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Sri Dhumavathi Hrudayam – श्री धूमावती हृदयम्

Sri Dhumavathi Hrudayam – श्री धूमावती हृदयम्
॥ श्री धूमावती हृदयम् ॥ विनियोगः ओं अस्य श्री धूमावतीहृदयस्तोत्र महामन्त्रस्य-पिप्पलादऋषिः- अनुष्टुप्छन्दः- श्री धूमावती देवता- धूं बीजं- ह्रीं शक्तिः- क्लीं कीलकं -सर्वशत्रु संहारार्थे जपे विनियोगः । ॥ करन्यासः ॥ ओं धां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं धीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं धूं मध्यमाभ्य़ां नमः । ओं धैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं धौं कनिष्ठकाभ्य़ां नमः । ओं धः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ अङ्गन्यासः ॥ ओं धां हृदयाय नमः । ओं धीं शिरसे स्वाहा । ओं धूं शिखायै वषट् । ओं धैं कवचाय हुं । ओं धौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं धः अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ धूम्राभां धूम्रवस्त्रां प्रकटितदशनां मुक्तबालाम्बराढ्यां । काकाङ्कस्यन्दनस्थां धवलकरयुगां शूर्पहस्तातिरूक्षाम् । कङ्काङ्क्षुत्क्षान्त देहं मुहुरति कुटिलां वारिदाभां विचित्रां । ध्यायेद्धूमावतीं कुटिलितनयनां भीतिदां भीषणास्याम् ॥ १ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ कल्पादौ या कालिकाद्याऽचीकलन्मधुकैटभौ । कल्पान्ते त्रिजगत्सर्वं भजे धूमावतीमहम् ॥ २ ॥ गुणागारा गम्यगुणा या गुणागुणवर्धिनी । गीतावेदार्थतत्त्वज्ञैः भजे धूमावतीमहम् ॥ ३ ॥ खट्वाङ्गधारिणी खर्वखण्डिनी खलरक्षसां । धारिणी खेटकस्यापि भजे धूमावतीमहम् ॥ ४ ॥ घूर्ण घूर्णकराघोरा घूर्णिताक्षी घनस्वना । घातिनी घातकानां या भजे धूमावतीमहम् ॥ ५ ॥ चर्वन्तीमस्तिखण्डानां चण्डमुण्डविदारिणीं । चण्डाट्टहासिनीं देवीं भजे धूमावतीमहम् ॥ ६ ॥ छिन्नग्रीवां क्षताञ्छन्नां छिन्नमस्तास्वरूपिणीं । छेदिनीं दुष्टसङ्घानां भजे धूमावतीमहम् ॥ ७ ॥ जाताया याचितादेवैरसुराणां विघातिनीं । जल्पन्तीं बहुगर्जन्तीं भजेतां धूम्ररूपिणीम् ॥ ८ ॥ झङ्कारकारिणीं झुञ्झा झञ्झमाझमवादिनीं । झटित्याकर्षिणीं देवीं भजे धूमावतीमहम् ॥ ९ ॥ हेतिपटङ्कारसम्युक्तान् धनुष्टङ्कारकारिणीं । घोराघनघटाटोपां वन्दे धूमावतीमहम् ॥ १० ॥ ठण्ठण्ठण्ठं मनुप्रीतां ठःठःमन्त्रस्वरूपिणीं । ठमकाह्वगतिप्रीतां भजे धूमावतीमहम् ॥ ११ ॥ डमरू डिण्डिमारावां डाकिनीगणमण्डितां । डाकिनीभोगसन्तुष्टां भजे धूमावतीमहम् ॥ १२ ॥ ढक्कानादेनसन्तुष्टां ढक्कावादनसिद्धिदां । ढक्कावादचलच्चित्तां भजे धूमावतीमहम् ॥ १३ ॥ तत्ववार्ता प्रियप्राणां भवपाथोधितारिणीं । तारस्वरूपिणीं तारां भजे धूमावतीमहम् ॥ १४ ॥ थान्थीन्थून्थेमन्त्ररूपां थैन्थोथन्थःस्वरूपिणीं । थकारवर्णसर्वस्वां भजे धूमावतीमहम् ॥ १५ ॥ दुर्गास्वरूपिणीदेवीं दुष्टदानवदारिणीं । देवदैत्यकृतध्वंसां वन्दे धूमावतीमहम् ॥ १६ ॥ ध्वान्ताकारान्धकध्वंसां मुक्तधम्मिल्लधारिणीं । धूमधाराप्रभां धीरां भजे धूमावतीमहम् ॥ १७ ॥ नर्तकीनटनप्रीतां नाट्यकर्मविवर्धिनीं । नारसिंहीं नराराध्यां न्ॐइ धूमावतीमहम् ॥ १८ ॥ पार्वतीपतिसम्पूज्यां पर्वतोपरिवासिनीं । पद्मारूपां पद्मपूज्यां न्ॐइ धूमावतीमहम् ॥ १९ ॥ फूत्कारसहितश्वासां फट्‍मन्त्रफलदायिनीं । फेत्कारिगणसंसेव्यां सेवे धूमावतीमहम् ॥ २० ॥ बलिपूज्यां बलाराध्यां बगलारूपिणीं वरां । ब्रह्मादिवन्दितां विद्यां वन्दे धूमावतीमहम् ॥ २१ ॥ भव्यर रूपां भवाराध्यां भुवनेशीस्वरूपिणीं । भक्तभव्यप्रदां देवीं भजे धूमावतीमहम् ॥ २२ ॥ मायां मधुमतीं मान्यां मकरध्वजमानितां । मत्स्यमांसमदास्वादां मन्ये धूमावतीमहम् ॥ २३ ॥ योगयज्ञप्रसन्नास्यां योगिनीपरिसेवितां । यशोदां यज्ञफलदां यजेद्धूमावतीमहम् ॥ २४ ॥ रामाराध्यपदद्वन्द्वां रावणध्वंसकारिणीं । रमेशरमणीपूज्यामहं धूमावतीं श्रये ॥ २५ ॥ लक्षलीलाकलालक्ष्यां लोकवन्द्यपदाम्बुजां । लम्बितां बीजकोशाढ्यां वन्दे धूमावतीमहम् ॥ २६ ॥ बकपूज्यपदांभोजां बकध्यानपरायणां । बालान्तीकारिसन्ध्येयां वन्दे धूमावतीमहम् ॥ २७ ॥ शङ्करीं शङ्करप्राणां सङ्कटध्वंसकारिणीं । शत्रुसंहारिणीं शुद्धां श्रये धूमावतीमहम् ॥ २८ ॥ षडाननारिसंहन्त्रीं षोडशीरूपधारिणीं । षड्रसास्वादिनीं सौम्यां नेवे धूमावतीमहम् ॥ २९ ॥ सुरसेवितपादाब्जां सुरसौख्यप्रदायिनीं । सुन्दरीगणसंसेव्यां सेवे धूमावतीमहम् ॥ ३० ॥ हेरम्बजननीं योग्यां हास्यलास्यविहारिणीं । हारिणीं शत्रुसङ्घानां सेवे धूमावतीमहम् ॥ ३१ ॥ क्षीरोदतीरसंवासां क्षीरपानप्रहर्षितां । क्षणदेशेज्यपादाब्जां सेवे धूमावतीमहम् ॥ ३२ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ चतुस्त्रिम्शद्वर्णकानां प्रतिवर्णादिनामभिः । कृतं तु हृदयस्तोत्रं धूमावत्यास्सुसिद्धिदम् ॥ ३३ ॥ य इदं पठति स्तोत्रं पवित्रं पापनाशनं । स प्राप्नोति परां सिद्धं धूमावत्याः प्रसादतः ॥ ३४ ॥ पठन्नेकाग्रचित्तोयो यद्यदिच्छति मानवः । तत्सर्वं समवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ३५ ॥ ॥ इति श्रीधूमावतीहृदयम् सम्पूर्णम् ॥ इतर पश्यतु ।

