श्री बृहस्पति पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् २ (Sri Brihaspati Panchavimshati Nama Stotram 2)
Sri Brihaspati Panchavimshati Nama Stotram 2

महत्व (Significance)
श्री बृहस्पति पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् २ एक दुर्लभ और अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसका वर्णन भगवान विष्णु द्वारा नन्दगोप के घर में किया गया है (नन्दगोपगृहासीन विष्णुना कीर्तितानि वै)।
इसमें बृहस्पति देव के 25 दिव्य नामों का समावेश है जो न केवल गुरु ग्रह के दोषों को शांत करते हैं, बल्कि साधक को विश्वव्यापी सम्मान और ज्ञान भी प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए एक वरदान है जो गुरु की कृपा और सुरक्षा चाहते हैं।
लाभ (Benefits)
चिरंजीवी योग: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि जो इसे सुनता या पढ़ता है, वह निस्संदेह दीर्घायु होता है (चिरं जीवेन्न संशयः)।
ग्रह पीड़ा से मुक्ति: इसके नियमित पाठ से बृहस्पति ग्रह द्वारा जनित कोई भी पीड़ा कभी नहीं होती (बृहस्पतिकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति)।
प्रतिकूल परिस्थितियों में रक्षा: यदि ग्रह स्थिति विपरीत भी हो, तो भी भगवान गुरु प्रसन्न होकर रक्षा करते हैं (विपरीतुल्यऽपि भगवान् प्रीतो भवति वै गुरुः)।
सर्वत्र विजय: साधक को 'सर्वजित' (सबको जीतने वाला) और 'सर्वपूजित' (सबके द्वारा पूजित) बनने का आशीर्वाद मिलता है।
पाठ विधि (Chanting Method)
इस स्तोत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
समय: प्रातः काल उठकर (प्रातरुत्थाय) सबसे उत्तम समय है।
एकाग्रता: मन को नियंत्रित (प्रयतः) और एकाग्र (सुसमाहितः) करके पाठ करें।
दिन: गुरुवार को विशेष रूप से पाठ करें।
श्रवण: यदि स्वयं न पढ़ सकें, तो इसे सुनना (यः शृणोति) भी समान रूप से फलदायी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. यह स्तोत्र अन्य बृहस्पति स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?
यह बृहस्पति पञ्चविंशतिनाम स्तोत्र का दूसरा संस्करण है। इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुखारविंद से मानी जाती है, जो इसे और भी पावन बनाती है।
2. क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल गुरुवार को ही करना चाहिए?
इसका पाठ नित्य प्रातः काल करना सर्वश्रेष्ठ है। यदि नित्य संभव न हो, तो कम से कम प्रत्येक गुरुवार को अवश्य करना चाहिए।
3. इस स्तोत्र के पाठ का क्या लाभ है?
इसके पाठ से लंबी आयु (चिरंजीवी) प्राप्त होती है और बृहस्पति ग्रह से संबंधित कोई भी पीड़ा या कष्ट कभी नहीं होता।