Sri Kalika Swaroopa Stuti – श्री कालिका स्वरूप स्तुतिः | Jnananetra Nath

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कालिका स्वरूप स्तुतिः ॥
सिततरसंविदवाप्यं सदसत्कलनाविहीनमनुपाधि ।
जयति जगत्त्रयरूपं नीरूपं देवि ते रूपम् ॥ १ ॥
(हे देवि! आपका वह रूप जो अत्यंत उज्ज्वल संविद (शुद्ध चेतना) द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, जो 'सत' और 'असत' की कलना (कल्पना/भेद) से रहित है, जो उपाधियों से मुक्त है। जो तीनों लोकों के रूप में होते हुए भी नि:रूप (आकार रहित) है—उस स्वरूप की जय हो।)
एकमनेकाकारं प्रसृतजगद्व्याप्तिविकृतिपरिहीनम् ।
जयति तवाद्वयरूपं विमलमलं चित्स्वरूपाख्यम् ॥ २ ॥
(आपका वह अद्वय (Non-dual) रूप जो एक होकर भी अनेक आकारों में प्रकट है, जो पूरे जगत में व्याप्त होकर भी विकारों से रहित है। जो अत्यंत निर्मल है और जिसे 'चित्-स्वरूप' (Consciousness itself) कहा जाता है—उसकी जय हो।)
जयति तवोच्छलदन्तः स्वच्छेच्छायाः स्वविग्रहग्रहणम् ।
किमपि निरुत्तरसहजस्वरूपसंवित्प्रकाशमयम् ॥ ३ ॥
(आपकी जय हो, जो अपनी स्वच्छ इच्छा (Swatantrya Shakti) से अपने भीतर उच्छलित होकर विग्रह (शरीर/सृष्टि) ग्रहण करती हैं। आपका वह 'सहज स्वरूप' किसी भी उत्तर (तर्क) से परे 'निरुत्तर' है और केवल संविद-प्रकाश (Light of Consciousness) मय है।)
वान्त्वा समस्तकालं भूत्या झङ्कारघोरमूर्तिमपि ।
निग्रहमस्मिन् कृत्वानुग्रहमपि कुर्वती जयसि ॥ ४ ॥
(जो समस्त 'काल' (समय) को पीकर (वान्त्वा - वमन करके/समाप्त करके) अपनी विभूति से झंकार करने वाली घोर मूर्ति धारण करती हैं। जो इस सृष्टि का निग्रह (संहार) करके भी (भक्तों पर) अनुग्रह करती रहती हैं, आपकी जय हो।)
कालस्य कालि देहं विभज्य मुनिपञ्चसङ्ख्यया भिन्नम् ।
स्वस्मिन् विराजमानं तद्रूपं कुर्वती जयसि ॥ ५ ॥
(हे कालि! आप काल (Time) के शरीर को 'सात' (मुनि=७) और 'पाँच' (बाण=५) अर्थात १२ (द्वादश काली) रूपों में विभाजित करके, उस भिन्न-भिन्न कालचक्र को अपने भीतर ही विराजमान करती हुई क्रीड़ा करती हैं। आपकी जय हो।)
भैरवरूपी कालः सृजति जगत्कारणादिकीटान्तम् ।
इच्छावशेन यस्याः सा त्वं भुवनाम्बिका जयसि ॥ ६ ॥
(जिसकी इच्छा के वश में होकर 'काल' रूपी भैरव इस जगत को—ब्रह्मा (कारण) से लेकर कीड़े (कीट) तक—रचते हैं, वह भुवनाम्बिका (भुवनेश्वरी/काली) आप ही हैं। आपकी जय हो।)
जयति शशाङ्कदिवाकरपावकधामत्रयान्तरव्यापि ।
जननि तव किमपि विमलं स्वरूपरूपं परन्धाम ॥ ७ ॥
(हे जननी! आपका वह निर्मल 'स्वरूप-रूप' जो चंद्रमा (सोम), सूर्य और अग्नि—इन तीनों धामों (तेज/मंडल) के भीतर व्याप्त है और जो परम धाम (Ultimate Abode) है, उसकी जय हो।)
एकं स्वरूपरूपं प्रसरस्थितिविलयभेदस्त्रिविधम् ।
प्रत्येकमुदयसंस्थितिलयविश्रमतश्चतुर्विधं तदपि ॥ ८ ॥
(आपका स्वरूप एक है, फिर भी वह सृष्टि (प्रसर), स्थिति और प्रलय के भेद से तीन प्रकार का है। और वह प्रत्येक फिर उदय, संस्थिति, लय और विश्राम (तुरीय) के भेद से चार प्रकार का (कुल १२ प्रकार का - द्वादश काली) हो जाता है।)
इति वसुपञ्चकसङ्ख्यं विधाय सहजस्वरूपमात्मीयम् ।
विश्वविवर्तावर्तप्रवर्तक जयति ते रूपम् ॥ ९ ॥