श्री धूमावती हृदयम् - परिचय (Introduction)

श्री धूमावती हृदयम् (Sri Dhumavathi Hrudayam) दश महाविद्या की सबसे रहस्यमयी और उग्र शक्ति, माँ धूमावती की साधना का प्राण है। 'हृदय' का अर्थ है - सार तत्व (Core Essence)। जिस प्रकार हृदय शरीर को प्राण शक्ति देता है, उसी प्रकार यह स्तोत्र माँ धूमावती की कृपा को साधक के जीवन में संचारित करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव और पिप्पलाद ऋषि की परंपरा से प्राप्त एक दुर्लभ तंत्र ग्रंथ है, जिसे गुप्त रखा गया था ताकि इसका दुरुपयोग न हो। माँ धूमावती को 'अलक्ष्मी' और 'विधवा' रूप में पूजा जाता है, जो संसार की नश्वरता, शून्यता (The Void) और वैराग्य का प्रतीक हैं।
साधारण दृष्टि में माँ धूमावती का स्वरूप डरावना लग सकता है - रथ पर आरूढ़, खुले बाल, मलिन वस्त्र और हाथ में सूप (Winnowing basket)। परन्तु यह हृदय स्तोत्र उनके इस रूप के पीछे छिपी करुणा को प्रकट करता है। वे भूख, प्यास, कलह और दरिद्रता को अपने भीतर समाहित कर लेती हैं, ताकि उनके भक्त सुखी रह सकें। यह स्तोत्र साधक को यह दिव्य दृष्टि देता है कि वह जीवन के दुःख और संघर्ष (Negative experiences) में भी ईश्वरीय शक्ति को पहचान सके। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक कवच भी है जो साधक के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनाता है जहाँ शत्रु, रोग और भय प्रवेश नहीं कर सकते।
कलयुग में, जब जीवन संघर्षमय हो और कोई रास्ता न सूझ रहा हो, तब माँ धूमावती की यह साधना 'रामबाण' मानी गई है। विशेषकर जो लोग तंत्र बाधाओं (Black Magic), कोर्ट-कचहरी के चक्कों, या असाध्य रोगों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र संजीवनी का काम करता है। यह साधक के भीतर के 'अहम' (Ego) को जलाकर उसे शुद्ध स्वर्ण जैसा बना देता है, जिससे उसे न केवल भौतिक सुख (भोग) मिलते हैं, बल्कि अंत में वह मोक्ष का अधिकारी भी बन जाता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • शत्रु दमन का अमोघ अस्त्र: इस स्तोत्र के विनियोग में ही इसका उद्देश्य बताया गया है - 'सर्वशत्रु संहारार्थे'। यह शत्रुओं की बुद्धि, बल और वाक शक्ति को स्तंभित (Freeze) कर देता है, जिससे वे साधक को हानि नहीं पहुँचा पाते।
  • अकाल मृत्यु निवारण: माँ धूमावती यम (मृत्यु के देवता) की भी नियंत्रक मानी जाती हैं। इस हृदय स्तोत्र का पाठ साधक को अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं के भय से मुक्त करता है।
  • तंत्र दोष मुक्ति: यदि किसी पर मारण, मोहन या उच्चाटन जैसे तांत्रिक प्रयोग किए गए हों, तो इस स्तोत्र की ध्वनि मात्र से वे प्रयोग नष्ट होकर वापस प्रयोक्ता के पास लौट जाते हैं।
  • सिद्धि और मोक्ष: यह स्तोत्र केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि साधनात्मक भी है। श्लोक ३४ में कहा गया है - 'स प्राप्नोति परां सिद्धं' (वह परम सिद्धि प्राप्त करता है)। यह साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर कैवल्य (मोक्ष) की ओर ले जाता है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

  • सर्व संकट नाश: 'मुच्यते सर्वसङ्कटैः' - जीवन का कोई भी संकट हो - चाहे वह आर्थिक हो, शारीरिक हो या मानसिक - इस पाठ से नष्ट हो जाता है।
  • वाक सिद्धि और तेज: 'जल्पन्तीं बहुगर्जन्तीं' (श्लोक 8) - इसके प्रभाव से साधक की वाणी में ऐसा तेज आता है कि उसके द्वारा कहे गए वचन सत्य होने लगते हैं। समाज में उसका मान-सम्मान बढ़ता है।
  • दारिद्र्य भंजन: यद्यपि माँ धूमावती अलक्ष्मी रूप हैं, परन्तु अपने भक्तों के लिए वे 'धन्या' और 'सर्वसम्पत्प्रदायकम्' हैं। वे भक्त की गरीबी को अपने सूप (Winnowing fan) में भरकर बाहर फेंक देती हैं।
  • मनोकामना पूर्ति: श्लोक ३५ में स्वयं देवी वचन देती हैं - 'यद्यदिच्छति मानवः तत्सर्वं समवाप्नोति' (मनुष्य जो-जो इच्छा करता है, वह सब प्राप्त कर लेता है)। यह एक पूर्णकाम स्तोत्र है।
  • पाप नाश: यह स्तोत्र 'पवित्रं पापनाशनं' है। यह पूर्व जन्मों के संचित पापों और कर्म बंधनों को काटकर साधक को निर्मल कर देता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • काल (Time): इस साधना का मुख्य समय रात्रि है। निशीथ काल (मध्यरात्रि) या सूर्यस्त के बाद का समय उत्तम है। शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष (विशेषकर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या) अधिक फलदायी होता है। शनिवार की रात्रि सर्वश्रेष्ठ है।
  • स्थान और आसन: एकांत कक्ष, शमशान या किसी प्राचीन शिव मंदिर में साधना करें। आसन काले रंग का (कंबल) होना चाहिए। दिशा दक्षिण या पश्चिम रखें।
  • वस्त्र: साधक को काले या सलेटी (Grey) रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। खुले बाल रखना और माथे पर भस्म का तिलक लगाना इस साधना में विशेष माना गया है (गुरु निर्देशानुसार)।
  • न्यास विधि: स्तोत्र के आरम्भ में दिए गए 'करन्यास' और 'अंगन्यास' अवश्य करें। इससे शरीर मंत्र-मय हो जाता है और सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • नैवेद्य: माँ को उड़द की दाल की खिचड़ी, कचौड़ी, या कड़वी/तीखी वस्तुओं का भोग लगाएँ। माँसाहारी साधक मदिरा या मांस का भोग भी लगाते हैं (केवल वाम मार्ग में)। सात्विक साधक लौंग और बताशे का भोग लगा सकते हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री धूमावती हृदयम् क्या है?

