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श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्रम् (Sri Ganapati Mantraksharavali Stotram)

Sri Ganapati Mantraksharavali Stotram

श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्रम् (Sri Ganapati Mantraksharavali Stotram)
॥ श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्रम् ॥ श्रीदेव्युवाच । विना तपो विना ध्यानम् विना होमं विना जपम् । अनायासेन विघ्नेशप्रीणनं वद मे प्रभो ॥ १ ॥ महेश्वर उवाच । मन्त्राक्षरावलिस्तोत्रं महासौभाग्यवर्धनम् । दुर्लभं दुष्टमनसां सुलभं शुद्धचेतसाम् ॥ २ ॥ महागणपतिप्रीतिप्रतिपादकमञ्जसा । कथयामि घनश्रोणि कर्णाभ्यामवतंसय ॥ ३ ॥ ओङ्कारवलयाकारं अच्छकल्लोलमालिकम् । ऐक्षवं चेतसा वन्दे सिन्धुं सन्धुक्षितस्वनम् ॥ ४ ॥ श्रीमन्तमिक्षुजलधेः अन्तरभ्युदितं नुमः । मणिद्वीपं महाकारं महाकल्पं महोदयम् ॥ ५ ॥ ह्रीप्रदेन महाधाम्ना धाम्नामीशे विभारके । कल्पोद्यानस्थितं वन्दे भास्वन्तं मणिमण्डपम् ॥ ६ ॥ क्लीबस्यापि स्मरोन्मादकारिशृङ्गारशालिनि । तन्मध्ये गणनाथस्य मणिसिंहासनं भजे ॥ ७ ॥ ग्लौकलाभिरिवाच्छाभिस्तीव्रादिनवशक्तिभिः । जुष्टं लिपिमयं पद्मं धर्माद्याश्रयमाश्रये ॥ ८ ॥ गम्भीरमिव तत्राब्धिं वसन्तं त्र्यश्रमण्डले । उत्सङ्गगतलक्ष्मीकं उद्यत्तिग्मांशुपाटलम् ॥ ९ ॥ गदेक्षुकार्मुकरुजाचक्राम्बुजगुणोत्पलैः । व्रीह्यग्रनिजदन्ताग्रकलशीमातुलुङ्गकैः ॥ १० ॥ णषष्ठवर्णवाच्यस्य दारिद्र्यस्य विभञ्जकैः । एतैरेकादशकरान् अलङ्कुर्वाणमुन्मदम् ॥ ११ ॥ परानन्दमयं भक्तप्रत्यूहव्यूहनाशनम् । परमार्थप्रबोधाब्धिं पश्यामि गणनायकम् ॥ १२ ॥ तत्पुरः प्रस्फुरद्बिल्वमूलपीठसमाश्रयौ । रमारमेशौ विमृशाम्यशेषशुभदायकौ ॥ १३ ॥ येन दक्षिणभागस्थन्यग्रोधतलमाश्रितम् । साकल्पं सायुधं वन्दे तं साम्बं परमेश्वरम् ॥ १४ ॥ वरसम्भोगरुचिरौ पश्चिमे पिप्पलाश्रयौ । रमणीयतरौ वन्दे रतिपुष्पशिलीमुखौ । १५ ॥ रममाणौ गणेशानोत्तरदिक्फलिनीतले । भूभूधरावुदाराभौ भजे भुवनपालकौ ॥ १६ ॥ वलमानवपुर्ज्योतिः कडारितककुप्तटीः । हृदयाद्यङ्गषड्देवीरङ्गरक्षाकृते भजे ॥ १७ ॥ रदकाण्डरुचिज्योत्स्नाकाशगण्डस्रवन्मदम् । ऋद्ध्याश्लेषकृतामोदमामोदं देवमाश्रये ॥ १८ ॥ दलत्कपोलविगलन्मदधारावलाहकम् । समृद्धितटिदाश्लिष्टं प्रमोदं हृदि भावये ॥ १९ ॥ सकान्तिं कान्तिलतिकापरिरब्धतनुं भजे । भुजप्रकाण्डसच्छायं सुमुखं कल्पपादपम् ॥ २० ॥ वन्दे तुन्दिलमिन्धानं चन्द्रकन्दलशीतलम् । दुर्मुखं मदनावत्या निर्मितालिङ्गनामृतम् ॥ २१ ॥ जम्भवैरिकृताभ्यर्च्यौ जगदभ्युदयप्रदौ । अहं मदद्रवाविघ्नौ हतये त्वेनसां श्रये ॥ २२ ॥ नवशृङ्गाररुचिरौ नमत्सर्वसुरासुरौ । द्राविणीविघ्नकर्तारौ द्रावयेतां दरिद्रताम् ॥ २ ३ ॥ मेदुरं मौक्तिकासारं वर्षन्तौ भक्तिशालिनाम् । वसुधाराशङ्खनिधी वाक्पुष्पाञ्जलिभिः स्तुमः ॥ २४ ॥ वर्षन्तौ रत्नवर्षेण वलद्बालातपत्विषौ । वरदौ नमतां वन्दे वसुधापद्मशेवधी ॥ २५ ॥ शमिताधिमहाव्याधीः सान्द्रानन्दकरम्बिताः । ब्राह्म्यादीः कलये शक्तीः शक्तीनामभिवृद्धये ॥ २६ ॥ मामवन्तु महेन्द्राद्या दिक्पाला दर्पशालिनः । संनताः श्रीगणाधीशं सवाहायुधशक्तयः ॥ २७ ॥ नवीनपल्लवच्छायादायादवपुरुज्ज्वलम् । मेदस्वि मदनिष्यन्दस्रोतस्वि कटकोटरम् ॥ २८ ॥ यजमानतनुं यागरूपिणं यज्ञपूरुषम् । यमं यमवतामर्च्यं यत्नभाजामदुर्लभम् ॥ २९ ॥ स्वारस्यपरमानन्दस्वरूपं स्वयमुद्गतम् । स्वयं वेद्यं स्वयं शक्तं स्वयं कृत्यत्रयाकरम् ॥ ३० ॥ हारकेयूर मुकुटकनकाङ्गद कुण्डलैः । अलङ्कृतं च विघ्नानां हर्तारं देवमाश्रये ॥ ३१ ॥ फलश्रुति मन्त्राक्षरावलिस्तोत्रं कथितं तव सुन्दरि । समस्तमीप्सितं तेन सम्पादय शिवे शिवम् ॥ ३२ ॥ इति श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्रम् ।
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प्रस्तावना (Introduction)