(इस प्रकार अपने सहज स्वरूप को १३ (वसु=८ + ५=१३, पाठभेद से १२ या १३) प्रकार का बनाकर, जो विश्व रूपी भंवर (आवर्त) को प्रवर्तित (संचालित) करता है, आपके उस रूप की जय हो।)
सदसद्विभेदसूतेर्दलनपरा कापि सहजसंवित्तिः ।
उदिता त्वमेव भगवति जयसि जयाद्येन रूपेण ॥ १० ॥
(सत और असत के भेद को पैदा करने वाली अविद्या का दलन (नाश) करने वाली आप कोई अनिर्वचनीय 'सहज संवित्ति' (Natural Consciousness) हैं। हे भगवति! आप अपने विजयशाली रूप में उदित होकर सर्वत्र जय को प्राप्त होती हैं।)
जयति समस्तचराचरविचित्रविश्वप्रपञ्चरचनोर्मि ।
अमलस्वभावजलधौ शान्तं कान्तं च ते रूपम् ॥ ११ ॥
(जिस निर्मल स्वभाव रूपी समुद्र (जलधौ) में समस्त चराचर जगत के विचित्र प्रपंचों की रचना रूपी लहरें (ऊर्मि) उठती हैं, आपका वह शांत और कांत (सुंदर) रूप जय को प्राप्त हो।)
सहजोल्लासविकासप्रपूरिताशेषविश्वविभवैषा ।
पूर्णा तवाम्ब मूर्तिर्जयति परानन्दसम्पूर्णा ॥ १२ ॥
(हे अम्ब! जो सहज उल्लास (Spontaneous Joy) के विकास से अशेष विश्व के वैभव को परिपूर्ण करती है, आपकी वह 'पूर्णा' मूर्ति जो परमानन्द से लबालब भरी है, उसकी जय हो।)
कवलितसकलजगत्रयविकटमहाकालकवलनोद्युक्ता ।
उपभुक्तभावविभवप्रभवापि कृशोदरी जयसि ॥ १३ ॥
(तीनों लोकों को ग्रास बनाने वाले विकट 'महाकाल' को भी निगलने (कवलन) के लिए जो उद्यत हैं। समस्त भावों (पदार्थों) के वैभव का उपभोग (संहार) करके भी जो 'कृशोदरी' (क्षीण उदर वाली/भूखी) ही बनी रहती हैं, आपकी जय हो।)
रूपत्रयपरिवर्जितमसमं रूपत्रयान्तरव्यापि ।
अनुभवरूपमरूपं जयति परं किमपि ते रूपम् ॥ १४ ॥
(जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश (रूपत्रय) से परे है, अनुपम है, फिर भी तीनों रूपों के भीतर व्याप्त है। जो केवल 'अनुभव' गम्य है और अरूप (निराकार) है, आपका वह कोई 'परम' रूप जय को प्राप्त हो।)
अव्ययमकुलममेयं विगलितसदसद्विवेककल्लोलम् ।
जयति प्रकाशविभवस्फीतं काल्याः परं धाम ॥ १५ ॥
(जो अव्यय (नष्ट न होने वाला), अकुल (कुल/शरीर से परे), अमेघ (मापा न जा सके) है। जहाँ सत-असत के विवेक का कोलाहल शांत (विगलित) हो गया है। ऐसा प्रकाश वैभव से भरा हुआ काली का परम धाम (अवस्था) जय को प्राप्त हो।)
ऋतुमुनिसङ्ख्यं रूपं विभज्य पञ्चप्रकारमेकैकम् ।
दिव्यौघमुद्गिरन्ती जयति जगत्तारिणी जननी ॥ १६ ॥
(ऋतु (६) और मुनि (७) सँख्या वाले रूपों को पाँच प्रकार (सृष्टि आदि कृत्य) में विभाजित करके, जो दिव्य समूह (शक्तियों का) को उगलती (प्रकट करती) हैं, वह जगत्तारिणी जननी जय को प्राप्त हों।)
भूदिग्गोखगदेवीचक्रसञ्ज्ञानविभवपरिपूर्णम् ।
निरुपमविश्रान्तिमयं श्रीपीठं जयति ते रूपम् ॥ १७ ॥
(जो पृथ्वी, दिशाएं, इन्द्रियां (गो), सूर्य/ग्रह (खग) और देवियों के चक्रों के ज्ञान-वैभव से परिपूर्ण है। जो निरुपम 'विश्रान्ति' (Rest in Self) मय है, वह आपका 'श्रीपीठ' रूप (Supreme Seat) जय को प्राप्त हो।)
प्रलयलयान्तरभूमौ विलसितसदसत्प्रपञ्चपरिहीनाम् ।
देवि निरुत्तरतरां नौमि सदा सर्वतः प्रकटाम् ॥ १८ ॥
(प्रलय और महाप्रलय के मध्य की भूमि में, जहाँ सत और असत का प्रपंच विलीन हो चुका है, वहाँ विलास करने वाली, निरुत्तर (तर्क से परे) और सर्वत्र प्रकट आप देवी को मैं सदा नमन करता हूँ।)
