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Sri Bagalamukhi Stavarajah (Atharvana Rahasya) – श्री बगलामुखी स्तवराजः

Sri Bagalamukhi Stavarajah (Atharvana Rahasya) – श्री बगलामुखी स्तवराजः
॥ श्रीबगलामुखीस्तवराजः ॥ वन्दे सकलसन्देहदावपावकमीश्वरम् । करुणावरुणावासं भक्तकल्पतरुं गुरुम् ॥ १॥ उल्लसत्पीतविद्योति विद्योतित तनुत्रयम् । निगमागमसर्वस्वमीडेऽहं तन्महन्महः ॥ २॥ ॐ पूर्वं स्थिरमायां च बगलामुखी सर्वतः । दुष्टानां वाचमुच्चार्य मुखं पदं तथोद्धरेत् ॥ ३॥ स्तम्भयेति ततो जिह्वां कीलयेति समुद्धरेत् । बुद्धिं विनाशयेति पदं स्थिरमायामनुस्मरेत् ॥ ४॥ प्रणवं वह्निजाया चेत्येव पैताम्बरो मनुः । पातु मां सर्वदा सर्वं निग्रहानुग्रहक्षमः ॥ ५॥ कण्ठं नारद ऋषिः पातु पङ्क्तिछन्दोऽवतान्मुखम् । पीताम्बरा देवता तु हृन्मध्यमवतान्मम ॥ ६॥ हली बीजं स्तनयोर्मेऽव्यात् स्वाहा शक्तिश्च दन्तयोः । स कीलकं तथा गुह्ये विनियोगोऽवताद्वपुः ॥ ७॥ षड्-दीर्घभाजा बीजेन व्यासोऽव्यान्मे करादिकम् । द्विपञ्जपञ्च नन्देषु दशभिर्मन्त्रवर्णकैः ॥ ८॥ षडङ्गकल्पना पातु षडङ्गानि ह्यनुक्रमात् । ऐं विद्यातत्त्वं क्लीं मायातत्त्वं सौश्च शिवात्मकम् ॥ ९॥ तत्त्वत्रयं सं बीजं च मूलं हृत्कण्ठं मध्यगः । सुधाब्धौ हेमभूरूढचम्पकोद्यानमध्यतः ॥ १०॥ गारुडोत्पलनिर्व्यूढस्वर्णसिंहासनोपरि । स्वर्णपङ्कजसंविष्टां त्रिनेत्रां शशिशेखराम् ॥ ११॥ पीतालङ्कारवसनां मल्लीचन्दनशोभिताम् । सव्याभां पञ्चशाखायां वज्रजिह्वां च बिभ्रतीम् ॥ १२॥ मुद्गरं नागपाशं च दक्षिणाभ्यां मदालसाम् । भक्तारिविग्रहोद्योगप्रगल्भां बगलामुखीम् ॥ १३॥ ध्यायमानस्य मे पातु शास्त्रवोद्वेषणे भृशम् । भूकलादलदिक्पत्रषट्कोणं त्र्यस्त्रबैन्दुकम् ॥ १४॥ यन्त्रं पैताम्बरं पातु सा मां पायादविग्रहा । आधारशक्तिमारभ्य ज्ञानात्मान्तास्तु शक्तयः ॥ १५॥ पीठाद्याः पान्तु पीठेऽत्रं प्रथमं मां च रक्षतु । शान्तिशङ्खविशेषात्मशक्तिभूतानि पान्तु माम् ॥ १६॥ आवाहनाद्याः पञ्चापि मुद्राश्च सुमनोजलैः । त्रिकोणमध्यमारभ्य पूजिता बगलामुखी ॥ १७॥ क्रोधिनी स्तम्भिनी चापि धारिण्यश्चापि मध्यगाः । ओजः पूषादिपीठानि कोणाग्रेषु स्थितानि वै ॥ १८॥ त्रिकोण बाह्यतः सिद्धनाथाद्या गुरवस्तथा । सिद्धनाथः सिद्धानन्दनाथः सिद्धपरमेष्ठि हि ॥ १९॥ नाथः सिद्धः श्रीकण्ठश्च नाथः सिद्धचतुष्टयम् । पातु मामथ षट्कोणे सुभगा भगरूपिणी ॥ २०॥ भगोदया च भगनिपातिनी भगमालिनी । भगवाहा च मां पातु षट्कोणाग्रेषु च क्रमात् ॥ २१॥ त्वगात्मा शोणितात्मा च मांसात्मा मेदसात्मकः । रूपात्मा परमात्मा च पातु मां स्थिरविग्रहा ॥ २२॥ अष्टपत्रेषु मूलेषु ब्राह्मी माहेश्वरी तथा । कौमारी वैष्णवी वाराहीन्द्राणी च तथा पुनः ॥ २३॥ चामुण्डा च महालक्ष्मीस्तत्र मध्ये पुनर्जया । विजया च जयाम्बा च राजिता जृम्भिणी तथा ॥ २४॥ स्तम्भिनी मोहिनी वश्याऽकर्षिण्यथ तदग्रके । असिताङ्गो रुरुश्चण्डः क्रौधोन्मत्तकपालिनः । भीषणाश्चापि संहार एते रक्षन्तु मां सदा ॥ २५॥ ततः षोडशपत्रेषु मङ्गला स्तम्भिनी तथा । जृम्भिणी मोहिनी वश्या ज्वाला सिंही बलाहका ॥ २६॥ भूधरा कल्मषा धात्री कन्यका कालकर्षिणी । भान्तिका मन्दगमना भोगस्था भावकेति च ॥ २७॥ पातु मामथ भूसद्म दशदिक्षु दिगीश्वराः । इन्द्रोऽनलो यमो रक्षो वरुणो मारुतः शशिः ॥ २८॥ ईशोऽनन्तः स्वयम्भूश्च दशैते पान्तु मे वपुः । वज्रशक्तिर्दण्डखड्गौ पाशाङ्कुशगदाः क्रमात् । शूलं चक्रं सरोजं च तत्तच्छस्त्राणि पान्तु माम् ॥ २९॥ अथ च पूर्वादि चतुर्दिशासु परतः क्रमात् । पातु विघ्नेशबटुकौ योगिनी क्षेत्रपालकः ॥ ३०॥ गुरुत्रयं त्रिरेखासु पातु मे वपुरञ्जसा । पुनः पीताम्बरा पातु उपचारैः प्रपूजिता ॥ ३१॥ साङ्गावरणशक्तिश्च जयश्रीः पातु सर्वदा । वलयं बटुकादिभ्यो रक्षां कुर्वन्तु मे सदा ॥ ३२॥ शक्तयः साधका वीराः पातु मे देवता इमाः । इत्यर्चाक्रमतः प्रोक्तं स्तोत्रं पैताम्बरं परम् ॥ ३३॥ यः पठेत् सकृदप्येतत् सोऽर्चाफलमवाप्नुयात् । सर्वथा कारयेत् क्षिप्रं प्रपद्यन्ते गदातुरान् ॥ ३४॥ राजानो राजपत्न्यश्च पौरजानपदास्तथा । वशगास्तस्य जायन्ते सततं सेवका इव ॥ ३५॥ गुरुकल्पाश्च विबुधा मूकतां यान्ति तेऽग्रतः । स्थिरा भवति तद्गेहे चपलापि हरिप्रिया ॥ ३६॥ पीताम्बराङ्गवसनो यदि लक्षसङ्ख्यं पैताम्बरं मनुममुं प्रजपेन्नरो यः । हेमी सकृन्नियमवान् विधिना हरिद्रा- मालां दधद्भवति तद्वशगा त्रिलोकी ॥ ३७॥ भवानि बगलामुखि त्रिदशकल्पवल्लि प्रभो कृपाजलनिधे तव चरणधूतबाधाखिलः । सुरासुरनरादिकसकलभक्तभाग्यप्रदे त्वदङ्घ्रिसरसीरुहद्वयमहं तु ध्याये सदा ॥ ३८॥ त्वमस्य जगतां जनिस्थितिविनाशबीजं निज प्रकाशबहुलद्युतिर्भवति भक्तहृन्मध्यगा । त्रयीमनु सुपूजिता हरिहरादि वृन्दारकै- रनुक्षणमनुक्षणं मयि शिवे क्षणं वीक्ष्यताम् ॥ ३९॥ शिवे तव तनूमहं हरिहराद्यगम्यां परां निखिलतापप्रत्यूहहृदयाभावयुक्तां स्मरे । विदारय विचूर्णय ग्लपय शोषय स्तम्भय प्रणोदय विरोधय प्रविलय प्रबद्धारिणाम् ॥ ४०॥ पार्वति कृपालसन्मयि कटाक्षपातं मना- गनाकुलतया क्षणं क्षिप विपक्षसंक्षोभिणि । यदीक्षणपथं गतः सकृदपि प्रभुः कश्चन स्फुटं मम वशंवदो भवतु तेन पीताम्बरे ॥ ४१॥ ॐ नमो भगवते महारुद्राय हुं फट् स्वाहा । ॥ इति अथर्वणरहस्यान्तर्गतः श्रीबगलामुखीस्तवराजः समाप्तः ॥

श्री बगलामुखी स्तवराजः — परिचय एवं तांत्रिक रहस्य (Introduction)

श्री बगलामुखी स्तवराजः (Sri Bagalamukhi Stavarajah) तांत्रिक वाङ्मय के अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ 'अथर्वण रहस्य' (Atharvana Rahasya) से उद्धृत है। संस्कृत में 'स्तवराज' का अर्थ है "स्तोत्रों का राजा" (King of Stotras)। इसे स्तोत्रों का राजा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल एक स्तुति नहीं है; इसमें गुरु वंदना, ३६ अक्षरी मूल मंत्र का उद्धार, षडंग न्यास, और बगलामुखी यंत्र की संपूर्ण आवरण पूजा एक साथ गुंथी हुई है।

गुरु वंदना से आरंभ: इस स्तोत्र की शुरुआत (श्लोक 1-2) साक्षात शिव और गुरु की वंदना से होती है— "वन्दे सकलसन्देहदावपावकमीश्वरम्" (मैं उन गुरु रूपी ईश्वर की वंदना करता हूँ जो भक्तों के समस्त संदेह रूपी जंगल को अग्नि के समान जला देते हैं)। तंत्र शास्त्र का यह अटल नियम है कि बिना गुरु की कृपा के महाविद्या की साधना फलीभूत नहीं होती, इसीलिए इस स्तवराज का आरंभ गुरु तत्व के स्मरण से किया गया है।

मंत्रोद्धार का रहस्य: श्लोक 3 से 5 तक ध्यान देने पर ज्ञात होता है कि इसमें माँ पीताम्बरा के जगत्-प्रसिद्ध ३६ अक्षरी मंत्र (ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां...) का एक-एक शब्द श्लोकों के रूप में पिरोया गया है। जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे स्वतः ही मूल मंत्र के जप का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

यंत्र पूजा और आवरण देवताओं का रहस्य (Yantra & Avarana Puja)

इस स्तवराज की सबसे महान तांत्रिक विशेषता यह है कि यह साधक को मानसिक रूप से 'श्रीयंत्र (बगलामुखी यंत्र)' की पूजा करवा देता है। श्लोक 14 से 33 तक यंत्र के विभिन्न आवरणों (Layers) और उनमें निवास करने वाली शक्तियों का आवाहन किया गया है:

  • त्रिकोण (Triangle): श्लोक 17-18 के अनुसार, यंत्र के मध्य त्रिकोण में माँ बगलामुखी के साथ 'क्रोधिनी', 'स्तम्भिनी' और 'धारिणी' शक्तियों का पूजन किया जाता है।
  • षट्कोण (Hexagram): श्लोक 20-21 में षट्कोण के अग्र भागों पर भगरूपिणी, भगोदया, भगनिपातिनी आदि शक्तियों की स्थापना की गई है।
  • अष्टदल कमल (8 Petals): श्लोक 23-25 में अष्टदल पर ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि अष्टमातृकाओं और असितांग, रुरु, चण्ड आदि अष्टभैरवों का आवाहन है।
  • षोडशदल कमल (16 Petals): श्लोक 26-27 में 16 दलों पर मंगला, स्तम्भिनी, जृम्भिणी, मोहिनी जैसी सोलह शक्तियों का रक्षा हेतु आवाहन किया गया है।
  • भूपुर (Outer Square): श्लोक 28-29 में यंत्र के सबसे बाहरी आवरण में इन्द्र, यम, वरुण आदि दश दिक्पालों और उनके अस्त्र-शस्त्रों (वज्र, शक्ति, दण्ड) की स्थापना है।

श्लोक 34 में स्पष्ट उद्घोष है— "यः पठेत् सकृदप्येतत् सोऽर्चाफलमवाप्नुयात्" अर्थात् जो व्यक्ति एक बार भी इस स्तोत्र को पढ़ लेता है, उसे यंत्र की संपूर्ण और विधिवत तांत्रिक पूजा (अर्चा) करने का फल मिल जाता है।

स्तवराज के अमोघ लाभ — फलश्रुति (Benefits of Stavaraja)

इस स्तोत्र के अंतिम भाग (श्लोक 34 से 41) में उन चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन है जो साधक को प्राप्त होती हैं:

  • राज-वशीकरण: (श्लोक 35) "राजानो राजपत्न्यश्च पौरजानपदास्तथा। वशगास्तस्य जायन्ते..." — बड़े-बड़े राजा, शासक, प्रशासक और नगर के लोग साधक के सेवक के समान वशीभूत हो जाते हैं।
  • विद्वानों का वाक्-स्तम्भन: (श्लोक 36) "गुरुकल्पाश्च विबुधा मूकतां यान्ति तेऽग्रतः" — बृहस्पति के समान श्रेष्ठ विद्वान और तर्कशास्त्री भी इस साधक के सामने आकर गूँगे (मूक) हो जाते हैं। कोर्ट-केस के लिए यह अमोघ है।
  • स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति: (श्लोक 36) "स्थिरा भवति तद्गेहे चपलापि हरिप्रिया" — माता लक्ष्मी (हरिप्रिया), जिनका स्वभाव चंचल (चपला) है, वे भी साधक के घर में स्थिर होकर निवास करने लगती हैं।
  • त्रैलोक्य वशीकरण (एक लाख जप का फल): (श्लोक 37) जो साधक पीले वस्त्र पहनकर, नियमपूर्वक हल्दी की माला से इस पैताम्बर मंत्र का एक लाख बार (लक्षसङ्ख्यं) जप करता है, तीनों लोक उसके वश में हो जाते हैं।
  • मारण एवं उच्चाटन: (श्लोक 40) "विदारय विचूर्णय ग्लपय शोषय स्तम्भय" — यह स्तोत्र शत्रुओं को विदीर्ण करने, कुचलने, सुखाने और पूरी तरह जड़वत करने की प्रार्थना है।

पाठ विधि एवं तांत्रिक सावधानियां (Ritual Method & Precautions)

चूँकि यह अथर्वण रहस्य (अथर्ववेद की तांत्रिक शाखा) से संबंधित है, इसलिए इसका अनुष्ठान पूर्ण सात्विकता और तांत्रिक नियमों के साथ होना चाहिए।

दैनिक पाठ और पुरश्चरण की विधि

  • पीताम्बर धारण: श्लोक 37 में स्पष्ट निर्देश है "पीताम्बराङ्गवसनो"— साधक को साधना के समय केवल पीले वस्त्र (धोती/साड़ी) ही धारण करने चाहिए।
  • हल्दी की माला: "हरिद्रा-मालां दधद्भवति" — यदि इस स्तोत्र के साथ मूल मंत्र का जप करना हो, तो केवल हरिद्रा (हल्दी) की माला का ही उपयोग करना चाहिए।
  • महारुद्र को आहुति: स्तोत्र के अंत में "ॐ नमो भगवते महारुद्राय हुं फट् स्वाहा" आया है। भगवान शिव (महारुद्र) ही माँ बगलामुखी के भैरव (रक्षक) हैं। अतः पाठ के अंत में महारुद्र को प्रणाम कर इस स्तोत्र की ऊर्जा को सुरक्षित (Seal) किया जाता है।

सावधानियां

बिना गुरु दीक्षा के 1 लाख पाठ का अनुष्ठान (पुरश्चरण) न करें। सामान्य संकट निवृत्ति और मुकदमे में जीत के लिए नित्य 1, 3 या 11 पाठ शुद्ध भावना से किए जा सकते हैं। इस स्तोत्र का प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष या सज्जन व्यक्ति को हानि पहुँचाने के लिए नहीं करना चाहिए, अन्यथा महाविद्या का भयंकर कोप सहना पड़ता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. 'स्तवराज' का क्या अर्थ है?

स्तवराज का अर्थ है 'स्तोत्रों का राजा'। यह पदवी उन स्तोत्रों को दी जाती है जिनमें मंत्र, न्यास, यंत्र पूजा और स्तुति— तंत्र के ये चारों प्रमुख अंग एक ही पाठ में समाहित होते हैं।

2. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह परम सिद्ध स्तोत्र 'अथर्वण रहस्य' (Atharvana Rahasya) से उद्धृत है। अथर्ववेद में रक्षा, मारण, मोहन और उच्चाटन के तांत्रिक प्रयोगों का मूल वर्णन मिलता है।

3. इस स्तोत्र के आरंभ में गुरु वंदना क्यों है?

तंत्र शास्त्र का यह अटल नियम है कि 'गुरु' ही अज्ञान और संदेह का नाश करते हैं। गुरु कृपा के बिना महाविद्याओं की उग्र साधना सफल नहीं होती, इसलिए सर्वप्रथम गुरु का ध्यान (वन्दे भक्तकल्पतरुं गुरुम्) किया गया है।

4. क्या इस स्तोत्र में 36 अक्षरी मंत्र गुप्त है?

जी हाँ, श्लोक 3 से 5 में "ॐ... स्थिरमायां (ह्लीं)... बगलामुखी... दुष्टानां वाचं मुखं पदं... स्तम्भय... जिह्वां कीलय... बुद्धिं विनाशय" के रूप में पूरा ३६ अक्षरी मंत्र पिरोया गया है।

5. हरिद्रा माला (हल्दी की माला) का क्या महत्व है?

श्लोक 37 में 'हरिद्रा-मालां' का उल्लेख है। हल्दी पीत वर्ण की होती है और तंत्र में इसमें जीवाणुओं (शत्रुओं) और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने (Purification & Paralyzing) की असीम क्षमता होती है।

6. 'चपलापि हरिप्रिया' का क्या तात्पर्य है?

माता लक्ष्मी (हरिप्रिया) का एक नाम 'चपला' है क्योंकि वे एक स्थान पर टिकती नहीं हैं। लेकिन इस स्तोत्र के प्रभाव से वे चंचल लक्ष्मी भी साधक के घर में स्थिर (Permanent) हो जाती हैं।

7. क्या इसे पढ़ने से यंत्र पूजा का फल मिलता है?

हाँ, श्लोक 34 स्पष्ट करता है कि जो इसे एक बार पढ़ लेता है, उसे यंत्र की आवरण पूजा (अर्चा) करने का संपूर्ण तांत्रिक फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।

8. इस स्तोत्र में षट्कोण और अष्टदल का क्या रहस्य है?

ये बगलामुखी यंत्र की ज्यामिति (Geometry) के भाग हैं। स्तोत्र पढ़ते समय साधक त्रिकोण, षट्कोण, अष्टदल और षोडशदल में स्थित भैरवों और मातृकाओं का मानसिक रूप से आवाहन करता है।

9. क्या बिना गुरु दीक्षा के इसे पढ़ सकते हैं?

सामान्य रक्षा, मुकदमों में जीत और विद्या प्राप्ति के लिए कोई भी इसका सामान्य पठन कर सकता है। परंतु 1 लाख जप (पुरश्चरण) का संकल्प लेने के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।

10. स्तोत्र के अंत में 'ॐ नमो भगवते महारुद्राय' क्यों है?

भगवान शिव (महारुद्र/मृत्युंजय) माँ बगलामुखी के भैरव हैं। वे इस विद्या के रक्षक हैं। पाठ के अंत में महारुद्र को प्रणाम कर इस उग्र स्तोत्र की ऊर्जा को शांत और सुरक्षित (Seal) किया जाता है।

11. पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ दिशा कौन सी है?

धन, ऐश्वर्य और शत्रुओं पर विजय के लिए 'उत्तर' (North) दिशा की ओर मुख करें। ज्ञान, वाक्-सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए 'पूर्व' (East) दिशा की ओर मुख करना श्रेष्ठ है।