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श्री गणपति गीता (Sri Ganapati Gita)

Sri Ganapati Gita

श्री गणपति गीता (Sri Ganapati Gita)
अथ श्री गणपति गीता क्व प्रासूत कदा त्वां गौरी न प्रामाण्यं तव जनने । विप्राः प्राहुरजं गणराजं यः प्राचामपि पूर्वतमः ॥ १ ॥ नासि गणपते शङ्करात्मजो भासि तद्वदेवाखिलात्मकः । ईशता तवानीशता नृणां केशवेरिता साशयोक्तिभिः ॥ २ ॥ गजमुख तावकमन्त्र महिम्ना सृजति जगद्विधिरनुकल्पम् । भजति हरिस्त्वां तदवनकृत्ये यजति हरोऽपि विरामविधौ ॥ ३ ॥ सुखयति शतमखमुखसुरनिकरानखिलक्रतु विघ्नघ्नोऽयम् । निखिलजगज्जीवकजीवनदः स खलु यतः पर्जन्यात्मा ॥ ४ ॥ प्रारम्भे कार्याणां हेरम्बं यो ध्यायेत् । पारं यात्येव कृतेरारादाप्नोति सुखम् ॥ ५ ॥ गौरीसूनोः पादाम्भोजे लीना चेतोवृत्तिर्मे । घोरे संसारारण्ये वासः कैलासे वास्तु ॥ ६ ॥ गुहगुरु पदयुगमनिशमभयदम् । वहसि मनसि यदि शमयसि दुरितम् ॥ ७ ॥ जय जय शङ्करवरसूनो भयहर भजतां गणराज । नय मम चेतस्तव चरणं नियमय धर्मेऽन्तः करणम् ॥ ८ ॥ चलसि चित्त किन्नु विषमविषयकानने कलय वृत्तिममृत दातृकरिवरानने । तुलय खेदमोदयुगलमिदमशाश्वतं विलय भयमलङ्घ्यमेव जन्मनि स्मृतम् ॥ ९ ॥ सोमशेखरसूनवे सिन्दूरसोदरभानवे यामिनीपतिमौलये यमिहृदयविरचितकेलये । मूषकाधिपगामिने मुख्यात्मनोऽन्तर्यामिने मङ्गलं विघ्नद्विषे मत्तेभवक्त्रज्योतिषे ॥ १० ॥ अवधीरितदाडिमसुम सौभगमवतु गणेशज्योति- -र्मामवतु गणेशज्योतिः । हस्तचतुष्टयधृत वरदाभय पुस्तकबीजापूरं धृत पुस्तकबीजापूरम् ॥ ११ ॥ रजताचल वप्रक्रीडोत्सुक गजराजास्यमुदारं भज श्रीगजराजास्यमुदारम् । फणिपरिकृत कटिवलयाभरणं कृणु रे जनहृदिकारणं तव कृणु रे जनहृदिकारणम् ॥ १२ ॥ फलश्रुतिः । यः प्रगे गजराजमनुदिनमप्रमेयमनुस्मरेत् । स प्रयाति पवित्रिताङ्गो विप्रगङ्गाद्यधिकताम् ॥ १३ ॥ सुब्रह्मण्यमनीषिविरचिता त्वब्रह्मण्यमपाकुरुते । गणपतिगीता गानसमुचिता सम्यक्पठतां सिद्धान्तः ॥ १४ ॥ इति श्रीसुब्रह्मण्ययोगि विरचित श्री गणपति गीता सम्पूर्णम् ।
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श्री गणपति गीता का महत्व

श्री गणपति गीता, महान संत श्री सुब्रह्मण्य योगी द्वारा एक अद्भुत रचना है। मात्र 14 श्लोकों में यह गीता, श्रीमद्भगवद्गीता के समान ही गहन दार्शनिक ज्ञान और भक्ति का सार प्रस्तुत करती है।

इसमें गणेश जी को केवल शिव-पार्वती के पुत्र तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि उन्हें "अज" (अजन्मा), "प्राचामपि पूर्वतमः" (पुरातन से भी प्राचीन) और "अखिलात्मक" (सर्वव्यापी आत्मा) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। कवि का स्पष्ट मत है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपनी सृजन, पालन और संहार शक्तियों के लिए गणेश जी (परब्रह्म) का ही आश्रय लेते हैं।

मुख्य शिक्षाएँ (Key Teachings)

  • परम तत्त्व: गणेश जी ही वह परम सत्ता हैं जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं।

  • मन-निग्रह: "चलसि चित्त किन्नु" (श्लोक 9) - मन जो विषयरूपी वन में भटक रहा है, उसे गणेश भक्ति रूपी अमृत से शांत करना चाहिए।

  • त्रिमूर्ति के आधार: ब्रह्मा, विष्णु और शिव, तीनों गणेश जी की ही शक्ति का विस्तार हैं।

लाभ (Benefits)

  • आत्म-शुद्धि: "स प्रयाति पवित्रिताङ्गो" - जो प्रतिदिन इसका स्मरण करता है, उसका शरीर और आत्मा गंगाजल से भी अधिक पवित्र हो जाती है।

  • मन की शांति: यह चंचल चित्त को वश में करने ("चलसि चित्त किन्नु") और उसे धर्म में लगाने ("नियमय धर्मेऽन्तः करणम्") के लिए अत्यंत प्रभावी है।

  • पाप नाश: "त्वब्रह्मण्यमपाकुरुते" - यह स्तोत्र अब्रह्मण्य (वेदाचार के विरुद्ध पाप) को दूर करता है और साधक को सन्मार्ग पर लाता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

गणपति गीता की रचना किसने की?

गणपति गीता की रचना महान संत 'श्री सुब्रह्मण्य योगी' ने की है। यह उनके गहन भक्ति और वेदांत ज्ञान का परिचायक है।

क्या भगवान गणेश शिव के पुत्र नहीं हैं?

श्लोक 2 में कवि कहते हैं - 'नासि गणपते शङ्करात्मजो' (हे गणेश, आप केवल शंकर के पुत्र नहीं हैं)। आप तो साक्षात् परब्रह्म हैं। शिव-पुत्र रूप तो आपकी एक लीला मात्र है।

गणपति गीता का मुख्य सार क्या है?

इसका सार है कि गणेश जी ही 'अखिलात्मक' (Soul of Everything) हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपनी शक्तियों (सृष्टि, पालन, संहार) के लिए गणेश जी की ही उपासना करते हैं।

इस गीता में गणेश जी के किस रूप का वर्णन है?

इसमें गणेश जी के 'विश्वरूप' और 'परब्रह्म' स्वरूप का वर्णन है। वे 'अज' (अजन्मा) हैं और 'प्राचामपि पूर्वतमः' (सबसे प्राचीन) हैं।

इसका पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ 'प्रगे' (प्रातःकाल) करने का विशेष महत्व बताया गया है। प्रतिदिन स्नान के बाद पवित्र मन से इसका पाठ करना चाहिए।

क्या यह पापों का नाश करती है?

हाँ, श्लोक 7 में कहा गया है - 'शमयसि दुरितम्' (आप पापों का शमन करते हैं)। यह 'विप्रगङ्गाद्यधिकताम्' (गंगा स्नान से भी अधिक पवित्रता) प्रदान करती है।

गणपति गीता के अनुसार गणेश जी कहाँ निवास करते हैं?

गणेश जी भक्तों के 'हृदय' (अन्तर्यामिने) में और 'मूलाधार' चक्र में निवास करते हैं। वे 'मुख्यात्मन' (Primary Soul) हैं।

'गजमुख' मंत्र की क्या महिमा है?

श्लोक 3 के अनुसार, ब्रह्मा जी 'गजमुख' मंत्र की महिमा से ही सृष्टि की रचना करते हैं। विष्णु जी पालन के लिए और शिव जी संहार के लिए इसी शक्ति का आश्रय लेते हैं।

क्या स्त्रियाँ गणपति गीता का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भक्ति भाव से कोई भी (स्त्री, पुरुष, बच्चे) इसका पाठ कर सकता है। मन की शुद्धता और श्रद्धा ही मुख्य है।

मन को वश में करने के लिए इसमें क्या उपाय है?

श्लोक 8 में प्रार्थना है - 'नियमय धर्मेऽन्तः करणम्'। गणेश जी के चरण कमलों में ध्यान लगाने से ('कलय वृत्तिममृत') चंचल मन स्थिर हो जाता है।