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Sri Bala Trishatakshari – श्री बाला त्रिशताक्षरी (300 अक्षरों का महामंत्र)

Sri Bala Trishatakshari – श्री बाला त्रिशताक्षरी (300 अक्षरों का महामंत्र)
॥ श्री बाला त्रिशताक्षरी ॥ ओं ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः सौः क्लीं ऐं नमो बाले त्रिपुरसुन्दरि, हृदयदेवि, शिरोदेवि, शिखादेवि, कवचदेवि, नेत्रदेवि, अस्त्रदेवि, इन्द्रशक्ते, अग्निशक्ते, यमशक्ते, निरृतिशक्ते, वरुणशक्ते, वायुशक्ते, कुबेरशक्ते, ईशानशक्ते, वशिनि, कामेश्वरि, मोदिनि, विमले, अरुणे, जयिनि, सर्वेश्वरि, कौलिनि, अनङ्गकुसुमे, अनङ्गमेखले, अनङ्गमदने, अनङ्गमदनातुरे, अनङ्गरेखे, अनङ्गवेगिनि, अनङ्गाङ्कुशे, अनङ्गमालिनि, असिताङ्गभैरव रुद्रभैरव चण्डभैरव क्रोधभैरव उन्मत्तभैरव कपालभैरव भीषणभैरव संहारभैरव युते, ब्राह्मि, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवि, वाराहि, माहेन्द्रि, चामुण्डे, महालक्ष्मि, साकिनि, राकिणि, लाकिनि, काकिनि, डाकिनि, हाकिनि, याकिनि, गुरुमयि, परमगुरुमयि, परमेष्ठिगुरुमयि, रतिदेवि, प्रीतिदेवि, विजयादेवि, सावरणदेवते बाले परे भट्‍टारिके, नमस्ते नमः सौः क्लीं ऐं ओम् ॥ ॥ इति श्री बाला त्रिशताक्षरी सम्पूर्णम् ॥

श्री बाला त्रिशताक्षरी का परिचय (Introduction)

श्री बाला त्रिशताक्षरी (Sri Bala Trishatakshari) एक अत्यंत शक्तिशाली और दुर्लभ महामंत्र है। 'त्रिशताक्षरी' का अर्थ है 'तीन सौ अक्षरों वाला' (त्रि = तीन, शत = सौ, अक्षरी = अक्षरों वाला)। यह मंत्र लगभग 300 अक्षरों का है और इसमें श्री विद्या परंपरा की समस्त प्रमुख शक्तियों का समावेश है।

यह मंत्र एक प्रकार का सर्वदेवता समावेशी आह्वान है। इसमें बाला त्रिपुरसुन्दरी के साथ-साथ षडंग देवियाँ, अष्ट दिक्पाल शक्तियाँ, अष्ट वशिनी/नित्या देवियाँ, अष्ट अनंग देवियाँ, अष्ट भैरव, अष्ट मातृकाएं, षट् चक्र योगिनियाँ, और गुरु मंडल — सभी का आह्वान एक ही मंत्र में किया गया है।

"ओं ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः सौः क्लीं ऐं नमो बाले त्रिपुरसुन्दरि..."


भावार्थ: ओं! वाग्भव बीज (ऐं), माया बीज (ह्रीं), लक्ष्मी बीज (श्रीं), और बाला बीज (ऐं क्लीं सौः) के साथ, हे बाला त्रिपुरसुन्दरी, आपको नमस्कार!

इस मंत्र की विशेषता यह है कि यह षडंग न्यास (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र) को भी मंत्र के अंदर ही समाहित करता है। साधक जब इस मंत्र का पाठ करता है, तो वह स्वयं ही समस्त न्यासों और आवरण पूजा को संपन्न कर लेता है।

मंत्र में समाहित देवता समूह (Deity Groups)

1. षडंग देवियाँ (Six Limb Deities): हृदयदेवी (हृदय), शिरोदेवी (सिर), शिखादेवी (शिखा), कवचदेवी (कवच), नेत्रदेवी (नेत्र), अस्त्रदेवी (अस्त्र)। ये षडंग न्यास की अधिष्ठात्री हैं और साधक के शरीर की रक्षा करती हैं।

