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Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री बालाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ (108 दिव्य नाम)

Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री बालाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २ (108 दिव्य नाम)
॥ श्री बालाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (द्वितीय) ॥ श्रीबाला श्रीमहादेवी श्रीमत्पञ्चासनेश्वरी । शिववामाङ्गसम्भूता शिवमानसहंसिनी ॥ १ ॥ त्रिस्था त्रिनेत्रा त्रिगुणा त्रिमूर्तिवशवर्तिनी । त्रिजन्मपापसंहर्त्री त्रियम्बककुटम्बिनी ॥ २ ॥ बालार्ककोटिसङ्काशा नीलालकलसत्कचा । फालस्थहेमतिलका लोलमौक्तिकनासिका ॥ ३ ॥ पूर्णचन्द्रानना चैव स्वर्णताटङ्कशोभिता । हरिणीनेत्रसाकारकरुणापूर्णलोचना ॥ ४ ॥ दाडिमीबीजरदना बिम्बोष्ठी मन्दहासिनी । शङ्खग्रीवा चतुर्हस्ता कुचपङ्कजकुड्मला ॥ ५ ॥ ग्रैवेयाङ्गदमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा । वटपत्रोदरा चैव निर्मला घनमण्डिता ॥ ६ ॥ मन्दावलोकिनी मध्या कुसुम्भवदनोज्ज्वला । तप्तकाञ्चनकान्त्याढ्या हेमभूषितविग्रहा ॥ ७ ॥ माणिक्यमुकुरादर्शजानुद्वयविराजिता । कामतूणीरजघना कामप्रेष्ठगतल्पगा ॥ ८ ॥ रक्ताब्जपादयुगला क्वणन्माणिक्यनूपुरा । वासवादिदिशानाथपूजिताङ्घ्रिसरोरुहा ॥ ९ ॥ वराभयस्फाटिकाक्षमालापुस्तकधारिणी । स्वर्णकङ्कणज्वालाभकराङ्गुष्ठविराजिता ॥ १० ॥ सर्वाभरणभूषाढ्या सर्वावयवसुन्दरी । ऐङ्काररूपा ऐङ्कारी ऐश्वर्यफलदायिनी ॥ ११ ॥ क्लीङ्काररूपा क्लीङ्कारी क्लुप्तब्रह्माण्डमण्डला । सौःकाररूपा सौःकारी सौन्दर्यगुणसम्युता ॥ १२ ॥ सचामररतीन्द्राणीसव्यदक्षिणसेविता । बिन्दुत्रिकोणषट्कोणवृत्ताष्टदलसम्युता ॥ १३ ॥ सत्यादिलोकपालान्तदेव्यावरणसंवृता । ओड्याणपीठनिलया ओजस्तेजःस्वरूपिणी ॥ १४ ॥ अनङ्गपीठनिलया कामितार्थफलप्रदा । जालन्धरमहापीठा जानकीनाथसोदरी ॥ १५ ॥ पूर्णागिरिपीठगता पूर्णायुः सुप्रदायिनी । मन्त्रमूर्तिर्महायोगा महावेगा महाबला ॥ १६ ॥ महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महादेवमनोहरी । कीर्तियुक्ता कीर्तिधरा कीर्तिदा कीर्तिवैभवा ॥ १७ ॥ व्याधिशैलव्यूहवज्रा यमवृक्षकुठारिका । वरमूर्तिगृहावासा परमार्थस्वरूपिणी ॥ १८ ॥ कृपानिधिः कृपापूरा कृतार्थफलदायिनी । अष्टत्रिंशत्कलामूर्तिः चतुःषष्टिकलात्मिका ॥ १९ ॥ चतुरङ्गबलादात्री बिन्दुनादस्वरूपिणी । दशाब्दवयसोपेता दिविपूज्या शिवाभिधा ॥ २० ॥ आगमारण्यमायूरी आदिमध्यान्तवर्जिता । कदम्बवनसम्पन्ना सर्वदोषविनाशिनी ॥ २१ ॥ सामगानप्रिया ध्येया ध्यानसिद्धाभिवन्दिता । ज्ञानमूर्तिर्ज्ञानरूपा ज्ञानदा भयसंहरा ॥ २२ ॥ तत्त्वज्ञाना तत्त्वरूपा तत्त्वमय्याश्रितावनी । दीर्घायुर्विजयारोग्यपुत्रपौत्रप्रदायिनी ॥ २३ ॥ मन्दस्मितमुखाम्भोजा मङ्गलप्रदमङ्गला । वरदाभयमुद्राढ्या बालात्रिपुरसुन्दरी ॥ २४ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ बालात्रिपुरसुन्दर्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । पठनान्मननाद्ध्यानात्सर्वमङ्गलकारकम् ॥ २५ ॥ ॥ इति श्री बालाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बालाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् का परिचय (Introduction)