श्री धूमावती हृदयम् एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। 'हृदयम्' का अर्थ है 'हृदय' या 'सार'। यह स्तोत्र माँ धूमावती की शक्ति के मूल तत्व को धारण करता है। जहाँ सामान्य स्तोत्र देवी के गुणों का वर्णन करते हैं, वहीं हृदय स्तोत्र साधक को देवी की चेतना के केंद्र (Heart) से जोड़ता है, जिससे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

2. इस स्तोत्र के ऋषि कौन हैं?

इस महामंत्र और स्तोत्र के ऋषि 'पिप्पलाद' (Pippalada Rishi) हैं। पिप्पलाद मुनि ने ही माँ धूमावती की कठिन साधना कर इस विद्या को सिद्ध किया था और जन-कल्याण हेतु इसे प्रकट किया।

3. धूमावती साधना किसे करनी चाहिए?

जो साधक जीवन में घोर संकट, शत्रुओं के षड्यंत्र, झूठे मुकदमों, असाध्य रोगों या तंत्र बाधाओं से ग्रसित हैं, उन्हें माँ धूमावती का आश्रय लेना चाहिए। इसके अलावा, मोक्ष और वैराग्य के इच्छुक उच्च कोटि के तांत्रिक भी इनकी साधना करते हैं।

4. क्या गृहस्थ व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है?

माँ धूमावती विधवा और अमंगल स्वरूपा हैं, इसलिए सामान्य गृहस्थों के लिए इनकी उग्र साधना वर्जित मानी जाती है। परन्तु, यदि जीवन में प्राणों पर संकट हो या कोई अन्य मार्ग न बचा हो, तो 'हृदय स्तोत्र' का पाठ भक्ति भाव से (निष्काम या रक्षा हेतु) किया जा सकता है। सकाम (इच्छा पूर्ति) अनुष्ठान के लिए गुरु का निर्देश अनिवार्य है।

5. पाठ करने का सर्वोत्तम समय (Time) क्या है?

दस महाविद्याओं की साधना रात्रि प्रधान होती है। इस स्तोत्र के लिए 'निशीथ काल' (मध्यरात्रि, लगभग 11 बजे से 1 बजे के बीच) सर्वोत्तम है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या या शनिवार की रात्रि विशेष फलदायी होती है।

6. इस पाठ से क्या शत्रु नाश होता है?

जी हाँ, विनियोग में ही स्पष्ट कहा गया है - 'सर्वशत्रु संहारार्थे जपे विनियोगः'। यह स्तोत्र शत्रुओं का स्तंभन (रोकना) और उच्चाटन (खदेड़ना) करने में अमोघ अस्त्र है। यह न केवल बाहरी शत्रुओं, बल्कि आंतरिक शत्रुओं (क्रोध, भय) का भी नाश करता है।

7. साधना में किस रंग के वस्त्र और आसन का प्रयोग करें?

माँ धूमावती को धूम्र (धुएँ जैसा ग्रे) या काला रंग प्रिय है। अतः साधक को काले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए और काले ऊनी आसन (कंबल) का प्रयोग करना चाहिए। यह रंग शनि और तामसी शक्ति के नियंत्रण का प्रतीक है।

8. 'काकध्वजरथारूढा' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'वह देवी जो उस रथ पर सवार हैं जिसकी ध्वजा (झंडे) पर कौवा (Crow) अंकित है'। कौवा अतृप्ति, मृत्यु और संदेश का वाहक है। माँ धूमावती का यह रूप दर्शाता है कि वे मृत्यु और अभाव के भय को जीतकर अपने भक्तों को निर्भय करती हैं।

9. क्या इस स्तोत्र से 'वाक सिद्धि' मिलती है?

हाँ। माँ धूमावती अतृप्त वाणी और भूख का प्रतीक भी हैं। उनकी साधना से साधक की वाणी में सत्यता और प्रभाव (Tejas) आता है। वह जो कहता है, वह सत्य होने लगता है (वाक सिद्धि)।

10. न्यास (Nyasa) करना क्यों आवश्यक है?

हृदय स्तोत्र एक शक्तिशाली मंत्र-मय रचना है। पाठ से पहले 'करन्यास' (हाथों में) और 'अंगन्यास' (शरीर के अंगों में) करने से साधक का शरीर उस ऊर्जा को धारण करने योग्य (देवता-मय) बन जाता है और सुरक्षा भी मिलती है।