Soundarya Lahari – सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य कृत) | संपूर्ण विवेचन और भावार्थ

॥ श्री सौन्दर्यलहरी ॥
(आदि शङ्कराचार्य कृत)
॥ आनन्दलहरी (१-४१) ॥
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ १॥
भावार्थ: शिव केवल शक्ति (ऊर्जा) से युक्त होने पर ही सृष्टि-रचना में समर्थ होते हैं। शक्ति के बिना वे 'स्पंदित' (हिलने-डुलने) में भी समर्थ नहीं हैं — वे निर्जीव शव के समान हैं। अतएव, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव (तीनों देव) भी आराध्य मानकर पूजते हैं, उन जगदम्बा को प्रणाम करने या स्तुति करने का साहस कोई पुण्यहीन व्यक्ति कैसे कर सकता है? (अर्थात् महान पुण्य के उदय होने पर ही आपकी भक्ति प्राप्त होती है)।
विवेचन: यह श्लोक शाक्त-दर्शन (Shakta Philosophy) का महावाक्य है। यहाँ शिव और शक्ति के अद्वैत संबंध को स्पष्ट किया गया है।
1. शिव और शक्ति: शिव 'प्रकाश' (Illumination/Consciousness) हैं और शक्ति 'विमर्श' (Reflection/Action) हैं। जिस प्रकार धूप के बिना सूर्य और सफेदी के बिना दूध का अस्तित्व नहीं, वैसे ही शक्ति के बिना शिव 'शव' (Corpse) मात्र हैं। 'शिव' शब्द में 'इ' कार ही शक्ति है; यदि उसे हटा दें तो वह 'शव' रह जाता है।
2. त्रिदेवों की आराध्या: ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन) और रुद्र (संहार) — ये तीनों अपनी शक्तियाँ (सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी) माँ से ही प्राप्त करते हैं। स्वतंत्र रूप से ये कुछ नहीं कर सकते।
3. पुण्य का महत्त्व: श्रीविद्या की उपासना या माँ का नाम लेना भी साधारण कर्म नहीं है। यह जन्मान्तरों के संचित 'महान पुण्य' (अकृत-पुण्य नहीं) का फल है।
तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ २॥
भावार्थ: आपके चरण-कमलों की अत्यंत सूक्ष्म धूलि (पराग) के एक कण को प्राप्त करके ब्रह्मा जी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं। उसी धूलि-कण को भगवान विष्णु (शौरि) स्वयं 'हजार सिर वाले शेषनाग' (सहस्रेण शिरसां) का रूप धारण कर बड़ी कठिनाई से उठाते हैं। और प्रलयकाल में, भगवान शिव (हर) उसी धूलि को (भस्म बनाकर) अपने शरीर पर लपेट लेते हैं।
विवेचन: यह श्लोक माँ की 'सर्वोपरि सत्ता' को दर्शाता है।
1. शौरि (विष्णु) और शेषनाग: श्लोक में 'शौरि' (विष्णु) शब्द है, पर 'सहस्रेण शिरसां' (हजार सिरों से) भी है। इसका अर्थ है कि भगवान विष्णु ही 'अनंत-शेष' रूप में पृथ्वी का भार उठाते हैं (श्रीमद्भागवत के अनुसार संकर्षण-शेष उन्हीं के तामसी विस्तार हैं)।
2. भार-वहन: शेषनाग के 1000 फनों पर पृथ्वी राई के दाने जैसी है, फिर भी माँ की धूलि का भार उनसे भी 'कथमपि' (बड़ी मुश्किल से) उठता है। यह शक्ति के घनत्व (Mass/Energy) को दर्शाता है।
3. शिव का भस्म: संहार का अर्थ है - नाम-रूप को मिटाकर उसे मूल तत्त्व (भस्म) में बदल देना। शिव इसी शक्ति-रज का आश्रय लेकर प्रलय करते हैं।
अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवति ॥ ३॥
भावार्थ: अज्ञान रूपी आंतरिक अंधकार को दूर करने के लिए आप 'उदित होते सूर्य की नगरी' (Island City of Sunrise) हैं। जड़ (मूर्ख) बुद्धि वालों के लिए आप 'चैतन्य' (बुद्धिमत्ता) के गुच्छों से बहती मकरंद (शहद) की धारा हैं। दरिद्रों के लिए आप मनोकामना पूर्ण करने वाली 'चिंतामणि' की माला हैं। और संसार-सागर (जन्म-मरण) में डूबते हुए लोगों के लिए आप भगवान वराह की दाढ़ (Tusk) के समान हैं (जो डूबती पृथ्वी को बचा लेती है)।
विवेचन: यहाँ माँ की कृपा के चार आयाम बताए गए हैं:
1. अविद्या-नाश: 'मिहिर-द्वीप-नगरी' — जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार छुपने की जगह नहीं पाता, वैसे ही माँ के ज्ञान से अविद्या का समूल नाश हो जाता है।
2. जड-चेतना: जो मंदबुद्धि हैं, उन पर माँ की कृपा सरस्वती-धारा (Medha Shakti) बनकर बरसती है। कालिदास इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
3. दारिद्र्य-नाश: चिंतामणि वह कल्पित रत्न है जो सब कुछ दे सकता है। माँ 'गुणनिका' (माला) हैं, यानी अनन्त चिंतामणियाँ उनके पास हैं।
4. भव-तारक: वराह अवतार ने जैसे पृथ्वी को रसातल से दाढ़ पर उठाया था, वैसे ही माँ भक्त को दुःख-सागर से झटपट ऊपर खींच लेती हैं।
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥ ४॥
भावार्थ: अन्य सभी देवता अपने हाथों की मुद्राओं (अभय और वरद मुद्रा) से भय-मुक्ति और वरदान देने का 'अभिनय' (Gesture) करते हैं। परन्तु हे जगज्जननी! एकमात्र आप ऐसी हैं जो यह सब नहीं करतीं। क्योंकि आपके 'चरण-कमल' ही लोगों को भय से बचाने और उनकी इच्छा से भी अधिक ('वाञ्छा-समधिकं') फल देने में पूर्णतः समर्थ हैं। (आपको हाथ उठाने का कष्ट भी नहीं करना पड़ता)।
विवेचन: यह श्लोक माँ की 'सहज करुणा' और 'श्रेष्ठता' को स्थापित करता है।
1. हस्त-मुद्रा की आवश्यकता नहीं: अन्य देवताओं को देना पड़ता है, पर माँ के पास आने मात्र से (चरणों में गिरने से) काम स्वतः हो जाते हैं।
2. वाञ्छा-समधिकं: माँ वह नहीं देतीं जो हम मांगते हैं, बल्कि वह देती हैं जो हमारे लिए सर्वोत्तम है और हमारी कल्पना से परे है। माँ बच्चे की मांग की प्रतीक्षा नहीं करतीं, उसकी आवश्यकता पूरी करती हैं।
3. शरण्ये: वह एकमात्र 'शरण' हैं। अन्य देव भी अंततः उन्हीं की शक्ति से वरदान देते हैं।
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥ ५॥
भावार्थ: (आप सौभाग्य की दात्री हैं) प्राचीन काल में, भगवान विष्णु ने आपकी आराधना करके मोहिनी रूप धारण किया और त्रिपुर-संहारक शिव (पुररिपु) के मन में भी क्षोभ (कामुकता/हलचल) उत्पन्न कर दिया। कामदेव (स्मर) ने भी, शरीर भस्म हो जाने पर भी, आपको प्रणाम करके रति के नेत्रों को प्रिय लगने वाला (अदृश्य) शरीर प्राप्त किया; जिससे वह आज बड़े-बड़े जितेन्द्रिय मुनियों के मन में भी मोह उत्पन्न करने में समर्थ है।
विवेचन: यह श्लोक माँ की 'सम्मोहन शक्ति' और 'सौभाग्य विद्या' का वर्णन है।
1. विष्णु की मोहिनी विद्या: विष्णु पुरुष हैं, पर माँ की उपासना से उनमें ऐसी स्त्री-सुलभ सम्मोहन शक्ति आई कि योगीश्वर शिव भी विचलित हो गए। यह सायुज्य भक्ति का उदाहरण है (देवीमय हो जाना)।
2. कामदेव की शक्ति: शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, वह 'अनंग' (बिना शरीर का) है। फिर भी वह पूरे जगत को नचाता है। यह शक्ति उसे कहाँ से मिली? केवल माँ के चरणों के नमन से।
3. साधक के लिए संकेत: जो साधक श्रीविद्या की उपासना करता है, उसमें ऐसा दिव्य आकर्षण (Tejas) उत्पन्न होता है कि संसार उसके वश में हो जाता है।
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः
वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्
अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिद-मनङ्गो विजयते ॥ ६॥
भावार्थ: हे हिमगिरि-सुते! कामदेव के पास लड़ने के साधन कितने तुच्छ हैं — धनुष फूलों का (कोमल), प्रत्यंचा (डोरी) भंवरों की (अस्थिर), बाण केवल पाँच (कमल, अशोक आदि), वसंत जैसा चंचल मित्र, और मलय पर्वत की हवा जैसा अदृश्य रथ। फिर भी, इन मामूली साधनों से वह अकेले ही सम्पूर्ण जगत को जीत लेता है। यह चमत्कार केवल आपकी 'अपॉग-दृष्टि' (कटाक्ष) से प्राप्त कृपा का ही फल है।
विवेचन: यहाँ कामदेव के आयुधों का प्रतीकात्मक अर्थ (Symbolism) गहरा है:
1. पुष्प-धनुष (मन): मन कोमल और चंचल है।
2. भ्रमर-मौर्वी (आसक्ति): भंवरे जैसी आसक्ति ही मन को खींचती है।
3. पञ्च-बाण (पाँच इन्द्रियाँ): शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध — यही पाँच बाण हमें घायल करते हैं।
4. विजय का रहस्य: इन चंचल साधनों से विश्व-विजय संभव नहीं। कामदेव 'अनंग' (शरीर रहित/मन रूप) होकर भी सर्वशक्तिमान इसलिए है क्योंकि उसकी शक्ति का स्रोत माँ की 'कामकला' है। माँ की एक तिरछी नज़र (Side-glance) में ब्रह्माण्ड को वश में करने की शक्ति है।
क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥ ७॥
भावार्थ: जिनकी करधनी (Waistband) मधुर झनकार कर रही है, जो हाथी के बच्चे (कलभ) के कुम्भ-स्थल समान उन्नत स्तनों के भार से थोड़ा झुकी हुई हैं, जिनका कटि-प्रदेश (कमर) अत्यंत क्षीण (पतला) है, और मुख शरद-पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा है। जो अपनी चार भुजाओं में धनुष, बाण, पाश और अंकुश धारण करती हैं — ऐसी त्रिपुर-संहारक शिव की अर्धांगिनी (त्रिपुरसुन्दरी) हमारे समक्ष प्रत्यक्ष उपस्थित हों।
विवेचन: यह माँ का 'ध्यान श्लोक' है। श्रीविद्या साधक को इसी रूप का ध्यान करना चाहिए। यहाँ चार आयुधों का गूढ़ रहस्य है:
1. पाश (Noose): यह 'राग' (Attachment/Iccha) का प्रतीक है। माँ अवांछित इच्छाओं को बाँध लेती हैं और अपनी ओर खींच लेती हैं।
2. अंकुश (Goad): यह 'द्वेष/क्रोध' (Hatred/Gyan) का प्रतीक है। यह मन रूपी हाथी को नियंत्रित करता है।
3. इक्षु-धनुष (Sugarcane Bow): यह 'मन' (Mind) है। गन्ना जैसे पोर-पोर में रस भरा होता है, वैसे ही मन वृत्तियों से भरा है।
4. पञ्च-बाण (Five Arrows): ये 'पञ्च-तन्मात्राएं' (Five Subtle Elements) हैं।
माँ इन चारों को नियंत्रित कर साधक को मोक्ष की ओर ले जाती हैं। 'आहोपुरुषिका' का अर्थ है — 'अहं इति भाव' यानि शिव का अपना 'मैं' पन (I-ness) जो शक्ति ही है।
सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ ८॥
भावार्थ: अमृत के सागर (सुधा-सिन्धु) के मध्य में एक 'मणिद्वीप' है, जो कल्पवृक्षों की वाटिका (सुर-विटपि-वाटी) से घिरा है। वहां नीप (कदम्ब) के वृक्षों का उपवन है और उसके बीच चिंतामणियों से बना भव्य भवन है। उस भवन में, 'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर' रूपी चार पायों वाले मंच पर, 'सदाशिव' रूपी फलक (Bed) पर विराजमान आप (परम-शक्ति) को जो विरले पुण्यात्मा भजते हैं, वे ही धन्य हैं और वे ही 'चिदानन्द-लहरी' (चेतना के आनंद की लहर) में डूबे रहते हैं।
विवेचन: यह श्रीचक्र के 'बिन्दु-स्थान' (Sarvanandamaya Chakra) का भौगोलिक और आध्यात्मिक वर्णन है।
1. सुधा-सिन्धु: यह हमारे सिर में स्थित 'सहस्रार' से टपकने वाला अमृत है।
