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Sri Gayatri Vandana (Pranayanjali) – श्री गायत्री वन्दना (प्रणयाञ्जलिः)

Sri Gayatri Vandana (Pranayanjali) – श्री गायत्री वन्दना (प्रणयाञ्जलिः)
॥ श्री गायत्री वन्दना (प्रणयाञ्जलिः) ॥
(रचयिता: पं. ध्यामनाथ शुक्ल 'द्विजश्याम')
ॐकाररूपा त्रिपदा त्रयी च त्रिदेववन्द्या त्रिदिवाधिदेवी । त्रिलोककर्त्री त्रितयस्य भर्त्री त्रैकालिकी सङ्कलनाविधात्री ॥ १॥ त्रैगुण्यभेदात् त्रिविधस्वरूपा त्रैविध्ययुक्तस्य फलस्य दात्री । तथापवर्गस्य विधायिनी त्वं दयार्द्रदृक्कोणविलोकनेन ॥ २॥ त्वं वाङ्मयी विश्ववदान्यमूर्तिर्विश्वस्वरूपापि हि विश्वगर्भा । तत्त्वात्मिका तत्त्वपरात्परा च दृक्तारिका तारकशङ्करस्य ॥ ३॥ भूतं च भव्यं सकलं यदेतत् त्वत्तः परं कुत्र न किञ्चिदस्ति । आद्यामनाद्यामनवद्यवन्द्यां पश्यन्ति विज्ञाः प्रवदन्ति च त्वाम् ॥ ४॥ विश्वात्मिके विश्वविलासभूते विश्वाश्रये विश्वविकाशधामे । विभूत्यधिष्ठात्रि विभूतिदात्रि पदे त्वदीये प्रणतिर्मदीया ॥ ५॥ त्वं नित्यसर्गस्य विसर्गभूता दैनन्दिनस्यापि च प्राकृतस्य । विश्वस्य योनिर्हि मता तथापि समुद्रहैमाद्रिविरञ्चिजाता ॥ ६॥ भोगस्य भोक्त्री करणस्य कर्त्री धात्वाव्ययप्रत्ययलिङ्गशून्या । ज्ञेया न वेदैर्न पुराणभेदैर्ध्येया धिया धारणयादिशक्तिः ॥ ७॥ किञ्चिद्यदेतत्तवमूर्तिरेषा तथाप्यदृश्याखिलसाधनैश्च । सान्ता निरन्ता सदसत्स्वरूपा स्फुटास्फुटा स्फोटविकाशरूपा ॥ ८॥ यस्मिन् यतो यस्य च येन यच्च कस्मिन्कुतः कस्य च केन किञ्च । इत्यादिशब्दैर्न विशोधनीया कुतः कथं सा परिबोधनीया ॥ ९॥ नित्या सदा सर्वगताऽप्यलक्ष्या विष्णोर्विधेः शङ्करतोऽप्यभिन्ना । शक्तिस्वरूपा जगतोऽस्य शक्तिर्ज्ञातुं न शक्या करणादिभिस्त्वम् ॥ १०॥ त्यक्तस्त्वयात्यन्तनिरस्तबुद्धिर्नरो भवेद् वैभवभाग्यहीनः । हिमालयादप्यधिकोन्नतॊऽपि जनैस्समस्तैरपि लङ्घनीयः ॥ ११॥ शिवे हरौ ब्रह्मणि भानुचन्द्रयोश्चराचरे गोचरकेऽप्यगोचरे । सूक्ष्मातिसूक्ष्मे महतो महत्तमे कला त्वदीया विमला विराजते ॥ १२॥ सुधामरन्दं तव पादपद्मं स्वे मानसे धारणया निधाय । बुद्धिर्मिलिन्दीभवतान्मदीया नातः परं देवि वरं समीहे ॥ १३॥ दीनेषु हीनेषु गतादरेषु स्वाभाविकी ते करुणा प्रसिद्धा । अतः शरण्ये शरणं प्रपन्नं गृहाण मातः प्रणयाञ्जलिं मे ॥ १४॥ पठतः शृण्वतो वापि सकृत्प्रणमतस्तथा । भव्याय जगतो भूयात् प्रणयस्यायमञ्जलिः ॥ १५॥
॥ इति गायत्रीवन्दना समाप्ता ॥
रचना - पं. ध्यामनाथजी शुक्ल, "द्विजश्याम"