यादृङ्महाश्मशाने दृष्टं देव्याः स्वरूपमकुलस्थम् ।
तादृग् जगत्रयमिदं भवतु तवाम्ब प्रसादेन ॥ १९ ॥
(जैसा 'अकुल' (Forms से परे) स्वरूप देवी का महाश्मशान (Absolute Void/Consciousness) में देखा गया है, हे अम्ब! आपके प्रसाद से यह तीनों लोक मुझे 'वैसा ही' (शिवमय/चिन्मय) प्रतीत हो।)
इत्थं स्वरूपस्तुतिरभ्यधायि
सम्यक्समावेशदशावशेन ।
मया शिवेनास्तु शिवाय सम्यक्
ममैव विश्वस्य तु मङ्गलाय ॥ २० ॥
(इस प्रकार, समाधि (सम्यक् समावेश) की दशा के वश में होकर यह 'स्वरूप स्तुति' कही गई। यह मुझ शिव (साधक) के द्वारा, शिव (परम) के लिए, मेरे और समस्त विश्व के परम मंगल (कल्याण) के लिए हो।)
॥ इति श्री श्रीज्ञाननेत्रपाद रचितं श्री कालिका स्वरूप स्तुतिः ॥
संलिखित ग्रंथ
स्तोत्र परिचय
श्री कालिका स्वरूप स्तुतिः कश्मीर शैव दर्शन और कौल संप्रदाय की एक उत्कृष्ट कृति है। इसके रचयिता श्री ज्ञाननेत्र नाथ (जिन्हें शिवानन्द भी कहा जाता है) महान सिद्ध थे। इस स्तुति में वे माँ काली के स्थूल रूप का वर्णन नहीं करते, बल्कि उनके 'स्वरूप' का गान करते हैं।
रचयिता: श्री ज्ञाननेत्र नाथ (कौल आचार्य)
संप्रदाय: क्रम दर्शन (Krama System)
विषय: अद्वैत काली विद्या
मुख्य भाव: समावेश (Absorption)
अंतिम लक्ष्य: अभेद बुद्धि
ज्ञाननेत्र नाथ और कौल दर्शन
श्री ज्ञाननेत्र नाथ (लगभग 850 ई.) कश्मीर शैव परंपरा के मूर्धन्य आचार्य थे। उन्होंने 'कालीकुल' या 'क्रम' संप्रदाय को पुनर्जीवित किया।
| तत्व | सामान्य भक्ति | कौल दृष्टि (इस स्तोत्र में) |
|---|---|---|
| काली | भयानक देवी, संहार करने वाली | परम चेतना (Pure Consciousness), 'काल' को भी खाने वाली |
| पूजा | फूल, अक्षत, बलि | आत्म-विमर्श, समावेश (Being one with Her) |
| शमशान | मृत्यु का स्थान, अपवित्र | महाश्मशान = जहाँ द्वैत (Duality) जलकर राख हो जाए |
| लक्ष्य | वरदान प्राप्ति | ब्रह्म-प्राप्ति (अद्वैत सिद्धि) |
स्वरूप के लक्षण (श्लोक 1-3)
प्रारंभिक श्लोकों में 'स्वरूप' (Essence) को परिभाषित किया गया है:
1.सिततर संविद: अत्यंत उज्ज्वल चेतना (सफ़ेद प्रकाश)।
2.सदसत्कलनाविहीनम्: 'है' और 'नहीं है' के द्वंद्व से परे।
3.अनुपाधि: बिना किसी विशेषण या उपाधि के (Naked Truth)।
4.निरुत्तर: जिसके आगे कोई प्रश्न या तर्क संभव नहीं।
द्वादश काली रहस्य (श्लोक 5 और 8)
श्लोक 5 और 8 में 'काल' के 12 भेदों (द्वादश काली) का संकेत है। यह क्रम दर्शन का हृदय है:
| कृत्य | चेतना की अवस्था | 3 देवियाँ (कुल 12) |
|---|---|---|
| सृष्टि (Creation) | प्रमेय (Object) का उदय | सृष्टि काली, रक्त काली, स्थिति नाश काली |
| स्थिति (Maintenance) | अनुभव काल | यम काली, संहार काली, मृत्यु काली |
| संहार (Dissolution) | विषय का लय | भद्र काली, मार्तण्ड काली, परमार्क काली |
| अनाख्य (Ineffable) | पूर्ण अद्वैत (Beyond) | महाकाल काली, महाभैरव काली, महाभैरव चण्डोग्रघोर काली |
भावार्थ: माँ काली इन 12 अवस्थाओं के माध्यम से निरतंर समय (Time) को खा रही हैं और रच रही हैं।
फलश्रुति (विशेष लाभ)
"तादृग् जगत्रयमिदं भवतु तवाम्ब प्रसादेन"
अंतिम श्लोकों (19-20) के अनुसार पाठ के लाभ:
✓तादृग् दृष्टि: संसार वैसा ही (ब्रह्ममय) दिखने लगता है जैसा समाधि में।
✓सम्यक् समावेश: साधक शिव-शक्ति में पूरी तरह लीन (Absorbed) हो जाता है।
✓अभय: 'महाश्मशान' के दर्शन से मृत्यु भय समाप्त हो जाता है।
✓विश्व मंगल: साधक की उपस्थिति मात्र से विश्व का कल्याण होता है।
पाठ विधि
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (ध्यान के लिए सर्वोत्तम) या अर्द्धरात्रि।
- आसन: सुखासन या सिद्धासन। लाल या काले ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- मानस पूजा: इस स्तोत्र के लिए बाह्य आडंबर की नहीं, बल्कि 'अन्तर्मुखी' दृष्टि की आवश्यकता है।
- चिन्तन: श्लोक पढ़कर नेत्र बंद करें और 'मैं ही वह काली स्वरूप हूँ' (I am that Consciousness) - ऐसा भाव करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'स्वरूप स्तुति' का अर्थ क्या है?
स्वरूप का अर्थ है 'अपना निज रूप' (Essential Nature)। इस स्तोत्र में काली की स्तुति उनके बाहरी रूप (काली चमड़ी, मुंडमाला आदि) की बजाय उनके असली रूप 'शुद्ध चेतना' (Pure Consciousness) के रूप में की गई है।
2. 'सिततर संविद' (Sitatara Samvid) का क्या मतलब है?
'सिततर' का अर्थ है 'अत्यंत उज्ज्वल/सफेद' और 'संविद' का अर्थ है 'चेतना'। अर्थात, काली अंधकार नहीं, बल्कि परम प्रकाश (Supreme Light) हैं जिससे सब कुछ प्रकाशित होता है।
3. श्लोक में 'महाश्मशान' का क्या तांत्रिक अर्थ है?
महाश्मशान वह स्थान है जहाँ सब कुछ जल जाता है। आध्यात्मिक रूप से, यह 'पूर्ण शून्यता' (Absolute Void) की अवस्था है जहाँ 'अहंकार' और 'द्वैत' जलकर भस्म हो जाते हैं।
4. 'द्वादश काली' (12 Kalis) का रहस्य क्या है?
क्रम दर्शन के अनुसार, चेतना सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्य के चक्र में 12 अवस्थाओं से गुजरती है। माँ काली इन 12 अवस्थाओं के रूप में समय (काल) का संचालन करती हैं।
5. 'कृशोदरी' (क्षीण उदर वाली) क्यों कहा गया है?
यह एक विरोधाभास अलंकार है। वे सारे ब्रह्मांड को खा जाती हैं फिर भी उनका पेट नहीं भरता (पतला रहता है) क्योंकि वे 'चिदाकाश' (Space of Consciousness) हैं, और आकाश कभी भरता नहीं है।
6. क्या इसका पाठ हिंदी अर्थ के साथ करना चाहिए?
हाँ, क्योंकि यह एक दार्शनिक ग्रंथ है। इसका लाभ तभी मिलेगा जब आप इसके गहरे अर्थों को समझेंगे। केवल संस्कृत रटने से इसका पूर्ण फल नहीं मिलेगा।
7. 'निरुत्तर' शब्द का क्या महत्व है?
यह वह अवस्था है जिसके आगे कोई प्रश्न या उत्तर नहीं बचता। यह वाणी और मन से परे की 'मौन' अवस्था है।
8. ज्ञाननेत्र नाथ कौन थे?
वे कश्मीर शैव दर्शन की 'क्रम' शाखा (Krama School) के एक महान आचार्य और सिद्ध योगी थे। उन्होंने काली उपासना को अद्वैत वेदान्त के स्तर पर स्थापित किया।
9. क्या इस स्तोत्र के लिए दीक्षा आवश्यक है?
यह एक स्तुति है, मंत्र नहीं। अतः इसके पाठ के लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, केवल श्रद्धा और समझने की जिज्ञासा चाहिए।
10. 'समावेश' (Samavesha) क्या है?
समावेश का अर्थ है - अपनी सीमित चेतना का असीम ईश्वरीय चेतना में लय हो जाना। जैसे बूँद का र् सागर में मिल जाना।