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Sri Kamakala Kali Bhujanga Prayata Stotram – श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्

Sri Kamakala Kali Bhujanga Prayata Stotram – श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् ॥ महाकाल उवाच । अथ वक्ष्ये महेशानि देव्याः स्तोत्रमनुत्तमम् । यस्य स्मरणमात्रेण विघ्ना यान्ति पराङ्मुखाः ॥ १ ॥ (महाकाल कहते हैं—हे महेशानि! अब मैं देवी का वह अनुत्तम (सर्वश्रेष्ठ) स्तोत्र कहता हूँ, जिसके स्मरण मात्र से ही सभी विघ्न परामुख होकर (पीठ दिखाकर) भाग जाते हैं।) विजेतुं प्रतस्थे यदा कालकस्या- -सुरान् रावणो मुञ्जमालिप्रवर्हान् । तदा कामकालीं स तुष्टाव वाग्भि- -र्जिगीषुर्मृधे बाहुवीर्येण सर्वान् ॥ २ ॥ (जब रावण कालक (असुरों) और मुंजमालि आदि श्रेष्ठ असुरों को जीतने के लिए प्रस्थित हुआ, तब युद्ध में अपनी बाहुओं के बल से सबको जीतने की इच्छा रखने वाले (जिगीषु) उस रावण ने वाणी द्वारा कामकाली की स्तुति की।) महावर्तभीमासृगब्ध्युत्थवीची- -परिक्षालिता श्रान्तकन्थश्मशाने । चितिप्रज्वलद्वह्निकीलाजटाले- -शिवाकारशावासने सन्निषण्णाम् ॥ ३ ॥ (मैं उन देवी का ध्यान करता हूँ जो श्मशान में विराजमान हैं, जहाँ रक्त के महासागर (असृगब्धि) की भयंकर लहरें (वीची) उठ रही हैं। जो जलती हुई चिता की अग्नि ज्वालाओं से घिरे हुए शिवरूपी शव के आसन (Shavasana) पर बैठी हैं।) महाभैरवीयोगिनीडाकिनीभिः करालाभिरापादलम्बत्कचाभिः । भ्रमन्तीभिरापीय मद्यामिषास्रा- -न्यजस्रं समं सञ्चरन्तीं हसन्तीम् ॥ ४ ॥ (जो महाभैरवी, योगिनी और डाकिनियों से घिरी हुई हैं। जिनके बाल पैरों तक लटक रहे हैं, जो मद्य और रक्त का पान करके निरंतर भ्रमण कर रही हैं और हँस रही हैं।) महाकल्पकालान्तकादम्बिनीत्विट्- -परिस्पर्धिदेहद्युतिं घोरनादाम् । स्फुरद्द्वादशादित्यकालाग्निरुद्र- -ज्वलद्विद्युदोघप्रभादुर्निरीक्ष्याम् ॥ ५ ॥ (जिनकी देह की कांति महाप्रलय के समय के बादलों (कादम्बिनी) की तरह श्याम वर्ण की है। जो घोर नाद (गर्जना) करने वाली हैं। जो १२ सूर्यों (द्वादश आदित्य) और कालाग्नि रुद्र के समान प्रज्वलित हैं, जिनकी चमक बिजली के समूह जैसी है और जिन्हें (तेज के कारण) देखना कठिन है।) लसन्नीलपाषाणनिर्माणवेदि- -प्रभश्रोणिविम्बां चलत्पीवरोरुम् । समुत्तुङ्गपीनायतोरोजकुम्भां कटिग्रन्थितद्वीपिकृत्युत्तरीयाम् ॥ ६ ॥ (जिनके नितम्ब नील मणियों से बनी वेदी के समान सुंदर और विशाल हैं। जिनकी जंघाएँ (Thighs) पीवर (मांसल) और चंचल हैं। जिनका वक्षस्थल उन्नत है और जो कमर में व्याघ्रचर्म (द्वीपिकृति) का उत्तरीय बाँधे हुए हैं।) स्रवद्रक्तवल्गन्नृमुण्डावनद्धा- -सृगावद्धनक्षत्रमालैकहाराम् । मृतब्रह्मकुल्योपक्लुप्ताङ्गभूषां महाट्‍टाट्‍टहासैर्जगत्त्रासयन्तीम् ॥ ७ ॥ (जो रक्त टपकते हुए नरमुंडों की माला और नक्षत्र माला धारण करती हैं। मृत ब्राह्मणों (ब्रह्मकुल) की हड्डियों से जिनके आभूषण बने हैं। जो अपने महा-अट्टहास से तीनों लोकों को भयभीत कर रही हैं।) निपीताननान्तामितोद्वृत्तरक्तो- -च्छलद्धारया स्नापितोरोजकुम्भां । महादीर्घदंष्ट्रायुगन्यञ्चदञ्च- -ल्ललल्लेलिहानोग्रजिह्वाग्रभागाम् ॥ ८ ॥ (जिनका मुख आसव (रक्त/मद्य) पान से रंगा हुआ है और उसी रक्त की धारा से उनका वक्षस्थल भीग गया है। जिनकी दो लंबी और भयानक दाढ़ें हैं और जो अपनी लपलपाती हुई उग्र जिह्वा चला रही हैं।) चलत्पादपद्मद्वयालम्बिमुक्त- -प्रकम्पालिसुस्निग्धसम्भुग्नकेशाम् । पदन्याससम्भारभीताहिराजा- -ननोद्गच्छदात्मस्तुतिव्यस्तकर्णाम् ॥ ९ ॥ (जिनके चलने से कमल रूपी चरणों तक खुले हुए, काले, चिकने बाल लहराते हैं। जिनके पैरों के भारी प्रहार (पदन्यास) से डरकर शेषनाग (अहिराज) अपने मुख से उनकी स्तुति कर रहे हैं, जिसे सुनने में वे व्यस्त हैं।) महाभीषणां घोरविंशार्धवक्त्रै- -स्तथासप्तविंशान्वितैर्लोचनैश्च । पुरोदक्षवामे द्विनेत्रोज्ज्वलाभ्यां तथान्यानने त्रित्रिनेत्राभिरामाम् ॥ १० ॥ (जो अत्यंत भीषण हैं, जिनके १० मुख (विंशार्ध = 20 का आधा) हैं और कुल २७ नेत्र हैं। सामने, दाएं और बाएं मुख में २-२ नेत्र उज्ज्वल हैं और अन्य मुखों में ३-३ नेत्र सुशोभित हैं।) लसद्द्वीपिहर्यक्षफेरुप्लवङ्ग- -क्रमेलर्क्षतार्क्षद्विपग्राहवाहैः । मुखैरीदृशाकारितैर्भ्राजमानां महापिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् ॥ ११ ॥ (जिनके मुख व्याघ्र (द्वीपि), सिंह, सियार (फेरु), बंदर (प्लवङ्ग), ऊंट (क्रमेल), भालू (ऋक्ष), गरुड़ (तार्क्ष), हाथी और मगरमच्छ जैसे आकार के हैं। जो पीली (पिङ्गल) जटाओं के भार से सुशोभित हैं।) भुजैः सप्तविंशाङ्कितैर्वामभागे युतां दक्षिणे चापि तावद्भिरेव । क्रमाद्रत्नमालां कपालं च शुष्कं ततश्चर्मपाशं सुदीर्घं दधानाम् ॥ १२ ॥ (जिनके बाएं भाग में २७ और दाएं भाग में भी २७ (कुल ५४) भुजाएं हैं। जो क्रमशः रत्नमाला, सूखा कपाल और लंबा चर्म-पाश धारण करती हैं...) ततः शक्तिखट्वाङ्गमुण्डं भुशुण्डीं धनुश्चक्रघण्टाशिशुप्रेतशैलान् । ततो नारकङ्कालबभ्रूरगोन्मा- -दवंशीं तथा मुद्गरं वह्निकुण्डम् ॥ १३ ॥ (...शक्ति, खट्वांग, मुंड, भुशुण्डी, धनुष, चक्र, घंटा, शिशु प्रेत, पर्वत, नर-कंकाल, भूरा सर्प, उन्माद वंशी, मुद्गर और अग्निकुंड धारण करती हैं।) अधो डम्मरुं पारिघं भिन्दिपालं तथा मौशलं पट्‍टिशं प्राशमेवम् । शतघ्नीं शिवापोतकं चाथ दक्षे महारत्नमालां तथा कर्तृखड्गौ ॥ १४ ॥ (डमरू, परिघ, भिन्दिपाल, मूसल, पट्टिश, प्राश, शतघ्नी और सियार के बच्चे को धारण करती हैं। दाईं ओर महारत्नमाला, कैंची (कर्तृ) और खड्ग...) चलत्तर्जनीमङ्कुशं दण्डमुग्रं लसद्रत्नकुम्भं त्रिशूलं तथैव । शरान् पाशुपत्यांस्तथा पञ्च कुन्तं पुनः पारिजातं छुरीं तोमरं च ॥ १५ ॥ (...तर्जनी मुद्रा, अंकुश, उग्र दंड, रत्नकुंभ, त्रिशूल, पाशुपतास्त्र, पाँच बाण, भाला (कुन्त), पारिजात पुष्प, छुरी और तोमर धारण करती हैं।) प्रसूनस्रजं डिण्डिमं गृध्रराजं ततः कोरकं मांसखण्डं श्रुवं च । फलं बीजपूराह्वयं चैव सूचीं तथा पर्शुमेवं गदां यष्टिमुग्राम् ॥ १६ ॥ (...पुष्पमाला, डिण्डिम वाद्य, गिद्धराज, कली (कोरक), मांस का टुकड़ा, स्रुवा (यज्ञ पात्र), बीजपूर फल (नींबू), सुई, फरसा (पर्शु), गदा और उग्र लाठी धारण करती हैं।) ततो वज्रमुष्टिं कुणप्पं सुघोरं तथा लालनं धारयन्तीं भुजैस्तैः । जवापुष्परोचिष्फणीन्द्रोपक्लुप्त- -क्वणन्नूपुरद्वन्द्वसक्ताङ्घ्रिपद्माम् ॥ १७ ॥ (...वज्रमुष्टि और घोर कुणप्प (शव/हथियार) धारण करती हैं। जिनके चरण कमलों में जवापुष्प जैसे लाल रंग के नागराजों (फणीन्द्र) के नूपुर बंधे हैं जो शब्द कर रहे हैं।) महापीतकुम्भीनसावद्धनद्ध स्फुरत्सर्वहस्तोज्ज्वलत्कङ्कणां च । महापाटलद्योतिदर्वीकरेन्द्रा- -वसक्ताङ्गदव्यूहसंशोभमानाम् ॥ १८ ॥ (जिनके सभी हाथों में बड़े पीले साँपों (कुम्भीनस) के कंगन चमक रहे हैं। जिनकी भुजाओं में फन वाले नागों (दर्वीकर) के बाजूबंद (अंगद) सुशोभित हैं।) महाधूसरत्त्विड्भुजङ्गेन्द्रक्लुप्त- -स्फुरच्चारुकाटेयसूत्राभिरामाम् । चलत्पाण्डुराहीन्द्रयज्ञोपवीत- -त्विडुद्भासिवक्षःस्थलोद्यत्कपाटाम् ॥ १९ ॥ (धूसर रंग के नागराजों से बनी हुई सुंदर करधनी (काटेय सूत्र) से जो अभिराम लग रही हैं। जिनके वक्षस्थल पर श्वेत रंग के नागराज का यज्ञोपवीत (जनेऊ) चमक रहा है।) पिषङ्गोरगेन्द्रावनद्धावशोभा- -महामोहबीजाङ्गसंशोभिदेहाम् । महाचित्रिताशीविषेन्द्रोपक्लुप्त- -स्फुरच्चारुताटङ्कविद्योतिकर्णाम् ॥ २० ॥ (जिनका शरीर पीले नागों और 'महामोह बीज' (ह्रीं/क्लीं) जैसे चिह्नों से सुशोभित है। जिनके कानों में विचित्र रंगों वाले विषधरों (सर्पों) के कुंडल (ताटंक) चमक रहे हैं।) वलक्षाहिराजावनद्धोर्ध्वभासि- -स्फुरत्पिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् । महाशोणभोगीन्द्रनिस्यूतमूण्डो- -ल्लसत्किङ्कणीजालसंशोभिमध्याम् ॥ २१ ॥ (जिनकी पीली जटाओं का भार सफेद नागराजों से बंधा हुआ है और ऊपर की ओर चमक रहा है। जिनकी कमर (मध्य भाग) लाल रंग के नागों और मुण्डों की किंकिणी जाल (करधनी) से सुशोभित है।) सदा संस्मरामीदृशों कामकालीं जयेयं सुराणां हिरण्योद्भवानाम् । स्मरेयुर्हि येऽन्येऽपि ते वै जयेयु- -र्विपक्षान्मृधे नात्र सन्देहलेशः ॥ २२ ॥ (मैं सदा ऐसी 'कामकाली' का स्मरण करता हूँ, ताकि मैं (रावण) हिरण्यगर्भ से उत्पन्न देवताओं को जीत सकूँ। जो अन्य लोग भी इनका स्मरण करेंगे, वे भी युद्ध में शत्रुओं को अवश्य जीतेंगे, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।) ॥ फलश्रुति ॥ पठिष्यन्ति ये मत्कृतं स्तोत्रराजं मुदा पूजयित्वा सदा कामकालीम् । न शोको न पापं न वा दुःखदैन्यं न मृत्युर्न रोगो न भीतिर्न चापत् ॥ २३ ॥ (जो लोग प्रसन्नतापूर्वक सदा कामकाली की पूजा करके मेरे (रावण) द्वारा रचित इस स्तोत्रराज का पाठ करेंगे, उन्हें न शोक होगा, न पाप, न दुःख-दैन्य, न अकाल मृत्यु, न रोग, न भय और न ही कोई आपत्ति (विपत्ति) आएगी।) धनं दीर्घमायुः सुखं बुद्धिरोजो शः शर्मभोगाः स्त्रियः सूनवश्च । श्रियो मङ्गलं बुद्धिरुत्साह आज्ञा लयः सर्व विद्या भवेन्मुक्तिरन्ते ॥ २४ ॥ (उन्हें धन, दीर्घायु, सुख, बुद्धि, ओज (तेज), यश, उत्तम भोग, स्त्रियाँ, पुत्र, श्री (लक्ष्मी), मंगल, उत्साह, आज्ञा (Command/Authority), लय (संगीत/ध्यान में), सर्व विद्या और अंत में मुक्ति प्राप्त होगी।) ॥ इति श्री महाकालसंहितायां दशम पटले रावण कृत श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् ॥

