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Sri Dakshinasya Bhujanga Prayata Stuti – श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः

Sri Dakshinasya Bhujanga Prayata Stuti – श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः
॥ श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः ॥ भवाम्भोधिपारं नयन्तं स्वभक्ता- न्कृपापूरपूर्णैरपाङ्गैः स्वकीयैः । समस्तागमान्तप्रगीतापदानं सदा दक्षिणास्यं तमाराधयेऽहम् ॥ १ ॥ चतुर्विंशदर्णस्य मन्त्रोत्तमस्य प्रजापाद्दृढं वश्यभावं समेत्य । प्रयच्छत्यरं यश्च विद्याममोघां सदा दक्षिणास्यं तमाराधयेऽहम् ॥ २ ॥ जडायापि विद्यां प्रयच्छन्तमाशु प्रपन्नार्तिविध्वंसदक्षाभिधानम् । जराजन्ममृत्यून् हरन्तं प्रमोदात् सदा दक्षिणास्यं तमाराधयेऽहम् ॥ ३ ॥ यमाराध्य पद्माक्षपद्मोद्भवाद्याः सुराग्र्याः स्वकार्येषु शक्ता बभूवुः । रमाभारतीपार्वतीस्तूयमानं सदा दक्षिणास्यं तमाराधयेऽहम् ॥ ४ ॥ सुधासूतिबालोल्लसन्मौलिभागं सुधाकुम्भमालालसत्पाणिपद्मम् । सपुत्रं सदारं सशिष्यं सवाहं सदा दक्षिणास्यं तमाराधयेऽहम् ॥ ५ ॥ गजास्याग्निभूसेव्यपादारविन्दं गजाश्वादिसम्पत्तिहेतुप्रणामम् । निजानन्दवाराशिराकासुधांशुं शुचीन्द्वर्कनेत्रं भजे दक्षिणास्यम् ॥ ६ ॥ गुणान्षट्शमादीनिहामुत्र भोगे विरक्तिं विवेकं ध्रुवानित्ययोश्च । मुमुक्षां च शीघ्रं लभेत प्रसादात् तमानन्दकन्दं भजे दक्षिणास्यम् ॥ ७ ॥ जडो जन्ममूकोऽपि यन्मन्त्रजप्तुः करस्पर्शनात्स्यात्सुराचार्यतुल्यः । तमज्ञानवारान्निधेर्वाडवाग्निं मुदा सर्वकालम भजे दक्षिणास्यम् ॥ ८ ॥ जहौ मृत्युभीतिं यदीयाङ्घ्रिपद्मं सदा पूजयित्वा मृकण्डोस्तनूजः । तमद्रीन्द्रकन्यासमाश्लिष्टदेहं कृपावारिराशिं भजे दक्षिणास्यम् ॥ ९ ॥ पुरा कामयाना पतिं स्वानुरूपां चरित्वा तपो दुष्करं शैलकन्या । अवापादराद्या रुचा कामगर्वं हरन्तं तमन्तर्भजे दक्षिणास्यम् ॥ १० ॥ यदीयाङ्घ्रिसेवापराणां नराणां सुसाध्या भवेयुर्जवात्सर्वयोगाः । हठाद्याः शिवान्ता यमाद्यङ्गयुक्ता मुदा सन्ततं तं भजे दक्षिणास्यम् ॥ ११ ॥ वटागस्य मूले वसन्तं सुरस्त्री- -कदम्बैः सदा सेव्यमानं प्रमोदात् । वरान् कामितान्नम्रपङ्क्त्यै दिशन्तं दयाजन्मभूमिं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १२ ॥ विधूताभिमानैस्तनौ चक्षुरादा- -वहन्त्वेन सम्प्राप्यमेकाग्रचित्तैः । यतीन्द्रैर्गुरुश्रेष्ठविज्ञाततत्त्वै- -र्महावाक्यगूढं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १३ ॥ शुकाद्या मुनीन्द्रा विरक्ताग्रगण्याः समाराध्य यं ब्रह्मविद्यामवापुः । तमल्पार्चनातुष्टचेतोऽम्बुजातं चिदानन्दरूपं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १४ ॥ श्रुतेर्युक्तितश्चिन्तनाद्ध्यानयोगा- -द्भवेद्यस्य साक्षात्कृतिः पुण्यभाजाम् । अखण्डं सदानन्दचिद्रूपमन्तः सदाहं मुदा तं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १५ ॥ सुवर्णाद्रिचापं रमानाथबाणं दिनेशेन्दुचक्रं धरास्यन्दनाग्र्यम् । विधिं सारथिं नागनाथं च मौर्वीं प्रकुर्वाणमीशं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १६ ॥ कराम्भोरुहैः पुस्तकं बोधमुद्रां सुधापूर्णकुम्भं स्रजं मौक्तिकानाम् । दधानं धराधीशमौलौ शयानं शशाङ्कार्धचूडं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १७ ॥ कलादानदक्षं तुलाशून्यवक्त्रं शिलादात्मजेड्यं वलारातिपूज्यम् । जलाद्यष्टमूर्तिं कलालापयुक्तं फलालिं दिशन्तं भजे दक्षिणास्यम् ॥ १८ ॥ यदालोकमात्रान्नतानां हृदब्जे शमाद्या गुणाः सत्वरं सम्भवन्ति । प्रणम्रालिचेतःसरोजातभानुं गुरुं तं सुरेड्यं नमामो भजामः ॥ १९ ॥ पिनद्धानि भक्त्याख्यसूत्रेण कण्ठे सदेमानि रत्नानि धत्ते दृढं यः । मुदा मुक्तिकान्ता द्रुतं तं वृणीते स्वयं शान्तिदान्तिप्रमुख्यालियुक्ता ॥ २० ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामिभिः विरचितं श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः ॥

