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Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २

Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २
॥ श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ओंकारतत्त्वरूपाय दिव्यज्ञानात्मने नमः । नभोऽतीतमहाधाम्ने ऐन्द्र्यर्ध्या ओजसे नमः ॥ १ ॥ नष्टमत्सरगम्यायाऽऽगम्याचारात्मवर्त्मने । मोचितामेध्यकृतये ह्रीम्बीजश्राणितश्रितः ॥ २ ॥ मोहादिविभ्रमान्ताय बहुकायधराय च । भक्तदुर्वैभवच्छेत्रे क्लीम्बीजवरजापिने ॥ ३ ॥ भवहेतुविनाशाय राजच्छोणाधराय च । गतिप्रकम्पिताण्डाय चारुव्यायतबाहवे ॥ ४ ॥ गतगर्वप्रियायास्तु यमादियतचेतसे । वशिताजातवश्याय मुण्डिने अनसूयवे ॥ ५ ॥ वदद्वरेण्यवाग्जालाविस्पष्टविविधात्मने । तपोधनप्रसन्नायेडापतिस्तुतकीर्तये ॥ ६ ॥ तेजोमण्यन्तरङ्गायाद्मरसद्मविहापिने । आन्तरस्थानसंस्थायायैश्वर्यश्रौतगीतये ॥ ७ ॥ वातादिभययुग्भावहेतवे हेतुहेतवे । जगदात्मात्मभूताय विद्विषत्षट्कघातिने ॥ ८ ॥ सुरवर्गोद्धृते भूत्या असुरावासभेदिने । नेत्रे च नयनाक्ष्णे चिच्चेतनाय महात्मने ॥ ९ ॥ देवाधिदेवदेवाय वसुधासुरपालिने । याजिनामग्रगण्याय द्राम्बीजजपतुष्टये ॥ १० ॥ वासनावनदावाय धूलियुग्देहमालिने । यतिसंन्यासिगतये दत्तात्रेयेति संविदे ॥ ११ ॥ यजनास्यभुजेऽजाय तारकावासगामिने । महाजवास्पृग्रूपायात्ताकाराय विरूपिणे ॥ १२ ॥ नराय धीप्रदीपाय यशस्वियशसे नमः । हारिणे चोज्ज्वलाङ्गायात्रेस्तनूजाय शम्भवे ॥ १३ ॥ मोचितामरसङ्घाय धीमतां धीकराय च । बलिष्ठविप्रलभ्याय यागहोमप्रियाय च ॥ १४ ॥ भजन्महिमविख्यात्रेऽमरारिमहिमच्छिदे । लाभाय मुण्डिपूज्याय यमिने हेममालिने ॥ १५ ॥ गतोपाधिव्याधये च हिरण्याहितकान्तये । यतीन्द्रचर्यां दधते नरभावौषधाय च ॥ १६ ॥ वरिष्ठयोगिपूज्याय तन्तुसन्तन्वते नमः । स्वात्मगाथासुतीर्थाय सुश्रिये षट्कराय च ॥ १७ ॥ तेजोमयोत्तमाङ्गाय नोदनानोद्यकर्मणे । हान्याप्तिमृतिविज्ञात्रे ओङ्कारितसुभक्तये ॥ १८ ॥ रुक्षुङ्मनःखेदहृते दर्शनाविषयात्मने । राङ्कवाततवस्त्राय नरतत्त्वप्रकाशिने ॥ १९ ॥ द्रावितप्रणताघायात्तस्वजिष्णुस्वराशये । राजत्त्र्यास्यैकरूपाय मस्थाय मसुबन्धवे ॥ २० ॥ यतये चोदनातीतप्रचारप्रभवे नमः । मानरोषविहीनाय शिष्यसंसिद्धिकारिणे ॥ २१ ॥ गन्त्रे पादविहीनाय चोदनाचोदितात्मने । यवीयसेऽलर्कदुःखवारिणेऽखण्डितात्मने ॥ २२ ॥ ह्रीम्बीजायार्जुनेष्ठाय दर्शनादर्शितात्मने । नतिसन्तुष्टचित्ताय यतये ब्रह्मचारिणे ॥ २३ ॥ इत्येष सत् स्तवो वृत्तोऽयात्कं देयात्प्रजापिने । मस्करीशो मनुस्यूतः परब्रह्मपदप्रदः ॥ २४ ॥ ॥ इति श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ का आध्यात्मिक रहस्य (Introduction)

