Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १

परिचय: श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १ (ब्रह्माण्ड पुराणोक्त)
श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १ (Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 1) हिंदू धर्म के १८ महापुराणों में से एक, 'ब्रह्माण्ड पुराण' (Brahmanda Purana) से उद्धृत है। यह स्तोत्र भगवान ब्रह्मा और देवर्षि नारद के बीच हुए उस परम गोपनीय संवाद का हिस्सा है, जहाँ नारद जी ने कलियुग के त्रितापों से मुक्ति का सरल मार्ग पूछा था। भगवान दत्तात्रेय को त्रिगुणात्मक अवतार माना जाता है, जिनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (संहार) की संयुक्त दिव्य शक्तियाँ निहित हैं।
दत्तात्रेय का अर्थ है— "दत्त" (स्वयं को अर्पित करने वाला) और "अत्रेय" (महर्षि अत्रि के पुत्र)। माता अनसूया के सतीत्व और महर्षि अत्रि के घोर तप के फलस्वरूप जब त्रिदेवों ने बालक रूप में अवतार लिया, तब वह शक्ति "दत्तात्रेय" कहलाई। १०८ नामों का यह संग्रह केवल भगवान के गुणों का वर्णन नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम एक स्वतंत्र मंत्र के समान ऊर्जावान है। इस पाठ का विनियोग स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को "ऋषि" मानकर किया गया है, जो इसकी सर्वोच्चता को सिद्ध करता है।
दत्त सम्प्रदाय में इस स्तोत्र को "गुरु तत्व" का साक्षात विग्रह माना गया है। भगवान दत्तात्रेय 'आदि गुरु' हैं, जिन्होंने २४ गुरुओं के माध्यम से प्रकृति के हर तत्व से ज्ञान ग्रहण करने की कला सिखाई। १०८ नामों के इस पाठ में उनके 'अवधूत' (पूर्णतः मुक्त), 'योगीन्द्र' (योगियों के राजा) और 'जगदीश्वर' (जगत के स्वामी) जैसे स्वरूपों का गान किया गया है। यह पाठ उन सभी साधकों के लिए अनिवार्य है जो आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ संसार के जटिल बंधनों से मुक्ति चाहते हैं।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और पितृ दोष निवारण
दत्तात्रेय साधना का एक अत्यंत गोपनीय और महत्वपूर्ण पक्ष 'पितृ दोष' (Ancestral Issues) की शांति है। हिंदू धर्मग्रंथों और महान दत्त अवतारों (जैसे श्रीपाद श्रीवल्लभ और श्री नृसिंह सरस्वती) के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति माने जाते हैं। जब किसी परिवार में अतृप्त पूर्वजों के कारण बाधाएं आती हैं, तो दत्त अष्टोत्तर का पाठ अमोघ औषधि की तरह कार्य करता है। १०८ नामों का सस्वर उच्चारण घर के वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है और पितरों को सद्गति प्रदान करता है।
स्तोत्र में भगवान को 'संसारवनदावाग्निः' (श्लोक १०) कहा गया है, जिसका अर्थ है— वह अग्नि जो संसार रूपी वन के दुखों को जलाकर भस्म कर दे। साथ ही, वे 'भवसागरतारकः' हैं, अर्थात इस जन्म-मरण के चक्र से पार लगाने वाले एकमात्र नाविक हैं। इस पाठ के माध्यम से साधक अपने भीतर के 'द्वैत' को समाप्त कर 'अद्वैत' (परमात्मा के साथ एकात्मता) का अनुभव कर सकता है। दत्त गुरु "स्मर्तृगामी" हैं, अर्थात मात्र पुकारने से ही वे भक्त की रक्षा के लिए दौड़ पड़ते हैं।
फलश्रुति: १०८ नामों के पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)
ब्रह्माण्ड पुराण में स्वयं इस स्तोत्र के अंतिम दो श्लोकों (१६-१७) में इसके चमत्कारी लाभों की घोषणा की गई है:
- समस्त पापों का नाश: "सर्वपापैः प्रमुच्यते" — श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाला साधक ज्ञात-अज्ञात सभी पापों के बोझ से मुक्त हो जाता है।
- दुखों और अरिष्टों का निवारण: "सर्वदुःखप्रशमनं सर्वारिष्टनिवारणम्" — यह पाठ जीवन में आने वाली अचानक आपदाओं, बुरी नजर और ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव (अरिष्ट) को रोकता है।
- भोग और मोक्ष की प्राप्ति: यह स्तोत्र अद्वितीय है क्योंकि यह संसार के सुख (भोग) और मृत्यु के बाद की मुक्ति (मोक्ष) दोनों एक साथ प्रदान करता है।
- दत्त सायुज्य: "दत्तसायुज्यदायकम्" — निरंतर अभ्यास से साधक अंततः भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप में विलीन होने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।
- मानसिक शांति और एकाग्रता: 'सच्चिदानन्द' और 'निर्विकल्प' जैसे नामों के जाप से चंचल मन शांत होता है और ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
- कठिन रोगों से सुरक्षा: भगवान को 'सर्वाधिव्याधिभेषज' (सभी रोगों की औषधि) माना गया है। पाठ के कंपन शारीरिक और मानसिक व्याधियों को कम करते हैं।
सिद्ध पाठ विधि एवं विशेष विधान (Ritual Method)
दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और शुद्धता का सर्वोच्च स्थान है। ब्रह्माण्ड पुराणोक्त इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है।
पूजा की तैयारी
- शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा (Full Moon), दत्त जयंती और मार्गशीर्ष मास में पाठ करना अनंत फलदायी है।
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः काल ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सबसे अधिक ऊर्जादायक होता है।
- आसन और दिशा: पीले (Saffron/Yellow) या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए।
- पञ्चपूजा: पाठ प्रारंभ करने से पहले 'लं' आदि पञ्चोपचार पूजा (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) मानस या प्रत्यक्ष रूप से अवश्य करें।
- ध्यान: भगवान के त्रिमूर्ति स्वरूप का ध्यान करें, जिनके साथ चार कुत्ते (चार वेद) और एक गाय (माता पृथ्वी) हैं।
विशेष मनोकामना हेतु प्रयोग
यदि पितृ शांति या किसी बड़े संकट के निवारण के लिए पाठ कर रहे हैं, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ या २१ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' मंत्र का जाप करना न भूलें। भगवान दत्त को चने की दाल और गुड़ का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)