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Sri Gayatri Stavaraja – श्री गायत्री स्तवराजः

Sri Gayatri Stavaraja – श्री गायत्री स्तवराजः
॥ श्री गायत्री स्तवराजः ॥
(श्री विश्वामित्र ऋषि प्रणीतः)
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीगायत्रीस्तवराजस्तोत्रमन्त्रस्य विश्वामित्र ऋषिः, सकलजननी चतुष्पदा श्रीगायत्री परमात्मा देवता, सर्वोत्कृष्टं परं धाम प्रथमपादो बीजं, द्वितीयः शक्तिः, तृतीयः कीलकं, दशप्रणवसम्युक्ता सव्याहृतिका तुरीयपादो व्यापकं, मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः । (जल छोड़े)
॥ ध्यानम् ॥
गायत्रीं वेदधात्रीं शतमखफलदां वेदशास्त्रैकवेद्यां चिच्छक्तिं ब्रह्मविद्यां परमशिवपदां श्रीपदं वै करोति । सर्वोत्कृष्टं पदं तत्सवितुरनुपदान्ते वरेण्यं शरण्यं भर्गो देवस्य धीमह्यभिदधति धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ १ ॥
इत्यौर्वतेजः ।
॥ स्तोत्रम् ॥
साम्राज्यबीजं प्रणवं त्रिपादं सव्यापसव्यं प्रजपेत्सहस्रकम् । सम्पूर्णकामं प्रणवं विभूतिं तथा भवेद्वाक्यविचित्रवाणी ॥ २ ॥ शुभं शिवं शोभनमस्तु मह्यं सौभाग्यभोगोत्सवमस्तु नित्यम् । प्रकाशविद्यात्रयशास्त्रसर्वं भजेन्महामन्त्रफलं प्रिये वै ॥ ३ ॥ ब्रह्मास्त्रं ब्रह्मदण्डं शिरसि शिखिमहद्ब्रह्मशीर्षं नमोऽन्तं सूक्तं पारायणोक्तं प्रणवमथ महावाक्यसिद्धान्तमूलम् । तुर्यं त्रीणि द्वितीयं प्रथममनुमहावेदवेदान्तसूक्तं नित्यं स्मृत्यानुसारं नियमितचरितं मूलमन्त्रं नमोऽन्तम् ॥ ४ ॥ अस्त्रं शस्त्रहतं त्वघोरसहितं दण्डेन वाजीहतं चादित्यादिहतं शिरोऽन्तसहितं पापक्षयार्थं परम् । तुर्यान्त्यादिविलोममन्त्रपठनं बीजं शिखान्तोर्ध्वकं नित्यं कालनियम्यविप्रविदुषां किं दुष्कृतं भूसुरान् ॥ ५ ॥ नित्यं मुक्तिप्रदं नियम्य पवनं निर्घोषशक्तित्रयं सम्यग्ज्ञानगुरूपदेशविधिवद्देवीं शिखां तामपि । षष्ट्यैकोत्तरसङ्ख्ययानुगतसौषुम्नादिमार्गत्रयीं ध्यायेन्नित्यसमस्तवेदजननीं देवीं त्रिसन्ध्यामयीम् ॥ ६ ॥ गायत्रीं सकलागमार्थविदुषां सौरस्य बीजेश्वरीं सर्वाम्नायसमस्तमन्त्रजननीं सर्वज्ञधामेश्वरीम् । ब्रह्मादित्रयसम्पुटार्थकरणीं संसारपारायणीं सन्ध्यां सर्वसमानतन्त्र परया ब्रह्मानुसन्धायिनीम् ॥ ७ ॥ एकद्वित्रिचतुःसमानगणनावर्णाष्टकं पादयोः पादादौ प्रणवादिमन्त्रपठने मन्त्रत्रयी सम्पुटाम् । सन्ध्यायां द्विपदं पठेत्परतरं सायं तुरीयं युतं नित्यानित्यमनन्तकोटिफलदं प्राप्तं नमस्कुर्महे ॥ ८ ॥ ओजोऽसीति सहोऽस्यहो बलमसि भ्राजोऽसि तेजस्विनी वर्चस्वी सविताग्निसोमममृतं रूपं परं धीमहि । देवानां द्विजवर्यतां मुनिगणे मुक्त्यर्थिनां शान्तिना- -मोमित्येकमृचं पठन्ति यमिनो यं यं स्मरेत्प्राप्नुयात् ॥ ९ ॥ ओमित्येकमजस्वरूपममलं तत्सप्तधा भाजितं तारं तन्त्रसमन्वितं परतरे पादत्रयं गर्भितम् । आपो ज्योति रसोऽमृतं जनमहः सत्यं तपः स्वर्भुव- -र्भूयो भूय नमामि भूर्भुवःस्वरोमेतैर्महामन्त्रकम् ॥ १० ॥ आदौ बिन्दुमनुस्मरन् परतरे बाला त्रिवर्णोच्चरन् व्याहृत्यादिसबिन्दुयुक्तत्रिपदातारत्रयं तुर्यकम् । आरोहादवरोहतः क्रमगता श्रीकुण्डलीत्थं स्थिता देवी मानसपङ्कजे त्रिनयना पञ्चानना पातु माम् ॥ ११ ॥ सर्वे सर्ववशे समस्तसमये सत्यात्मिके सात्त्विके सावित्रीसवितात्मिके शशियुते साङ्ख्यायनी गोत्रजे । सन्ध्यात्रीण्युपकल्प्य सङ्ग्रहविधिः सन्ध्याभिधानामके गायत्रीप्रणवादिमन्त्रगुरुणा सम्प्राप्य तस्मै नमः ॥ १२ ॥ क्षेमं दिव्यमनोरथाः परतरे चेतः समाधीयितां ज्ञानं नित्यवरेण्यमेतदमलं देवस्य भर्गो धियन् । मोक्षश्रीर्विजयार्थिनोऽथ सवितुः श्रेष्ठं विधिस्तत्पदं प्रज्ञा मेध प्रचोदयात्प्रतिदिनं यो नः पदं पातु माम् ॥ १३ ॥ सत्यं तत्सवितुर्वरेण्यविरलं विश्वादिमायात्मकं सर्वाद्यं प्रतिपादपादरमया तारं तथा मन्मथम् । तुर्यान्यत्रितयं द्वितीयमपरं सम्योगसव्याहृतिं सर्वाम्नायमनोन्मनीं मनसिजां ध्यायामि देवीं पराम् ॥ १४ ॥ आदौ गायत्रिमन्त्रं गुरुकृतनियमं धर्मकर्मानुकूलं सर्वाद्यं सारभूतं सकलमनुमयं देवतानामगम्यम् । देवानां पूर्वदेवं द्विजकुलमुनिभिः सिद्धविद्याधराद्यैः को वा वक्तुं समर्थस्तव मनुमहिमाबीजराजादिमूलम् ॥ १५ ॥ गायत्रीं त्रिपदां त्रिबीजसहितां त्रिव्याहृतिं त्रिपदां त्रिब्रह्मा त्रिगुणां त्रिकालनियमां वेदत्रयीं तां पराम् । साङ्ख्यादित्रयरूपिणीं त्रिनयनां मातृत्रयीं तत्परां त्रैलोक्य त्रिदशत्रिकोटिसहितां सन्ध्यां त्रयीं तां नुमः ॥ १६ ॥ ओमित्येतत्त्रिमात्रा त्रिभुवनकरणं त्रिस्वरं वह्निरूपं त्रीणि त्रीणि त्रिपादं त्रिगुणगुणमयं त्रैपुरान्तं त्रिसूक्तम् । तत्त्वानां पूर्वशक्तिं द्वितयगुरुपदं पीठयन्त्रात्मकं तं तस्मादेतत्त्रिपादं त्रिपदमनुसरं त्राहि मां भो नमस्ते ॥ १७ ॥ स्वस्ति श्रद्धाऽतिमेधा मधुमतिमधुरः संशयः प्रज्ञकान्ति- -र्विद्याबुद्धिर्बलं श्रीरतुलधनपतिः सौम्यवाक्यानुवृत्तिः । मेधा प्रज्ञा प्रतिष्ठा मृदुपतिमधुरापूर्णविद्या प्रपूर्णं प्राप्तं प्रत्यूषचिन्त्यं प्रणवपरवशात्प्राणिनां नित्यकर्म ॥ १८ ॥ पञ्चाशद्वर्णमध्ये प्रणवपरयुते मन्त्रमाद्यं नमोन्तं सर्वं सव्यापसव्यं शतगुणमभितो वर्णमष्टोत्तरं ते । एवं नित्यं प्रजप्तं त्रिभुवनसहितं तुर्यमन्त्रं त्रिपादं ज्ञानं विज्ञानगम्यं गगनसुसदृशं ध्यायते यः स मुक्तः ॥ १९ ॥ आदिक्षान्तसबिन्दुयुक्तसहितं मेरुं क्षकारात्मकं व्यस्ताव्यस्तसमस्तवर्गसहितं पूर्णं शताष्टोत्तरम् । गायत्रीं जपतां त्रिकालसहितां नित्यं सनैमित्तिकं एवं जाप्यफलं शिवेन कथितं सद्भोगमोक्षप्रदम् ॥ २० ॥ सप्तव्याहृतिसप्ततारविकृतिः सत्यं वरेण्यं धृतिः सर्वं तत्सवितुश्च धीमहि महाभर्गस्य देवं भजे । धाम्नो धाम समाधिधारणमहान् धीमत्पदं ध्यायते ओं तत्सर्वमनुप्रपूर्णदशकं पादत्रयं केवलम् ॥ २१ ॥ विज्ञानं विलसद्विवेकवचसः प्रज्ञानुसन्धारिणीं श्रद्धामेध्ययशः शिरः सुमनसः स्वस्ति श्रियं त्वां सदा । आयुष्यं धनधान्यलक्ष्मिमतुलं देवीं कटाक्षं परं तत्काले सकलार्थसाधनमहान्मुक्तिर्महत्वं पदम् ॥ २२ ॥ पृथ्वी गन्धोऽर्चनायां नभसि कुसुमता वायुधूपप्रकर्षो वह्निर्दीपप्रकाशो जलममृतमयं नित्यसङ्कल्पपूजा । एतत्सर्वं निवेद्यं सुखवसति हृदि सर्वदा दम्पतीनां त्वं सर्वज्ञ शिवं कुरुष्व ममता नाहं त्वया ज्ञेयसि ॥ २३ ॥ सौम्यं सौभाग्यहेतुं सकलसुखकरं सर्वसौख्यं समस्तं सत्यं सद्भोगनित्यं सुखजनसुहृदं सुन्दरं श्रीसमस्तम् । सौमङ्गल्यं समग्रं सकलशुभकरं स्वस्तिवाचं समस्तं सर्वाद्यं सद्विवेकं त्रिपदपदयुगं प्राप्तुमध्यासमस्तम् ॥ २४ ॥ गायत्रीपदपञ्चपञ्चप्रणवद्वन्द्वं त्रिधा सम्पुटं सृष्ट्यादिक्रममन्त्रजाप्यदशकं देवीपदं क्षुत्त्रयम् । मन्त्रादिस्थितिकेषु सम्पुटमिदं श्रीमातृकावेष्टितं वर्णान्त्यादिविलोममन्त्रजपनं संहारसम्मोहनम् ॥ २५ ॥ भूराद्यं भूर्भुवस्वस्त्रिपदपदयुतं त्र्यक्षमाद्यन्तयोज्यं सृष्टिस्थित्यन्तकार्यं क्रमशिखिसकलं सर्वमन्त्रं प्रशस्तम् । सर्वाङ्गं मातृकाणां मनुमयवपुषं मन्त्रयोगं प्रयुक्तं संहारं क्षादिवर्णं वसुशतगणनं मन्त्रराजं नमामि ॥ २६ ॥
॥ फलश्रुति ॥
विश्वामित्रमुदाहृतं हितकरं सर्वार्थसिद्धिप्रदं स्तोत्राणां परमं प्रभातसमये पारायणं नित्यशः । वेदानां विधिवादमन्त्रसकलं सिद्धिप्रदं सम्पदां सम्प्राप्नोति परत्र सर्वसुखदं चायुष्यमारोग्यताम् ॥ २७ ॥
॥ इति श्रीविश्वामित्र कृत श्री गायत्री स्तवराजः ॥

श्री गायत्री स्तवराजः - परिचय एवं महात्म्य

श्री गायत्री स्तवराजः (Sri Gayatri Stavaraja) वैदिक साहित्य की अमूल्य निधि है। इसकी रचना महर्षि विश्वामित्र ने की है, जो स्वयं गायत्री मंत्र के 'द्रष्टा' (Seer) हैं। 'स्तवराज' का शाब्दिक अर्थ है "स्तुतियों का राजा"। जिस प्रकार गायत्री मंत्र को 'मंत्रराज' कहा जाता है, उसी प्रकार इस स्तोत्र को गायत्री की समस्त स्तुतियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह स्तोत्र सामान्य प्रार्थना नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय साधना पद्धति है।

इस स्तोत्र की विशेषता इसमें निहित 'कुण्डलिनी विज्ञान' और 'नाद योग' है। इसमें गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों को, प्रणव (ॐ) को, और व्याहृतियों (भूः भुवः स्वः) को इस प्रकार गूंथा गया है कि पाठ करते समय साधक के शरीर में एक विशेष कंपन (Vibration) उत्पन्न होता है। यह कंपन सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय करता है और 'आज्ञा चक्र' (भ्रूमध्य) पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।

विश्वामित्र जी ने अपनी घोर तपस्या से गायत्री की जिस शक्ति का अनुभव किया था, उसे उन्होंने इस स्तोत्र में शब्दबद्ध किया है। यह स्तोत्र साधक को केवल पापों से मुक्त नहीं करता, बल्कि उसे एक तेजस्वी व्यक्तित्व (Magnetic Personality) प्रदान करता है। इसे 'ब्रह्मास्त्र' के समान अमोघ माना गया है, जो अज्ञान और अंधकार को एक क्षण में भेद देता है।

विशिष्ट महत्व और दार्शनिक विश्लेषण (Significance)

श्री गायत्री स्तवराज का महत्व इसके बहुआयामी प्रभावों में देखा जा सकता है। यह केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि एक विज्ञान है:

  • वाक सिद्धि (Power of Speech): श्लोक 2 में कहा गया है—"भवेद्वाक्यविचित्रवाणी"। इसका नियमित पाठ करने वाले साधक की वाणी में ओज और सम्मोहन आ जाता है। वह जो कहता है, वह सत्य और प्रभावी होता है। यह वक्ताओं, शिक्षकों और वकीलों के लिए वरदान समान है।

  • तांत्रिक सुरक्षा कवच: श्लोक 5 में इसे "अस्त्रं शस्त्रहतं" कहा गया है। यह साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाता है जो न केवल भौतिक शस्त्रों से, बल्कि तांत्रिक अभिचार (Black Magic) और नकारात्मक ऊर्जाओं से भी रक्षा करता है।

  • कुण्डलिनी जागरण: श्लोक 11 में "आरोहादवरोहतः क्रमगता श्रीकुण्डलीत्थं स्थिता" पंक्ति स्पष्ट करती है कि यह स्तोत्र कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से सहस्रार तक ले जाने (आरोहण) और वापस लाने (अवरोहण) की प्रक्रिया को सुगम बनाता है।

  • दाम्पत्य सुख: अक्सर वैदिक स्तोत्र केवल वैराग्य की बात करते हैं, लेकिन यह स्तोत्र श्लोक 23 में "सुखवसति हृदि सर्वदा दम्पतीनां" कहकर गृहस्थ जीवन में प्रेम और सामंजस्य स्थापित करने का आश्वासन देता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ

महर्षि विश्वामित्र ने स्वयं इस स्तोत्र के अंत में (श्लोक 27) इसके लाभों की घोषणा की है। इसके नित्य पाठ से निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

१. सर्वार्थ सिद्धि
यह स्तोत्र "सर्वार्थसिद्धिप्रदं" है। अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि एक साथ प्रदान करता है। साधक के जीवन की सभी बाधाएं स्वतः समाप्त होने लगती हैं।
२. आरोग्य और दीर्घायु
इसके नित्य पाठ से "आयुष्यमारोग्यताम्" प्राप्त होती है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) और प्राण शक्ति को बढ़ाता है, जिससे साधक स्वस्थ और दीर्घजीवी बनता है।
३. मेधा और प्रज्ञा
यह बुद्धि को कुशाग्र करता है। विद्यार्थियों के लिए यह "विद्याबुद्धिर्बलं" (विद्या, बुद्धि और बल) देने वाला सर्वोत्तम साधन है, जिससे उनकी ग्रहण शक्ति में वृद्धि होती है।
४. परम शांति
मानसिक तनाव, भय और संशय को दूर करके यह साधक को गहन आंतरिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। यह चित्त की चंचलता को 'स्तम्भित' (रोकने) में सहायक है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Method)

श्री गायत्री स्तवराज का पूर्ण लाभ उठाने के लिए निम्नलिखित शास्त्रीय विधि अपनाएं:

  • समय: श्लोक 27 में स्पष्ट निर्देश है—"प्रभातसमये पारायणं नित्यशः"। अर्थात सूर्योदय के समय (प्रातः सन्ध्या) इसका पाठ करना अनिवार्य और सर्वश्रेष्ठ है।
  • विनियोग: पाठ शुरू करने से पहले दाएं हाथ में जल लेकर 'विनियोग' मंत्र बोलें और जल भूमि पर छोड़ दें। यह संकल्प और उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
  • आसन: पूर्व दिशा (सूर्य की ओर) मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
  • ध्यान: 'ध्यानम्' श्लोक (गायत्रीं वेदधात्रीं...) बोलते समय कल्पना करें कि सूर्य मण्डल के बीच देवी गायत्री हंस पर विराजमान हैं और उनका स्वर्ण-तेज आपके भीतर समा रहा है।
  • शुद्धि: पाठ के दौरान मन में श्रद्धा और शरीर में पवित्रता का होना अत्यंत आवश्यक है।

नोट: यह स्तोत्र संस्कृत निष्ठ और तांत्रिक बीजों से युक्त है, अतः उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। यदि संस्कृत कठिन लगे तो इसे धीरे-धीरे सुनकर अभ्यास करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री स्तवराज का पाठ करने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य 'ब्रह्मतेज' (Spiritual Glow) और 'वाक सिद्धि' (वाणी की शक्ति) प्राप्त करना है। यह साधक को अलौकिक बुद्धि, स्मरण शक्ति और आध्यात्मिक तेज प्रदान करता है।

2. 'स्तवराज' का क्या अर्थ है?

'स्तव' का अर्थ है स्तुति और 'राज' का अर्थ है राजा। अर्थात यह गायत्री की हजारों स्तुतियों में सर्वश्रेष्ठ, सबसे प्रभावशाली और 'राजा' के समान शक्तिशाली है।

3. क्या इस स्तोत्र में कोई बीज मंत्र शामिल है?

हाँ, इस स्तोत्र में ॐ (प्रणव), भूः भुवः स्वः (व्याहृतियां) और गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों का तांत्रिक विन्यास (Arrangement) है, जो इसे अत्यंत ऊर्जावान बनाता है।

4. क्या इसके पाठ से शत्रु भय दूर होता है?

बिल्कुल। श्लोक ५ में उल्लेख है कि यह 'अस्त्रं शस्त्रहतं' अर्थात अस्त्र-शस्त्र के आघात और 'अघोर' शक्तियों (गुप्त शत्रुओं) से रक्षा करने वाला अभेद्य कवच है।

5. कुण्डलिनी जागरण में इसकी क्या भूमिका है?

श्लोक ११ में 'श्रीकुण्डलीत्थं स्थिता' का वर्णन है। यह स्तोत्र सुषुम्ना नाड़ी को जागृत कर कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से ऊपर उठाने (आरोहण) में सहायक है।

6. क्या गृहस्थ लोग इसका पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, श्लोक २३ में 'सुखवसति हृदि सर्वदा दम्पतीनां' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह पति-पत्नी (दम्पती) के जीवन में सुख, प्रेम और समझ बढ़ाता है।

7. पाठ के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

'प्रभातसमये पारायणं नित्यशः' (श्लोक २७) - अर्थात प्रतिदिन प्रातः काल (सूर्योदय के समय) इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। सन्ध्या काल में भी किया जा सकता है।

8. 'वाक्यविचित्रवाणी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि साधक की वाणी इतनी प्रभावशाली, तर्कपूर्ण और विचित्र (अद्भुत) हो जाती है कि वह जो बोलता है, लोग उसे मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं और मानते हैं।

9. क्या यह स्तोत्र मोक्ष प्रदान करता है?

हाँ, फलश्रुति और श्लोक २० में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'सद्भोगमोक्षप्रदम्' है, अर्थात यह जीवन में भौतिक भोग (ऐश्वर्य) और अंत में मोक्ष (मुक्ति) दोनों देता है।

10. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ स्त्रियाँ भी इसका पाठ कर सकती हैं। माँ गायत्री स्वयं स्त्री स्वरूपा हैं और वेदों की माता हैं।