श्री बालाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् (Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram) बाला त्रिपुरसुन्दरी के 108 पवित्र नामों का संग्रह है। 'अष्टोत्तर' का अर्थ है 108 (अष्ट = आठ + उत्तर = अधिक), और 'शतनाम' का अर्थ है 'सौ नाम'। यह स्तोत्र देवी के दिव्य गुणों, स्वरूप, और शक्तियों का विस्तृत वर्णन करता है।

यह स्तोत्र विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बाला देवी के शारीरिक सौंदर्य (केश से लेकर चरण तक), आध्यात्मिक स्वरूप (त्र्यक्षरी बीज मंत्र), तांत्रिक पहचान (शक्ति पीठों का उल्लेख), और दार्शनिक तत्त्व (तत्त्वज्ञाना, परमार्थस्वरूपिणी) — सभी का समावेश है।

"ऐङ्काररूपा ऐङ्कारी ऐश्वर्यफलदायिनी । क्लीङ्काररूपा क्लीङ्कारी... सौःकाररूपा सौःकारी..."


भावार्थ: देवी 'ऐं' बीज का स्वरूप हैं और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। वे 'क्लीं' बीज का स्वरूप हैं और ब्रह्मांड की रचयिता हैं। वे 'सौः' बीज का स्वरूप हैं और सौंदर्य गुणों से युक्त हैं।

यह स्तोत्र दशाब्दवयसोपेता (दस वर्ष से कम आयु वाली) के रूप में बाला को वर्णित करता है, जो उनकी शाश्वत बाल्यावस्था और दिव्य पवित्रता का प्रतीक है। साथ ही, चार प्रमुख शक्ति पीठों — ओड्याण, अनंग, जालंधर, और पूर्णागिरि — का उल्लेख इस स्तोत्र की तांत्रिक प्रामाणिकता को सिद्ध करता है।

108 नामों की विशेषताएं (Key Features of 108 Names)

1. शारीरिक सौंदर्य वर्णन (Physical Description): श्लोक 3-10 में देवी के अंग-प्रत्यंग का अद्भुत वर्णन है — बालार्ककोटिसङ्काशा (करोड़ों उगते सूर्यों के समान तेज), नीलालकलसत्कचा (नीले केश), पूर्णचन्द्रानना (पूर्ण चंद्र जैसा मुख), दाडिमीबीजरदना (अनार के बीज जैसे दांत), बिम्बोष्ठी (लाल होंठ), शङ्खग्रीवा (शंख जैसी गर्दन)।

2. त्र्यक्षरी बीज स्वरूप (Three-Syllable Identity): श्लोक 11-12 में बाला के तीन मूल बीज मंत्रों का वर्णन है — ऐं (वाग्भव - ज्ञान), क्लीं (कामराज - आकर्षण), और सौः (शक्ति - परा शक्ति)। यह त्र्यक्षरी मंत्र श्री विद्या साधना का आधार है।

