श्री भास्कर सप्तकम् (सप्तसप्तिसप्तकम्) – Sri Bhaskara Saptakam | Surya Stotra

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री भास्कर सप्तकम्, जिसे सप्तसप्तिसप्तकम् भी कहा जाता है, भगवान सूर्य की स्तुति में विरचित एक अत्यंत सुंदर और अलंकारिक स्तोत्र है। इसकी रचना श्री आपटीकर ने की है जो संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान एवं स्तोत्रकार थे।
'सप्तसप्ति' शब्द का अर्थ है सात घोड़ों वाला — सूर्य देव का रथ सात दिव्य अश्वों द्वारा खींचा जाता है। ये सात अश्व वास्तव में सात वैदिक छंदों (गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुभ्, अनुष्टुभ् व पंक्ति) का प्रतीक हैं। 'सप्तक' का अर्थ है सात श्लोकों का समूह, जबकि आठवां श्लोक फलश्रुति है।
यह स्तोत्र सूर्य देव को ध्वान्तदन्तिकेसरी (अंधकार रूपी हाथी का सिंह), हिरण्यकान्तिभासुर (स्वर्णिम कांति से देदीप्यमान), कोटिरश्मिभूषित (करोड़ों किरणों से सुशोभित), और विश्वचक्षु (संसार के नेत्र) के रूप में स्तुति करता है।
स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में सूर्य देव के विभिन्न स्वरूपों और गुणों की स्तुति है:
श्लोक 1: सूर्य को अंधकार के विनाशक सिंह, स्वर्णिम कांति वाले, करोड़ों किरणों से युक्त, दिवस के स्वामी, भास्कर और रवि के रूप में वंदना।
श्लोक 2: यक्ष, सिद्ध, किन्नर, तपस्वी और ऋषियों द्वारा सेवित, तपे हुए सोने जैसी आभा वाले, आदि देवता और विश्व के नेत्र सूर्य को नमस्कार।
श्लोक 3: सूर्य ने पृथ्वी की रचना की, उनके तेज से पृथ्वी की रक्षा होती है — ऐसे कश्यप पुत्र रवि की भक्तिपूर्वक उपासना।
श्लोक 4: किरणमाली, सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले), बुद्धिदाता, शक्तिदाता, अक्षर, दिव्य नेत्र, अमृत और विष्णुरूप सूर्य को नमस्कार।
श्लोक 5: सूर्य की किरणों से आकाश प्रकाशित होता है, उनके तेज से सृष्टि पलती है और उनकी दिव्य दीप्ति सर्वदा आनंद प्रदान करती है।
श्लोक 6 (सबसे महत्वपूर्ण): आप अंधकार और रोगों के नाशक हैं — मेरे देह और चित्त के दोषों को भी शीघ्र नष्ट करें। आप शक्ति, धैर्य, बुद्धि और आनंद के दाता हैं।
श्लोक 7: करुणा के सागर, किरणों से युक्त ईश्वर, लोक रक्षक, चक्रवाक पक्षियों को मिलाने वाले और कमलों की शोभा बढ़ाने वाले जगत्पति भास्कर की उपासना।
श्लोक 8 (फलश्रुति): जो मनुष्य भक्तियुक्त हृदय से दिवाकर का स्मरण करते हुए इस सप्तसप्तिसप्तक का नित्य पाठ करता है, उसके अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है और वासरेश्वर रवि उसे सदैव रोगमुक्त रखते हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। सूर्य की पहली किरणों में इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी है।
दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
आसन: लाल या पीले रंग का आसन बिछाएं।
जल अर्पण: पाठ के पश्चात् सूर्य देव को तांबे के पात्र से जल (अर्घ्य) अवश्य दें।
विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी, मकर संक्रांति और छठ पूजा के अवसर पर पाठ का विशेष महत्व है।
संकल्प: आरोग्य प्राप्ति के लिए 7, 21 या 40 दिन तक नियमित पाठ का संकल्प लें।
नैवेद्य: सूर्य देव को गुड़, गेहूं, लाल फूल और लाल चंदन अर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)