2. पञ्च-प्रेतासन: माँ जिस आसन पर बैठती हैं, वह पाँच देवताओं से बना है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर — ये चार पाये (Legs) हैं क्योंकि ये अपनी क्रिया (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव) करके शांत (मृतवत) हो चुके हैं। सदाशिव, जो निष्क्रिय साक्षी हैं, वह गद्दा (Plank) हैं।
3. शक्ति की सक्रियता: जब माँ इन पर बैठती हैं, तभी ये चैतन्य होते हैं। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च सत्ता (Supreme Reality) शक्ति ही है जो निष्क्रिय ब्रह्म को आधार बनाती है।
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९॥
भावार्थ: हे माँ! आप मूलाधार चक्र में स्थित 'पृथ्वी तत्त्व' (मही) को, मणिपूर में 'जल तत्त्व' (यहाँ पाठभेद से अग्नि माना जाता है, पर श्लोक में क्रम भेदन है) को, स्वाधिष्ठान में 'अग्नि तत्त्व' (क्रम व्यत्यय — सामान्यतः मणिपूर अग्नि है), हृदय में 'वायु तत्त्व' को, विशुद्धि में 'आकाश तत्त्व' को और भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) में 'मन तत्त्व' को भेदकर (पार करके), सुष्मना मार्ग से सम्पूर्ण 'कुल-पथ' को पार करती हुई, सहस्रार कमल में अपने पति (सदाशिव) के साथ एकांत में विहार करती हैं।
विवेचन: यह 'कुण्डलिनी योग' की पूर्ण प्रक्रिया है।
1. षट्चक्र भेदन: कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार (Earth) से उठकर आज्ञा चक्र (Mind) तक सभी तत्त्वों को अपने में विलीन करती जाती है। इसे 'लयाक्रम' कहते हैं।
2. कुल-पथ: सुष्मना नाड़ी को 'कुल-पथ' कहा गया है। सुष्मना के द्वार को खोलकर शक्ति ऊपर उठती है।
3. सहस्रार मिलन: अंत में सहस्रार (शून्य/Infinity) में शक्ति अपने स्रोत 'शिव' (Pure Consciousness) से मिलती है। यह 'रहसि' (एकांत/Secret) मिलन है, जिसे समाधि कहते हैं। यहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः
प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥ १०॥
भावार्थ: (सहस्रार में विहार करने के बाद) आप अपने चरणों से झरती हुई अमृत-धाराओं (सुधा-धारा-सारैः) से सम्पूर्ण शरीर रूपी प्रपंच (72000 नाड़ियों) को सींचती हैं (पुनर्जीवित करती हैं)। तत्पश्चात्, उस चन्द्र-मंडल (रसाम्नाय-महसः) से आप अपनी स्व-भूमि (मूलाधार) में वापस लौट आती हैं और वहाँ 'कुल-कुण्ड' (हवन कुण्ड जैसी खाली जगह) में, एक साढ़े तीन फेरे लगाई हुई सर्पिणी (भुजग-निभ) के रूप में सूक्ष्म होकर सो जाती हैं।
विवेचन: यह 'सृष्टि क्रम' या अवतरण है।
1. अमृत वर्षा: योग में जब कुण्डलिनी शिव से मिलती है, तो परम-आनंद (Nectar) टपकता है। यह साधक के शरीर को दिव्य बना देता है (काया-कल्प)।
2. पुनरागमन: शक्ति सदैव सहस्रार में नहीं रह सकती (वरना शरीर छूट जाएगा)। वह वापस मूलाधार में आती है, ताकि साधक संसार में कार्य कर सके। इसे 'अवरोहण' कहते हैं।
3. साढ़े तीन कुण्डल: यह 3.5 coils — अ, उ, म (Omkar) और अर्धमात्रा (नाद) का प्रतीक हैं। कुण्डलिनी सुप्त अवस्था में यहीं विश्राम करती है।
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ॥ ११॥
भावार्थ: आपका निवास-स्थान (श्रीचक्र) चार शिव त्रिकोण (ऊर्ध्वमुखी), पाँच शक्ति त्रिकोण (अधोमुखी), इन नौ मूल त्रिकोणों के परस्पर मिलने से बने 43 त्रिकोण, अष्टदल पद्म, षोडशदल पद्म, तीन वृत्त और तीन रेखाओं (भूपुर) से मिलकर 44 कोणों में परिणत होता है।
विवेचन: यह श्लोक 'श्रीचक्र' (यंत्र-राज) की उत्पत्ति और संरचना का वैज्ञानिक वर्णन है।
1. शिव-शक्ति संयोग: 4 त्रिकोण ऊपर की ओर (शिव/अग्नि) और 5 त्रिकोण नीचे की ओर (शक्ति/सोम) मिलते हैं। यह 9 मूल प्रकृतियाँ हैं।
2. 43 त्रिकोण: इनके प्रतिच्छेदन (Intersection) से 43 छोटे त्रिकोण बनते हैं। मध्य बिन्दु को मिलाकर 44 होते हैं।
3. ब्रह्माण्ड का प्रतीक: यह यंत्र केवल रेखाएं नहीं, बल्कि पिण्ड (शरीर) और ब्रह्माण्ड (Cosmos) का नक्शा है। इसे 'विचित्र-सृष्टि' कहते हैं क्योंकि यह शिव और शक्ति के सामरस्य से बनी है।
त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥ १२॥
भावार्थ: हे हिमगिरि-सुते! आपके सौन्दर्य की तुलना (उपमा) करने के लिए ब्रह्मा आदि कवीश्वर बहुत प्रयास करते हैं, पर असफल रहते हैं। (वे आपकी उपमा ढूँढ ही नहीं पाते)। आपके रूप-दर्शन की उत्सुकता से ही, अप्सराएं (अमर-ललना) मन ही मन उस 'गिरिश-सायुज्य' (शिव में लीन होने की अवस्था) को प्राप्त कर लेती हैं, जो कठोर तपस्या से भी दुर्लभ है।
विवेचन: यहाँ माँ के 'अनुपम सौन्दर्य' और 'भक्ति की शक्ति' का वर्णन है।
1. अनिवर्चनीय: माँ का सौन्दर्य इतना दिव्य है कि 'उपमा' (Simile) के लिए संसार में कोई वस्तु है ही नहीं। ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) भी हार मान जाते हैं।
2. सायुज्य मुक्ति: अप्सराएं माँ को शिव की अर्धांगिनी के रूप में देखती हैं। वे माँ जैसा बनना चाहती हैं ताकि शिव का प्रेम पा सकें। इस तीव्र इच्छा (Intensity) से वे मानसिक रूप से शिव-सायुज्य पा लेती हैं। यह 'कीट-भ्रमर न्याय' है — जिसका चिंतन करो, वैसा ही बन जाओ।
नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥ १३॥
भावार्थ: आपकी कटाक्ष-कृपा जिस पुरुष पर पड़ जाती है — भले ही वह अत्यंत वृद्ध (वर्षियां) हो, देखने में कुरूप (नयन-विरस) हो, और प्रेम-व्यवहार (शृंगार की बातों) में एकदम जड़ (मूर्ख) हो — फिर भी उसके पीछे सैकड़ों युवतियाँ दौड़ पड़ती हैं। (वे इतनी मोहित हो जाती हैं कि) उनके केश खुल जाते हैं, वक्षस्थल से वस्त्र खिसक जाते हैं, करधनी टूट जाती है और रेशमी वस्त्र गिर पड़ते हैं (उन्हें अपनी सुध-बुध नहीं रहती)।
विवेचन: यह माँ की 'वशीकरण शक्ति' का चरम उदाहरण है।
1. अपात्र पर कृपा: साधारणतः प्रेम सुन्दर और गुणवान से होता है। पर माँ की दृष्टि जिसे मिल जाए, उसमें ऐसा 'दिव्य आकर्षण' (Divine Magnetism) आ जाता है कि कमियाँ छिप जाती हैं।
2. विगलित-वेणी: यह गोपियों की दशा जैसा वर्णन है। यह केवल काम-वासना नहीं, बल्कि वह आकर्षण है जो जीव को परमात्मा (शक्ति) की ओर खींचता है। साधक संसार के लिए प्रिय हो जाता है।
क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।
दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥ १४॥
भावार्थ: (हे माँ! आप काल-स्वरूप भी हैं)। पृथ्वी तत्त्व (मूलाधार) में 56, जल (मणिपुर) में 52, अग्नि (स्वाधिष्ठान) में 62, वायु (अनाहत) में 54, आकाश (विशुद्धि) में 72 और मन (आज्ञा चक्र) में 64 मयूख (किरणें) हैं। आपके चरण-कमल इन सभी (कुल 360) किरणों से ऊपर (सहस्रार में) स्थित हैं।
विवेचन: यह श्लोक 'काल-चक्र' और 'षट्चक्र' का समन्वय है।
1. 360 किरणें: इन सभी चक्रों की किरणों का योग (56+52+62+54+72+64) 360 होता है, जो 'एक वर्ष' के दिनों की संख्या है। इसका अर्थ है कि हमारा शरीर 'काल' (Time) के अधीन है।
2. कालातीत: माँ के चरण इन सबसे ऊपर सहस्रार में हैं। इसलिए माँ 'कालातीता' हैं। जो साधक अपनी चेतना को आज्ञा चक्र से ऊपर ले जाता है, वह मृत्यु और काल के भय को जीत लेता है।
शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥ १५॥
भावार्थ: जो शरद ऋतु की चाँदनी के समान 'शुभ्र' (Shwet) वर्ण वाली हैं, जिनके जटाजूट-मुकुट में चन्द्रमा शोभायमान है, और जो अपने चार हाथों में 'वरद और अभय' मुद्रा (वर-त्रास-त्राण), स्फटिक की माला और पुस्तक धारण करती हैं — ऐसी (सरस्वती रूपी) आपको एक बार भी प्रणाम करके, सज्जनों की वाणी 'मधु, दूध और द्राक्षा' (अंगूर) से भी अधिक मधुर क्यों न हो जाएगी? (अवश्य हो जाएगी)।
विवेचन: यह 'वाग्वादिनी' (सरस्वती) रूप का ध्यान है।
1. शुभ्र वर्ण: यह 'सत्व गुण' और 'शुद्ध ज्ञान' का प्रतीक है।
2. आयुध: पुस्तक (वेद/शास्त्र ज्ञान), स्फटिक माला (एकाग्रता/तप), वर-अभय (सफलता और सुरक्षा)।
3. फल: इस श्लोक की साधना से जड़ बुद्धि भी कवि बन जाता है। वाणी में ओज और माधुर्य (Eloquence) आता है। कालिदास जैसे कवियों की सिद्धि का यही रहस्य है।
कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी-
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥ १६॥
भावार्थ: हे माँ! जो सत्पुरुष 'कवीन्द्रों' (वाल्मीकि, व्यास आदि) के चित्त-रूपी कमल-वन को खिलाने वाली 'प्रातःकालीन सूर्य की कोमल धूप' (Balarka) के समान, आपके 'अरुण' (लाल) वर्ण का ध्यान करते हैं; वे ब्रह्मा की पत्नी (सरस्वती) की 'शृंगार-रस' से भरी, गंभीर और विद्वत्तापूर्ण वाणी से सज्जनों (विद्वानों) को मोहित/प्रसन्न कर देते हैं।
विवेचन: यह पिछले श्लोक (शुभ्र ध्यान) का पूरक (रुद्र-यामली तंत्र) है।
1. अरुण वर्ण: यह 'रजोगुण' और 'क्रिया शक्ति' का प्रतीक है। शुभ्र वर्ण ज्ञान देता है, पर अरुण वर्ण उस ज्ञान को 'काव्य' (Creative Art) में बदलने की प्रेरणा देता है।
2. श्रृंगार और गांभीर्य: केवल ज्ञान शुष्क होता है। माँ की कृपा से वाणी में 'सरसता' (आनंद) आती है। उनकी वाणी ऐसी होती है जिसे सुनकर सभा वाह-वाह कर उठती है। यह 'शब्द-ब्रह्म' की साधना है।
सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः
वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः
वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥ १७॥
भावार्थ: हे जननी! जो साधक, वाणी की अधिष्ठात्री (सवित्री), चन्द्रकान्त मणि और स्फटिक शिला जैसी निर्मल कांति वाली 'वशिन्यादि' (आठ वाग्देवियों) के साथ आपका चिंतन करता है; वह (साधक) महान काव्यों का रचियता बन जाता है। उसकी वाणी 'वाग्देवी' (सरस्वती) के मुख-कमल की सुगंध (Scent) जैसी मधुर और चमत्कारी (भंगी-रुचि) होती है।
विवेचन: श्रीचक्र के 'सर्व-रोग-हर चक्र' (अष्टकोण) में 8 वाग्देवियाँ रहती हैं — 1. वशिनी, 2. कामेश्वरी, 3. मोदिनी, 4. विमला, 5. अरुणा, 6. जयिनी, 7. सर्वेश्वरी, 8. कौलिनी।
1. रहस्य: यही वाग्देवियाँ 'ललिता सहस्रनाम' की रचियता हैं।
2. साधना: माँ को इन आठ शक्तियों के मध्य (Central Deity) मानकर ध्यान करने से साधक 'सरस्वती-पुत्र' बन जाता है। उसके मुख से निकला हर शब्द शास्त्र बन जाता है।
तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥ १८॥
भावार्थ: जो साधक, प्रातःकालीन बाल-सूर्य (Rising Sun) की कांति (श्री) जैसी लालिमा (अरुणिमा) वाली आपकी 'शरीर-प्रभा' (तनु-छाया) से, सम्पूर्ण 'स्वर्ग' (दिवं) और 'पृथ्वी' (उर्वी) को 'लाल रंग में डूबा हुआ' (Immersed in Red) ध्यान करता है; तो (स्वर्ग की अप्सरा) उर्वशी सहित, भयभीत हिरणी जैसे नेत्रों वाली कितनी ही देवांगनाएं और स्त्रियाँ उसके वश में क्यों न हो जाएंगी? (अवश्य हो जाएंगी)।