श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ भगवान दत्तात्रेय की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत गूढ़ और तांत्रिक महत्व का स्तोत्र है। हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान दत्तात्रेय को त्रिगुणात्मक अवतार माना गया है, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त शक्तियाँ समाहित हैं। 'अष्टोत्तरशतनाम' का अर्थ है १०८ नाम। हिंदू परंपरा में १०८ संख्या पूर्णता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है (१२ राशियाँ × ९ ग्रह)। यह स्तोत्र न केवल प्रभु के नामों की सूची है, बल्कि प्रत्येक नाम एक विशेष गुण और आध्यात्मिक स्थिति का द्योतक है।

इस स्तोत्र की रचना शैली आधुनिक काल के महान दत्त अवतार और प्रकांड विद्वान परम पूज्य श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) की कृतियों से मेल खाती है। इसमें 'ओंकारतत्त्वरूपाय' (ओंकार का स्वरूप) से लेकर 'परब्रह्मपदप्रदः' (परब्रह्म का पद देने वाले) तक की यात्रा वर्णित है। यह स्तोत्र विशेष रूप से बीज मंत्रों (जैसे द्राम, ह्रीं, क्लीं) के साथ जुड़ा हुआ है, जो इसे केवल एक प्रार्थना नहीं बल्कि एक शक्तिशाली 'साधना अस्त्र' बनाता है। श्लोक २ और ३ में 'ह्रीम्बीज' और 'क्लीम्बीज' का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि यह पाठ साधक की मानसिक और आध्यात्मिक ग्रंथियों को खोलने के लिए रचा गया है।

भगवान दत्तात्रेय को 'अवधूत' और 'आदि गुरु' कहा जाता है। वे किसी बंधन में नहीं बंधते, फिर भी अपने भक्तों के लिए सदैव सुलभ हैं। इस स्तोत्र में उनके 'मुण्डिने' (सन्यासी), 'यति' और 'ब्रह्मचारी' स्वरूपों की वंदना की गई है, जो वैराग्य के शिखर को दर्शाते हैं। १०८ नामों के माध्यम से प्रभु के उन रूपों का स्मरण किया जाता है जिन्होंने अलर्क, कार्तवीर्यार्जुन और यदु जैसे महान राजाओं को आत्मज्ञान की दीक्षा दी थी।

विशिष्ट महत्व एवं तांत्रिक बीज मंत्रों का संगम (Significance)

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र २ का महत्व इसके 'बीज-गर्भित' होने में है। सामान्य स्तोत्रों की तुलना में इसमें बीजाक्षरों का विशेष संपुट लगा हुआ है। उदाहरण के लिए, श्लोक १० में "द्राम्बीजजपतुष्टये" का उल्लेख है। 'द्राम' (Dram) भगवान दत्तात्रेय का साक्षात स्वरूप बीज मंत्र है। ऐसी मान्यता है कि इस बीज मंत्र के बिना दत्त साधना अधूरी रहती है। यह ध्वनि तरंग (Frequency) साधक के आज्ञा चक्र को जाग्रत करती है।

स्तोत्र में 'वासनावनदावाय' (वासना रूपी वन को जलाने वाली अग्नि) जैसे नाम यह बताते हैं कि दत्तात्रेय साधना का मुख्य उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि है। भगवान दत्त को 'यतिसंन्यासिगतये' कहा गया है, अर्थात वे उन लोगों के अंतिम आश्रय हैं जिन्होंने सत्य की खोज में सब कुछ त्याग दिया है। साथ ही, 'विद्विषत्षट्कघातिने' (छह आंतरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर—का नाश करने वाले) के रूप में उनका स्मरण साधक को मानसिक द्वंद्वों से मुक्त करता है। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के रहस्यों को नामों के रूप में प्रस्तुत करता है।

फलश्रुति: १०८ नामों के पाठ के आध्यात्मिक लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक (२४) में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'परब्रह्मपदप्रदः' है। इसके अन्य लाभ निम्नलिखित हैं:

  • अज्ञान और मोह का नाश: 'मोहादिविभ्रमान्ताय' (श्लोक ३) के अनुसार, यह जीवन के भ्रम और मोह को समाप्त कर स्पष्ट दृष्टि प्रदान करता है।
  • ग्रह बाधा एवं भय से मुक्ति: 'वातादिभययुग्भावहेतवे' (श्लोक ८) के स्मरण से प्राकृतिक आपदाओं और ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से रक्षा होती है।
  • एकाग्रता और ज्ञान की प्राप्ति: 'धीप्रदीपाय' (बुद्धि के दीपक) स्वरूप प्रभु का नाम लेने से छात्रों और साधकों की स्मरण शक्ति और प्रज्ञा जाग्रत होती है।
  • आंतरिक शत्रुओं पर विजय: काम, क्रोध आदि विकारों का शमन होता है, जिससे मन शांत और एकाग्र रहता है।
  • परब्रह्म पद की प्राप्ति: यह स्तोत्र अंततः साधक को मोक्ष और ईश्वर के साथ एकात्मता (Unity) का अनुभव कराता है।
  • सर्व मनोकामना पूर्ति: बीज मंत्रों के प्रभाव से भौतिक बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में समृद्धि का उदय होता है।