3. श्री चक्र स्वरूप: श्लोक 13 में श्री चक्र के तत्वों का उल्लेख है — बिन्दु, त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त, और अष्टदल। यह देवी के यंत्र स्वरूप को दर्शाता है।

4. शक्ति पीठ संबंध: चार महापीठों — ओड्याण (उड्डियान), अनंग, जालंधर, और पूर्णागिरि — का उल्लेख इस स्तोत्र की तांत्रिक परंपरा को प्रमाणित करता है।

5. फलश्रुति (Benefits): अंतिम श्लोक में स्पष्ट वर्णन है — इस स्तोत्र के पाठ, मनन, और ध्यान से सर्वमंगल (सभी प्रकार के शुभ फल) की प्राप्ति होती है।

पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं (स्तोत्र के नामों से प्रमाणित):

  • ऐश्वर्य प्राप्ति: 'ऐश्वर्यफलदायिनी' — देवी ऐश्वर्य (धन, वैभव, सम्मान) का फल प्रदान करती हैं।
  • दीर्घायु और आरोग्य: 'पूर्णायुः सुप्रदायिनी', 'दीर्घायुर्विजयारोग्यपुत्रपौत्रप्रदायिनी' — पूर्ण आयु, विजय, आरोग्य, और पुत्र-पौत्र सुख मिलता है।
  • रोग नाश: 'व्याधिशैलव्यूहवज्रा' — देवी व्याधियों (रोगों) के पहाड़ को वज्र की तरह तोड़ने वाली हैं।
  • यम भय निवारण: 'यमवृक्षकुठारिका' — यम (मृत्यु) रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी।
  • मनोकामना पूर्ति: 'कामितार्थफलप्रदा' — इच्छित फलों को प्रदान करने वाली।
  • ज्ञान और सिद्धि: 'ज्ञानमूर्तिर्ज्ञानरूपा ज्ञानदा', 'महासिद्धिः' — ज्ञान और सिद्धि प्रदान करती हैं।
  • कृपा प्राप्ति: 'कृपानिधिः कृपापूरा कृतार्थफलदायिनी' — कृपा का भंडार और कृतार्थ करने वाली।
  • भय नाश: 'भयसंहरा' — सभी प्रकार के भय का नाश करती हैं।
  • सर्वमंगल: 'मङ्गलप्रदमङ्गला', 'सर्वमङ्गलकारकम्' — सभी प्रकार के मंगल का आशीर्वाद।
  • दोष निवारण: 'सर्वदोषविनाशिनी' — सभी दोषों का विनाश करने वाली।

साधना और पाठ विधि (Recitation Method)

इस अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र की सिद्धि के लिए निम्न विधि से पाठ करें:
1. उत्तम समय
प्रातःकाल (सूर्योदय) या संध्या काल में पाठ श्रेष्ठ है। शुक्रवार, नवरात्रि, पूर्णिमा, और अमावस्या विशेष फलदायी हैं।
2. आसन और दिशा
लाल या सफेद आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। देवी की प्रतिमा या श्री चक्र के समक्ष पाठ करें।
3. पाठ संख्या
नियमित पूजा में प्रतिदिन 1 बार पाठ पर्याप्त है। विशेष अनुष्ठान में 9, 11, या 21 बार पाठ करें।
4. नैवेद्य
माँ बाला को दूध, मिश्री, शहद, खीर, और फलों का भोग अर्पित करें। लाल पुष्प (गुड़हल, कमल, गुलाब) चढ़ाएं।

विशेष प्रयोग: 108 नामों का अर्चन (पुष्प या अक्षत से) करने पर प्रत्येक नाम के साथ देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह विधि नवरात्रि में अत्यंत फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अष्टोत्तर शतनाम का अर्थ क्या है?