विवेचन: यह 'सर्व-वशीकरण' प्रयोग है।
1. अरुण ध्यान: सूर्योदय के समय, जब पूरी दुनिया सुनहरी-लाल दिखती है, उस समय यह भावना करनी चाहिए कि यह लालिमा सूर्य की नहीं, माँ की आभा है।
2. त्रैलोक्य वश: जब साधक पूरे ब्रह्माण्ड को 'शक्तिमय' (लाल) देखता है, तो द्वैत मिट जाता है। जिसे आप अपना ही रूप मान लेंगे, वह आपसे दूर कैसे रह सकता है? यही आकर्षण का मनोविज्ञान है।
मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥ १९॥
भावार्थ: हे हर-महिषी (शिव-पत्नी)! जो साधक आपके 'मुख' को 'बिन्दु' (Dot), उसके नीचे दोनों 'स्तनों' को (दो बिन्दु), और उसके नीचे 'योनि' (अर्ध-हकार/त्रिकोण) के रूप में ध्यान करता है — जो कि आपकी 'मन्मथ-कला' (कामकला) है; वह साधक तत्काल स्त्रियों को क्षोभित (मोहित) कर देता है। अरे, यह तो बहुत छोटी बात है, वह तो सूर्य और चन्द्रमा रूपी स्तनों वाली उस 'त्रिलोकी' (तीनों लोकों की स्त्री रूपी प्रकृति) को भी शीघ्र ही भ्रमित (वश में) कर लेता है।
विवेचन: यह श्लोक 'कामकला-यंत्र' (Kamakala Yantra) का गोपनीय वर्णन है।
1. स्वरूप: एक बिन्दु (मुख) के नीचे दो बिन्दु (स्तन) और उसके नीचे एक उल्टा त्रिकोण (योनि)। यह संरचना देवी का सूक्ष्म रूप है।
2. सूर्य-चन्द्र स्तन: साधक के लिए यह ब्रह्माण्ड ही देवी का शरीर बन जाता है। सूर्य और चन्द्रमा उस विराट नारी के स्तन हैं।
3. सिद्धि: इस तत्व को जानने वाला 'विराट' से एक हो जाता है, इसलिए त्रिलोक उसके वश में होता है। यह वासना नहीं, 'समष्टि-भाव' (Cosmic Consciousness) है।
किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं
हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥ २०॥
भावार्थ: हे माँ! जो साधक अपने हृदय में आपका ध्यान 'चन्द्रकान्त-मणि' (हिमकर-शिला) की मूर्ति के समान करता है — जिससे चारों ओर 'अमृत-रस की किरणें' (किरण-निकुरुम्ब-अमृत-रसं) झर रही हैं; वह 'गरुड़' (पक्षिराज) के समान साँपों के घमंड (विष) को शांत कर देता है। और (ज्वर आदि रोगों की) जलन से तपते हुए लोगों को अपनी 'सुधा-स्रावी दृष्टि' (अमृत बरसाने वाली नज़र) से ही स्वस्थ और सुखी कर देता है।
विवेचन: यह 'अमृत-विद्या' या 'संजीवनी' प्रयोग है।
1. शीतल ध्यान: माँ को हृदय में पिघली हुई चाँदनी या बर्फ की मूर्ति जैसा सोचना। इससे शरीर का ताप (Heat/Fever) नष्ट होता है।
2. विष-नाशक: गरुड़ जैसे साँपों को मार देता है, वैसे ही यह ध्यान शरीर के विष (Toxins/Virus) और मन के विष (Ego/Anger) को नष्ट कर देता है।
3. दृष्टि-दीक्षा: ऐसे साधक की आँखों में इतनी ठंडक आ जाती है कि वह जिसे देख ले, उसका रोग दूर हो जाता है।
तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥ २१॥
भावार्थ: जो योगी अपने मन को 'मल और माया' से रहित करके (मृदित-मल-मायेन), सहस्रार कमल रूपी वन (महा-पद्म-अटव्यां) में, सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान तेजस्वी, बिजली की रेखा जैसी सूक्ष्म (तटिल्लेखा-तन्वीं) और छहों कमलों (षट्चक्र) के ऊपर विराजमान आपकी 'कला' (कुण्डलिनी शक्ति) का दर्शन करते हैं; वे महान आत्माएं 'परमानंद की लहरों' (Maha-Ananda-Lahari) को धारण करते हैं (उसमें डूब जाते हैं)।
विवेचन: यह 'कुण्डलिनी जागरण' की पूर्णता का श्लोक है।
1. तटिल्लेखा: सुष्मना नाड़ी में कुण्डलिनी बिजली की चमक जैसी होती है। यह प्रकाशमय है।
2. षट्चक्रों के ऊपर: जब शक्ति सहस्रार में पहुँचती है, तो वह सूर्य-चन्द्र-अग्नि (तीनों लोकों) से परे हो जाती है।
3. परमानंद: यह आनंद विषयों का नहीं, बल्कि 'ब्रह्मानंद' है। साधक स्वयं 'आनंद-लहरी' बन जाता है।
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥
भावार्थ: हे भवानी! जो भक्त आपकी स्तुति करने की इच्छा से "हे भवानी! त्वं..." (हे भवानी! तुम मुझ दा़स पर...) इतना ही कह पाता है, आप उसे तत्काल अपनी 'सायुज्य-मुक्ति' (अपने जैसा बना लेना) वाला पद प्रदान कर देती हैं। (क्योंकि 'भवानी त्वं' का एक अर्थ 'मैं भवानी हो जाऊँ' भी है)। यह वह पद है जिसकी आरती विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र अपने मुकुटों की मणियों से करते हैं।
विवेचन: यहाँ 'शब्द-श्लेष' (Pun) और माँ की 'आशुतोष' प्रकृति का अद्भुत वर्णन है।
1. भवानी त्वं: भक्त कहना चाहता था "भवानी त्वं दासे मयि..." (हे भवानी! तुम मुझ दास पर दया करो), पर माँ ने व्याकरण के अनुसार अर्थ लिया "भवानी (मैं) त्वं (तू)" — अर्थात् 'तू भवानी हो जा'।
2. तत्काल फल: माँ वाक्य पूरा होने का भी इंतज़ार नहीं करतीं। यह 'भावना-मात्र' से मोक्ष मिलने का सिद्धांत है।
त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥ २३॥
भावार्थ: (हे माँ! आप शिव से भी अधिक प्रभावशाली हैं)। मुझे शंका है कि आपने शिवजी का वाम-भाग (Left half) तो पहले ही ले लिया था (अर्धनारीश्वर रूप में), फिर भी मन नहीं भरा (अपरितृप्तेन मनसा) तो उनका दूसरा आधा भाग भी हर लिया। इसीलिए अब आपका यह रूप पूरी तरह 'अरुण' (लाल) है, तीन नेत्रों वाला है, स्तनों के भार से झुका है और मस्तक पर चन्द्रमा है। (शिव का श्वेत वर्ण लुप्त हो गया है, सर्वत्र आप ही छायी हैं)।
विवेचन: यह 'शक्ति-प्रधान' दर्शन है। अर्धनारीश्वर में शिव-शक्ति आधे-आधे हैं। लेकिन यहाँ कवि कहते हैं कि प्रेम की अधिकता में शक्ति ने शिव को पूरा ढक लिया है।
1. अरुणाभं: लाल रंग शक्ति का है, श्वेत शिव का। जब पूरा रूप लाल हो गया, इसका अर्थ है शिव शक्ति में विलीन हो गए।
2. तात्पर्य: अब शिव और शक्ति दो नहीं, केवल 'ललिता' ही सर्वत्र है।
जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।
सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥ २४॥
भावार्थ: ब्रह्मा जगत को उत्पन्न करते हैं (सूते), विष्णु पालन करते हैं (अवति), रुद्र संहार करते हैं (क्षपयते), ईश्वर इन तीनों को (अपने में समेटकर) तिरोहित कर देते हैं। और सदाशिव (इन चारों से परे) आपके 'भ्रू-विलास' (Eye-brow movement) की क्षणिक आज्ञा का सहारा लेकर, इन सब पर अनुग्रह (Creation again) करते हैं।
विवेचन: यह 'पञ्च-कृत्य' (Five Acts of God) का वर्णन है:
1. सृष्टि, स्थिति, संहार: ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र।
2. तिरोभाव: ईश्वर (Ishvara) जो प्रलय में सबको छिपा लेते हैं।
3. अनुग्रह: सदाशिव, जो पुनः सृष्टि का चक्र चलाते हैं।
सत्य यह है कि ये पाँचों देवता (पञ्च-प्रेत) केवल 'यंत्र' (Instruments) हैं, असली कर्ता (Doer) माँ की इच्छा-शक्ति है।
त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे
भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ॥ २५॥
भावार्थ: हे शिवे! तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से उत्पन्न तीनों देवताओं (विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र) की पूजा तो आपके 'चरणों की पूजा' से ही संपन्न हो जाती है। (अलग से उनकी पूजा की आवश्यकता नहीं)। प्रमाण यह है कि ये तीनों देवता सदैव आपके चरण रखने की चौकी (मणिपीठ) के पास, अपने मुकुटों को झुकाए और हाथ जोड़े 'नित्य' (शश्वत्) खड़े रहते हैं।
विवेचन: जब हम 'मूल' (Root/Mother) को सींचते हैं, तो शाखाएँ (Gods) अपने आप तृप्त हो जाती हैं।
1. त्रिदेवों की स्थिति: ब्रह्मा, विष्णु, महेश — ये माँ के दरबार के मुख्य अधिकारी हैं। वे सदैव सेवा में तत्पर हैं।
2. सर्व-देव-मयी: माँ की पूजा 'समष्टि' (Total) पूजा है। जो माँ को पूजता है, उसे किसी अन्य देवता को पूजने की बाध्यता नहीं रहती।
विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा
महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ॥ २६॥
भावार्थ: (महाप्रलय के समय) ब्रह्मा पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं (मिट जाते हैं), विष्णु भी विराम पा लेते हैं (उनका कार्य समाप्त हो जाता है), यमराज (कीनाश) स्वयं विनाश को प्राप्त होते हैं, कुबेर (धनद) का भी निधन हो जाता है। इंद्रियों के स्वामी इंद्र (माहेन्द्री) की आँखें भी बंद हो जाती हैं। लेकिन हे सती! उस महासंहार में भी आपके पति (सदाशिव) आपके साथ विहार (क्रीड़ा) करते हैं।
विवेचन: यह माँ के 'पातिव्रत्य' (Chastity) और 'नित्यता' का वर्णन है।
1. महाप्रलय: जब सब कुछ (देवता, काल, दिशाएं) समाप्त हो जाता है, तब भी 'शिव और शक्ति' रहते हैं।
2. सती का अर्थ: 'सती' वह है जो सत (Truth/Existence) है। जिसका कभी नाश नहीं होता। शिव भी केवल शक्ति के कारण ही 'महा-कालेश्वर' होकर जीवित रहते हैं।
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥
भावार्थ: मेरा बड़बड़ाना (Jalpa) ही 'जप' बन जाए, हाथों का हिलाना-डुलाना 'मुद्रा' हो, चलना-फिरना आपके मंदिर की 'परिक्रमा' हो, खाना- पीना 'आहुति' (हवन) हो, लेटना 'प्रणाम' हो। संक्षेप में, मेरा हर सुख-भोग 'आत्म-समर्पण' की दृष्टि से आपकी 'पूजा' ही बन जाए।
विवेचन: यह 'सहज-समाधि' या 'मानस-पूजा' का सर्वश्रेष्ठ श्लोक है।
1. दृष्टिकोण: पूजा केवल मंदिर में नहीं होती। हर सांस, हर कर्म माँ के लिए है। "यद्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्" — इसी भाव को यहाँ शक्ति-परक रूप में कहा गया है।
2. जीवन-मुक्ति: जो साधक इस भाव में जीता है, वह संसार में रहते हुए भी मुक्त है। उसे अलग से नियम-संयम की आवश्यकता नहीं।
सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥ २८॥
भावार्थ: अमृत का सेवन करके भी, जो भय, बुढ़ापा और मृत्यु को हरने वाला माना जाता है, ब्रह्मा, इंद्र आदि सभी देवता (प्रलय काल में) नष्ट हो जाते हैं। परन्तु भयानक 'हलाहल विष' को निगलने वाले शिव पर 'काल' (मृत्यु) का कोई जोर नहीं चलता। हे जननी! इसका मूल कारण (केवल विष का प्रभाव न होना नहीं, बल्कि) आपके 'ताटंक/कर्णफूल' (मंगलयूत्र) की महिमा है।
विवेचन: यह पति की आयु बढ़ाने वाला श्लोक है (सुहाग-रक्षा)।
1. अमृत vs विष: अमृत पीकर भी देवता मर गए, पर विष पीकर भी शिव अमर हैं। क्यों?
2. ताटंक महिमा: भारतीय संस्कृति में पत्नी का 'मांगल्य' (Pativratya) पति की रक्षा करता है। माँ का ताटंक (Ear-ring) सूर्य-चन्द्र रूप है, जो काल को नियंत्रित करता है। जब तक माँ सुहागिन हैं, शिव को मृत्यु कैसे छू सकती है?
किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥ २९॥
भावार्थ: (जब सभी देवता आपके चरणों में प्रणाम कर रहे होते हैं, तब शिवजी के आने पर आप उठकर उनका स्वागत करना चाहती हैं, उस समय बड़़ी हड़बड़ी होती है)। आपकी दासियाँ चिल्लाती हैं — "ब्रह्मा का मुकुट बचाओ! (ठोकर न लगे), कैटभ-शत्रु (विष्णु) के कठोर मुकुट से बचो! इन्द्र (जम्भारि) के मुकुट को मत छुओ!" आपके द्वारा शिव के सम्मान में एकदम उठ खड़े होने (अभ्युत्थान) के समय, आपके परिजनों की ये उक्तियाँ (चेतावनियाँ) आज भी गूँज रही हैं (विजयी हो रही हैं)।
विवेचन: यह एक 'सजीव चित्र' (Visual Imagery) है।
1. राजसी दरबार: सभी देवता मुकुट झुकाकर चरणों में पड़े हैं। भीड़ इतनी है कि पैर रखने की जगह नहीं।
2. पति-प्रेम: माँ जगदम्बा हैं, पर शिव के आते ही वह मर्यादावश एकदम खड़ी हो जाती हैं।
3. व्यंग्य: ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र के मुकुट 'फर्श' जैसे बन गए हैं। यह माँ की सर्वोच्चता और देवताओं की दीनता दर्शाता है।
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥ ३०॥
भावार्थ: जो साधक, अपने शरीर से उत्पन्न होने वाली 'अणिमा आदि' सिद्धियों की किरणों (जो चारों ओर फैल रही हैं) से घिरे हुए, 'नित्य और अद्वितीय' (One without a second) आपको यह मानकर पूजता है कि "मैं ही वह (आप) हूँ" (अहमिति सदा भावयति); उस साधक की दृष्टि में शिव की अष्ट-मूर्ति सम्पदा भी 'तिनके' (Trin) समान तुच्छ हो जाती है, और स्वयं महा-प्रलय की अग्नि (महासंवर्त-अग्नि) उसकी 'आरती' उतारती है (उसे जला नहीं पाती)।
विवेचन: यह 'सोऽहम्' (Sah-Aham) साधना है — 'मैं ही शक्ति हूँ'।
1. आरक्षा-कवच: ऐसा साधक अपनी आभामंडल (Aura) से सुरक्षित रहता है।
2. अग्नि-परीक्षा: प्रलय की आग भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, बल्कि सम्मान में आरती करती है।
3. वैराग्य: उसे इन्द्र या शिव का पद भी छोटा लगता है, क्योंकि वह स्वयं 'ब्रह्म' बन चुका होता है।
चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना-
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥ ३१॥
भावार्थ: पशुपति (शिव) ने 64 तंत्रों के द्वारा पूरे संसार को (विभिन्न सिद्धियों के जाल में) बाँध रखा है, जो केवल एक-एक सिद्धि देने वाले हैं। परन्तु आपके विशेष आग्रह (निर्बन्ध) पर, उन्होंने इस 'स्वतन्त्र-तन्त्र' (श्रीविद्या) को प्रकट किया, जो सभी पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को एक साथ देने में समर्थ है।
विवेचन: यहाँ 'श्रीविद्या' की सर्वश्रेष्ठता स्थापित की गई है।
1. 64 तंत्र: ये सांसारिक सिद्धियाँ (जैसे मारण, मोहन, वशीकरण) देते हैं, पर मोक्ष नहीं। ये 'परतंत्र' हैं (सशर्त हैं)।
2. स्वतन्त्र तंत्र: श्रीविद्या (ललिता-उपासना) एकमात्र ऐसा मार्ग है जो 'भोग और मोक्ष' दोनों साथ देता है। इसे 'तन्त्र-राज' कहा जाता है।
शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥ ३२॥
भावार्थ: शिव (क), शक्ति (ए), काम (ई), क्षिति (ल) — (यह पहला कूट); रवि (ह), शीतकिरण (स), स्मर (क), हंस (ह), शक्र (ल) — (यह दूसरा कूट); परा (स), मार (क), हरि (ल) — (यह तीसरा कूट)। इन तीनों कूटों के अंत में 'हृल्लेखा' (ह्रीं) जोड़ने से जो वर्ण बनते हैं, वे हे जननी! आपके नाम (मन्त्र) के अवयव बनते हैं।
विवेचन: यह 'पञ्चदशी मंत्र' (कादि विद्या) का गोपनीय उद्धार है:
1. वाग्भव कूट: क, ए, ई, ल, ह्रीं (5 अक्षर)।
2. कामराज कूट: ह, स, क, ह, ल, ह्रीं (6 अक्षर)।
3. शक्ति कूट: स, क, ल, ह्रीं (4 अक्षर)।
कुल 15 अक्षर। यह मंत्र साक्षात् ललिता महात्रिपुरसुन्दरी का 'शब्द-शरीर' है।
स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः
शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥ ३३॥
भावार्थ: हे नित्ये! जो साधक आपके (पंचदशी) मंत्र के आरम्भ में 'स्मर' (क्लीं/क), 'योनि' (ह्रीं/ए) और 'लक्ष्मी' (श्रीं) — इन तीनों को लगाकर; शिव-रूपी अग्नि (चिदग्नि) में सैकड़ों घी की धाराओं की आहुति देते हुए, 'चिंतामणि' की माला से आपका जप करते हैं; वे असीम और निरन्तर (निरवधि) 'महा-भोग' के रसिक बनते हैं (उन्हें शिव-तुल्य ऐश्वर्य मिलता है)।
विवेचन: यह 'षोडशी' या 'महा-षोडशी' मंत्र का संकेत है।
1. बीज-त्रय: श्रीं, ह्रीं, क्लीं — ये लक्ष्मी, माया और काम बीज हैं।
2. चिन्तामणि जप: जिसका मन 'चिन्तन' से मुक्त होकर 'मणि' (प्रकाश) जैसा हो जाए।
3. फल: ऐसे साधक के लिए भोग ही मोक्ष बन जाता है (योगो भोगायते)।
शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं
तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।
अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥ ३४॥
भावार्थ: हे भगवती! आप शंभु का शरीर हैं, और सूर्य-चन्द्रमा आपके दो स्तन हैं। आप निष्पाप और 'नौ व्यूहों' वाली (नवात्म-अनघम्) हैं। इसलिए मैं मानता हूँ कि आप दोनों (शिव और शक्ति) के बीच 'शेष-शेषी' (अंग-अंगी) का सम्बन्ध है जो दोनों के लिए समान है; और आप दोनों 'समरस' होकर 'परमानन्द' में स्थित हैं।
विवेचन: यह 'सामरस्य' (Perfect Harmony) का सिद्धांत है।
1. नवात्मा: माँ 9 रूपों में व्यक्त हैं (समय, मंत्र, चक्र आदि)।
2. शेष-शेषी: जैसे गुण और गुणी अलग नहीं हो सकते, वैसे ही शिव और शक्ति। शिव 'प्रकाश' हैं तो शक्ति 'विमर्श' (Self-awareness)। शक्ति के बिना शिव 'शव' हैं।
मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥ ३५॥
भावार्थ: आप ही मन (Mind) हैं, आप ही आकाश (Ether) हैं, आप ही वायु (Air) हैं, आप ही अग्नि (Fire), आप ही जल (Water) और आप ही पृथ्वी (Earth) हैं। जब आप इस 'विराट विश्व' के रूप में परिणत हो गई हैं, तो आपसे अलग (परम्) कुछ भी नहीं है। आप केवल अपने 'आनंद-स्वरूप' (शिव) को प्रकट करने के लिए ही इस 'शिव-युवती' (शक्ति) के रूप में विश्व-शरीर धारण करती हैं।
विवेचन: यह माँ का 'विश्वरूप' दर्शन है। पंचभूत और मन — यही सृष्टि का आधार है। वैज्ञानिक दृष्टि से 'Matter and Energy are one'। माँ ही Energy (शक्ति) हैं जो Matter (विश्व) बनी हैं।
तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभुवने ॥ ३६॥
भावार्थ: मैं आपके 'आज्ञा-चक्र' (Bhrumadhya) में स्थित उन 'परम-शम्भु' (Supreme Shiva) की वन्दना करता हूँ जो 'पर-चिति' (Supreme Consciousness, Shakti) के साथ मिले हुए हैं, और करोड़ों सूर्य-चन्द्रमाओं की कांति धारण करते हैं। जो साधक भक्ति-भाव से इनकी आराधना करता है, वह उस 'आलोक-भुवन' (Realm of Light) में निवास करता है जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि की पहुँच नहीं है (जो स्वयंप्रकाशित है)।
विवेचन: यह 'आज्ञा-चक्र' (Mind center) का ध्यान है।
1. स्थान: दोनों भौंहों के बीच। यहाँ 'मन' (Mind) का विलय 'आत्म-तत्त्व' में होता है।
2. निरालोक: यह वह अवस्था है जहाँ भौतिक प्रकाश की जरूरत नहीं। "न तत्र सूर्यो भाति..." (कठोपनिषद्)। यह आत्म-ज्योति का क्षेत्र है।
विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे-
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३७॥
भावार्थ: मैं आपके 'विशुद्धि-चक्र' (कंठ) में स्थित, शुद्ध स्फटिक मणि जैसे निर्मल, आकाश-तत्त्व को उत्पन्न करने वाले 'शिव' (व्योमेश्वर) और उनके समान ही धर्म वाली 'देवी' (व्योमेश्वरी) की सेवा करता हूँ। जिन दोनों की फैलती हुई कांति (किरणों) के सहारे, यह अज्ञान-अंधकार से ग्रसित दुनिया, चांदनी को देखकर खिलने वाली 'चकोरी' की तरह आनंदित होती है।
विवेचन: यह 'विशुद्धि-चक्र' (Throat center) का ध्यान है।
1. तत्त्व: आकाश (Space/Ether)। गुण: शब्द।
2. रहस्य: यहाँ शिव-शक्ति 'स्फटिक' (Crystal Clear) रूप में हैं। यह शुद्ध ज्ञान का प्रतीक है। इनकी उपासना से साधक का अज्ञान (Inner Darkness) मिट जाता है।
समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति-
र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३८॥
भावार्थ: मैं (अनाहत चक्र में) खिले हुए ज्ञान-रूपी कमल के मकरन्द (शहद) का पान करने वाले उस 'अद्भुत हंस-जोड़े' (शिव-शक्ति) को भजता हूँ, जो महान योगियों के 'मानस-सरोवर' (मन) में तैरते हैं। जिनके गुंजन (संलाप) से अठारह विद्याएँ (18 Vidyas) प्रकट होती हैं; और जो (दूध और पानी की तरह) संसार के दोषों को छोड़कर केवल गुणों को ग्रहण करते हैं।
विवेचन: यह 'अनाहत-चक्र' (Heart center) का ध्यान है।
1. हंस-युगल: 'हं' (शिव) और 'सः' (शक्ति)। हमारी श्वास 'हंस' मंत्र जप रही है।
2. 18 विद्याएँ: 4 वेद, 6 वेदांग, पुराण, न्याय, मीमांसा आदि सब इसी 'हृदय-आकाश' से प्रकट हुए हैं।
तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३९॥
भावार्थ: हे जननी! मैं आपके 'स्वाधिष्ठान-चक्र' में, अग्नि-तत्त्व पर आरूढ़ (Adhisthaya), प्रलय-कालीन अग्नि (संवर्त) जैसे तेजस्वी 'रुद्र' और उनकी शक्ति 'महासमया' की वंदना करता हूँ। जब वह रुद्र क्रोध से लोकों को जलाने लगते हैं, तब आपकी 'दया से भीगी हुई' (दयार्द्रा) शीतल दृष्टि ही उस ताप को शांत करके विश्व की रक्षा (उपचार) करती है।
विवेचन: यह 'स्वाधिष्ठान-चक्र' (Sacral center) का ध्यान है।
1. तत्त्व: अग्नि। यह सृजनात्मक आग है।
2. रहस्य: शिव की अग्नि 'संहारक' है, पर शक्ति की करुणा उसे 'पालक' बना देती है। हमारे भीतर का क्रोध (Fire) जब भक्ति से मिलता है, तो वह ओज (Vitality) बन जाता है।
तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥ ४०॥
भावार्थ: मैं आपके 'मणिपूर-चक्र' में स्थित उस 'नील-मेघ' (काले बादल) रूपी शिव की सेवा करता हूँ, जो नाना प्रकार के रत्न-आभूषणों (मणि-पूर) की कांति रूपी 'इन्द्रधनुष' (Rainbow) से घिरे हैं, और अपनी शक्ति रूपी 'विद्युत' (Lightning) से चमक रहे हैं। वह मेघ 'संहार-कालीन सूर्य' (हर-मिहिर) से तपते हुए तीनों लोकों पर 'शांति की वर्षा' कर रहा है।
विवेचन: यह 'मणिपूर-चक्र' (Solar Plexus) का अद्भुत ध्यान है।
1. जलता हुआ जगत: मणिपुर-चक्र अग्नि का केन्द्र है (Heat), पर यहाँ माँ की कृपा से काले-बादल (Cooling Mist) का ध्यान बताया है।
2. इन्द्रधनुष: मणिपुर 10 दल वाला है, जो रत्नों से चमकता है।
3. फल: यह ध्यान पेट की अग्नि (Acid/Heat) को शांत करता है और जीवन के संताप मिटाता है।
तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ॥ ४१॥
भावार्थ: मैं आपके मूलाधार चक्र (पृथ्वी तत्त्व) में स्थित उस 'नवात्मा' (शिव) का ध्यान करता हूँ, जो 'लास्य-नृत्य' में मग्न अपनी शक्ति 'समया' के साथ मिलकर 'महाताण्डव' और 'नवरस' (श्रृंगार आदि) का अभिनय कर रहे हैं। हे जननी! आप दोनों (जगत के माता-पिता) के संयोग से ही यह अनाथ संसार 'सनाथ' (स्वामी वाला/सुरक्षित) हुआ है।
विवेचन: यह 'आनन्दलहरी' (भाग-1) का अन्तिम श्लोक है।
1. ताण्डव और लास्य: शिव का नृत्य (ताण्डव) पौरुष और संहार का प्रतीक है, शक्ति का नृत्य (लास्य) कोमलता और सृजन का। जब ये दोनों मिलते हैं, तभी सृष्टि का चक्र चलता है।
2. समया: यहाँ शक्ति को 'समया' (Samayachar Tantra) कहा है जो आन्तरिक पूजा (Mental Worship) की अधिष्ठात्री हैं।
॥ सौन्दर्यलहरी (४२-१०३) ॥
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ ४२॥
भावार्थ: हे हिमगिरि-सुते! जो भक्त आपके 'रत्न-जटित स्वर्ण-मुकुट' (जिसमें 12 सूर्य मणियां बनकर जड़े हैं) का वर्णन करता है, वह चंद्रमा के टुकड़े (अर्धचंद्र) को इन्द्रधनुष क्यों न मान ले? (क्योंकि मणियों की रंगीन कांति से अर्धचंद्र भी इन्द्रधनुषी होकर रंग-बिरंगा दिखता है)।
विवेचन: यहाँ से 'सौंदर्यलहरी' (भाग-2) का प्रारंभ है।
1. ब्रह्मांड का शिरोभूषण: माँ का मुकुट केवल सोना नहीं, बल्कि 'द्वादश-आदित्य' (12 Suns) हैं।
2. इन्द्रधनुष: जब सूर्य (मणि) और चंद्रमा (अर्धचंद्र) मिलते हैं, तो प्रकाश का 'वर्ण-विक्षेपण' (Rainbow) होता है। यह माँ के विराट और बहुरंगी स्वरूप का द्योतक है।
धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं
घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ॥ ४३॥
भावार्थ: हे शिवे! आपके घने (Ghana), चिकने (Snigdha) और कोमल (Shlakshna) बाल, जो खिले हुए 'नीलकमल वन' के समान हैं, हमारे अज्ञान-रूपी अंधकार (Inner Darkness) को दूर करें। मुझे लगता है कि नंदनवन के कल्पवृक्ष-पुष्प (Sumanas) अपनी सुगंध बढ़ाने के लिए, आपके बालों में (गजरे के रूप में) आकर बसते हैं, ताकि उन्हें आपकी स्वाभाविक 'दिव्य-गंध' मिल सके।
विवेचन: यह 'केश-पाश' का सौंदर्य है।
1. अंधकार से प्रकाश: सामान्यतः प्रकाश अंधकार को मिटाता है, पर यहाँ माँ के 'काले बाल' (Black Hair) अज्ञान को मिटा रहे हैं। यह 'विपरीत-लक्षणा' है।
2. स्वाभाविक सुगंध: फूलों में खुशबू होती है, पर वे माँ के बालों से खुशबू 'लेने' आते हैं, देने नहीं।
तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी-
परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर-
द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥ ४४॥
भावार्थ: आपकी माँग (सीमंत) का सिन्दूर हमारा कल्याण करे। यह ऐसा लगता है मानो (1) आपके मुख-सौंदर्य की बाढ़ (Lahar) की धारा बह निकली हो, या (2) काले बालों (केश-पाश) रूपी शत्रुओं के झुंड ने, 'बाल-सूर्य' की किरण को कैद कर लिया हो (और वह सिन्दूर बनकर चमक रही हो)।
विवेचन: सिन्दूर 'सुहाग' और 'शक्ति' का प्रतीक है।
1. कैद सूर्य: माँ के काले बाल 'अंधकार/शत्रु' हैं और सिन्दूर 'सूर्य/ज्ञान' है। अंधकार ने ज्ञान को घेरा है, फिर भी ज्ञान (सूर्य) चमक रहा है।
2. सौंदर्य-लहरी: सिन्दूर वह 'चैनल' है जिससे माँ का सौंदर्य (या कुण्डलिनी शक्ति) ऊपर की ओर बहता है।
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥ ४५॥
भावार्थ: स्वभाव से ही घुंघराले बालों से घिरा आपका मुख कमल की शोभा को भी लजाता है। जब आप मंद मुस्कुराती हैं (Dar-smere), तो आपके दाँतों की कांति 'केसर' (Filaments) बन जाती है, जिस पर कामदेव को जलाने वाले शिव (स्मर-दहन) के नेत्र-रूपी भौंरे भी, उसकी सुगंध से मदमस्त होकर मँडराने लगते हैं।
विवेचन: यह माँ के मुख-मण्डल का प्रभाव है।
1. शिव का सम्मोहन: शिव ने कामदेव को जला दिया था (जितेन्द्रिय), पर माँ की मुस्कान के सामने वे भी 'भ्रमर' (रसिक) बन गए।
2. सुगंध: कमल में सुगंध होती है, पर माँ के मुख की 'वाचिक' सुगंध वेदों का ज्ञान है जो शिव को भी प्रिय है।
ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-
द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥ ४६॥
भावार्थ: आपका ललाट, जो लावण्य की द्युति से विमल है, मुझे 'द्वितीय' (अष्टमी का) चंद्रमा लगता है। मुकुट में जड़ा 'अर्धचंद्र' (Pahla tukda) और आपके ललाट का 'अर्धचंद्र' (Doosra tukda) — यदि इन दोनों को उलटकर मिला दिया जाए, तो वह 'अमृत' (Sudha) से जुड़ा हुआ 'पूर्णमासी का चंद्रमा' (Raaka-Himakara) बन जाएगा।
विवेचन: यह 'योगिक गणित' है।
1. अपूर्णता से पूर्णता: शिव के पास केवल अर्धचंद्र है (अपूर्ण), शक्ति के पास भी अर्धचंद्र (ललाट) है। जब शिव-शक्ति मिलते हैं, तभी 'पूर्ण-चंद्र' (पूर्णता/पूर्णिमा) का उदय होता है।
2. सहस्रार: ललाट के ऊपर ही सहस्रार है जहाँ सुधा-सिंधु (Ocean of Nectar) बहता है।
भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥ ४७॥
भावार्थ: हे उमे! (जगत का भय दूर करने वाली), आपकी थोड़ी टेढ़ी (Bhugne) भौंहें कामदेव का वह 'धनुष' हैं, जिसकी डोरी (String) आपके लंबे नेत्र (मधुकर-रुचि) हैं। आपकी नासिका तो कामदेव की 'मुट्ठी' है, जिसने धनुष के मध्य भाग को (जहाँ इसे पकड़ा जाता है) छिपा लिया है।
विवेचन: यहाँ भ्रू-मध्य (Center of eyebrows) का रहस्य है।
1. काम-कोदंड: माँ की भौंहें ही वे हथियार हैं जिनसे कामदेव (Eros/Desire) संसार को जीतता है।
2. अभय-मुद्रा: 'उमे' संबोधन का अर्थ है — "उ मा" (तप मत करो)। माँ अपने भक्तों के भय (संसार का डर) को अपनी भौंहों के इशारे से ही मिटा देती हैं।
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ॥ ४८॥
भावार्थ: (लोग कहते हैं) आपका दायाँ नेत्र 'सूर्य' रूप होकर दिन (Ahah) को जन्म देता है, और बायाँ नेत्र 'चंद्रमा' रूप होकर रात (Triyama) को। और आपका (ललाट पर स्थित) तीसरा नेत्र, जो 'थोड़े खिले हुए स्वर्ण-कमल' (Golden Lotus) जैसा है, वह दिन और रात के बीच की 'संध्या' (Twilight) का निर्माण करता है।
विवेचन: यह 'काल-चक्र' है।
1. सूर्य-चन्द्र-अग्नि: पिंगला (सूर्य/दायाँ), इड़ा (चन्द्र/बायाँ), सुषुम्ना (अग्नि/मध्य)।
2. संध्या: योग में 'संध्या-भाषा' वह है जो द्वैत (दिन-रात) से परे 'अद्वैत' (संध्या) में ले जाए। तीसरा नेत्र ही वह द्वार है।
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥ ४९॥
भावार्थ: आपकी दृष्टि 'विशाला' (विशाल), 'कल्याणी' (मंगलकारी), 'अयोध्या' (अजेय/युद्ध रहित), 'धारा' (मद-धारा), 'मधुरा' (मधुर/सुंदर), 'भोगवती' (नागलोक जैसी/सुखदा), 'अवन्ती' (रक्षक) और 'विजया' (विजयी) है। यह दृष्टि इन आठों 'नगरों' (समृद्धियों/गुणों) के नामों को सार्थक करती हुई (तीनों लोकों पर) विजय प्राप्त करती है।
विवेचन: यहाँ 'अष्ट-दृष्टि' (Eight Glances) और 8 ऐतिहासिक नगरों (Cities) का श्लेष है।
1. विशाला: विस्मित दृष्टि / उज्जैन नगरी।
2. कल्याणी: मुग्ध दृष्टि / कल्याणी नगर।
3. अयोध्या: अपराजित / राम की नगरी।
... और इसी प्रकार। माँ की एक ही नज़र में दुनिया के सारे ऐश्वर्य और नगरों का वैभव समाया है।
कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥ ५०॥
भावार्थ: कवियों (ब्रह्मा आदि) के द्वारा रचित काव्य-रूपी गुच्छों के मकरन्द (रस) को पीने के एकमात्र रसिक, आपके 'दोनों कान' (Karna-yugalam) हैं। आपके दोनों नेत्र (जो कानों तक लंबे हैं) जब उस रस को पीने के लिए 'भ्रमर' बनकर कानों के पास मँडराते हैं, तो यह देखकर (रसपान में बाधा मानकर या ईर्ष्या से) आपका 'तीसरा नेत्र' थोड़ा लाल (Arunam) हो गया है।
विवेचन: यह 'ईर्ष्या' का दैवीय रूप है।
1. श्रवण-सुख: कान ज्ञान (काव्य) सुनते हैं। आँखें (दृष्टि) भी वही रस लेना चाहती हैं।
2. तीसरा नेत्र (अग्नि): यह ज्ञान-चक्षु है। भौतिक रस (काव्य/संगीत) में इसकी रुचि नहीं, इसलिए यह 'अरुण' (तप्त/लाल) रहता है। इसे केवल 'समाधि' का रस चाहिए।
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती । (गिरिशनयने)
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी (जयिनी)
सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ॥ ५१॥
भावार्थ: हे शिवे! आपकी दृष्टि शिव के प्रति 'शृंगार-रस' (प्रेम) से आर्द्र (गीली) है; अन्य पुरुषों के प्रति 'वीभत्स-रस' (घृणा/तिरस्कार) से युक्त; (सपत्नी) गंगा पर 'रौद्र-रस' (रोष) से भरी; हिमालय-चरित्र (या शिव-कथा) सुनते समय 'अद्भुत-रस' (विस्मय); सर्पों से 'भयानक-रस' (भय); कमलों के सौंदर्य को जीतने के लिए 'वीर-रस' (जयिनी); सखियों के प्रति 'हास्य-रस' (स्मेरा); और मुझ (भक्त) पर 'करुण-रस' (दया) से परिपूर्ण है। (इस प्रकार आप अष्ट-रसात्मिका हैं)।
विवेचन: यह माँ का 'नवरस-स्वरूप' है (शांत रस सहित)।
1. भक्त के लिए: भक्त को केवल अंतिम रस 'करुणा' (Mercy) चाहिए। माँ की एक दृष्टि ही उसे सारे पापों से मुक्त कर सकती है।
2. विस्मय: शिव का चरित्र इतना विचित्र (Wonder) है कि स्वयं शक्ति भी उसे सुनकर चकित हो जाती हैं।
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥ ५२॥
भावार्थ: हे पर्वतराज-कुल-दीपक कलिके! आपके लंबे 'नेत्र' (बाण) कानों तक (Karnabhyarnam) फैले हैं और उनकी 'बरौनियां' (Pakhshmani) बाण के पंखों (Feathers) जैसी हैं। ये नेत्र-बाण शिव (त्रिपुरारी) के उस शांत चित्त को भी विचलित (Vidravana) करने में सक्षम हैं, मानो कामदेव ने अपना बाण कान तक खींचकर (Aakarna-dhanurasana) संधान किया हो।
विवेचन: नेत्रों की उपमा 'बाण' से है।
1. लक्ष्य: शिव का 'वैराग्य' (Detachment)। माँ का सौंदर्य शिव को समाधि से जगाकर रचना (सृष्टि) में प्रवृत्त करता है।
2. पंख: तीर में संतुलन के लिए पंख होते हैं, यहाँ बरौनियां वही काम करती हैं ताकि निशाना न चूके।
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥ ५३॥
भावार्थ: हे ईश-प्रिये! आपके तीन नेत्रों में तीन रंग स्पष्ट हैं — 'श्वेत' (तारा), 'रक्त' (कोने) और 'श्याम' (पुतली/काजल)। ये मानो प्रलय में लीन हुए 'ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र' को पुनः उत्पन्न करने के लिए, क्रमशः रजोगुण (रक्त), सत्त्वगुण (श्वेत) और तमोगुण (श्याम) — इन 'तीन गुणों' (Traivarnyam) को धारण किए हुए हैं।
विवेचन: माँ 'त्रिगुणातीत' और 'त्रिगुणात्मिका' दोनों हैं।
1. सृष्टि-रहस्य: जब प्रलय के बाद पुनः सृष्टि करनी होती है, तो माँ अपने नेत्रों के तीन रंगों (गुणों) से ही त्रिदेवों को प्रकट करती हैं।
2. रंग-विज्ञान: सत्त्व (सफेद - विष्णु), रज (लाल - ब्रह्मा), तम (काला - रुद्र)।
पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।
नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥ ५४॥
भावार्थ: हे पशुपति-पराधीन-हृदये! (शिव के वश में रहने वाली), आप हमें पवित्र करने के लिए, अपने दया-युक्त नेत्रों (अरुण, धवल, श्याम) के द्वारा मानो 'शोण नद' (लाल), 'गंगा' (श्वेत) और 'यमुना' (श्याम/तपन-तनया) — इन तीन तीर्थों का 'पवित्र संगम' (Triveni Sangam) ही हमारे पास ले आती हैं।
विवेचन: यह 'कटाक्ष-स्नान' है।
1. अघमर्षण: तीर्थों में जाकर नहाना पड़ता है, पर माँ की दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहाँ तीनों नदियाँ (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना) साक्षात् बहने लगती हैं।
2. अनघ (पाप-रहित): इस दृष्टि-संगम में डुबकी लगाने वाला जीव तत्काल 'पाप-मुक्त' हो जाता है।
निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥ ५५॥
भावार्थ: हे पर्वतराज-पुत्री! संत (विद्वान) कहते हैं कि आपके 'उन्मेष' (नेत्र खुलने) से जगत का 'उदय' (सृष्टि) होता है और 'निमेष' (नेत्र बंद होने) से 'प्रलय' (Dissolution) होता है। शायद इसीलिए, इस सम्पूर्ण जगत को (अकाल) प्रलय से बचाने के लिए, आप अपने नेत्र कभी बंद नहीं करतीं (अनिमेष रहती हैं)।
विवेचन: यह माँ की 'वात्सल्य-करुणा' है।
1. सृष्टि-स्थित-लय: माँ की आँखों की पलक झपकना ही काल का चक्र है।
2. अनिमेष दृष्टि: देवता अपलक देखते हैं, पर यहाँ कारण बताया गया है — "कहीं मेरी आँख बंद होते ही मेरे बच्चों (संसार) का नाश न हो जाए।"
तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥ ५६॥
भावार्थ: हे अपर्णे! आपके लंबे नेत्र कानों तक जाकर (कानाफूसी जैसा करते हुए) कुछ 'चुगली' (Paishunya) करते हैं, इस भय से 'शफरी' (मछलियाँ) हमेशा पानी में छिपी रहती हैं (अनिमेष/खुली आँखों से)। और लक्ष्मी (श्री) भी सुबह 'बंद कमलों' (सोते हुओं) को छोड़ देती हैं और (जागृत) कमलों में प्रवेश करती हैं — मानो वह आपके खुले नेत्रों की समानता पाना चाहती हैं।
विवेचन: उपमाओं की हार:
1. मछली: मछली की आँखें झपकती नहीं, पर वह पानी में डरकर रहती है क्योंकि माँ के नेत्र उससे सुंदर हैं।
2. कमल: लक्ष्मी को 'चंचला' कहा जाता है, पर वह माँ के नेत्रों (जागृत अवस्था) में स्थिर रहना चाहती हैं।
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥ ५७॥
भावार्थ: हे शिवे! अपनी लंबी (Draghiyasya) और 'अधखिले नीलकमल' जैसी सुंदर (कांति वाली) दृष्टि से, मुझ 'दूर स्थित' (Daviyaasam), 'दीन' (हीन) भक्त पर भी कृपा की वर्षा (स्नान) करें। इससे मैं धन्य (पवित्र) हो जाऊँगा और आपकी कोई हानि नहीं होगी — जैसे चंद्रमा की चाँदनी (Himakara) वन (जंगल) और महल (Haramya) दोनों पर समान रूप से पड़ती है।
विवेचन: यह शरणागति का सर्वश्रेष्ठ श्लोक है।
1. पात्रता-अपात्रता: चंद्रमा यह नहीं देखता कि नीचे महल है या जंगल। वैसे ही माँ, मैं 'दीन' हूँ, पर आपकी दृष्टि तो 'सम-दर्शी' है।
2. स्नपय (Bathe me): भक्त धन-दौलत नहीं, केवल 'दृष्टि-स्नान' मांग रहा है। "मेरी और देखो, बस!"