परिचय: श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः — शृङ्गेरी जगद्गुरु का दिव्य उपहार (Detailed Introduction)

श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः (Sri Dakshinasya Bhujanga Prayata Stuti) भगवान शिव के आदि-गुरु स्वरूप, 'दक्षिणामूर्ति' को समर्पित एक अत्यंत तेजस्वी और दार्शनिक रूप से समृद्ध स्तुति है। इसकी रचना शृङ्गेरी शारदा पीठ के ३३वें पीठाधिपति, जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामी जी ने की थी। नृसिंह भारती जी को आधुनिक काल का 'अभिनव शंकर' माना जाता है। उन्होंने इस स्तुति की रचना 'भुजङ्गप्रयात' छंद में की है, जिसकी गति चलते हुए सर्प के समान अत्यंत गतिशील और श्रवणीय होती है। यह स्तोत्र २० दिव्य छंदों में भगवान दक्षिणामूर्ति के उन रहस्यों को उद्घाटित करता है जो उपनिषदों का सार हैं।

दक्षिणामूर्ति का अर्थ है— "वे जिनका मुख दक्षिण (Dakshina) की ओर है"। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दक्षिण दिशा काल (मृत्यु) और अज्ञान की दिशा मानी जाती है। भगवान उस ओर मुख करके यह संकेत देते हैं कि वे मृत्यु के भय को मिटाने वाले और प्रज्ञा (Intelligence) की ज्योति जाग्रत करने वाले एकमात्र गुरु हैं। इस स्तुति के दूसरे श्लोक में एक विशेष रहस्य का उल्लेख है— 'चतुर्विंशदर्णस्य मन्त्रोत्तमस्य', अर्थात् २४ अक्षरों वाला दक्षिणामूर्ति महामन्त्र। आचार्य बताते हैं कि जो इस मन्त्र का आश्रय लेता है, उसे साक्षात् भगवान दक्षिणामूर्ति अमोघ विद्या प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र साधक के अंतर्मन को मन्त्र की शक्ति से जोड़ता है।

