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Sri Durga Arya Stavam – श्री दुर्गा आर्या स्तवम् | Mahabharata

Sri Durga Arya Stavam – श्री दुर्गा आर्या स्तवम् | Mahabharata
॥ श्री दुर्गा आर्या स्तवम् ॥ ॥ वैशम्पायन उवाच ॥ आर्यास्तवं प्रवक्ष्यामि यथोक्तमृषिभिः पुरा । नारायणीं नमस्यामि देवीं त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥ त्वं हि सिद्धिर्धृतिः कीर्तिः श्रीर्विद्या सन्नतिर्मतिः । सन्ध्या रात्रिः प्रभा निद्रा कालरात्रिस्तथैव च ॥ २ ॥ आर्या कात्यायनी देवी कौशिकी ब्रह्मचारिणी । जननी सिद्धसेनस्य उग्रचारी महाबला ॥ ३ ॥ जया च विजया चैव पुष्टिस्तुष्टिः क्षमा दया । ज्येष्ठा यमस्य भगिनी नीलकौशेयवासिनी ॥ ४ ॥ बहुरूपा विरूपा च अनेकविधिचारिणी । विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी ॥ ५ ॥ पर्वताग्रेषु घोरेषु नदीषु च गुहासु च । वासस्ते च महादेवि वनेषूपवनेषु च ॥ ६ ॥ शबरैर्बर्बरैश्चैव पुलिन्दैश्च सुपूजिता । मयूरपिच्छध्वजिनी लोकान् क्रमसि सर्वशः ॥ ७ ॥ कुकुटैश्छागलैर्मेषैः सिंहैर्व्याघ्रैः समाकुला । घण्टानिनादबहुला विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता ॥ ८ ॥ त्रिशूली पट्‍टिशधरा सूर्यचन्द्रपताकिनी । नवमी कृष्णपक्षस्य शुक्लस्यैकादशी तथा ॥ ९ ॥ भगिनी बलदेवस्य रजनी कलहप्रिया । आवासः सर्वभूतानां निष्ठा च परमा गतिः ॥ १० ॥ नन्दगोपसुता चैव देवानां विजयावहा । चीरवासाः सुवासाश्च रौद्री सन्ध्याचरी निशा ॥ ११ ॥ प्रकीर्णकेशी मृत्युश्च सुरामांसबलिप्रिया । लक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च ॥ १२ ॥ सावित्री चापि देवानां माता मन्त्रगणस्य च । कन्यानां ब्रह्मचर्या त्वं सौभाग्यं प्रमदासु च ॥ १३ ॥ अन्तर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चैव दक्षिणा । कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च ॥ १४ ॥ सिद्धिः साम्यात्रिकाणां तु वेला त्वं सागरस्य च ॥ यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां सुरसेति च ॥ १५ ॥ ब्रह्मवादिन्यथो दीक्षा शोभा च परमा तथा । ज्योतिषां त्वं प्रभा देवि नक्षत्राणां च रोहिणी ॥ १६ ॥ राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च । पूर्णा च पूर्णिमा चन्द्रे कृत्तिवासा इति स्मृता ॥ १७ ॥ सरस्वती च वाल्मीके स्मृतिर्द्वैपायने तथा । ऋषीणां धर्मबुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा ॥ १८ ॥ सुरा देवी तु भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः । इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनेति च ॥ १९ ॥ तापसानां च देवी त्वमरणी चाग्निहोत्रिणाम् । क्षुधा च सर्वभूतानां तृप्तिस्त्वं दैवतेषु च ॥ २० ॥ स्वाहा तृप्तिर्धृतिर्मेधा वसूनां त्वं वसूमती । आशा त्वं मानुषाणां च पुष्टिश्च कृतकर्मणाम् ॥ २१ ॥ दिशश्च विदिशश्चैव तथा ह्यग्निशिखा प्रभा । शकुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा ॥ २२ ॥ निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा । विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ॥ २३ ॥ नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीमृषयो विदुः । अरुन्धती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा ॥ २४ ॥ पर्यायनामभिर्दिव्यैरिन्द्राणी चेति विश्रुता । त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥ सङ्ग्रामेषु च सर्वेषु अग्निप्रज्वलितेषु च । नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च ॥ २६ ॥ प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने । प्रयाणाद्येषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशयः ॥ २७ ॥ त्वयि मे हदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि । रक्ष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम् । यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ॥ २९ ॥ त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं वै सम्प्रयच्छसि । षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं प्रयच्छसि ॥ ३० ॥ अर्चिता तु त्रिभिर्मासैर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि । संवत्सरेण सिद्धिं तु यथाकामं प्रयच्छसि ॥ ३१ ॥ सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैपायनवचो यथा । नृणां बन्धं वधं घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम् ॥ ३२ ॥ व्याधिमृत्युभयं चैव पूजिता शमयिष्यसि । भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ ३३ ॥ मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत् । अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवत् ॥ ३४ ॥ स्ववृद्ध्यर्थमहं चैव करिष्ये कंसगोपताम् । एवं तां स समादिश्य गतोन्तर्धानमीश्वरः ॥ ३५ ॥ सा चापि तं नमस्कृत्य तथास्त्विति च निश्चिता । यश्चैतत्पठते स्तोत्रं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः । सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ३६ ॥ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि तृतीयोऽध्याये आर्या स्तवम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance of Arya Stavam)