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदण्डकुतुकम् ।
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस-
न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥ ५८॥
भावार्थ: हे पर्वतराज-पुत्री! आपके कानों और नेत्रों के बीच का 'टेढ़ा स्थान' (Pali / Side of face), किसे कामदेव के 'धनुष' (Kodanda) का भ्रम नहीं देता? जहाँ आपके 'तिरछी चितवन' (Katkasha/Apanga), कानों (श्रवण-पथ) को लांघती हुई, ऐसी लगती है मानो कामदेव ने 'बाण-संधान' (तीर चढ़ाने) का निश्चय कर लिया हो।
विवेचन: यहाँ नेत्र-प्रान्त (Corner of eyes) का वर्णन है।
1. कानों का उल्लंघन: सामान्य तीर कान तक खींचा जाता है, पर माँ की आँखें कानों से भी आगे (परे) जाती हैं। यह 'असीमित दृष्टि' (Unlimited Vision) का संकेत है।
2. काम-विजय: इस धनुष (सौंदर्य) से माँ ने शिव के वैराग्य को बींध दिया है।
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥ ५९॥
भावार्थ: आपके चमकते गालों (Ganda) में झलकते 'दो ताटंक' (Ear-rings) मिलकर 'चार पहियों' (Chakra) जैसे लगते हैं (दो असली, दो प्रतिबिंब)। इससे आपका मुख कामदेव का 'चार पहियों वाला रथ' (Pushpaka Ratha) जान पड़ता है। इसी रथ पर चढ़कर, वह 'महावीर' (कामदेव), उस शिव (त्रिपुरारी) का सामना करने का साहस करता है जो पृथ्वी को रथ और सूर्य-चंद्र को पहिये बनाकर युद्ध के लिए सज्जित थे।
विवेचन: मुख-सौंदर्य की विजय।
1. सरल बनाम विशाल: शिव का रथ विशाल पृथ्वी थी, पर वे कामदेव से हार गए। कामदेव का रथ केवल 'माँ का मुख' था, और वह जीत गया।
2. ताटंक महिमा: ताटंक (सौभाग्य) ही शक्ति का वह अस्त्र है जो अजेय (शिव) को भी जीत लेता है।
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥ ६०॥
भावार्थ: हे शर्वाणी! वीणावादिनी सरस्वती की 'अमृतमयी सूक्तियों' (Saraswati's songs) को आप अपने 'कान-रूपी अंजिलियों' (Chuluka) से निरंतर पी रही हैं। उस समय आनंद से सिर हिलाते हुए आपके 'कुंडलों की झनकार' (Jhanat-kara) मानो सरस्वती को 'तार' (High pitch) स्वर में 'वाह-वाह' / 'साधु-साधु' (Prati-vachana) कह रही है।
विवेचन: यह संगीत और विद्या का सम्मान है।
1. श्रोता श्रेष्ठ: सरस्वती गा रही हैं, पर देवी (श्रोता) की प्रशंसा (कुंडलों की झनकार) उस गान को पूर्णता देती है।
2. ज्ञान का पान: कानों को 'चुलुक' (हथेली का प्याला) कहा है, जिससे ज्ञान पिया जाता है।
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥ ६१॥
भावार्थ: हे जननी! आपकी नासिका-रूपी 'बाँस' (Vamsha) — जो हमारे 'हिमालय-वंश' की ध्वजा (Flagstaff) है — हमें 'अति-निकट' (Nediyah) और उचित फल प्रदान करे। आपकी 'शीतल निश्वास' (इड़ा-चंद्र नाड़ी) से अंदर मोती (Mukta) बनते हैं, और शायद उन्हीं मोतियों की समृद्धि (Overflow) के कारण आपने बाहर भी नासिका पर एक 'मोती' (नथ/Bulaak) धारण किया हुआ है।
विवेचन: नासिका में 'प्राण-शक्ति' का वास है।
1. वंश-ध्वजा: माँ पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उनकी ऊंची नासिका हिमालय कुल की कीर्ति-पताका है।
2. शीतल निश्वास: माँ की साँसें 'चंद्र-स्वर' (Cooling Breath) हैं जो भक्तों के ताप को हर लेती हैं। बाँस में मोती (Vamsha-Muktaphala) दुर्लभ होते हैं, पर माँ की नासिका में यह सहज है।
प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥ ६२॥
भावार्थ: हे सुदति (सुंदर दाँतों वाली)! आपके 'स्वाभाविक लाल' (Prakritya-raktayah) होंठों की उपमा किससे दूँ? 'मूँगा-लता' (Coral) तो फल देती ही नहीं (निष्फल है), और 'बिम्बफल' (कुंदरू) का लाल रंग भी आपके होंठों के प्रतिबिंब से ही मिला है (उधारी का है), इसलिए वह भी तुलना (Tula) करने में लज्जित होकर (ग्रहण लगने पर) छिप जाता है।
विवेचन: यह 'अधर-सौंदर्य' है।
1. स्वाभाविक रक्तिमा: माँ के होंठों को रंगने की ज़रूरत नहीं, वे करुणा और राजसी आभा (Redness) से नित्य लाल हैं।
2. बिम्ब-लज्जा: बिम्बफल (Bimba fruit) लालिमा के लिए प्रसिद्ध है, पर कवि कहते हैं कि उसे भी यह रंग माँ की छाया पड़ने से मिला है। सूर्य-बिम्ब भी माँ के सामने फीका है।
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः
पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥ ६३॥
भावार्थ: आपके 'मुख-चंद्र' की 'मुस्कान-रूपी चाँदनी' (Smita-jyostana) — जो अत्यंत मधुर और रसपूर्ण है — को पी-पी कर चकोरों की चोंच 'जड़' (सुन्न/Jadima) हो गई है (मिठास की अति से)। इसीलिए वे (स्वाद बदलने के लिए) रात में चंद्रमा की (असली) चाँदनी को 'कांजी' (Sour Gruel/खट्टी छाछ) समझकर बड़े चाव से पीते हैं।
विवेचन: यह 'अमृत-पान' की स्थिति है।
1. मुस्कान बनाम चाँदनी: भौतिक चाँदनी (Moonlight) केवल शीतलता देती है, पर माँ की मुस्कान 'परमानंद' देती है।
2. कांजी: जैसे ज्यादा मीठा खाने के बाद खट्टा (Sour) अच्छा लगता है, वैसे ही चकोरों को माँ की मुस्कान के बाद चाँदनी 'खट्टी' लगती है।
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥ ६४॥
भावार्थ: हे जननी! आपकी जिह्वा (Tongue), जो 'जवाकुसुम' (Hibiscus) जैसी लाल है और निरंतर पति (शिव) के 'गुण-गणों' की कथा को दोहराने (Amredana) में लगी रहती है, वह सर्वोपरि (Jayathi) है। आपकी जिह्वा के अग्रभाग पर बैठी हुई 'श्वेत-वर्णा सरस्वती' (Crystal clear) भी (जिह्वा की लालिमा के प्रतिबिंब से) 'माणिक्य' (Ruby) जैसी लाल हो जाती हैं।
विवेचन: यह माँ की 'वाक्-सिद्धि' (Power of Speech) है।
1. सरस्वती का रूपांतरण: सरस्वती ज्ञान (सफेद) हैं, पर जब वे माँ की जिह्वा (भक्ति/प्रेम) पर आती हैं, तो वे भी 'रक्तिम' (अनुराग) हो जाती हैं। ज्ञान जब भक्ति में घुलता है, तभी पूर्ण होता है।
2. शिव-गुण गान: माँ स्वयं 'शिव-कथा' कहती हैं, जिसका अर्थ है कि शक्ति ही शिव को व्यक्त (Manifest) करती है।
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर्-
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥ ६५॥
भावार्थ: हे माता! युद्ध में दैत्यों (भंडासुर आदि) को जीतकर, अपने सिरस्त्राण (Helmets) उतारकर लौटे हुए 'कार्तिकेय (विशाख), इंद्र और विष्णु (उपेन्द्र)' — जो शिव (चंडांश/निर्माल्य) के प्रसाद को लेने से विमुख रहते हैं — वे आपके मुख के 'ताम्बूल' (पान) के उन टुकड़ों (कपूर मिले हुए) को लेने के लिए ललकते हैं जो आपके मुख से गिरते हैं।
विवेचन: यह 'उच्छिष्ट-प्रसाद' की महिमा है।
1. चण्डेश्वर भाग: शिव पर चढ़ाया गया नैवेद्य (निर्माल्य) चण्डेश्वर का भाग होता है, जिसे देवता/मनुष्य ग्रहण नहीं करते (अग्राह्य)।
2. शक्ति-प्रसाद: माँ का उच्छिष्ट (Jhutha) 'ब्रह्म-ज्ञान' देने वाला है। इसलिए बड़े-बड़े देवता भी उसे 'सिद्ध-अंजन' या महाप्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं।
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः
त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥ ६६॥
भावार्थ: जब सरस्वती (वाणी) अपनी वीणा (विपञ्ची) पर पशुपति (शिव) के विविध 'अपेदान' (वीर चरितों) का गान करती हैं, और उस पर आप (प्रसन्न होकर) सिर हिलाकर जब कुछ 'साधु-वचन' (वाह! बहुत सुंदर!) बोलती हैं, तो आपकी वाणी की मिठास के सामने वीणा के स्वर फीके (Apalapita) पड़ जाते हैं। तब सरस्वती लज्जित होकर चुपके से (Nibhritam) अपनी वीणा को खोल (Cover) में बंद कर देती हैं।
विवेचन: माँ 'संगीत-महारानी' हैं।
1. प्राकृत vs संस्कृत: वीणा कृत्रिम वाद्य है, माँ का कंठ 'दैवीय वाद्य' है।
2. सरस्वती की लज्जा: ज्ञान की देवी भी माँ के सामने तुच्छ अनुभव करती हैं। साधक जब माँ को पुकारता है, तो उसे 'वीणा-नाद' (अनाहत नाद) से भी ऊपर की शांति मिलती है।
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥ ६७॥
भावार्थ: हे गिरिसुते! पिता (हिमालय) वात्सल्य से जिसका स्पर्श करते हैं (ठोड़ी पकड़कर दुलारना), और पति (शिव) अधर-पान की आकुलता से जिसे बार-बार (Muhur) ऊपर उठाते हैं — जो शम्भु के हाथ में 'मुख-रूपी दर्पण' की 'मूठ' (Handle of a mirror) जैसी लगती है, आपकी उस 'उपमा-रहित' (Anupam) ठोड़ी (Chin) का वर्णन हम कैसे करें?
विवेचन: चिबुक (Chin) का सौंदर्य।
1. वात्सल्य और श्रृंगार: एक ही अंग (ठोड़ी) पिता के लिए 'स्नेह' का केंद्र है और पति के लिए 'प्रेम' का।
2. मुख-मुकुरवृन्त: प्राचीन काल में दर्पण के नीचे पकड़ने के लिए डंडी (Handle) होती थी। माँ का मुख दर्पण है और ठोड़ी उसकी डंडी। शिव इसे पकड़कर माँ के 'स्वरूप' (Self) का दर्शन करते हैं।
भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥ ६८॥
भावार्थ: त्रिपुरारी (शिव) के निरंतर आलिंगन (Bhujashlesha) से रोमांचित (कंटकित/Goosebumps) आपकी यह ग्रीवा (Neck), 'मुख-रूपी कमल' की 'नाल' (Stalk) जैसी शोभा देती है। इसके नीचे लटकती मोतियों की माला — जो स्वभाव से श्वेत है पर 'कालागुरु' (Black Agaru musk) के लेप से थोड़ी सांवली हो गई है — वह कमल-नाल के नीचे की 'जड़' (मृणाल/Muda) का लालित्य धारण करती है।
विवेचन: विशुद्धि चक्र (Throat) और ग्रीवा का वर्णन।
1. सात्त्विक भाव: रोमांच (Rupture/Hair standing on end) प्रेम की निशानी है। शिव के स्पर्श से शक्ति भी रोमांचित होती हैं।
2. श्वेत-श्याम: मोतियों (सफेद) पर कस्तूरी/अगरु (काला) का लेप 'शिव-शक्ति सामरस्य' का प्रतीक है।
गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥ ६९॥
भावार्थ: हे 'गति' (Tempo), 'गमक' (Modulation) और 'गीत' में निपुण माते! आपके गले में 'तीन रेखाएँ' (Tiro-rekhaha) ऐसी विराजती हैं मानो:
(1) विवाह के समय बाँधे गए 'मंगलसूत्र' के अनेक धागों की सीमा हों (Boundaries),
(2) तीनों 'ग्रामों' (षड्ज, मध्यम, गांधार - Musical Scales) की सीमा-रेखाएँ हों,
(3) या तीनों लोकों की मर्यादा हों।
विवेचन: कम्बु-ग्रीवा (Conch-like neck) की तीन रेखाएं।
1. संगीत-शास्त्र: माँ संगीत की जननी हैं। उनके कंठ में ही सातों सुर और तीनों ग्राम (Scales) बसते हैं।
2. मंगल-सूत्र: ये रेखाएं उनके 'नित्य-सुहागिन' होने का प्रमाण हैं।
मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥ ७०॥
भावार्थ: (हे माते!) ब्रह्मा जी (Sarasij-bhavah) अपने 'चार मुखों' से, आपकी 'कमल-नाल' (Mrinali) जैसी कोमल 'चार भुजाओं' (Four Arms) के सौंदर्य की स्तुति करते हैं। (वे चार ही मुखों से स्तुति क्यों करते हैं?) शायद वे अंधकासुर-हन्ता शिव के 'नाखूनों' (Nakh-agrah) से डरे हुए हैं (जिन्होंने उनका पाँचवाँ सिर काटा था), और अपने बचे हुए चार सिरों की रक्षा के लिए, आपकी चार भुजाओं से एक साथ 'अभय-दान' (Protection) चाहते हैं।
विवेचन: यह ब्रह्मा की 'शरणागति' है।
1. चतुर्भुज रूप: माँ की चार भुजाएं ४ वेदों, ४ पुरुषार्थों और ४ दिशाओं की प्रतीक हैं।
2. शिव-भय: शिव 'संहारक' हैं, पर शक्ति 'रक्षक' हैं। जिसे शिव से डर लगता है (पापों के कारण), उसे भी माँ की शरण (अभय-मुद्रा) बचा लेती है।
नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारसचणम् ॥ ७१॥
भावार्थ: हे उमे! आपके कोमल हाथों की कांति का वर्णन हम कैसे करें? आपके नखों की चमचमाती लालिमा तो सुबह के खिले हुए लाल कमल का भी उपहास करती है (उसे फीका बना देती है)। हाय! कमल तो आपके हाथों की बराबरी शायद तभी कर पाता, यदि वह भी (आपकी सेवा में लगी) लक्ष्मी जी के चरणों के 'लाक्षा-रस' (महावर) की लालिमा को प्राप्त कर पाता।