इस स्तुति की विशिष्टता इसके 'मेधा-प्रदायक' गुणों में छिपी है। श्लोक ८ में आचार्य कहते हैं कि जिनकी कृपा से जन्मजात मूक (गूंगा) और जड़ बुद्धि वाला व्यक्ति भी देवताओं के गुरु 'बृहस्पति' के समान विद्वान हो जाता है, उन दक्षिणामूर्ति की मैं वंदना करता हूँ। यह पाठ विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए एक वरदान है। यह न केवल बौद्धिक क्षमता बढ़ाता है, बल्कि साधक को 'अद्वैत' (Non-duality) के उस शिखर पर ले जाता है जहाँ 'अहं' का विसर्जन होकर केवल 'चिदानंद' शेष रह जाता है।

ऐतिहासिक और तांत्रिक शोध के अनुसार, दक्षिणामूर्ति की उपासना में 'न्यास' और 'मन्त्र-जप' का विशेष स्थान है। जगद्गुरु नृसिंह भारती जी ने इस स्तुति में भगवान के उस स्वरूप का वर्णन किया है जो हाथ में पुस्तक (ज्ञान), बोधमुद्रा (अनुभव), अक्षमाला (निरंतर जप) और सुधा-कुम्भ (मोक्ष का अमृत) धारण किए हुए हैं। Pavitra Granth के इस प्रामाणिक संस्करण में हम उन्हीं रहस्यों को प्रस्तुत कर रहे हैं जो साधक को संसार रूपी सागर (भवाम्भोधि) से पार उतारने में सक्षम हैं। जो भक्त भक्ति के सूत्र से इन रत्नों को अपने कंठ में धारण करता है, उसे 'मुक्तिकान्ता' (मुक्ति रूपी देवी) स्वयं वरण करती है।

विशिष्ट महत्व: २४ अक्षरी मन्त्र और गुरु-तत्व (Significance)

दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुति का महत्व इसकी दार्शनिक और ध्वन्यात्मक गहराई में है। इसके प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं:

  • मन्त्र-सिद्ध प्रपत्ति: श्लोक २ के अनुसार, यह स्तुति २४ अक्षरों वाले दक्षिणामूर्ति मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करती है, जो विद्या का सर्वोच्च शिखर है।
  • मृत्युञ्जय भाव: श्लोक ९ में ऋषि मार्कण्डेय (मृकण्डुसूनु) का प्रसंग है, जिन्होंने दक्षिणामूर्ति के चरणों का आश्रय लेकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। यह पाठ अकाल मृत्यु के भय को हरने वाला है।
  • प्रज्ञा जागरण: 'मेधाधीदक्षिणामूर्ते' कहकर भगवान को बुद्धि का स्वामी माना गया है। यह स्तोत्र अवचेतन मन की जड़ता को मिटाकर प्रज्ञा को प्रखर बनाता है।
  • योग और वैराग्य: श्लोक ७ में 'षट्-सम्पत्ति' (शम, दम आदि) और मुमुक्षा (मोक्ष की इच्छा) प्राप्त करने का मार्ग बताया गया है।

फलश्रुति: स्तुति पाठ के दिव्य लाभ (Divine Benefits)

शास्त्रों और शृङ्गेरी परंपरा के अनुसार, इस भुजङ्गप्रयात स्तुति के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अपार बौद्धिक शक्ति: "जडायापि विद्यां प्रयच्छन्तम्" — मंद बुद्धि वाले व्यक्ति को भी यह स्तुति कुशाग्र और ज्ञानी बना देती है।
  • अज्ञान और मोह का नाश: यह पाठ अज्ञान रूपी समुद्र की आग (वाडवाग्नि) के समान है, जो समस्त संशयों और मोह का भक्षण कर लेती है।
  • मानसिक शांति और विवेक: श्लोक ७ के अनुसार, साधक में विवेक (नित्य-अनित्य का ज्ञान) और वैराग्य का उदय होता है, जिससे चिरस्थायी शांति मिलती है।
  • समस्त योगों की सिद्धि: "सुसाध्या भवेयुर्जवात्सर्वयोगाः" — हठयोग से लेकर ज्ञानयोग तक की सभी साधनाएँ दक्षिणामूर्ति की कृपा से सहज सिद्ध हो जाती हैं।
  • मोक्ष की प्राप्ति: स्तोत्र के अंतिम श्लोक के अनुसार, जो इस पाठ रूपी रत्नों को भक्ति के सूत्र में पिरोता है, उसे स्वयं मुक्ति देवी (मोक्ष) प्राप्त होती है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method & Guidelines)