श्री दुर्गा आर्या स्तवम् महाभारत कालीन स्तुति है। यह हरिवंश पुराण (जो महाभारत का ही परिशिष्ट है) के 'विष्णु पर्व' में आता है। जब देवकी के गर्भ से 8वीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म होने वाला था, तब भगवान् विष्णु ने योगमाया को आदेश दिया कि वे यशोदा के गर्भ से जन्म लें।

इस कार्य में सफलता के लिए और कंस को भ्रमित करने के लिए भगवान् ने स्वयं देवी की स्तुति की। यह स्तुति ही 'आर्या स्तव' कहलाती है। 'आर्या' का अर्थ है - श्रेष्ठ, पूजनीय और कुलीन देवी।

इस स्तोत्र में देवी के अनेक रूपों का वर्णन है - वे 'कात्यायनी' हैं, 'कौशिकी' हैं, और 'विन्ध्यवासिनी' भी। यह पहला प्रमाणिक स्तोत्र है जहाँ देवी को विंध्याचल निवासिनी कहा गया है।

स्तोत्र का भावार्थ (Verse Meanings)

  • नारायणी और त्रिभुवनेश्वरी (Verse 1): भगवान कहते हैं - "मैं त्रिभुवन की ईश्वरी देवी नारायणी को नमन करता हूँ।" यह सिद्ध करता है कि शक्ति और शक्तिमान (नारायण) एक ही हैं।

  • बलराम की बहन (Verse 10): 'भगिनी बलदेवस्य' - यहाँ भविष्यवाणी की गई है कि देवी सुभद्रा (जो कृष्ण और बलराम की बहन हैं) के रूप में या एकानंशा के रूप में जानी जाएंगी।

  • सर्वव्यापी रूप (Verse 6-8): देवी केवल महलों में नहीं, बल्कि घने जंगलों, नदियों, गुफाओं और 'शबर-बर्बर' (वनवासी) जातियों के बीच भी पूजी जाती हैं। उन्हें मयूर पंख और घंटियाँ प्रिय हैं।

  • काल और मृत्यु (Verse 12): देवी जीवन हैं तो मृत्यु भी हैं ('मृत्युश्च')। वे ही लक्ष्मी हैं और राक्षसों के नाश के लिए अलक्ष्मी भी बन जाती हैं।

त्रिमासिक और षाण्मासिक फल (Benefits Timeline)

3 महीने का अनुष्ठान (3 Months)

'त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं...' - जो 3 महीने तक नियम से इसका पाठ करता है, उसे उसकी मनचाही वस्तु (नौकरी, विवाह, संतान) प्राप्त होती है।