विवेचन: इस श्लोक में माँ के 'कर-कमलों' की दिव्यता का अकल्पनीय वर्णन है। कमल तो रात में बंद हो जाता है और उसकी शोभा क्षणिक है, जबकि माँ के हाथ सदैव 'अभय' और 'वरदान' देने के लिए खुले रहते हैं। लक्ष्मी, जो स्वयं समृद्धि की देवी हैं, उनके चरणों की लालिमा (लाक्षा) भी माँ के हाथों की स्वाभाविक लालिमा के आगे तुच्छ है। तंत्र साधना में, यह श्लोक देवी के हाथों से प्राप्त होने वाली 'संजीवनी शक्ति' और 'अष्ट-सिद्धि' की ओर संकेत करता है। साधक जब इन हाथों का ध्यान करता है, तो उसे यह अनुभूति होती है कि समस्त ब्रह्मांड का ऐश्वर्य (लक्ष्मी) माँ की सेवा में ही लीन है।
समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।
यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झटिति ॥ ७२॥
भावार्थ: हे देवी! आपके दोनों स्तन, जिनसे निरंतर वात्सल्य-रूपी दूध की धारा बहती रहती है और जिनका पान एक साथ स्कंद (कार्तिकेय) और द्विपवदन (हाथी-मुख वाले गणेश) करते हैं, हमारे सभी दुःखों को दूर करें। इन विशाल स्तनों को देखकर गणेश जी संशय में पड़ जाते हैं (कि कहीं ये उनके अपने कुम्भ-स्थल -मस्तक के उभार- तो नहीं हैं) और तुरंत अपनी सूंड से अपने सिर को टटोलने लगते हैं, जिससे (शिव-पार्वती को) हँसी आ जाती है।
विवेचन: यहाँ वात्सल्य और विनोद का अद्भुत संगम है। 'निरंतर बहता दूध' माँ की असीम 'करुणा' और 'ज्ञान-गंगा' है जो कभी सूखती नहीं। गणेश और कार्तिकेय (ज्ञान और शक्ति के प्रतीक) इसी दुग्ध-पान से पुष्ट होते हैं। गणेश का भ्रमित होकर अपना मस्तक छूना यह दर्शाता है कि माँ का स्वरूप और उनकी संतान (जीव) का स्वरूप एक ही चेतना-तत्व से बना है। दार्शनिक दृष्टि से, यह 'अद्वैत' का ही एक मधुर पारिवारिक दृश्य है। यह श्लोक साधक के मन से 'भेद-बुद्धि' और 'अज्ञान' के अंधकार को मिटाने के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ
न सन्देहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगमरसौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥ ७३॥
भावार्थ: हे हिमालय की पताका (कीर्ति) स्वरूपिणी देवि! हमारे मन में तनिक भी संदेह नहीं है कि आपके ये दोनों स्तन साक्षात 'अमृत से भरे हुए माणिक्य (रत्न) के कुप्पे' (कलश) हैं। क्योंकि इनका पान करने वाले दोनों पुत्र — गजानन (गणेश) और क्रौंच-दलन (कार्तिकेय) — आज भी 'कुमार' ही हैं और वधू-संगम (विषय-भोग) के आसक्ति-रस से सर्वथा अनजान हैं।
विवेचन: माँ के स्तनों में साधारण दूध नहीं, बल्कि 'ब्रह्म-ज्ञान' रूपी अमृत है। इसे पीने वाला 'अजर-अमर' हो जाता है। गणेश और कार्तिकेय के विवाह होने के बाद भी उन्हें 'नित्य कुमार' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सांसारिक वासनाओं से निर्लिप्त हैं। यह 'ऊर्ध्वरेता' अवस्था का प्रतीक है। जो साधक माँ की इस ज्ञान-धारा का पान करता है, वह गृहस्थ होते हुए भी 'विदेह' और 'जीवनमुक्त' बना रहता है। माणिक्य (लाल रंग) शक्ति का और अमृत (सफेद रंग) शिव का प्रतीक है — यह पुनः शिव-शक्ति सामरस्य का ही दर्शन है।
वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकां ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥ ७४॥
भावार्थ: हे माँ! आपके वक्षस्थल पर वह निर्मल मोतियों की माला सुशोभित है, जिसके मोती (शिव द्वारा संहार किए गए) गजासुर के मस्तक (कुम्भ) से निकले हैं। यह माला आपके बिम्ब-फल जैसे लाल होठों की कांति पड़ने से 'शबल' (चितकबरी/बहुरंगी) हो गई है। यह ऐसी लगती है मानो त्रिपुरारी (शिव) की श्वेत 'कीर्ति' के साथ उनका लाल 'प्रताप' (वीरता) मिल गया हो।
विवेचन: यहाँ तीन रंगों का रहस्य है — मोतियों का 'श्वेत' रंग (सात्विक/शिव की कीर्ति), होठों का 'राक्ष' (लाल/राजसी/शिव का प्रताप), और उनका मिश्रण। गजासुर के मस्तक से निकले मोती 'अहंकार के नाश' के प्रतीक हैं। जब अहंकार मिटता है, तभी जीव (मोती) माँ के हृदय के करीब (हार बनकर) पहुँचता है। शिव की 'कीर्ति' (शांति/ज्ञान) और 'प्रताप' (शक्ति/क्रिया) दोनों माँ के हृदय पर एक साथ विराजते हैं। यह अर्धनारीश्वर भाव को पुष्ट करता है कि शिव का पराक्रम और शांति दोनों शक्ति के बिना अधूरे हैं।
तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवियिता ॥ ७५॥
भावार्थ: हे पर्वत-कन्या! मैं मानता हूँ कि आपके स्तनों से बहने वाला दूध, आपके हृदय से उमड़ने वाला साक्षात 'सारस्वत-सागर' (ज्ञान का समुद्र) ही है। इसी दूध को जब आपने दया करके 'द्रविड़ शिशु' (आदि शंकराचार्य या ज्ञानसम्बंदर) को पिलाया, तो वह बालक पीते ही बड़े-बड़े विद्वान कवियों के बीच भी सबसे 'कमनीय' (श्रेष्ठ) महाकवि बन गया।
विवेचन: यह श्लोक 'शक्ति-पात' का प्रत्यक्ष प्रमाण है। माँ का दूध केवल पोषण नहीं, 'परा-विद्या' है। 'सारस्वत' का अर्थ है सरस्वती का तत्व। माँ ज्ञान की आदि-स्रोत हैं। द्रविड़ शिशु की कथा बताती है कि साधना और तपस्या से जो ज्ञान वर्षों में मिलता है, वह माँ की एक बूँद कृपा (स्तन्य-पान) से क्षण भर में प्राप्त हो सकता है। यह बुद्धि (intellect) का नहीं, बल्कि 'प्रज्ञा' (intuition) का जागरण है। जो साधक इस श्लोक का ध्यान करता है, उसे वाक-सिद्धि और असीम रचनात्मक शक्ति प्राप्त होती है।
हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥ ७६॥
भावार्थ: हे पर्वत-दुहिते! जब कामदेव (मनसिज) शिव के क्रोध की अग्नि-ज्वालाओं से घिर गए, तो उन्होंने (तपन से बचने के लिए) आपके गहरे नाभि-रूपी सरोवर में छलांग लगा दी। उस बुझती हुई अग्नि से जो धुएं की पतली रेखा ऊपर उठी, उसे ही लोग हे जननी! आपकी 'रोमावलि' (नाभि से ऊपर उठती हुई बालों की रेखा) के रूप में जानते हैं।
विवेचन: यह श्लोक 'कामाग्नि' के रूपांतरण की तांत्रिक प्रक्रिया को दर्शाता है। कामदेव (इच्छा) जब शिव (ज्ञान) की अग्नि से जलते हैं, तो वे देवी (शक्ति) के नाभि-चक्र (मणिपूर - अग्नि स्थान) में शरण लेते हैं। यहाँ काम 'भस्म' नहीं होता, बल्कि उसका 'शोधन' हो जाता है। वह 'धूम-लतिका' बनकर उर्ध्वगामी (ऊपर उठने वाला) हो जाता है। यह कुण्डलिनी योग में 'प्राण' के सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने का रूपक है। नाभि वह स्थान है जहाँ से 72,000 नाड़ियां निकलती हैं, और यहीं पर इच्छा-शक्ति का दिव्यीकरण होता है।
यदेतत्कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशे मध्ये किञ्चिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥ ७७॥
भावार्थ: हे शिवे! हे जननी! विद्वान लोग आपकी पतली कमर पर दिखने वाली उस रेखा को — जो यमुना (कालिंदी) की सूक्ष्म तरंग जैसी है — मात्र रोमावलि नहीं समझते। वे मानते हैं कि आपके दोनों विशाल स्तन-कलशों के आपस में टकराने (विमर्द) से उनके बीच का 'आकाश' (खाली स्थान) पिचक कर पतला हो गया है और आपकी गहरी नाभि-गुफा में प्रवेश कर रहा है।
विवेचन: यहाँ 'आकाश' तत्व की सूक्ष्मता का वर्णन है। स्तनों (सृष्टि/पोषण) के भार से आकाश भी दबकर सूक्ष्म हो गया है। यह 'व्योम' (ईथर/Space) का नाभि में प्रवेश करना — यह समाधि की अवस्था है जहाँ 'खेचरी' और 'शाम्भवी' मुद्राओं का रहस्य छिपा है। यमुना (श्याम वर्ण) का उल्लेख सुषुम्ना नाड़ी के रंग और प्रवाह की ओर संकेत करता है। यह साधक को स्थूल आकाश से सूक्ष्म चिदाकाश (Inner Space) की ओर ले जाने की प्रक्रिया है।
स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ॥ ७८॥
भावार्थ: हे गिरिसुते! आपकी नाभि की महिमा अद्भुत है — यह गंगा का एक स्थिर भंवर है; यह स्तन-रूपी कलियों वाली रोमावलि-लता का 'आलवाल' (क्यारी/थाला) है; यह कामदेव (कुसुमशर) के तेज-रूपी अग्नि का पावन 'हवन-कुंड' है; यह रति का क्रीड़ा-भवन है; और यह शिव (गिरीश) के नेत्रों (तपस्या) की सिद्धि का 'बिल-द्वार' (गुफा का मुख) है।
विवेचन: यह श्लोक नाभि-चक्र (Nabhi Chakra) के पांच आयामों को खोलता है। 1. गंगावर्त: अनंत ऊर्जा का केंद्र। 2. आलवाल: जीवन-लता का मूल। 3. हवन-कुंड: कामाग्नि को धारण करने वाला पवित्र पात्र। 4. रति-गृह: श्रृंगार और प्रेम का उद्गम। 5. सिद्ध-द्वार: सबसे महत्वपूर्ण, यह वह गुफा है जहाँ शिव की तपस्या (समाधि) फलीभूत हुई। योगी के लिए नाभि वह द्वार है जहाँ से वह 'परा-संवित' (Supreme Consciousness) में प्रवेश करता है।
निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥ ७९॥
भावार्थ: हे शैलतनये! हे नारियों में श्रेष्ठ! आपकी कमर (मध्य भाग) स्वभाव से ही अत्यंत क्षीण (पतली) है और स्तनों के भार से थककर थोड़ी झुक गई है। ऐसा लगता है मानो नदी के कटते हुए किनारे पर खड़ा कोई वृक्ष (तट-तरु) कभी भी गिर सकता है। आपकी इस नाज़ुक कमर की (जो सृष्टि का भार उठा रही है) सदा कुशलता हो!
विवेचन: यहाँ भक्त की चिंता और वात्सल्य भाव है। 'मध्य' (कमर) सूक्ष्मता का प्रतीक है, जबकि 'स्तन' (जगत) विस्तार का। माँ उस 'अव्यक्त' (Unmainfested) बिंदु को धारण किए हुए है जिस पर पूरा व्यक्त जगत (Manifested World) टिका है। यह संतुलन इतना नाजुक है कि भक्त प्रार्थना करता है कि यह संतुलन (Harmony) कभी न टूटे, क्योंकि इसी पर ब्रह्मांड का अस्तित्व निर्भर है। 'तट-तरु' की उपमा नश्वरता और शाश्वतता के संधि-स्थल को दर्शाती है।
कुचौ सद्यस्स्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥ ८०॥
भावार्थ: हे देवी! (शिव-मिलन की उत्सुकता से) आपके स्तन पसीने से गीले होकर कंचुकी (चोली) को फाड़ रहे हैं और भुजाओं के मूल को रगड़ रहे हैं। इन स्वर्ण-कलश जैसे भारी स्तनों के भार से कहीं आपकी कमर टूट न जाए, इसीलिए मानो कामदेव (तनुभव) ने आपकी कमर को 'लवली-लता' की तीन रस्सियों (त्रिवलि) से तीन बार कसकर बाँध दिया है।
विवेचन: 'त्रिवलि' (पेट पर पड़ने वाली तीन रेखाएं) केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि एक 'दैवीय बंधन' है। ये तीन रेखाएं तीन गुणों (सत्व, रज, तम), तीन लोकों (भु:, भुव:, स्व:) और तीन शक्तियों (इच्छा, ज्ञान, क्रिया) का प्रतीक हैं। कामदेव द्वारा इन्हें 'कसकर बाँधना' यह दर्शाता है कि सृष्टि का ढांचा इन तीन तत्वों के संतुलन (Binding) से ही सुरक्षित है। यदि यह त्रिगुणात्मक संतुलन न हो, तो 'सृष्टि-भार' (स्तन) को संभालना असंभव हो जाएगा। यह संरचनात्मक (Structural) और आध्यात्मिक (Spiritual) दोनों ही दृष्टियों से 'धारण-शक्ति' (Supporting Power) का प्रतीक है।
गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥ ८१॥
भावार्थ: हे पार्वती! ऐसा लगता है कि आपके पिता, पर्वतराज (हिमालय) ने अपनी ही ढलानों (नितम्ब) से भारीपन और विस्तार काटकर आपको 'दहेज' (हरण) के रूप में दे दिया है। इसीलिए आपका यह विशाल और भारी नितम्ब पूरी पृथ्वी को ढक लेता है और उसे अपने भार से हल्का (लघु) बना देता है।
विवेचन: यहाँ 'नितम्ब' (Hips) के माध्यम से माँ की 'धारण-शक्ति' (Sustaining Power) का वर्णन है। पृथ्वी स्वयं भारी है, पर माँ का भार (गुरुत्व) उससे भी अधिक है, क्योंकि वे संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने गर्भ में धारण करती हैं। 'लघुत्वं नयति' का दार्शनिक अर्थ है कि माँ की महिमा के आगे यह भौतिक जगत तुच्छ (हल्का) है। हिमालय की पुत्री होने के नाते, यह 'अचल' और 'स्थिर' तत्व का भी प्रतीक है, जो साधक को जीवन के तूफानों में स्थिरता प्रदान करता है।
करीन्द्राणां शुण्डान्कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवति ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विधिज्ञे जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥ ८२॥
भावार्थ: हे गिरिसुते! आपने अपनी दोनों जाँघों से श्रेष्ठ हाथियों की सूंड और सुनहरे केले के तनों — दोनों को ही सुंदरता में जीत लिया है। हे विधि-ज्ञे (शास्त्रों को जानने वाली)! पति (शिव) को निरंतर प्रणाम करने से घट्टे पड़कर कठोर हुए आपके दोनों घुटने, अब देवताओं के हाथी (ऐरावत) के कुम्भ-स्थलों (मस्तक) की बराबरी कर रहे हैं।
