Sri Bagalamukhi Stavarajah (Atharvana Rahasya) – श्री बगलामुखी स्तवराजः

श्री बगलामुखी स्तवराजः — परिचय एवं तांत्रिक रहस्य (Introduction)
श्री बगलामुखी स्तवराजः (Sri Bagalamukhi Stavarajah) तांत्रिक वाङ्मय के अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ 'अथर्वण रहस्य' (Atharvana Rahasya) से उद्धृत है। संस्कृत में 'स्तवराज' का अर्थ है "स्तोत्रों का राजा" (King of Stotras)। इसे स्तोत्रों का राजा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल एक स्तुति नहीं है; इसमें गुरु वंदना, ३६ अक्षरी मूल मंत्र का उद्धार, षडंग न्यास, और बगलामुखी यंत्र की संपूर्ण आवरण पूजा एक साथ गुंथी हुई है।
गुरु वंदना से आरंभ: इस स्तोत्र की शुरुआत (श्लोक 1-2) साक्षात शिव और गुरु की वंदना से होती है— "वन्दे सकलसन्देहदावपावकमीश्वरम्" (मैं उन गुरु रूपी ईश्वर की वंदना करता हूँ जो भक्तों के समस्त संदेह रूपी जंगल को अग्नि के समान जला देते हैं)। तंत्र शास्त्र का यह अटल नियम है कि बिना गुरु की कृपा के महाविद्या की साधना फलीभूत नहीं होती, इसीलिए इस स्तवराज का आरंभ गुरु तत्व के स्मरण से किया गया है।
मंत्रोद्धार का रहस्य: श्लोक 3 से 5 तक ध्यान देने पर ज्ञात होता है कि इसमें माँ पीताम्बरा के जगत्-प्रसिद्ध ३६ अक्षरी मंत्र (ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां...) का एक-एक शब्द श्लोकों के रूप में पिरोया गया है। जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे स्वतः ही मूल मंत्र के जप का पुण्य प्राप्त हो जाता है।
यंत्र पूजा और आवरण देवताओं का रहस्य (Yantra & Avarana Puja)
इस स्तवराज की सबसे महान तांत्रिक विशेषता यह है कि यह साधक को मानसिक रूप से 'श्रीयंत्र (बगलामुखी यंत्र)' की पूजा करवा देता है। श्लोक 14 से 33 तक यंत्र के विभिन्न आवरणों (Layers) और उनमें निवास करने वाली शक्तियों का आवाहन किया गया है:
- ✦त्रिकोण (Triangle): श्लोक 17-18 के अनुसार, यंत्र के मध्य त्रिकोण में माँ बगलामुखी के साथ 'क्रोधिनी', 'स्तम्भिनी' और 'धारिणी' शक्तियों का पूजन किया जाता है।
- ✦षट्कोण (Hexagram): श्लोक 20-21 में षट्कोण के अग्र भागों पर भगरूपिणी, भगोदया, भगनिपातिनी आदि शक्तियों की स्थापना की गई है।
- ✦अष्टदल कमल (8 Petals): श्लोक 23-25 में अष्टदल पर ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि अष्टमातृकाओं और असितांग, रुरु, चण्ड आदि अष्टभैरवों का आवाहन है।
- ✦षोडशदल कमल (16 Petals): श्लोक 26-27 में 16 दलों पर मंगला, स्तम्भिनी, जृम्भिणी, मोहिनी जैसी सोलह शक्तियों का रक्षा हेतु आवाहन किया गया है।
- ✦भूपुर (Outer Square): श्लोक 28-29 में यंत्र के सबसे बाहरी आवरण में इन्द्र, यम, वरुण आदि दश दिक्पालों और उनके अस्त्र-शस्त्रों (वज्र, शक्ति, दण्ड) की स्थापना है।