श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्रम् (Sri Ganapati Mantraksharavali Stotram) भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को दिया गया एक दुर्लभ और गुप्त उपदेश है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है - "मंत्र-अक्षर-आवलि" अर्थात यह स्तोत्र भगवान गणेश के शक्तिशाली मंत्रों के "अक्षरों की माला" (Garland of Mantra Letters) है।

सामान्यतः देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या, ध्यान या हवन की आवश्यकता होती है। किन्तु इस स्तोत्र के प्रथम श्लोक में ही भगवान शिव एक क्रांतिकारी रहस्य प्रकट करते हैं - "विना तपो विना ध्यानम् विना होमं विना जपम्"। अर्थात, जो कलयुगी मनुष्य जटिल साधनाएं नहीं कर सकता, वह केवल इस स्तोत्र के पाठ मात्र से सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता (Uniqueness & Significance)

1. बीज मंत्रों का शक्तिपुंज:
यह कोई साधारण कविता नहीं है। इसके श्लोकों में गणेश जी के तांत्रिक बीज मंत्र (जैसे 'गं', 'ह्रीं', 'श्रीं', 'ग्लौं') गुप्त रूप से बुने गए हैं। जब हम इन श्लोकों का उच्चारण करते हैं, तो अज्ञात रूप से हम उन बीज मंत्रों को जाग्रत कर रहे होते हैं।

2. दरिद्रता नाशक (Destroyer of Poverty):
गणेश जी "ऋद्धि-सिद्धि" के दाता हैं। इस स्तोत्र में उन्हें "दारिद्र्यस्य विभञ्जकैः" (दरिद्रता को तोड़ने वाला) और "महासौभाग्यवर्धनम्" (सौभाग्य बढ़ाने वाला) कहा गया है। यह आर्थिक बाधाओं को दूर करने के लिए अचूक है।

3. शिव-शक्ति संवाद:
यह स्तोत्र एक संवाद (Dialogue) के रूप में है, जहाँ जगत पिता महादेव जगत जननी पार्वती को उपदेश दे रहे हैं। जिस स्तोत्र का वक्त स्वयं शिव हों, उसकी महिमा अनंत है।

प्रमुख लाभ (Key Benefits)

फलश्रुति के अनुसार इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
  • अनायास सिद्धि: "अनायासेन विघ्नेशप्रीणनं" - बिना प्रयास के विघ्नहर्ता की कृपा। यह व्यस्त जीवन शैली वाले लोगों के लिए वरदान है।

  • समस्त इच्छा पूर्ति: "समस्तमीप्सितं तेन सम्पादय" - साधक जो भी इच्छा (नौकरी, विवाह, संतान, मोक्ष) मन में रखकर पाठ करता है, वह पूर्ण होती है।

  • बुद्धि और विद्या: बीज मंत्रों की ध्वनि मस्तिष्क के सुप्त तंतुओं (Neurons) को जागृत करती है, जिससे स्मरण शक्ति और कुशाग्र बुद्धि प्राप्त होती है।

पाठ विधि (Chanting Method)

सरल विधि

  1. शुद्धि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. आसन: लाल या पीले रंग के आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. संकल्प: हाथ में जल लेकर गणेश जी से अपनी मनोकामना कहें।
  4. पाठ: कम से कम एक बार (हो सके तो 11 बार) इस स्तोत्र का पाठ करें।
  5. भोग: अंत में गणेश जी को गुड़, मोदक या ऋतु फल का भोग लगाएं।

विशेष: इसका पाठ "चतुर्थी" तिथि को करने से इसका प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणपति मन्त्राक्षरावलि स्तोत्र क्या है? (What is Sri Ganapati Mantraksharavali Stotram?)

यह भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को उपदेशित एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है। 'मन्त्राक्षरावलि' का अर्थ है - 'मंत्रों के अक्षरों की माला'। इसमें भगवान गणेश के मूल बीज मंत्रों (जैसे गं, ग्लौं, ह्रीं) को श्लोकों के रूप में पिरोया गया है।

इस स्तोत्र की मुख्य विशेषता क्या है?

इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान शिव स्वयं कहते हैं - 'विना तपो विना ध्यानम्' - अर्थात बिना कठोर तप, बिना लंबे ध्यान और बिना हवन के भी केवल इस स्तोत्र के पाठ से गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं।

महागणपति मन्त्राक्षरावलि के पाठ से क्या लाभ होता है?

यह स्तोत्र 'महासौभाग्यवर्धनम्' है, यानी यह दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल देता है। इसके पाठ से दरिद्रता का नाश होता है (दारिद्र्यस्य विभञ्जकैः) और साधक को अष्ट सिद्धि और नव निधि की प्राप्ति होती है।

इसमें किन बीज मंत्रों का प्रयोग हुआ है?

इसमें गणेश जी के शक्तिशाली बीज मंत्रों जैसे 'गं' (Gam), 'ग्लौं' (Glaum), 'श्रीं' (Shreem), 'ह्रीं' (Hreem), और 'क्लीं' (Kleem) का गुप्त रूप से समावेश है। यह साक्षात मंत्र योग है।

क्या इसे बिना गुरु दीक्षा के पढ़ा जा सकता है?

स्तोत्र रूप में होने के कारण इसे भक्ति भाव से पढ़ा जा सकता है। लेकिन चूंकि यह 'मन्त्रात्मक' है, यदि किसी गुरु से इसे समझा जाए तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

'विना होमं विना जपम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'बिना हवन और बिना जप के'। कलयुग में जब लोगों के पास जटिल वैदिक अनुष्ठान करने का समय या ज्ञान नहीं है, तब यह स्तोत्र एक सरल शॉर्टकट (Shortcut) की तरह कार्य करता है जो पूर्ण फल देता है।

इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

इसे ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में करना सर्वोत्तम है। गणेश चतुर्थी, बुधवार, या संकष्टी चतुर्थी के दिन इसका 11 बार पाठ विशेष फलदायी होता है।

क्या यह धन प्राप्ति के लिए प्रभावी है?

हाँ, अत्यंत प्रभावी। श्लोक 11 में स्पष्ट कहा गया है - 'दारिद्र्यस्य विभञ्जकैः' (दरिद्रता को तोड़ने वाला)। जो लोग कर्ज या आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, उन्हें इसका नित्य पाठ करना चाहिए।

क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। इसमें 'परमार्थप्रबोधाब्धिं' कहा गया है, जिसका अर्थ है सर्वोच्च ज्ञान का सागर। यह बुद्धि, स्मृति और विवेक को बढ़ाता है, जो विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है।

'ओङ्कारवलयाकारं' से क्या तात्पर्य है?

गणेश जी का स्वरूप 'ओम' (ॐ) कार जैसा है। वे साक्षात नाद ब्रह्म हैं। यह शब्द उनकी उसी आदि शक्ति और ब्रह्मांडीय स्वरूप (Cosmic Form) का वर्णन करता है।

फलश्रुति में भगवान शिव क्या आश्वासन देते हैं?

भगवान शिव कहते हैं - 'समस्तमीप्सितं तेन सम्पादय'। अर्थात, इस स्तोत्र के पाठ से साधक की सभी मनोकामनाएं (चाहे भौतिक हों या आध्यात्मिक) निश्चित रूप से पूर्ण होती हैं।

पाठ करते समय किस दिशा में मुख होना चाहिए?

पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करना चाहिए। सामने गणेश यंत्र या मूर्ति रखना शुभ होता है।