकण्ठ' का अर्थ है 'कटा हुआ गला'। यह उस पौराणिक घटना की ओर संकेत करता है जब मोहिनी रूप में भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु-केतु का सिर काट दिया था। केतु धड़ (Headless body) हैं।

10. क्या ग्रहण के समय यह पाठ सुरक्षा देता है?

हाँ, श्लोक 6 में स्पष्ट लिखा है कि केतु पर्वकाल (ग्रहण) में सूर्य-चन्द्र को पीड़ित करते हैं। अतः ग्रहण के समय इस स्तोत्र का पाठ साधक को ग्रहण की नकारात्मक तरंगों (Radiation) से बचाता है।