श्लोक 34 में स्पष्ट उद्घोष है— "यः पठेत् सकृदप्येतत् सोऽर्चाफलमवाप्नुयात्" अर्थात् जो व्यक्ति एक बार भी इस स्तोत्र को पढ़ लेता है, उसे यंत्र की संपूर्ण और विधिवत तांत्रिक पूजा (अर्चा) करने का फल मिल जाता है।
स्तवराज के अमोघ लाभ — फलश्रुति (Benefits of Stavaraja)
इस स्तोत्र के अंतिम भाग (श्लोक 34 से 41) में उन चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन है जो साधक को प्राप्त होती हैं:
- ✦राज-वशीकरण: (श्लोक 35) "राजानो राजपत्न्यश्च पौरजानपदास्तथा। वशगास्तस्य जायन्ते..." — बड़े-बड़े राजा, शासक, प्रशासक और नगर के लोग साधक के सेवक के समान वशीभूत हो जाते हैं।
- ✦विद्वानों का वाक्-स्तम्भन: (श्लोक 36) "गुरुकल्पाश्च विबुधा मूकतां यान्ति तेऽग्रतः" — बृहस्पति के समान श्रेष्ठ विद्वान और तर्कशास्त्री भी इस साधक के सामने आकर गूँगे (मूक) हो जाते हैं। कोर्ट-केस के लिए यह अमोघ है।
- ✦स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति: (श्लोक 36) "स्थिरा भवति तद्गेहे चपलापि हरिप्रिया" — माता लक्ष्मी (हरिप्रिया), जिनका स्वभाव चंचल (चपला) है, वे भी साधक के घर में स्थिर होकर निवास करने लगती हैं।
- ✦त्रैलोक्य वशीकरण (एक लाख जप का फल): (श्लोक 37) जो साधक पीले वस्त्र पहनकर, नियमपूर्वक हल्दी की माला से इस पैताम्बर मंत्र का एक लाख बार (लक्षसङ्ख्यं) जप करता है, तीनों लोक उसके वश में हो जाते हैं।
- ✦मारण एवं उच्चाटन: (श्लोक 40) "विदारय विचूर्णय ग्लपय शोषय स्तम्भय" — यह स्तोत्र शत्रुओं को विदीर्ण करने, कुचलने, सुखाने और पूरी तरह जड़वत करने की प्रार्थना है।
पाठ विधि एवं तांत्रिक सावधानियां (Ritual Method & Precautions)
चूँकि यह अथर्वण रहस्य (अथर्ववेद की तांत्रिक शाखा) से संबंधित है, इसलिए इसका अनुष्ठान पूर्ण सात्विकता और तांत्रिक नियमों के साथ होना चाहिए।
दैनिक पाठ और पुरश्चरण की विधि
- पीताम्बर धारण: श्लोक 37 में स्पष्ट निर्देश है "पीताम्बराङ्गवसनो"— साधक को साधना के समय केवल पीले वस्त्र (धोती/साड़ी) ही धारण करने चाहिए।
- हल्दी की माला: "हरिद्रा-मालां दधद्भवति" — यदि इस स्तोत्र के साथ मूल मंत्र का जप करना हो, तो केवल हरिद्रा (हल्दी) की माला का ही उपयोग करना चाहिए।
- महारुद्र को आहुति: स्तोत्र के अंत में "ॐ नमो भगवते महारुद्राय हुं फट् स्वाहा" आया है। भगवान शिव (महारुद्र) ही माँ बगलामुखी के भैरव (रक्षक) हैं। अतः पाठ के अंत में महारुद्र को प्रणाम कर इस स्तोत्र की ऊर्जा को सुरक्षित (Seal) किया जाता है।
सावधानियां
बिना गुरु दीक्षा के 1 लाख पाठ का अनुष्ठान (पुरश्चरण) न करें। सामान्य संकट निवृत्ति और मुकदमे में जीत के लिए नित्य 1, 3 या 11 पाठ शुद्ध भावना से किए जा सकते हैं। इस स्तोत्र का प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष या सज्जन व्यक्ति को हानि पहुँचाने के लिए नहीं करना चाहिए, अन्यथा महाविद्या का भयंकर कोप सहना पड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)