2. अष्ट दिक्पाल शक्तियाँ (Eight Directional Powers): इंद्रशक्ति (पूर्व), अग्निशक्ति (आग्नेय), यमशक्ति (दक्षिण), निरृतिशक्ति (नैऋत्य), वरुणशक्ति (पश्चिम), वायुशक्ति (वायव्य), कुबेरशक्ति (उत्तर), ईशानशक्ति (ईशान)। ये आठों दिशाओं से साधक की रक्षा करती हैं।

3. अष्ट वशिनी/नित्या देवियाँ (Eight Nitya Devis): वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी, कौलिनी। ये श्री चक्र की प्रथम आवरण की देवियाँ हैं और आकर्षण-वशीकरण की शक्ति प्रदान करती हैं।

4. अष्ट अनंग देवियाँ (Eight Ananga Devis): अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, अनंगरेखा, अनंगवेगिनी, अनंगांकुशा, अनंगमालिनी। ये कामदेव (अनंग) की शक्तियाँ हैं और सम्मोहन-आकर्षण प्रदान करती हैं।

5. अष्ट भैरव (Eight Bhairavas): असितांगभैरव, रुद्रभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालभैरव, भीषणभैरव, संहारभैरव। ये शिव के उग्र रूप हैं जो शत्रु नाश और रक्षा करते हैं।

6. अष्ट मातृकाएं (Eight Matrikas): ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, महालक्ष्मी। ये सभी देवताओं की शक्तियाँ हैं।

7. षट् चक्र योगिनियाँ (Chakra Yoginis): डाकिनी (मूलाधार), राकिणी (स्वाधिष्ठान), लाकिनी (मणिपूर), काकिनी (अनाहत), साकिनी (विशुद्ध), हाकिनी (आज्ञा), याकिनी (सहस्रार)। ये कुंडलिनी चक्रों की अधिष्ठात्री हैं।

पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits)

इस त्रिशताक्षरी मंत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  • सर्वदिक् रक्षा: अष्ट दिक्पाल शक्तियों के आह्वान से आठों दिशाओं से सम्पूर्ण रक्षा मिलती है।
  • षडंग रक्षा: षडंग देवियों द्वारा शरीर के छः महत्वपूर्ण अंगों (हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र) की रक्षा।
  • आकर्षण और वशीकरण: वशिनी देवियों और अनंग देवियों के प्रभाव से अद्भुत आकर्षण शक्ति।
  • शत्रु नाश: अष्ट भैरवों की शक्ति से गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का नाश।
  • सर्व सिद्धि: अष्ट मातृकाओं के आशीर्वाद से समस्त कार्यों में सिद्धि।
  • कुंडलिनी जागरण: षट् चक्र योगिनियों के प्रभाव से कुंडलिनी शक्ति का जागरण।
  • गुरु कृपा: गुरुमयि, परमगुरुमयि, परमेष्ठिगुरुमयि — सम्पूर्ण गुरु परंपरा का आशीर्वाद।
  • प्रेम और विजय: रतिदेवी (प्रेम), प्रीतिदेवी (स्नेह), विजयादेवी (विजय) — जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता।

साधना और पाठ विधि (Recitation Method)

इस त्रिशताक्षरी मंत्र की सिद्धि के लिए निम्न विधि से पाठ करें:
1. उत्तम समय
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या काल में पाठ श्रेष्ठ है। एक बार पाठ में लगभग 2-3 मिनट लगते हैं।
2. आसन और दिशा
लाल या सफेद आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्री चक्र या देवी प्रतिमा के समक्ष पाठ करें।
3. पाठ संख्या
नियमित पूजा में 1, 3, या 11 बार पाठ करें। विशेष अनुष्ठान में 108 बार पाठ अत्यंत फलदायी है।
4. नैवेद्य
दूध, मिश्री, खीर, शहद, और ऋतु फल अर्पित करें। लाल और सफेद पुष्प विशेष प्रिय हैं।

विशेष: चूंकि इस मंत्र में षडंग न्यास और आवरण पूजा स्वतः समाहित है, इसलिए यह मंत्र उन साधकों के लिए विशेष उपयोगी है जो जटिल पूजा विधि नहीं जानते।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. त्रिशताक्षरी का अर्थ क्या है?

'त्रिशताक्षरी' का अर्थ है 'तीन सौ अक्षरों वाला' (त्रि = तीन, शत = सौ, अक्षरी = अक्षरों वाला)। यह मंत्र लगभग 300 अक्षरों का है और इसमें विविध देवताओं का समावेश है।

2. इस मंत्र में कौन-कौन सी देवियाँ आह्वानित हैं?

इस मंत्र में अनेक देवी समूह आह्वानित हैं: (1) षडंग देवियाँ (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र), (2) अष्टदिक्पाल शक्तियाँ (इन्द्र से ईशान तक), (3) अष्ट वशिनी/नित्या देवियाँ, (4) अष्ट अनंग देवियाँ, (5) सप्त मातृकाएं, और (6) षट् चक्र योगिनियाँ।

3. अष्ट भैरवों का उल्लेख क्यों है?

अष्ट भैरव (असितांग, रुद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण, संहार) शिव के उग्र रूप हैं जो रक्षा और शत्रु नाश करते हैं। बाला देवी इन अष्ट भैरवों के साथ (युते) विराजमान हैं, जो मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली बनाता है।

4. सप्त मातृकाओं का क्या महत्व है?

ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री (इंद्राणी), और चामुण्डा — ये सप्त मातृकाएं ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, वराह, इंद्र और दुर्गा की शक्तियाँ हैं। इनका आह्वान सर्वतोमुखी रक्षा प्रदान करता है।

5. अनंग देवियाँ कौन हैं?

अनंग देवियाँ कामदेव (अनंग = बिना अंग वाले) से संबंधित आठ शक्तियाँ हैं: अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, अनंगरेखा, अनंगवेगिनी, अनंगांकुशा, और अनंगमालिनी। ये आकर्षण और वशीकरण की देवियाँ हैं।

6. षट् चक्र योगिनियाँ क्या हैं?

डाकिनी, राकिणी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी, हाकिनी, और याकिनी — ये कुंडलिनी योग के षट् चक्रों (मूलाधार से आज्ञा तक) की अधिष्ठात्री योगिनियाँ हैं। इनका आह्वान कुंडलिनी जागरण में सहायक है।

7. गुरुमयि, परमगुरुमयि, परमेष्ठिगुरुमयि का क्या अर्थ है?

ये गुरु परंपरा के तीन स्तर हैं: गुरुमयि (अपने प्रत्यक्ष गुरु का स्वरूप), परमगुरुमयि (गुरु के गुरु का स्वरूप), और परमेष्ठिगुरुमयि (परम गुरु अर्थात आदि गुरु का स्वरूप)। बाला देवी सम्पूर्ण गुरु परंपरा का मूल स्वरूप हैं।

8. इस मंत्र का पाठ कब और कैसे करें?

प्रातःकाल या संध्या काल में पाठ उत्तम है। एक बार सम्पूर्ण पाठ में लगभग 2-3 मिनट लगते हैं। नियमित पूजा में 1, 3, या 11 बार पाठ करें। विशेष अनुष्ठान में 108 बार पाठ करें।

9. क्या यह मंत्र बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

यह एक स्तोत्र/नाम मंत्र है, गुप्त बीज मंत्र नहीं। कोई भी भक्त श्रद्धापूर्वक इसका पाठ कर सकता है। हालांकि, गुरु कृपा से पाठ अधिक फलदायी होता है।

10. इस मंत्र के मुख्य लाभ क्या हैं?

यह मंत्र सर्वसमावेशी है। इसके पाठ से: (1) सभी दिशाओं से रक्षा (दिक्पाल शक्तियाँ), (2) आकर्षण और वशीकरण (अनंग देवियाँ), (3) शत्रु नाश (भैरव), (4) चक्र जागरण (योगिनियाँ), (5) दिव्य ज्ञान (गुरु मंडल), और (6) सर्व सिद्धि (मातृकाएं) प्राप्त होती है।