6 महीने का अनुष्ठान (6 Months)

'षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं...' - 6 महीने के पाठ से व्यक्ति को 'वरिष्ठ' (अत्यंत श्रेष्ठ) वरदान प्राप्त होता है। यह राजयोग या बड़ी सफलता के लिए है।

1 वर्ष का अनुष्ठान (1 Year)

'संवत्सरेण सिद्धिं तु...' - एक वर्ष तक पाठ करने से 'सिद्धि' प्राप्त होती है। साधक की वाणी और संकल्प सिद्ध हो जाते हैं।

भय मुक्ति

यह स्तोत्र 'व्याधिमृत्युभयं' (बीमारी और मृत्यु का डर), 'राजबन्धन' (जेल/केस) और 'चौर-कान्तार भय' (चोर-डाकू का डर) को जड़ से मिटा देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. आर्या स्तवम् का क्या महत्व है?

यह स्तोत्र महाभारत के खिलभाग (हरिवंश) में आता है। यह भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) द्वारा देवी योगमाया की पहली स्तुति मानी जाती है, जिसके बाद देवी ने विंध्याचल में निवास किया।

2. इसका पाठ कब करना चाहिए?

विशेष रूप से नवरात्रि की अष्टमी, नवमी या किसी बड़े संकट के समय। सुबह उठकर पवित्र मन से इसका पाठ करने से मनोवांछित फल मिलता है।

3. 'कांक्षितं फल' कितने समय में मिलता है?

फलश्रुति (श्लोक 30) में स्पष्ट कहा गया है - 'त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं', अर्थात 3 महीने तक नियमित पाठ करने से मनचाहा फल प्राप्त होता है।

4. क्या यह मोक्षदायक है?

हाँ, श्लोक 10 में देवी को 'निष्ठा च परमा गतिः' (परम गति/मोक्ष) कहा गया है। यह भोग और मोक्ष दोनों देने वाला स्तोत्र है।

5. श्लोक 7 में किन जातियों का उल्लेख है?

इसमें 'शबरैर्बर्बरैश्चैव पुलिन्दैश्च' का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि देवी केवल उच्च वर्ग की नहीं, बल्कि वनवासियों और आदिवासियों (शबर, भील, पुलिंद) द्वारा भी पूजी जाती हैं।

6. क्या यह शत्रुओं का नाश करता है?

बिल्कुल। श्लोक 26-27 में कहा गया है कि युद्ध, चोरों के भय और शत्रुओं के बीच यह रक्षा कवच का काम करता है।

7. क्या इसे 'विंध्यवासिनी स्तोत्र' भी कहते हैं?

हाँ, क्योंकि इसमें देवी को 'विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता' (विंध्याचल में निवास करने वाली) कहा गया है। यह विंध्यवासिनी देवी का सबसे प्राचीन स्तोत्र है।

8. भगवान कृष्ण ने यह स्तुति क्यों की?

कृष्ण चाहते थे कि देवी योगमाया यशोदा की पुत्री बनें और कंस के हाथों से छूटकर आकाश में चली जाएं, ताकि कृष्ण का जीवन सुरक्षित रहे।

9. क्या गर्भवती स्त्रियां इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, यह गर्भ रक्षा और संतान प्राप्ति ('पुत्रनाशं धनक्षयम्' शमन करने वाला) के लिए अत्यंत शुभ है।

10. पाठ की विधि क्या है?

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। कुश के आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें। 3, 6, या 12 महीने का संकल्प लेना श्रेष्ठ माना गया है।

11. श्लोक 1 में देवी को क्या कहा गया है?

उन्हें 'नारायणी' और 'त्रिभुवनेश्वरी' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे भगवान नारायण की ही शक्ति हैं।

12. क्या यह रोग निवारण करता है?

हाँ, श्लोक 33 में 'व्याधिमृत्युभयं' (बीमारी और मौत के डर) को शांत करने की बात कही गई है।