श्री गायत्री वन्दना (प्रणयाञ्जलिः) - विस्तृत परिचय

श्री गायत्री वन्दना (Sri Gayatri Vandana), जिसे 'प्रणयाञ्जलिः' के नाम से भी जाना जाता है, आधुनिक संस्कृत काव्य जगत की एक अनमोल मणि है। इसकी रचना २०वीं शताब्दी के महान विद्वान और कवि पण्डित ध्यामनाथ शुक्ल 'द्विजश्याम' ने की थी। यह वन्दना प्राचीन स्तोत्रों की गम्भीरता और आधुनिक भक्ति मार्ग की सरलता का एक अद्भुत संगम है। १५ श्लोकों में निबद्ध यह स्तुति माँ गायत्री के विराट स्वरूप और उनके प्रति एक भक्त के अनन्य समर्पण को व्यक्त करती है।

'प्रणयाञ्जलि' शब्द स्वयं में अत्यंत मधुर और अर्थपूर्ण है। 'प्रणय' का अर्थ है प्रेम, स्नेह या समर्पण, और 'अञ्जलि' का अर्थ है दोनों हाथों को जोड़कर अर्पित किया गया निवेदन। इस प्रकार, यह वन्दना किसी कठोर तान्त्रिक अनुष्ठान की तरह नहीं, बल्कि एक बालक के अपनी माता के प्रति सहज और प्रेमपूर्ण निवेदन की तरह है। कवि ने माँ गायत्री को 'ॐकाररूपा' और 'त्रिपदा' कहकर उनकी वैदिक महत्ता को भी अक्षुण्ण रखा है।

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह माँ गायत्री को केवल एक मन्त्र तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें 'विश्वस्वरूपा' और 'विश्वगर्भा' के रूप में प्रस्तुत करता है। कवि ने बहुत ही सुन्दर ढंग से यह समझाया है कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु, चाहे वह गोचर हो या अगोचर, सूक्ष्म हो या स्थूल, माँ गायत्री की ही दिव्य कला का प्रतिरूप है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, 'द्विजश्याम' जी की यह रचना साधक के अहंकार को मिटाने का कार्य करती है। श्लोक ११ में कवि बहुत ही गम्भीर चेतावनी देते हैं कि यदि माँ गायत्री किसी से रुष्ट हो जाएँ या अपनी कृपा हटा लें, तो वह मनुष्य वैभव और भाग्य से हीन हो जाता है, चाहे वह हिमालय जैसा ऊँचा ही क्यों न हो। यह वन्दना हमें सिखाती है कि जीवन की सार्थकता केवल माँ की स्वाभाविक करुणा में ही निहित है।

दार्शनिक गहराई और 'प्रणयाञ्जलि' का रहस्य

श्री गायत्री वन्दना का महत्व इसके दार्शनिक भावों में छिपा है, जो साधक को मन्त्र के अर्थ से परे उसके 'तत्त्व' तक ले जाते हैं:

  • त्रिदेव वन्द्या: माँ गायत्री को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की आराध्या बताया गया है। वे 'त्रिदिवाधिदेवी' हैं, अर्थात् तीनों लोकों की स्वामिनी और संचालन करने वाली पराशक्ति हैं।

  • तत्त्वात्मिका: माँ साक्षात् तत्त्वों का स्वरूप हैं और उन तत्त्वों से भी परे (तत्त्वपरात्परा) हैं। वे ही साक्षात् शिव (तारकशङ्कर) की आँखों की ज्योति (दृक्तारिका) हैं।

  • व्यापकता: शिव, हरि, ब्रह्मा, सूर्य और चन्द्रमा—इन सभी में माँ की ही विमल कला विराजती है। यह अद्वैत दर्शन का सार है कि एक ही शक्ति समस्त देवों में व्याप्त है।

  • स्वाभाविक करुणा: श्लोक १४ इस वन्दना का हृदय है। कवि कहते हैं कि माँ की करुणा दीनों और हीनों के लिए 'स्वाभाविक' है। माँ कृपा करने के लिए किसी पात्रता की प्रतीक्षा नहीं करती, वे अपनी ममता के कारण स्वतः ही रक्षा करती हैं।

फलश्रुति लाभ: भक्ति और मानसिक शान्ति

इस मधुर वन्दना के नियमित पाठ से साधक के जीवन में निम्नलिखित दिव्य परिवर्तन आते हैं:
१. हृदय में भक्ति का उदय
प्रणयाञ्जलि का पाठ शुष्क साधना को सरस बना देता है। यह साधक के मन में माँ के प्रति वह प्रेम जाग्रत करता है जो मन्त्र सिद्धि के लिए परम आवश्यक है।
२. बुद्धि की शुद्धि (मिलिन्दी-बुद्धि)
श्लोक १३ के अनुसार, साधक की बुद्धि माँ के चरणों में भ्रमर (भौंरा) के समान स्थिर हो जाती है। चंचल मन एकाग्र होता है और विवेक शक्ति का विकास होता है।
३. अहंकार का शमन और वैभव प्राप्ति
माँ की वन्दना करने से साधक विनम्र होता है। शास्त्रों के अनुसार, विनम्रता ही लक्ष्मी और सौभाग्य का प्रवेश द्वार है। यह स्तुति वैभव और भाग्यहीनता को दूर करती है।
४. आध्यात्मिक सुरक्षा
माँ को 'विश्वविलासभूते' और 'विश्वाश्रये' कहा गया है। उनके इस विराट स्वरूप की वन्दना साधक को हर प्रकार के अज्ञात भय और मानसिक विकारों से सुरक्षा प्रदान करती है।