पाठ विधि और विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)

दत्तात्रेय अष्टोत्तर का पाठ पूर्ण श्रद्धा और सात्विकता के साथ करना चाहिए। भगवान दत्त 'स्मर्तृगामी' हैं, अर्थात याद करते ही वे सहायता के लिए पहुँच जाते हैं।

साधना के नियम

  • समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का दिन है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या सायंकाल का समय सर्वश्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा और दत्त जयंती पर पाठ अनंत फलदायी होता है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान दत्तात्रेय को अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) की ओर होना चाहिए।
  • दीप और नैवेद्य: घी का दीपक प्रज्वलित करें और भगवान को गुड़, चना, या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • माला: यदि आप प्रत्येक नाम का जप करना चाहते हैं, तो रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।

विशेष तांत्रिक प्रयोग

यदि जीवन में बड़ी बाधा हो, तो इस स्तोत्र के पाठ के बाद 'ॐ द्राम दत्तात्रेयाय नमः' मंत्र की ५ माला जप करें। स्तोत्र में आए 'द्राम्बीज' की शक्ति को जाग्रत करने के लिए यह आवश्यक है। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का संकीर्तन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10 FAQs)

1. श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ के रचयिता कौन हैं?

यह स्तोत्र मुख्य रूप से दत्त संप्रदाय की गुरु परंपरा से आया है। इसके भाव और शब्द विन्यास महान योगी श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) की रचनाओं के समान हैं, जिन्होंने लुप्त दत्त साहित्य को पुनः जीवित किया।

2. 'द्राम्बीज' का इस स्तोत्र में क्या महत्व है?

'द्राम' (Dram) भगवान दत्तात्रेय का मूल बीज मंत्र है। श्लोक १० में कहा गया है कि प्रभु इस बीज मंत्र के जप से अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यह साधक की रक्षा और एकाग्रता के लिए रामबाण है।

3. क्या इस स्तोत्र के पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय पितरों के स्वामी माने जाते हैं। उनके १०८ नामों का पाठ अतृप्त पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है।

4. 'यतिसंन्यासिगतये' नाम का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि भगवान दत्तात्रेय उन सभी सन्यासियों और योगियों के अंतिम लक्ष्य (Gati) और आश्रय हैं जिन्होंने संसार का त्याग कर सत्य की खोज शुरू की है।

5. क्या इसे पढ़ते समय माला की आवश्यकता है?

अनिवार्य नहीं है। इसे केवल श्रद्धापूर्वक पढ़ने से भी लाभ मिलता है। हालांकि, यदि आप प्रत्येक नाम के आगे 'ॐ' और पीछे 'नमः' लगाकर जप करते हैं (जैसे- ॐ ओंकारतत्त्वरूपाय नमः), तो रुद्राक्ष की माला का उपयोग श्रेष्ठ है।

6. 'विद्विषत्षट्कघातिने' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है— 'छह आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाले'। ये शत्रु हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर। इनके विनाश के बिना आध्यात्मिक शांति संभव नहीं है।

7. क्या स्त्रियों के लिए यह पाठ करना वर्जित है?

बिल्कुल नहीं। भगवान दत्तात्रेय की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। माता अनसूया के पुत्र होने के कारण, प्रभु स्त्रियों पर विशेष वात्सल्य रखते हैं।

8. 'अलर्कदुःखवारिणे' नाम का क्या संदर्भ है?

श्लोक २२ में यह नाम राजा अलर्क की कथा की ओर संकेत करता है, जिन्हें भगवान दत्तात्रेय ने योग का उपदेश देकर उनके समस्त राजसी दुखों और मोह से मुक्त किया था।

9. क्या इस पाठ से व्यापार या नौकरी में उन्नति होती है?

हाँ, क्योंकि यह स्तोत्र 'ऐश्वर्यश्रौतगीतये' (ऐश्वर्य का गान करने वाला) है। गुरु की प्रसन्नता से जातक के बुद्धि दोष दूर होते हैं और निर्णय क्षमता बढ़ती है, जिससे भौतिक उन्नति होती है।

10. 'परब्रह्मपद' प्राप्त करने का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर उस परम चैतन्य (Godhood) में विलीन हो जाना, जो इस स्तोत्र का अंतिम और सर्वोच्च फल है।