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Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १

Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १
॥ श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १ ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीदत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रमहामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः, श्रीदत्तात्रेयो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीदत्तात्रेय प्रीत्यर्थे नामपरायणे विनियोगः । ॥ करन्यासः ॥ ओं द्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं द्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं द्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं द्रैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं द्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं द्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ओं द्रां हृदयाय नमः । ओं द्रीं शिरसे स्वाहा । ओं द्रूं शिखायै वषट् । ओं द्रैं कवचाय हुम् । ओं द्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं द्रः अस्त्राय फट् । ओं भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः । ॥ ध्यानम् ॥ दिगम्बरं भस्मविलेपिताङ्गं चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदां च । पद्माननं योगिमुनीन्द्र वन्द्यं ध्यायामि तं दत्तमभीष्टसिद्ध्यै ॥ ॥ पञ्चपूजा ॥ ओं लं पृथिवीतत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः गन्धं परिकल्पयामि । ओं हं आकाशतत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः पुष्पं परिकल्पयामि । ओं यं वायुतत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः धूपं परिकल्पयामि । ओं रं वह्नितत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः दीपं परिकल्पयामि । ओं वं अमृततत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि । ओं सं सर्वतत्त्वात्मने श्रीदत्तात्रेयाय नमः सर्वोपचारान् परिकल्पयामि । ॥ स्तोत्रम् ॥ अनसूयासुतो दत्तो ह्यत्रिपुत्रो महामुनिः । योगीन्द्रः पुण्यपुरुषो देवेशो जगदीश्वरः ॥ १ ॥ परमात्मा परं ब्रह्म सदानन्दो जगद्गुरुः । नित्यतृप्तो निर्विकारो निर्विकल्पो निरञ्जनः ॥ २ ॥ गुणात्मको गुणातीतो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः । नानारूपधरो नित्यः शान्तो दान्तः कृपानिधिः ॥ ३ ॥ भक्तिप्रियो भवहरो भगवान्भवनाशनः । आदिदेवो महादेवः सर्वेशो भुवनेश्वरः ॥ ४ ॥ वेदान्तवेद्यो वरदो विश्वरूपोऽव्ययो हरिः । सच्चिदानन्दः सर्वेशो योगीशो भक्तवत्सलः ॥ ५ ॥ दिगम्बरो दिव्यमूर्तिर्दिव्यभूतिविभूषणः । अनादिसिद्धः सुलभो भक्तवाञ्छितदायकः ॥ ६ ॥ एकोऽनेको ह्यद्वितीयो निगमागमपण्डितः । भुक्तिमुक्तिप्रदाता च कार्तवीर्यवरप्रदः ॥ ७ ॥ शाश्वताङ्गो विशुद्धात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः । सर्वेश्वरः सदातुष्टः सर्वमङ्गलदायकः ॥ ८ ॥ निष्कलङ्को निराभासो निर्विकल्पो निराश्रयः । पुरुषोत्तमो लोकनाथः पुराणपुरुषोऽनघः ॥ ९ ॥ अपारमहिमाऽनन्तो ह्याद्यन्तरहिताकृतिः । संसारवनदावाग्निर्भवसागरतारकः ॥ १० ॥ श्रीनिवासो विशालाक्षः क्षीराब्धिशयनोऽच्युतः । सर्वपापक्षयकरस्तापत्रयनिवारणः ॥ ११ ॥ लोकेशः सर्वभूतेशो व्यापकः करुणामयः । ब्रह्मादिवन्दितपदो मुनिवन्द्यः स्तुतिप्रियः ॥ १२ ॥ नामरूपक्रियातीतो निःस्पृहो निर्मलात्मकः । मायाधीशो महात्मा च महादेवो महेश्वरः ॥ १३ ॥ व्याघ्रचर्माम्बरधरो नागकुण्डलभूषणः । सर्वलक्षणसम्पूर्णः सर्वसिद्धिप्रदायकः ॥ १४ ॥ सर्वज्ञः करुणासिन्धुः सर्पहारः सदाशिवः । सह्याद्रिवासः सर्वात्मा भवबन्धविमोचनः । विश्वम्भरो विश्वनाथो जगन्नाथो जगत्प्रभुः ॥ १५ ॥ ओं भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्विमोकः ॥ ॥ फलश्रुति ॥ नित्यं पठति यो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते । सर्वदुःखप्रशमनं सर्वारिष्टनिवारणम् ॥ १६ ॥ भोगमोक्षप्रदं नृणां दत्तसायुज्यदायकम् । पठन्ति ये प्रयत्नेन सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ १७ ॥ ॥ इति ब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्मनारदसंवादे श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १ (ब्रह्माण्ड पुराणोक्त)