पाठ विधि और साधना नियम (Ritual Guide)

चूँकि यह एक भक्ति प्रधान वन्दना है, इसकी पाठ विधि अत्यंत सरल और भावपूर्ण है:
  • समय (Time): गायत्री सन्ध्या (प्रातः, मध्याह्न या सायं) के ठीक बाद इस वन्दना का पाठ करना सबसे उत्तम है। जप के उपरान्त माँ की स्तुति साधना को पूर्णता देती है।
  • शुद्धि: स्नान के बाद पवित्र होकर शांत मन से आसन पर बैठें। यदि मन्त्र जप कर चुके हैं, तो उसी ऊर्जा के साथ वन्दना प्रारंभ करें।
  • मुद्रा: दोनों हाथों को जोड़कर (अञ्जलि मुद्रा) हृदय के पास रखें। माँ के ज्योतिर्मय स्वरूप का ध्यान करें।
  • एकाग्रता: पाठ करते समय प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर ध्यान दें। विशेष रूप से श्लोक १४ पढ़ते समय पूर्ण शरणागति का भाव रखें।
  • नियमितता: नित्य कम से कम एक बार पाठ करने से वाणी में मधुरता और जीवन में सकारात्मकता आती है।
नोट: 'प्रणयाञ्जलि' का अर्थ ही प्रेम का अर्पण है। पाठ करते समय जितना अधिक प्रेम और समर्पण का भाव होगा, माँ की कृपा उतनी ही शीघ्र प्राप्त होगी।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस वन्दना के रचनाकार कौन हैं?

यह वन्दना पण्डित ध्यामनाथ शुक्ल 'द्विजश्याम' द्वारा रचित है। यह आधुनिक संस्कृत काव्य की एक अत्यंत सुन्दर और दार्शनिक रचना है।

2. 'प्रणयाञ्जलि' और सामान्य आरती में क्या अन्तर है?

आरती बाहरी पूजा का अंग है, जबकि 'प्रणयाञ्जलि' एक दार्शनिक स्तुति है जो माँ के तत्त्व और भक्त के आन्तरिक समर्पण पर अधिक बल देती है।

3. क्या इस वन्दना का पाठ गायत्री मन्त्र के जप बिना किया जा सकता है?

हाँ, इसे स्वतंत्र स्तुति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। माँ की महिमा का गुणगान अपने आप में एक पूर्ण साधना है।

4. 'द्विजश्याम' जी ने माँ को 'धात्वाव्ययप्रत्ययलिङ्गशून्या' क्यों कहा?

यह एक व्याकरणिक रूपक है। कवि कहते हैं कि माँ व्याकरण के नियमों (धातु, प्रत्यय आदि) से परे हैं, अर्थात् वे भाषा और बुद्धि की सीमाओं से परे अनन्त हैं।

5. क्या इसे बच्चे भी पढ़ सकते हैं?

अवश्य, गायत्री बुद्धि की अधिष्ठात्री हैं। बच्चों के लिए यह वन्दना एकाग्रता और बौद्धिक विकास का बहुत बड़ा साधन है।

6. 'दृक्तारिका तारकशङ्करस्य' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि माँ गायत्री भगवान शिव (जो स्वयं जगत के रक्षक हैं) की आँखों की पुतली (ज्योति) के समान प्रिय और शक्ति स्वरूप हैं।

7. क्या इस पाठ के लिए दीक्षा आवश्यक है?

भक्ति स्तोत्रों के पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है। कोई भी माँ का पुत्र/पुत्री अपनी माँ की वन्दना शुद्ध मन से कर सकता है।

8. पाठ के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

यद्यपि नित्य पाठ श्रेष्ठ है, परन्तु रविवार और गायत्री जयन्ती के दिन इसका पाठ विशेष ऊर्जा प्रदान करता है।

9. क्या यह वन्दना मानसिक कष्टों को दूर करती है?

हाँ, माँ को 'नित्यानन्दे' और 'दयार्द्रदृक्' कहा गया है। उनकी करुणा साधक के मानसिक संतापों और तनावों को दूर करने में सक्षम है।

10. 'सकलभुवनरक्षासृष्टिसंहारकर्त्रीं' का दार्शनिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि माँ गायत्री ही वह आद्या शक्ति हैं जो पूरे ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन (रक्षा) और संहार करती हैं। वे ही कालचक्र की संचालिका हैं।