स्तोत्र परिचय

श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् की रचना दशग्रीव रावण ने की थी, जो शिव और शक्ति का परम भक्त था। यह स्तोत्र 'भुजङ्ग प्रयात' छंद में है, जिसका अर्थ है 'सर्प की चाल'। जिस प्रकार शिव ताण्डव स्तोत्र में एक तीव्र लय है, वैसे ही इस स्तोत्र में भी एक दिव्य प्रवाह है।

रचयिता: रावण (लंकापति)
स्रोत: महाकाल संहिता (गुह्य काली खंड, पटल १०)
छंद: भुजङ्ग प्रयात (य-य-य-य गण)
देवता: कामकाली (दशमुख रूप)
उद्देश्य: शत्रु विजय और सर्वार्थ सिद्धि

रावण और काली भक्ति

रावण केवल शिव भक्त ही नहीं, बल्कि 'काली' का भी अनन्य उपासक था। महाकाल संहिता के अनुसार, देवताओं (इन्द्र आदि) को जीतने के लिए रावण ने 'कामकाली' की साधना की थी।
तत्वविवरण
1. जिगीषु भावश्लोक 2 में रावण को 'जिगीषु' (जीतने की इच्छा रखने वाला) कहा गया है। यह साधना 'वीर भाव' की है।
2. दश मुखरावण के स्वयं 10 मुख थे, और यहाँ उसने माँ काली के भी 10 (विंशार्ध) मुखों का वर्णन किया है। यह 'साम्य' (Oneness) का प्रतीक है।
3. श्मशान साधनास्तोत्र में 'श्रान्तकन्थश्मशान' का वर्णन है, जो रावण की अघोर साधना को दर्शाता है।

माँ कामकाली का स्वरूप (Iconography)

रावण ने माँ के जिस विराट और उग्र रूप का दर्शन किया, वह अद्भुत है:

शारीरिक लक्षण

  • 10 मुख: शेर, बाघ, सियार, बंदर, ऊंट, भालू आदि के समान।
  • 27 नेत्र: 3-3 नेत्र सभी मुखों में, कुछ में 2।
  • 54 भुजाएँ: 27 दाएँ और 27 बाएँ।
  • वर्ण: प्रलय के बादलों जैसा श्याम (गहरा काला/नीला)।

आभूषण (सर्पमय)

  • कुंडल: विचित्र रंगों वाले विषधर।
  • कंगन: पीले रंग के महासर्प।
  • यज्ञोपवीत: श्वेत (White) नागराज।
  • नूपुर: लाल रंग के नाग।

प्रमुख आयुध (Weapons)

श्लोक 12-17 में 54 हाथों के आयुधों में से प्रमुख का वर्णन है। यह सूची तांत्रिक अस्त्रों का विश्वकोश है:
प्रहारक अस्त्रपाश/बंधनतांत्रिक उपकरणप्राकृतिक/विचित्र
खड्ग, त्रिशूल, धनुष, बाणचर्मपाश, अंकुशडमरू, खट्वांग, कपाल, घंटाशिशु प्रेत, नरकंकाल
शतघ्नी, भिन्दिपाल, मुद्गरनागपाशअग्निकुंड, स्रुवा, उन्माद वंशीगिद्धराज, सियार का बच्चा
वज्रमुष्टि, गदा, फरसा (पर्शु)-रत्नकुंभ, मालामांस खंड, नींबू (बीजपूर)