'अष्टोत्तर' का अर्थ है '108' (100 + 8), और 'शतनाम' का अर्थ है 'सौ नाम'। अतः अष्टोत्तर शतनाम का अर्थ है 'एक सौ आठ पवित्र नाम'। यह देवी के विभिन्न गुणों और स्वरूपों का वर्णन करने वाला स्तोत्र है।

2. यह स्तोत्र '2' क्यों है? '1' कहाँ है?

बाला त्रिपुरसुन्दरी के एक से अधिक अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र विभिन्न ग्रंथों में प्राप्त होते हैं। यह स्तोत्र दूसरे पाठांतर से लिया गया है, जो प्रथम स्तोत्र से भिन्न नामों और क्रम से युक्त है।

3. इस स्तोत्र में किन शक्ति पीठों का उल्लेख है?

इस स्तोत्र में तीन प्रमुख शाक्त पीठों का उल्लेख है: (1) ओड्याण पीठ (श्लोक 14), (2) अनंग पीठ (श्लोक 15), (3) जालंधर पीठ (श्लोक 15), और (4) पूर्णागिरि पीठ (श्लोक 16)। ये चारों शक्ति उपासना के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

4. बाला को 'दशाब्दवयसोपेता' क्यों कहा गया है?

'दशाब्दवयसोपेता' का अर्थ है 'दस वर्ष से कम आयु वाली'। बाला त्रिपुरसुन्दरी सदा 9 वर्ष की कन्या के रूप में चित्रित की जाती हैं। यह उनकी शाश्वत बाल्यावस्था और पवित्रता का प्रतीक है।

5. ऐंकारी, क्लींकारी, सौःकारी का क्या अर्थ है?

ये बाला के तीन मूल बीज मंत्रों के स्वरूप हैं: 'ऐंकारी' = 'ऐं' बीज (वाग्भव - ज्ञान की देवी), 'क्लींकारी' = 'क्लीं' बीज (कामराज - आकर्षण), 'सौःकारी' = 'सौः' बीज (शक्ति - परा शक्ति)। ये त्र्यक्षरी मंत्र बाला साधना का मूल है।

6. इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक में स्पष्ट फलश्रुति है — 'पठनान्मननाद्ध्यानात्सर्वमङ्गलकारकम्' अर्थात इसके पाठ, मनन और ध्यान से सर्वमंगल (सभी प्रकार के शुभ फल) की प्राप्ति होती है। इसमें वाक सिद्धि, ऐश्वर्य, विजय, आरोग्य और पुत्र-पौत्र सुख शामिल हैं।

7. क्या इस स्तोत्र का पाठ बिना दीक्षा के कर सकते हैं?

हाँ, यह एक नाम स्तोत्र है, गुप्त मंत्र नहीं। कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक इसका पाठ कर सकता है। दीक्षा से प्रभाव तीव्र होता है, परन्तु यह अनिवार्य नहीं है।

8. 'चतुरङ्गबलादात्री' का क्या अर्थ है?

'चतुरङ्गबल' का अर्थ है 'चतुर्विध सेना' (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल)। 'आदात्री' का अर्थ है 'प्रदान करने वाली'। अतः इस नाम का अर्थ है — देवी जो भक्त को सम्पूर्ण शक्ति और सेना (संसाधन) प्रदान करती हैं।

9. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

प्रातःकाल या संध्या काल में पाठ उत्तम है। शुक्रवार, नवरात्रि, और पूर्णिमा विशेष फलदायी हैं। नियमित पाठ के लिए प्रतिदिन किसी भी समय कर सकते हैं।

10. 'कदम्बवनसम्पन्ना' का क्या महत्व है?

कदम्ब वन (Kadamba Forest) देवी ललिता और बाला का निवास स्थान माना जाता है। श्री विद्या परंपरा में श्री चक्र (Meru) को कदम्ब वन के मध्य में स्थित बताया गया है। यह नाम देवी के इस दिव्य निवास से संबंध दर्शाता है।