श्री दक्षिणास्य भुजङ्गप्रयात स्तुतिः एक अत्यंत ऊर्जामय पाठ है। इसका पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:

  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४:०० - ६:०० बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। गुरुवार और प्रदोष काल इसके लिए विशेष माने जाते हैं।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। सफेद रंग ज्ञान और सात्विकता का प्रतीक है।
  • आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। ऊनी या कुश का आसन सर्वोत्तम है।
  • पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म (विभूति), श्वेत चंदन और बिल्वपत्र अर्पित करें।
  • लयबद्ध पाठ: चूंकि यह भुजङ्गप्रयात छंद है, इसे संगीत की लय में गाने से मस्तिष्क की कोशिकाएं सक्रिय होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है।
  • मौन ध्यान: पाठ के समापन के बाद कम से कम ५ मिनट मौन बैठकर भगवान के 'चिन्-मुद्रा' स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवान दक्षिणामूर्ति कौन हैं?

भगवान दक्षिणामूर्ति महादेव शिव का वह स्वरूप हैं जो समस्त विद्याओं के आदि-गुरु और ज्ञान के अधिष्ठाता माने जाते हैं। वे वटवृक्ष के नीचे मौन रहकर ऋषियों को आत्मज्ञान देते हैं।

2. 'भुजङ्गप्रयात' छंद की क्या विशेषता है?

यह एक विशिष्ट संस्कृत काव्य छंद है जिसकी गति चलते हुए सर्प (भुजङ्ग) के समान लहराती हुई होती है। यह सुनने में अत्यंत ओजस्वी और मधुर लगता है।

3. क्या इस स्तुति के रचयिता आदि शंकराचार्य हैं?

नहीं, आदि शंकराचार्य ने 'दक्षिणामूर्त्यष्टकम्' की रचना की थी। इस विशिष्ट 'भुजङ्गप्रयात स्तुति' के रचयिता शृङ्गेरी पीठ के ३३वें जगद्गुरु श्री नृसिंह भारती स्वामी जी हैं।

4. क्या विद्यार्थियों के लिए यह स्तुति उपयोगी है?

जी हाँ, श्लोक ८ के अनुसार यह जड़ बुद्धि को भी प्रखर बनाती है। विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्मृति बढ़ाने हेतु यह सर्वश्रेष्ठ पाठ है।

5. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?

दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की दिशा है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे काल और अज्ञान (मृत्यु के भय) को मिटाने वाले परम गुरु हैं।

6. स्तोत्र में वर्णित 'चतुर्विंशदर्णस्य' मन्त्र क्या है?

यह दक्षिणामूर्ति का २४ अक्षरों वाला महान मन्त्र है। यह स्तुति उस मन्त्र की शक्ति को साधक के भीतर जाग्रत करने में सहायक होती है।

7. क्या इसे घर में नित्य पढ़ा जा सकता है?

हाँ, घर के मंदिर में शांत मन से इसका पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

8. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

सोमवार और गुरुवार (गुरु का दिन) इस स्तुति के पाठ के लिए विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।

9. क्या केवल सुनने (श्रवण) से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, शास्त्रों के अनुसार प्रभु की महिमा का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध करता है और प्रज्ञा को जाग्रत करता है।

10. 'चिन्-मुद्रा' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

चिन्-मुद्रा में तर्जनी उंगली (जीवात्मा) अंगूठे (परमात्मा) से मिलती है, जो इस सत्य का प्रतीक है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं।