Sri Chandralamba Ashtottara Stotram – श्रीलक्ष्मीचन्द्रलाम्बाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्रीचंद्रलाम्बा स्तोत्र: सन्नतिक्षेत्र का पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ
सन्नतिक्षेत्र (Sannati Kshetra): कर्नाटक राज्य के कलबुर्गी (गुलबर्गा) जिले में भीमा नदी के तट पर स्थित 'सन्नति' एक अत्यंत पवित्र और पुरातात्विक रूप से महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थान न केवल सम्राट अशोक के काल के बौद्ध स्तूपों के लिए जाना जाता है, बल्कि शाक्त परंपरा में इसे एक प्रमुख सिद्धपीठ माना गया है। श्रीमार्कण्डेय पुराण और स्कंद पुराण के 'चंद्रलाम्बा माहात्म्य' में इस क्षेत्र की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी पवित्र भूमि की अधिष्ठात्री देवी श्री लक्ष्मी चंद्रलाम्बा (Sri Lakshmi Chandralamba Parameshwari) हैं।
भ्रमराम्बा का रहस्य: स्कंद पुराण में एक अत्यंत रोचक कथा आती है। नारायण मुनि नामक एक ऋषि की पत्नी, चंद्रवदनी, को सेतुरेय नामक एक दुष्ट राजा ने बंदी बना लिया था। तब ऋषि की पुकार सुनकर साक्षात भगवती लक्ष्मी 'चंद्रलाम्बा' के रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी दिव्य पादुका (खड़ाऊं) से पांच विशाल भंवरों (Bumblebees) को उत्पन्न किया। इन भंवरों ने उस दुष्ट राजा पर आक्रमण किया और उसे भीमा नदी में डुबोकर मार डाला। इसी कारण श्लोक 8 में देवी को "भ्रमरी भ्रमराम्बा च भीमरूपा भयप्रदा" कहा गया है—अर्थात वे भंवरों की माता हैं और दुष्टों के लिए भयंकर रूप धारण करने वाली हैं।
त्रिगुणात्मक स्वरूप (त्रिमूर्ति रूप): यह स्तोत्र देवी के त्रिगुणात्मक रूप—सत्त्व, रज और तम—का अद्भुत संगम है। श्लोक 5 में उन्हें "त्रिगुणात्धात्री" (तीनों गुणों को धारण करने वाली) कहा गया है। एक ओर वे 'शङ्खधारिणी' (शंख धारण करने वाली विष्णु पत्नी लक्ष्मी) हैं, तो दूसरी ओर 'कपालिनी' और 'कालरात्री' (दुष्टों का नाश करने वाली महाकाली) हैं। इसके साथ ही वे 'ब्राह्मी' और 'ज्ञानदात्री' (ज्ञान देने वाली महासरस्वती) भी हैं। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि परब्रह्म की शक्ति एक ही है, जो समय और कार्य के अनुसार अलग-अलग रूप धारण करती है।
नामों का गूढ़ अर्थ और स्तोत्र की फलश्रुति (Benefits)
श्री चंद्रलाम्बा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के 14 श्लोकों में गुंथे हुए 108 नाम मात्र शब्द नहीं हैं, बल्कि ये शक्तिशाली बीज मंत्र हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इन नामों का गान करता है, उसके जीवन में देवी की साक्षात उपस्थिति का संचार होता है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
- दरिद्रता का समूल नाश: श्लोक 14 में सबसे शक्तिशाली घोषणा की गई है — "रजोदारिद्र्यनाशिनी"। रजोगुण से उत्पन्न होने वाले क्लेश, मानसिक अस्थिरता और भयंकर आर्थिक दरिद्रता को यह स्तोत्र जड़ से समाप्त कर देता है। श्लोक 6 में उन्हें "धनधान्यविवर्धिनी" (धन और धान्य को बढ़ाने वाली) कहा गया है।
- रोग और ताप निवारण: मानव जीवन में तीन प्रकार के ताप (दुःख) होते हैं—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक। देवी को "तापत्रयनिवारिणी" (श्लोक 5) कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे साधक को हर प्रकार के शारीरिक रोगों और मानसिक संतापों से मुक्त करती हैं।
- शत्रु और भय पर विजय: जो लोग अकारण भय, तंत्र-मंत्र की बाधाओं या गुप्त शत्रुओं से पीड़ित हैं, उनके लिए माँ का "चामुण्डा मुण्डमथना चण्डिका चक्रधारिणी" (श्लोक 3) रूप एक अभेद्य कवच (Shield) का कार्य करता है। वे दानवों और दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत करती हैं (दानवान्तकरी)।
- ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति: भौतिक सुखों से आगे बढ़कर, देवी अपने भक्तों को आत्मज्ञान प्रदान करती हैं। "ज्ञानदात्री ज्ञानरूपा" (श्लोक 14) और "निर्विकल्पा निराधारी निर्गुणा" (श्लोक 7) जैसे नाम दर्शाते हैं कि वे साधक को माया के बंधनों से निकालकर कैवल्य (मोक्ष) के मार्ग पर ले जाती हैं।
- अखंड सौभाग्य और राजयोग: श्लोक 11 में "राजलक्ष्मी राजभूषा राज्ञी राजसुपूजिता" का पाठ करने से साधक को समाज में उच्च पद, मान-सम्मान, नेतृत्व क्षमता और राजसत्ता (करियर में प्रमोशन) का आशीर्वाद मिलता है।
साधना और अनुष्ठान की विधि (Ritual Method)
इस स्तोत्र की ऊर्जा को जागृत करने के लिए इसे एक विशेष विधि और पवित्रता के साथ पढ़ना चाहिए। जो लोग कर्नाटक के सन्नति क्षेत्र नहीं जा सकते, वे अपने घर के पूजा स्थल पर ही देवी का ध्यान करके पूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं।
- समय और दिशा: इस पाठ के लिए शुक्रवार का दिन, नवरात्रि (विशेष रूप से चैत्र और आश्विन) और दीपावली का समय सबसे श्रेष्ठ है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल या रेशमी आसन पर बैठें।
- ध्यान: माता चंद्रलाम्बा का ध्यान एक ऐसी देवी के रूप में करें, जिनके हाथों में शंख, चक्र, पाश और अंकुश है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है और वे कमल के पुष्प पर विराजमान हैं।
- दीप और नैवेद्य: गाय के शुद्ध घी का एक मुखी या पंचमुखी दीपक प्रज्वलित करें। माँ को लाल या गुलाबी रंग के पुष्प (विशेषकर कमल या गुड़हल) अर्पित करें। भोग में उन्हें मिश्री, पंचामृत, या खीर (पायसम) चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- पाठ की संख्या: सामान्य शांति और सुख के लिए प्रतिदिन 1 बार पाठ करें। यदि कोई विशेष मनोकामना (जैसे कर्ज मुक्ति या रोग निवारण) हो, तो 41 दिनों तक लगातार 11 बार पाठ करने का संकल्प लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)