Sri Kashi Vishwanatha Ashtottara Shatanama Stotram – श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

(धन्यवादः – काशीपुरीवास गुरुमूर्ति शिवयोगि श्री निर्मल रामनाथ शर्म महोदयः)
अखिलागमसंस्तुतं अजादिदेववन्दितम् ।
अखण्डमण्डलाकारं अनेकजनसेवितम् ॥ १ ॥
अनाद्यन्तस्वयम्भूतं आशापाशविमोचकम् ।
आनन्दकाननाधीशं चैवानन्दप्रदायकम् ॥ २ ॥
इहलोकस्पृहानेकपरिपूरकस्वामिनम् ।
ईशित्वाद्यष्टसिद्धिनं इन्द्रियग्रामदैवतम् ॥ ३ ॥
उरगराजभूषणं उडुराजविभूषितम् ।
ऊर्ध्वलिङ्गं उमाकान्तं उरुदुःखविमोचकम् ॥ ४ ॥
महोज्ज्वलस्वरूपं च त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकम् ।
अन्नपूर्णाविशालाक्षीनाथं गङ्गाधरं विभुम् ॥ ५ ॥
भावनामात्रसन्तुष्टहृदयं हृदयेश्वरम् ।
भूतभव्यभवन्नाथं भवरोगहरं हरम् ॥ ६ ॥
महाश्मशानदेवेशं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।
महोक्षवाहनारूढं मृगहस्तं महेश्वरम् ॥ ७ ॥
उग्रं भीमं मृडं शर्वं सर्वैश्वर्यप्रदायकम् ।
नन्दीश्वरादिसंस्तुतं त्रिनेत्रं ताण्डवेश्वरम् ॥ ८ ॥
विश्वेशं विश्वरूपं च विश्वकारणमव्ययम् ।
विषकण्ठं विरूपाक्षं वीरभद्रप्रियं शिवम् ॥ ९ ॥
महादेवं महेशानं महनीयगुणाकरम् ।
श्रीमणिकर्णिकेशं च श्रीमाधवप्रियं प्रभुम् ॥ १० ॥
महादेवीसमायुक्तशरीरं परमेश्वरम् ।
मृत्युञ्जयं मृडानीशं महाभयनिवारकम् ॥ ११ ॥
भक्तमानसरोवरविहारासक्तः शूलिनम् ।
भवदुःखविभञ्जकं भक्तवरप्रदायकम् ॥ १२ ॥
गङ्गास्नपितसर्वाङ्गं बिल्वपत्रादिपूजितम् ।
नानालङ्कारसम्युक्तं दिव्यगन्धानुलेपितम् ॥ १३ ॥
त्रयीवेद्यं त्रिलोकेशं तापत्रयप्रभञ्जकम् ।
त्रिपुरसुन्दरीरूपं त्र्यम्बकं त्रिपुरान्तकम् ॥ १४ ॥
वाराणसीपुराधीशं वररुद्राक्षधारिणम् ।
व्यालयज्ञोपवीतिनं व्याघ्रचर्मविभूषितम् ॥ १५ ॥
सुरासुरनमस्कृतश्रीमच्चरणपङ्कजम् ।
सदैकरसरूपं च सदानटनतत्परम् ॥ १६ ॥
सत्यज्ञानात्मकं सोमं सोमसूर्याग्निलोचनम् ।
कालभैरवमीशानं कालाग्निरुद्रमीश्वरम् ॥ १७ ॥
शुद्धकैवल्यरूपं च शुद्धविद्याप्रदायकम् ।
शान्तं पद्मासनस्थं च श्रीकण्ठं चन्द्रशेखरम् ॥ १८ ॥
गिरीशं गिरिजापतिं पशुपाशविमोचकम् ।
यज्ञेशं नीलग्रीवं च योगिहृत्पद्मवासिनम् ॥ १९ ॥
कोटिसूर्यसमप्रभं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां साक्षीभूतं चिदात्मकम् ॥ २० ॥
सर्वव्यापकदेवेशं विश्वनाथमहर्निशम् ।
सदैवलिङ्गरूपं तं परानन्दपरात्परम् ॥ २१ ॥
अष्टोत्तरैकशिवनाम समन्वितं यत्
स्तोत्रं पठन्ति मनुजा भुवि भक्तियुक्ताः ।
सम्प्राप्य लौकिकसुखानि परं लभन्ते
देहावसानसमये शिव सम्प्रसादात् ॥ २२ ॥
इति श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥
श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय
श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। भक्तजन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं।
पाठ के लाभ (Benefits)
- मानसिक शांति: तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है और मन स्थिर होता है।
- विघ्न नाश: जीवन आने वाली बाधाएं भगवान शिव की कृपा से दूर होती हैं।
- समृद्धि: घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
- भक्ति: भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा दृढ़ होती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्या समय (प्रदोष काल) सर्वोत्तम है।
- शुद्धि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- आसन: पूजा कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ध्यान: भगवान शिव के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, विशेषकर सोमवार और मासिक शिवरात्रि के दिन इसका महत्व अधिक है।
2. क्या संस्कृत न जानने वाले भी पाठ कर सकते हैं?
हाँ, आप हिंदी अर्थ समझकर या श्रवण (सुनकर) भी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। भाव मुख्य है।
3. श्री काशीविश्वनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् के पाठ से क्या फल मिलता है?
इसके नियमित पाठ से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, भय का नाश होता है और जीवन में शांति आती है।