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Sri Dhanvantari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री धन्वन्तर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Dhanvantari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री धन्वन्तर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री धन्वन्तर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ धन्वन्तरिः सुधापूर्णकलशाढ्यकरो हरिः । जरामृतित्रस्तदेवप्रार्थनासाधकः प्रभुः ॥ १ ॥ निर्विकल्पो निस्समानो मन्दस्मितमुखाम्बुजः । आञ्जनेयप्रापिताद्रिः पार्श्वस्थविनतासुतः ॥ २ ॥ निमग्नमन्दरधरः कूर्मरूपी बृहत्तनुः । नीलकुञ्चितकेशान्तः परमाद्भुतरूपधृत् ॥ ३ ॥ कटाक्षवीक्षणाश्वस्तवासुकिः सिंहविक्रमः । स्मर्तृहृद्रोगहरणो महाविष्ण्वंशसम्भवः ॥ ४ ॥ प्रेक्षणीयोत्पलश्याम आयुर्वेदाधिदैवतम् । भेषजग्रहणानेहः स्मरणीयपदाम्बुजः ॥ ५ ॥ नवयौवनसम्पन्नः किरीटान्वितमस्तकः । नक्रकुण्डलसंशोभिश्रवणद्वयशष्कुलिः ॥ ६ ॥ दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽम्बुजेक्षणः । चतुर्भुजः शङ्खधरश्चक्रहस्तो वरप्रदः ॥ ७ ॥ सुधापात्रोपरिलसदाम्रपत्रलसत्करः । शतपद्याढ्यहस्तश्च कस्तूरीतिलकाञ्चितः ॥ ८ ॥ सुकपोलः सुनासश्च सुन्दरभ्रूलताञ्चितः । स्वङ्गुलीतलशोभाढ्यो गूढजत्रुर्महाहनुः ॥ ९ ॥ दिव्याङ्गदलसद्बाहुः केयूरपरिशोभितः । विचित्ररत्नखचितवलयद्वयशोभितः ॥ १० ॥ समोल्लसत्सुजातांसश्चाङ्गुलीयविभूषितः । सुधागन्धरसास्वादमिलद्भृङ्गमनोहरः ॥ ११ ॥ लक्ष्मीसमर्पितोत्फुल्लकञ्जमालालसद्गलः । लक्ष्मीशोभितवक्षस्को वनमालाविराजितः ॥ १२ ॥ नवरत्नमणीक्लुप्तहारशोभितकन्धरः । हीरनक्षत्रमालादिशोभारञ्जितदिङ्मुखः ॥ १३ ॥ विरजोऽम्बरसंवीतो विशालोराः पृथुश्रवाः । निम्ननाभिः सूक्ष्ममध्यः स्थूलजङ्घो निरञ्जनः ॥ १४ ॥ सुलक्षणपदाङ्गुष्ठः सर्वसामुद्रिकान्वितः । अलक्तकारक्तपादो मूर्तिमद्वार्धिपूजितः ॥ १५ ॥ सुधार्थान्योन्यसम्युध्यद्देवदैतेयसान्त्वनः । कोटिमन्मथसङ्काशः सर्वावयवसुन्दरः ॥ १६ ॥ अमृतास्वादनोद्युक्तदेवसङ्घपरिष्टुतः । पुष्पवर्षणसम्युक्तगन्धर्वकुलसेवितः ॥ १७ ॥ शङ्खतूर्यमृदङ्गादिसुवादित्राप्सरोवृतः । विष्वक्सेनादियुक्पार्श्वः सनकादिमुनिस्तुतः ॥ १८ ॥ साश्चर्यसस्मितचतुर्मुखनेत्रसमीक्षितः । साशङ्कसम्भ्रमदितिदनुवंश्यसमीडितः ॥ १९ ॥ नमनोन्मुखदेवादिमौलिरत्नलसत्पदः । दिव्यतेजःपुञजरूपः सर्वदेवहितोत्सुकः ॥ २० ॥ स्वनिर्गमक्षुब्धदुग्धवाराशिर्दुन्दुभिस्वनः । गन्धर्वगीतापदानश्रवणोत्कमहामनाः ॥ २१ ॥ निष्किञ्चनजनप्रीतो भवसम्प्राप्तरोगहृत् । अन्तर्हितसुधापात्रो महात्मा मायिकाग्रणीः ॥ २२ ॥ क्षणार्धमोहिनीरूपः सर्वस्त्रीशुभलक्षणः । मदमत्तेभगमनः सर्वलोकविमोहनः ॥ २३ ॥ स्रंसन्नीवीग्रन्थिबन्धासक्तदिव्यकराङ्गुलिः । रत्नदर्वीलसद्धस्तो देवदैत्यविभागकृत् ॥ २४ ॥ सङ्ख्यातदेवतान्यासो दैत्यदानववञ्चकः । देवामृतप्रदाता च परिवेषणहृष्टधीः ॥ २५ ॥ उन्मुखोन्मुखदैत्येन्द्रदन्तपङ्क्तिविभाजकः । पुष्पवत्सुविनिर्दिष्टराहुरक्षःशिरोहरः ॥ २६ ॥ राहुकेतुग्रहस्थानपश्चाद्गतिविधायकः । अमृतालाभनिर्विण्णयुध्यद्देवारिसूदनः ॥ २७ ॥ गरुत्मद्वाहनारूढः सर्वेशस्तोत्रसम्युतः । स्वस्वाधिकारसन्तुष्टशक्रवह्न्यादिपूजितः ॥ २८ ॥ मोहिनीदर्शनायातस्थाणुचित्तविमोहकः । शचीस्वाहादिदिक्पालपत्नीमण्डलसन्नुतः ॥ २९ ॥ वेदान्तवेद्यमहिमा सर्वलोकैकरक्षकः । राजराजप्रपूज्याङ्घ्रिः चिन्तितार्थप्रदायकः ॥ ३० ॥ धन्वन्तरेर्भगवतो नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । यः पठेत्सततं भक्त्या नीरोगः सुखभाग्वेत् ॥ ३१ ॥ ॥ इति श्री धन्वन्तर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: भगवान धन्वन्तरि और अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र (Introduction)

श्री धन्वन्तर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Dhanvantari Ashtottara Shatanama Stotram) भगवान विष्णु के उस दिव्य स्वरूप को समर्पित है, जिन्हें चराचर जगत का प्रथम वैद्य और 'आयुर्वेद का अधिष्ठाता' माना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भागवत और ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, जब देवों और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तो चतुर्दशी तिथि को भगवान धन्वन्तरि अपने चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और औषधियाँ लेकर प्रकट हुए। उनका यह प्राकट्य ब्रह्मांड के प्राणियों को रोगों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करने के लिए था।

यह स्तोत्र 'बृहद्ब्रह्मानन्दोपनिषद्' का एक अभिन्न अंग है। इसमें धन्वन्तरि के १०८ नाम केवल संबोधन मात्र नहीं हैं, बल्कि वे उनकी अनंत चिकित्सा शक्तियों का बीजाक्षर स्वरूप हैं। शोधपरक दृष्टिकोण से देखें तो 'धन्वन्तरि' शब्द की व्युत्पत्ति 'धनु' (शरीर रूपी धनुष) और 'अन्तरि' (भीतर विचरण करने वाला) से हुई है। अर्थात् वह दिव्य शक्ति जो हमारे शरीर के भीतर रोगों का विनाश कर प्राण ऊर्जा का संचार करती है। १०८ नामों की यह शृंखला साधक को उनके उस स्वरूप का दर्शन कराती है जो 'सुधापूर्णकलशाढ्य' (अमृत कलश से सुशोभित) और 'जरामृतित्रस्तदेवप्रार्थनासाधक' (बुढ़ापे और मृत्यु से डरे देवों की रक्षा करने वाले) हैं।

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों जैसे 'सुश्रुत संहिता' में भगवान धन्वन्तरि को काशी के राजा दिवोदास के रूप में पुनर्जन्म लेकर शल्य चिकित्सा (Surgery) का ज्ञान प्रदान करने वाला बताया गया है। इस स्तोत्र का पठन करने से न केवल बाहरी शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं, बल्कि यह हमारे सूक्ष्म शरीर की ग्रंथियों को भी सक्रिय करता है, जिससे मानसिक अवसाद और भय का नाश होता है। यह स्तोत्र सात्विक जीवन शैली और दीर्घायु की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक आध्यात्मिक 'हील पैकेट' की तरह कार्य करता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं चिकित्सकीय महत्व (Significance)

भगवान धन्वन्तरि की उपासना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय आरोग्य ऊर्जा से जुड़ने का माध्यम है। इस स्तोत्र में उन्हें 'आयुर्वेदाधिदैवतम्' (श्लोक ५) कहा गया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि वे समस्त औषधियों और चिकित्सा पद्धतियों के परम स्वामी हैं। इस स्तोत्र का महत्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए अधिक है जो असाध्य रोगों से जूझ रहे हैं या जो चिकित्सक (Doctors) के रूप में सेवा कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संगठनों और सिद्ध पीठों में इस स्तोत्र को 'आरोग्य कवच' माना जाता है। श्लोक ४ में प्रभु को 'स्मर्तृहृद्रोगहरणो' कहा गया है, जिसका अर्थ है उनके स्मरण मात्र से हृदय के रोग (शारीरिक और भावनात्मक) नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि वास्तविक स्वास्थ्य केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि शरीर, मन और आत्मा का संतुलन है। जो भक्त एकाग्र होकर इन १०८ नामों का उच्चारण करता है, उसके चारों ओर एक सकारात्मक 'बायो-मैग्नेटिक फील्ड' निर्मित होता है, जो उसे संक्रामक व्याधियों से सुरक्षित रखता है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ३१) में स्वयं वर्णित है कि जो निरंतर भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह नीरोग होकर सुख भोगता है। प्रमुख लाभों की सूची यहाँ दी गई है:

  • आरोग्य की प्राप्ति: शारीरिक व्याधियों, विशेषकर पुराने रोगों (Chronic diseases) में इस पाठ से आशातीत सुधार होता है।
  • मानसिक शांति और बल: चिंता, तनाव और भय के विकारों को दूर कर यह मन में दृढ़ता प्रदान करता है।
  • दीर्घायु और यौवन: 'जरामृतित्रस्त' (बुढ़ापे और मृत्यु का भय) को दूर करने की शक्ति इसमें सन्निहित है, जो साधक को जीवंतता प्रदान करती है।
  • नकारात्मकता का नाश: घर के वातावरण में मौजूद रोगकारी नकारात्मक तरंगों को नष्ट कर यह सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
  • चिकित्सीय सफलता: डॉक्टरों और सर्जनों के लिए इसका पाठ उनके हाथों में 'यश' और उपचार में 'सफलता' प्रदान करने वाला माना गया है।

पाठ विधि और सर्वोत्तम समय (Ritual Method & Guidelines)

भगवान धन्वन्तरि की साधना अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी है। उत्तम फल की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:

  • समय: प्रातः काल सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ करना सबसे श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त धनतेरस (धन्वन्तरि जयंती) पर इसका पाठ विशेष सिद्धिदायक है।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: भगवान धन्वन्तरि के चित्र के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। यदि संभव हो तो प्रभु को पीला चंदन, तुलसी दल और औषधि स्वरूप कोई फल (जैसे आंवला) अर्पित करें।
  • संकल्प: पाठ प्रारंभ करने से पहले हाथ में जल लेकर आरोग्य और कल्याण के लिए संकल्प करें।

विशेष प्रयोग: यदि कोई बहुत बीमार हो, तो उसके नाम से तांबे के कलश में जल भरकर १०८ बार पाठ करें और फिर वह अभिमंत्रित जल रोगी को पिलाएं। यह जल 'अमृत' के समान प्रभाव दिखाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवान धन्वन्तरि कौन हैं और उनका प्राकट्य कैसे हुआ?

धन्वन्तरि भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक हैं। उनका प्राकट्य समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (धनतेरस) को अमृत कलश लेकर हुआ था। उन्हें 'आयुर्वेद का पिता' कहा जाता है।

2. धन्वन्तरि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र मुख्य रूप से बृहद्ब्रह्मानन्दोपनिषद् के अंतर्गत आता है, जो प्रभु की महिमा का दार्शनिक और आध्यात्मिक वर्णन करता है।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल डॉक्टर ही कर सकते हैं?

नहीं, आरोग्य की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है। हालाँकि, डॉक्टरों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि यह उन्हें सफल उपचार की शक्ति प्रदान करता है।

4. 'अमृत कलश' का आध्यात्मिक संकेत क्या है?

अमृत कलश अमरत्व और स्वास्थ्य का प्रतीक है। तांत्रिक अर्थों में, यह हमारे मस्तिष्क के भीतर 'सहस्रार चक्र' से निकलने वाले उस दिव्य रस का प्रतीक है जो शरीर को नवजीवन देता है।

5. क्या धनतेरस पर इस स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य है?

हाँ, धनतेरस वास्तव में धन्वन्तरि जयंती है। इस दिन पाठ करने से पूरे वर्ष आरोग्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है। 'धन' का वास्तविक अर्थ यहाँ 'स्वास्थ्य रूपी धन' से है।

6. 'स्मर्तृहृद्रोगहरणो' नाम का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है "अपने स्मरण करने वाले भक्तों के हृदय रोगों को हरने वाले"। यह नाम धन्वन्तरि की उस कृपा को दर्शाता है जो शारीरिक हृदय रोगों के साथ-साथ भावनात्मक पीड़ा को भी दूर करती है।

7. क्या इस स्तोत्र से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है?

शास्त्रों के अनुसार, भगवान धन्वन्तरि 'अकाल मृत्यु' के भय को हरने वाले हैं। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति की आयु की रक्षा होती है।

8. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का भोग लगाना चाहिए?

प्रभु को तुलसी दल, मक्खन-मिश्री या ऋतु फल अर्पित किए जा सकते हैं। चूँकि वे आयुर्वेद के देवता हैं, उन्हें शहद और आंवले का भोग लगाना भी अत्यंत शुभ है।

9. क्या इस पाठ के साथ दवाइयां लेना भी आवश्यक है?

अवश्य। हिंदू दर्शन 'कर्म' और 'भक्ति' दोनों पर जोर देता है। यह स्तोत्र दवाओं के प्रभाव को बढ़ाता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को जागृत करता है।

10. क्या बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए यह पाठ किया जा सकता है?

जी हाँ, माता-पिता अपने बच्चों के आरोग्य और बुद्धि विकास के लिए धन्वन्तरि जी के चरणों का ध्यान करते हुए यह पाठ कर सकते हैं।