फलश्रुति (Benefits)

अंतिम दो श्लोकों (23-24) में रावण ने स्पष्ट फलश्रुति दी है:
  • विघ्न नाश: प्रथम श्लोक में ही कहा है - "स्मरणमात्रेण विघ्ना यान्ति पराङ्मुखाः" (स्मरण मात्र से विघ्न भाग जाते हैं)।
  • शत्रु विजय: किसी भी युद्ध, मुकदमे या विवाद में विजय।
  • अभय: मृत्यु, रोग और अकाल का भय समाप्त होता है।
  • अष्ट सिद्धि: धन, यश, स्त्री, पुत्र और अंत में मोक्ष।
  • आज्ञा शक्ति: साधक में 'आज्ञा' (Authority/Commanding Power) का विकास होता है, जैसे रावण में था।

साधना विधि

  • समय: मध्यरात्रि (निशीथ काल) या प्रदोष काल।
  • दिशा: दक्षिण दिशा।
  • आसन: ऊनी काला आसन।
  • सावधानी: यह एक उग्र स्तोत्र है। इसे पवित्रता और निडरता के साथ पढ़ना चाहिए। यदि भय लगे तो पहले 'कवच' का पाठ करें।
  • विशेष प्रयोग: शत्रु बाधा निवारण के लिए २१ दिन तक नित्य पाठ करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'कामकला काली' का अर्थ क्या है?

'काम' का अर्थ है इच्छा (Desire/Creation) और 'कला' का अर्थ है शक्ति। वह काली जो सृष्टि की आदि इच्छा और क्रिया शक्ति है। तांत्रिक ज्यामिति में 'कामकला' (बिंदु त्रिकोण) सृष्टि का मूल है।

2. 'भुजङ्ग प्रयात' क्या है?

यह संस्कृत का एक छंद (Meter) है। 'भुजङ्ग' अर्थात सर्प और 'प्रयात' अर्थात चाल। इस छंद की गति (लघु-गुरु) साँप के रेंगने जैसी लहराती हुई होती है। प्रसिद्ध 'शिव ताण्डव स्तोत्र' (जटाटवी गलज्जल...) पंचचामर छंद में है, लेकिन यह भी उसी शैली का ओजस्वी छंद है।

3. क्या रावण ने सच में इसकी रचना की?

हाँ, महाकाल संहिता और परम्पराओं के अनुसार रावण एक महान तांत्रिक और शिव-शक्ति उपासक था। उसके द्वारा रचित स्तोत्र (जैसे शिव ताण्डव, रावण संहिता) आज भी प्रामाणिक माने जाते हैं।

4. 'श्मशान' में पाठ करना जरूरी है?

नहीं, भौतिक शमशान में जाना कतई जरूरी नहीं है। आप अपने घर के एकांत कक्ष को ही साधना स्थल बना सकते हैं। तांत्रिक अर्थ में, मूलाधार चक्र ही शमशान है जहाँ कुंडलिनी जागृत होती है।

5. माँ के 10 मुख क्यों हैं?

10 मुख 10 दिशाओं पर पूर्ण नियंत्रण और 10 महाविद्याओं की समष्टि का प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि काली का विस्तार सर्वत्र है।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, शक्ति की उपासना का अधिकार सबको है। परंतु चूंकि यह उग्र विवरण वाला स्तोत्र है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को इसे सुनने/पढ़ने से बचना चाहिए (भयानक रसों के कारण)।

7. 'विघ्ना यान्ति पराङ्मुखाः' का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है - "विघ्न मुँह फेर कर भाग जाते हैं"। जब साधक इस शक्तिशाली स्वरूप का ध्यान करता है, तो छोटे-मोटे विघ्न उसके सामने टिक ही नहीं पाते।

8. 'शतघ्नी' क्या है?

शतघ्नी (Shataghni) एक प्राचीन हथियार है, जिसका अर्थ है 'सौ को मारने वाली'। यह संभवतः तोप जैसा या कांटों वाला भारी गदा जैसा अस्त्र होता था।

9. 'उन्माद वंशी' का क्या कार्य है?

यह एक ऐसी बांसुरी है जो शत्रुओं को मोहित या उन्मत्त (पागल) कर देती है। यह माँ की सम्मोहन शक्ति का प्रतीक है।

10. क्या इसके साथ कवच पढ़ना चाहिए?

सदा। किसी भी उग्र स्तोत्र के साथ 'कवच' (जैसे त्रैलोक्य मोहन कवच या काली कवच) का पाठ सुरक्षा घेरा बनाता है और ऊर्जा को संतुलित करता है।