Sri Kali Stavanam (Shakini Stotram) – श्री काली स्तवनम् (शाकिनी स्तोत्रम्)

स्तोत्र परिचय
ग्रंथ: श्रीरुद्रयामले उत्तरतन्त्रे
प्रकरण: सिद्धमन्त्रप्रकरणे षट्चक्रप्रकाशे
संवाद: भैरवी-भैरव (आनन्दभैरवी-महाकाल)
श्लोक: 47
विशेषता: षट्चक्र, कुण्डलिनी, अष्टांग योग, नाड़ी शुद्धि का विस्तृत वर्णन
रुद्रयामल तंत्र - विस्तृत परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भाग | पूर्व तंत्र और उत्तर तंत्र |
| संवाद | भैरव (शिव) और भैरवी (पार्वती) |
| विषय | मंत्र, यंत्र, तंत्र, योग, साधना |
| भाषा | संस्कृत (तांत्रिक शैली) |
| महत्व | कौल मार्ग का प्रमुख ग्रंथ |
शाकिनी कौन हैं? - विस्तृत वर्णन
स्तोत्र में शाकिनी का वर्णन:
• "शाकिनी हृदये भाति" - हृदय में शाकिनी प्रकाशित हैं
• "कालीति जगति ख्याता" - जगत में काली नाम से विख्यात
• "सा देवी हृदयस्थिता" - वही देवी हृदय में स्थित हैं
• "निरञ्जना निराकारा" - निर्मल और निराकार
• "आद्या देवी कालिकाख्या" - आदि देवी, कालिका नाम वाली
षट्चक्र और उनकी देवियाँ
| चक्र | स्थान | देवी | दल | बीज |
|---|---|---|---|---|
| 1. मूलाधार | गुदा के पास | डाकिनी | 4 | लं |
| 2. स्वाधिष्ठान | जननेन्द्रिय | राकिनी | 6 | वं |
| 3. मणिपूर | नाभि | लाकिनी | 10 | रं |
| 4. अनाहत | हृदय | काकिनी | 12 | यं |
| 5. विशुद्ध | कण्ठ | शाकिनी ★ | 16 | हं |
| 6. आज्ञा | भ्रूमध्य | हाकिनी | 2 | ॐ |
कुण्डलिनी शक्ति - विस्तृत वर्णन
स्तोत्र में कुण्डलिनी (श्लोक 22-23):
• "श्रीकुण्डलीं भावय" - कुण्डलिनी का ध्यान करो
• "मूलामलपङ्कजे रचयति" - मूलाधार कमल में स्थित
• "कुलश्रीकुण्डल्याः" - कुल की श्री कुण्डलिनी
- मूलाधार: सुप्त कुण्डलिनी - साढ़े तीन वलय में लिपटी
- जागरण: प्राणायाम, बंध, मुद्रा से जागृत
- आरोहण: सुषुम्ना नाड़ी से ऊपर उठती है
- भेदन: प्रत्येक चक्र को भेदती हुई
- सहस्रार: शिव से मिलन - परम आनंद
नाड़ी तंत्र (श्लोक 32-33)
| नाड़ी | स्थान | स्वभाव | संबंध |
|---|---|---|---|
| इडा | वाम (बायाँ) | शीतल, सौम्य | चंद्र, मनस |
| पिंगला | दक्षिण (दायाँ) | उष्ण, तेजस्वी | सूर्य, प्राण |
| सुषुम्ना | मध्य (मेरुदण्ड) | निर्विकार | अग्नि, आत्मा |
- वज्रिणी नाड़ी: सुषुम्ना के अंदर - सत्त्वगुणी
- चित्रिणी नाड़ी: वज्रिणी के अंदर - शुद्ध चेतना
- ब्रह्मनाड़ी: चित्रिणी के अंदर - परम सूक्ष्म
अष्टांग योग - विस्तृत (श्लोक 20, 29-31)
| अंग | अर्थ | उप-विभाग |
|---|---|---|
| 1. यम | सामाजिक अनुशासन | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह |
| 2. नियम | व्यक्तिगत अनुशासन | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान |
| 3. आसन | स्थिर मुद्रा | पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन आदि |
| 4. प्राणायाम | श्वास नियंत्रण | पूरक, कुम्भक, रेचक |
| 5. प्रत्याहार | इन्द्रियों का संयम | विषयों से मन हटाना |
| 6. धारणा | एकाग्रता | एक बिंदु पर मन लगाना |
| 7. ध्यान | निरंतर एकाग्रता | धारणा का प्रवाह |
| 8. समाधि | परम लय | सविकल्प, निर्विकल्प |
षट्कर्म क्रियाएं (श्लोक 40-43)
| क्रिया | विधि | लाभ |
|---|---|---|
| 1. धौति | वस्त्र/जल से पेट सफाई | कफ नाश, पाचन शुद्धि |
| 2. बस्ति | आंतों की सफाई | वात-पित्त-कफ शुद्धि |
| 3. नेति | नासिका सफाई | श्वास मार्ग शुद्धि |
| 4. त्राटक | एकटक देखना | नेत्र शुद्धि, एकाग्रता |
| 5. नौलि ★ | उदर घूर्णन | जठराग्नि प्रदीपन |
| 6. कपालभाति | तीव्र श्वास | मस्तिष्क शुद्धि |
फलश्रुति - विस्तृत
पाठ विधि (श्लोक 47):
• प्रातः, मध्याह्न, सायं - तीनों संध्या में पाठ
• त्रिसप्तक (21) बार - प्रत्येक संध्या में
• 100 बार पाठ से मोक्ष प्राप्ति
• पुरश्चरण फल - मंत्र सिद्धि के समान