श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् १ (Sri Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram 1) हिंदू धर्म के १८ महापुराणों में से एक, 'ब्रह्माण्ड पुराण' (Brahmanda Purana) से उद्धृत है। यह स्तोत्र भगवान ब्रह्मा और देवर्षि नारद के बीच हुए उस परम गोपनीय संवाद का हिस्सा है, जहाँ नारद जी ने कलियुग के त्रितापों से मुक्ति का सरल मार्ग पूछा था। भगवान दत्तात्रेय को त्रिगुणात्मक अवतार माना जाता है, जिनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (संहार) की संयुक्त दिव्य शक्तियाँ निहित हैं।

दत्तात्रेय का अर्थ है— "दत्त" (स्वयं को अर्पित करने वाला) और "अत्रेय" (महर्षि अत्रि के पुत्र)। माता अनसूया के सतीत्व और महर्षि अत्रि के घोर तप के फलस्वरूप जब त्रिदेवों ने बालक रूप में अवतार लिया, तब वह शक्ति "दत्तात्रेय" कहलाई। १०८ नामों का यह संग्रह केवल भगवान के गुणों का वर्णन नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम एक स्वतंत्र मंत्र के समान ऊर्जावान है। इस पाठ का विनियोग स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को "ऋषि" मानकर किया गया है, जो इसकी सर्वोच्चता को सिद्ध करता है।

दत्त सम्प्रदाय में इस स्तोत्र को "गुरु तत्व" का साक्षात विग्रह माना गया है। भगवान दत्तात्रेय 'आदि गुरु' हैं, जिन्होंने २४ गुरुओं के माध्यम से प्रकृति के हर तत्व से ज्ञान ग्रहण करने की कला सिखाई। १०८ नामों के इस पाठ में उनके 'अवधूत' (पूर्णतः मुक्त), 'योगीन्द्र' (योगियों के राजा) और 'जगदीश्वर' (जगत के स्वामी) जैसे स्वरूपों का गान किया गया है। यह पाठ उन सभी साधकों के लिए अनिवार्य है जो आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ संसार के जटिल बंधनों से मुक्ति चाहते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और पितृ दोष निवारण

दत्तात्रेय साधना का एक अत्यंत गोपनीय और महत्वपूर्ण पक्ष 'पितृ दोष' (Ancestral Issues) की शांति है। हिंदू धर्मग्रंथों और महान दत्त अवतारों (जैसे श्रीपाद श्रीवल्लभ और श्री नृसिंह सरस्वती) के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति माने जाते हैं। जब किसी परिवार में अतृप्त पूर्वजों के कारण बाधाएं आती हैं, तो दत्त अष्टोत्तर का पाठ अमोघ औषधि की तरह कार्य करता है। १०८ नामों का सस्वर उच्चारण घर के वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है और पितरों को सद्गति प्रदान करता है।

स्तोत्र में भगवान को 'संसारवनदावाग्निः' (श्लोक १०) कहा गया है, जिसका अर्थ है— वह अग्नि जो संसार रूपी वन के दुखों को जलाकर भस्म कर दे। साथ ही, वे 'भवसागरतारकः' हैं, अर्थात इस जन्म-मरण के चक्र से पार लगाने वाले एकमात्र नाविक हैं। इस पाठ के माध्यम से साधक अपने भीतर के 'द्वैत' को समाप्त कर 'अद्वैत' (परमात्मा के साथ एकात्मता) का अनुभव कर सकता है। दत्त गुरु "स्मर्तृगामी" हैं, अर्थात मात्र पुकारने से ही वे भक्त की रक्षा के लिए दौड़ पड़ते हैं।

फलश्रुति: १०८ नामों के पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

ब्रह्माण्ड पुराण में स्वयं इस स्तोत्र के अंतिम दो श्लोकों (१६-१७) में इसके चमत्कारी लाभों की घोषणा की गई है:

  • समस्त पापों का नाश: "सर्वपापैः प्रमुच्यते" — श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाला साधक ज्ञात-अज्ञात सभी पापों के बोझ से मुक्त हो जाता है।
  • दुखों और अरिष्टों का निवारण: "सर्वदुःखप्रशमनं सर्वारिष्टनिवारणम्" — यह पाठ जीवन में आने वाली अचानक आपदाओं, बुरी नजर और ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव (अरिष्ट) को रोकता है।
  • भोग और मोक्ष की प्राप्ति: यह स्तोत्र अद्वितीय है क्योंकि यह संसार के सुख (भोग) और मृत्यु के बाद की मुक्ति (मोक्ष) दोनों एक साथ प्रदान करता है।
  • दत्त सायुज्य: "दत्तसायुज्यदायकम्" — निरंतर अभ्यास से साधक अंततः भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप में विलीन होने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता: 'सच्चिदानन्द' और 'निर्विकल्प' जैसे नामों के जाप से चंचल मन शांत होता है और ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
  • कठिन रोगों से सुरक्षा: भगवान को 'सर्वाधिव्याधिभेषज' (सभी रोगों की औषधि) माना गया है। पाठ के कंपन शारीरिक और मानसिक व्याधियों को कम करते हैं।

सिद्ध पाठ विधि एवं विशेष विधान (Ritual Method)

दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और शुद्धता का सर्वोच्च स्थान है। ब्रह्माण्ड पुराणोक्त इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है।

पूजा की तैयारी

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा (Full Moon), दत्त जयंती और मार्गशीर्ष मास में पाठ करना अनंत फलदायी है।
  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः काल ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सबसे अधिक ऊर्जादायक होता है।
  • आसन और दिशा: पीले (Saffron/Yellow) या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • पञ्चपूजा: पाठ प्रारंभ करने से पहले 'लं' आदि पञ्चोपचार पूजा (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) मानस या प्रत्यक्ष रूप से अवश्य करें।
  • ध्यान: भगवान के त्रिमूर्ति स्वरूप का ध्यान करें, जिनके साथ चार कुत्ते (चार वेद) और एक गाय (माता पृथ्वी) हैं।

विशेष मनोकामना हेतु प्रयोग

यदि पितृ शांति या किसी बड़े संकट के निवारण के लिए पाठ कर रहे हैं, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ या २१ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' मंत्र का जाप करना न भूलें। भगवान दत्त को चने की दाल और गुड़ का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'ब्रह्माण्ड पुराण' (Brahmanda Purana) के अंतर्गत ब्रह्मा और नारद मुनि के संवाद से लिया गया है।

2. भगवान दत्तात्रेय को 'त्रिगुणात्मक' क्यों कहा जाता है?

क्योंकि उनमें सत, रज और तम तीनों गुणों का संतुलन है और वे ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के संयुक्त अवतार हैं।

3. क्या इस स्तोत्र के पाठ से पितृ दोष दूर होता है?

जी हाँ, भगवान दत्त पितरों के अधिपति हैं। १०८ नामों का पाठ पूर्वजों को शांति और सद्गति प्रदान करने के लिए अमोघ माना जाता है।

4. 'स्मर्तृगामी' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'स्मर्तृगामी' का अर्थ है— स्मरण करते ही पहुँच जाने वाले। यह भगवान दत्त की वह कृपा है जिसमें वे किसी कठिन योग के बिना मात्र याद करने से ही भक्त की सहायता करते हैं।

5. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवती अनसूया के पुत्र होने के कारण भगवान दत्तात्रेय स्त्रियों पर विशेष वात्सल्य रखते हैं। शुद्धि के नियमों का पालन करते हुए कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

दत्तात्रेय साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि मानसिक जाप करना हो तो बिना माला के भी किया जा सकता है।

7. क्या १०८ नामों का पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है?

हाँ, श्लोक २ के 'निर्विकल्प' और 'निरञ्जन' जैसे नामों का जाप मस्तिष्क की चंचलता को शांत कर एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाता है।

8. भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते क्या दर्शाते हैं?

वे चार कुत्ते ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के प्रतीक हैं, जो यह बताते हैं कि संपूर्ण ज्ञान प्रभु के चरणों में सुरक्षित है।

9. क्या यह पाठ घर के मंदिर में किया जा सकता है?

हाँ, शांत और पवित्र स्थान पर दीपक जलाकर इसका पाठ करना घर के वातावरण को सात्विक बनाता है।

10. 'दिगम्बर' नाम का क्या तात्पर्य है?

'दिक्' (दिशाएं) ही जिनका 'अम्बर' (वस्त्र) हैं। यह भगवान के उस स्वरूप को दर्शाता है जो किसी भी भौतिक बंधन या माया के आवरण में नहीं है।