विवेचन: यह श्लोक माँ की 'पति-भक्ति' और 'तपस्या' को उजागर करता है। केले के तने और हाथी की सूंड कोमलता और गोलाई के प्रतीक हैं, पर माँ की जाँघें उनसे भी सुंदर हैं। विशेष बात 'जानु' (घुटनों) की है — जो प्रणाम करने से कठोर हो गए हैं। यह सिखाता है कि शक्ति सर्वोच्च होते हुए भी शिव (परम चेतना) के प्रति समर्पित है। यही 'दास्य-भाव' की पराकाष्ठा है। 'विबुध-करि-कुम्भ' की तुलना यह दर्शाती है कि माँ की विनम्रता (प्रणाम) ही उनकी असली शक्ति (ऐरावत का बल) है।
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥ ८३॥
भावार्थ: हे गिरिसुते! कामदेव (विषम-विशिख) ने रुद्र (शिव) को जीतने के लिए आपकी दोनों पिंडलियों (जंघाओं) को ही अपने 'तरकश' (quivers) बना लिया है। और चूँकि तरकश दो हैं, इसलिए बाण भी दुगुने (पाँच की जगह दस) हो गए हैं। आपके दोनों पैरों के दस नाखून ही वे दस बाण हैं, जो आपके चरणों में झुकने वाले देवताओं के मुकुटों पर रगड़ खाकर और भी तीखे (नकीले) हो गए हैं।
विवेचन: कामदेव के पास केवल 5 बाण होते हैं, पर माँ के पास 10 (पैरों की उंगलियां) हैं। शिव ने कामदेव को जला दिया था, पर माँ के सौंदर्य के आगे वे भी विवश हैं। यह श्लोक बताता है कि माँ का सौंदर्य ही वह शक्ति है जो शिव को समाधि से जगाकर सृष्टि-क्रिया में लगाती है। 'देवताओं के मुकुटों से घिसकर तीखे होना' यह दर्शाता है कि जो (देवता/अहंकारी) माँ के चरणों में झुकता है, वह अनजाने में माँ की शक्ति (बाणों) को और बढ़ा देता है। यह शरणागति का महिमामंडन है।
श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥ ८४॥
भावार्थ: हे माता! श्रुतियाँ (वेद - उपनिषद) जिन चरणों को अपने सिर पर मुकुट की तरह धारण करती हैं, आप दया करके उन चरणों को मेरे सिर पर भी रख दीजिये। ये वे चरण हैं जिन्हें धोने वाला जल (पाद्य) स्वयं पशुपति (शिव) की जटाओं से बहने वाली गंगा है, और जिनकी महावर (लाक्षा) की लालिमा विष्णु (हरि) के मुकुट की माणिक्य-मणि की कांति से मिलती है।
विवेचन: यह 'चरण-स्पर्श' दीक्षा/वरदान का श्लोक है। माँ के चरण वेदों से भी ऊपर हैं (वेदों के सिर पर विराजमान)। ब्रह्मा (वेद), विष्णु (मुकुट-मणि/लक्ष्मी) और महेश (गंगा-जल) — तीनों माँ के चरणों की सेवा में हैं। 'मम अपि एतौ मातः' (मेरे सिर पर भी, माँ) — यह एक आर्त पुकार है। साधक यह मानता है कि मोक्ष शास्त्रों (श्रुति) से नहीं, बल्कि माँ की 'चरण-धूलि' और 'कृपा-स्पर्श' से मिलता है। यह गुरु-तत्व और शक्ति-तत्व का सर्वोच्च सम्मान है।
नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥ ८५॥
भावार्थ: हम आपके उन दोनों चरणों को नमस्कार करते हैं जो नयनों को अत्यंत सुंदर लगते हैं और उज्ज्वल महावर (आलक्तक) से सुशोभित हैं। (इन चरणों का प्रभाव ऐसा है कि) स्वयं पशुपति (शिव) आपके उद्यान के अशोक (कंकेलि) वृक्ष से बहुत ईर्ष्या करते हैं, क्योंकि वह वृक्ष आपके चरणों का प्रहार (लात) खाने के लिए तरसता है (दोहद-क्रिया), जिसे पाने के लिए स्वयं शिव लालायित रहते हैं।
विवेचन: कवियों की मान्यता है कि अशोक वृक्ष सुंदरी के चरण-प्रहार से ही खिलता है। यहाँ शिव की 'ईर्ष्या' (असूया) का वर्णन अद्भुत है। शिव, जो जगत-पति हैं, वे एक जड़ वृक्ष से जल रहे हैं क्योंकि उसे माँ का चरण-स्पर्श मिल रहा है। यह 'प्रेमा-भक्ति' की पराकाष्ठा है। शिव भी शक्ति के स्पर्श के प्यासे हैं। यह श्लोक बताता है कि माँ का 'ताड़न' (दंड/कठिनाई) भी वास्तव में एक 'पुरस्कार' है। जो दुख (चरण-प्रहार) हमें माँ देती है, वह भी ईश्वर को ईर्ष्या कराने वाला सौभाग्य हो सकता है।
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥ ८६॥
भावार्थ: हे माँ! जब शिव ने क्रीड़ा में झूठमूठ ही आपका नाम किसी और (गंगा/दूसरी स्त्री) के नाम से पुकारा (गोत्र-स्खलन), और फिर लज्जा से अपना सिर झुका लिया, तब आपने अपने चरण-कमल से उनके ललाट पर प्रेम-पूर्वक प्रहार किया। उस समय आपके पायलों (नुपुरों) की झनकार (किली-किली ध्वनि) ऐसी लगी मानो शिव-शत्रु (कामदेव) अपने पुराने बैर (दहन-जनित शल्य) के मिट जाने पर खुशी से किलकारियां मार रहा हो।
विवेचन: यह 'मान-लीला' का श्लोक है। शिव (परम सत्य) जब लीला में शक्ति (माया) के वश में होकर 'गोत्र-स्खलन' (विस्मृति) का नाटक करते हैं, तो शक्ति उन्हें 'ताड़न' (जागृति) देती है। कामदेव, जिसे शिव ने जलाया था, वह माँ के चरणों के नूपुरों में आज भी जीवित है। जब वे नूपुर शिव के मस्तक (तीसरा नेत्र) से टकराते हैं, तो यह कामदेव की विजय नहीं, बल्कि 'प्रेम' की विजय है। शिव का मस्तक (ज्ञान) और शक्ति का चरण (क्रिया) — जब ये मिलते हैं, तभी सृष्टि में उल्लास (किली-किली) गूंजता है।
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥ ८७॥
भावार्थ: हे जननी! आपके चरण-कमल तो सामान्य कमलों को भी जीत लेते हैं। सामान्य कमल बर्फ से मर जाते हैं, पर आपके चरण हिमालय (हिमगिरि) में ही निवास करने में चतुर हैं; कमल रात में सो (बंद हो) जाते हैं, पर आपके चरण रात-दिन (पर-भाग) जागकर प्रकाश (विशद) देते हैं; कमल लक्ष्मी का आश्रय हैं, पर आपके चरण 'समयिन' (कौल संप्रदाय के साधकों) को वह 'श्री' (मोक्ष-लक्ष्मी) देते हैं जो अनंत है। इसमें क्या आश्चर्य है कि आपके चरण ही विजयी हैं?
विवेचन: यह श्लोक 'समयाचार' (Subtle Worship) की श्रेष्ठता बताता है। माँ के चरण 'कालातीत' हैं — न दिन, न रात का बंधन। सामान्य ऐश्वर्य (लक्ष्मी) नश्वर है, पर माँ के चरणों से मिलने वाली 'श्री' (आत्म-ज्ञान) शाश्वत है। 'हिमगिरि-निवास' का अर्थ 'सहस्रार चक्र' (जहाँ शीतलता है) में स्थिति भी है। साधक के लिए यह संकेत है कि उसे नश्वर सिद्धियों (कमल) के बजाय अनश्वर सत्य (माँ के चरण) की शरण लेनी चाहिए।
पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥ ८८॥
भावार्थ: हे देवी! आपका अग्र-पाद (Forepart of foot) कीर्तियों का स्थान है और विपत्तियों के लिए 'अ-पद' (जहाँ विपत्ति टिक नहीं सकती) है। कवियों ने इसकी तुलना 'कछुए की कठोर पीठ' (कमठी-खर्पर) से कैसे कर दी? और यदि यह इतना कठोर है, तो विवाह के समय त्रिपुरारी (शिव) ने इसे इतने दयालु मन से उठाकर (कोमल समझकर) पत्थर (शिला) पर कैसे रखा होगा? (सप्तपदी की रस्म)।
विवेचन: यहाँ 'ठोस' (Solid) और 'कोमल' (Tender) का विरोधाभास है। माँ के चरण भक्तों की रक्षा के लिए 'वज्र' (कछुए की पीठ) समान दृढ़ हैं, पर शिव के लिए वे 'कुसुम' (फूल) समान कोमल हैं। 'शिला-ारोहण' (पत्थर पर पैर रखना) विवाह की रस्म है जो दृढ़ता का प्रतीक है। शिव ने माँ के पैर को पत्थर पर इसलिए रखा ताकि वह भी पत्थर जैसी दृढ़ बनें, पर शिव ने इसे 'दया-भाव' से उठाया। यह बताता है कि शक्ति का आधार 'प्रेम' भी है और 'संकल्प' भी।
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥ ८९॥
भावार्थ: हे चंडी! आपके चरणों के नाखून ऐसे 'चंद्रमा' हैं जिन्हें देखकर अप्सराओं (नाक-स्त्री) के हाथ-रूपी कमल (shame से) बंद हो जाते हैं। आपके चरण उन कल्पवृक्षों (दिव्य-तरु) का भी उपहास करते हैं जो केवल स्वर्गवासियों को ही फल देते हैं; क्योंकि आपके चरण तो दरिद्र (गरीब) भक्तों को भी 'अहमिका' (तुरंत और भरपूर) 'श्री' (संपत्ति और मोक्ष) प्रदान करते हैं।
विवेचन: यहाँ माँ को 'चंडी' (Fierce/Independent) कहा गया है। कल्पवृक्ष स्वर्ग में हैं और केवल देवताओं की सुनते हैं, पर माँ के चरण 'सुलभ' हैं। 'दरिद्र' का अर्थ केवल धनहीन नहीं, 'साधन-हीन' भी है। जो जीव साधन-हीन है, उसे कल्पवृक्ष कुछ नहीं देता, पर माँ उसे सब कुछ दे देती है। नखों को 'चंद्रमा' कहना यह बताता है कि माँ के चरणों का प्रकाश अज्ञान-रूपी अंधकार (जिसमें हाथ बंद हो जाते हैं) को मिटाने वाला है। यह 'दान' की पराकाष्ठा है।
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥ ९०॥
भावार्थ: हे माँ! आपका चरण दीनों को उनकी आशा के अनुरूप निरंतर धन देता है और साथ ही 'सौंदर्य-रूपी शहद' (मकरन्द) भी बिखेरता है। मेरा जीव (आत्मा), अपनी छः इन्द्रियों (करण-चरण: 5 ज्ञानेंद्रियां + 1 मन) के साथ, आपके इस 'मन्दार-पुष्प' जैसे सुंदर चरण में डूबकर 'षट-चरण' (भौंरा) बन जाए।
विवेचन: यह 'आत्म-निवेदन' है। 'मन्दार' (स्वर्ग का फूल) से सुंदर माँ के चरण हैं। भौंरे के 6 पैर होते हैं, और जीव के पास 6 करण (इन्द्रियाँ + मन) हैं। भक्त चाहता है कि उसकी सारी इन्द्रियाँ केवल माँ के चरणों का रस (मकरन्द/ब्रह्मानंद) ही पिएं, विषय-वासनाओं का नहीं। यह 'प्रत्याहार' और 'धारणा' की स्थिति है। जब मन और इन्द्रियां माँ के चरणों में लीन (निमज्जन) हो जाती हैं, तभी सच्ची 'भक्ति' पूर्ण होती है। यहाँ धन (श्री) और सौंदर्य (मकरन्द) दोनों की प्राप्ति का मार्ग 'चरण-शरणागति' है।
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥ ९१॥
भावार्थ: हे सुंदर चरित्र वाली (चारु-चरिते)! आपके घर के राजहंस आपकी चाल (पदन्यास) की नकल करने का अभ्यास कर रहे हैं, पर वे बार-बार लड़खड़ा जाते हैं, फिर भी वे प्रयास (खेल) नहीं छोड़ते। ऐसा लगता है कि आपके चरण-कमल अपनी सुंदर मणि-जड़ित पायलों (मंजीर) की झनकार के बहाने (छल से) उन हंसों को सही चाल की 'शिक्षा' दे रहे हैं।
विवेचन: 'हंस' योगी का प्रतीक है (सोऽहम्)। योगी माँ की गति (दिव्य लीला) को समझने और अपनाने का प्रयास करते हैं, पर वे लड़खड़ाते हैं। माँ अपने नूपुरों की ध्वनि (अनहत नाद) से उन्हें निर्देश देती हैं। यह गुरु-शिष्य परंपरा का भी सूचक है, जहाँ गुरु (माँ) शिष्य (साधक/हंस) की गलतियों को सुधारता है। और 'न जहति' (नहीं छोड़ते) यह साधक की दृढ़ता (Persistance) को दर्शाता है — सिद्धि मिले या न मिले, अभ्यास नहीं टूटना चाहिए।
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ ९२॥
भावार्थ: हे माँ! ब्रह्मा, हरि, रुद्र और ईश्वर — ये चारों देवता आपके पलंग (मंच) के पाये बन गए हैं। और सदाशिव (पाँचवें) विशुद्ध श्वेत वर्ण वाले होने के कारण आपके पलंग की 'सफेद चादर' (प्रच्छद-पट) बन गए हैं। जब आपके शरीर की लाल कांति उस सफेद सदाशिव पर पड़ती है, तो वे भी लाल हो जाते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो साक्षात् 'श्रृंगार रस' ने शरीर धारण कर लिया हो और हमारी आँखों को आनंद (कुतुक) दे रहा हो।
विवेचन: यह 'पंच-प्रेतासन' का रहस्य है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव — ये 'पंच-कृत्य' (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान, अनुग्रह) के देवता हैं। आसन बनने का अर्थ है कि वे माँ के अधीन हैं (माँ उन पर विराजमान हैं)। सदाशिव 'निर्गुण-ब्रह्म' (शुद्ध श्वेत) हैं, और माँ 'सगुण-शक्ति' (लाल) हैं। जब शक्ति ब्रह्म पर आसीन होती है, तभी सृष्टि में 'रस' (आनंद/जीवन) आता है। बिना शक्ति के शिव 'शव' (सफेद चादर/प्रेत) मात्र हैं। यह द्वैत में अद्वैत का मिलन है।
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ ९३॥
भावार्थ: हे माँ! आपके केश घुंघराले (कुटिल) हैं, पर मुस्कान स्वभाव से ही सरल है; आपका चित्त शिरीष फूल जैसा कोमल है, पर स्तन पत्थर (दृषद) जैसे कठोर हैं; आप कमर में अत्यंत क्षीण (पतली) हैं, पर नितम्ब और स्तनों में विशाल (पृथु) हैं। शम्भू (शिव) की वह 'अरुणा' (लालिमा-युक्त) करुणा ही 'काचित्' (अर्वचनीय) रूप धारण करके जगत की रक्षा के लिए सर्वत्र विजयी हो रही है।
विवेचन: यहाँ विरोधाभासों (Paradoxes) का अद्भुत मेल है — कुटिलता और सरलता, कोमलता और कठोरता, क्षीणता और विशालता। यह इंगित करता है कि माँ 'पूर्ण' (Whole) हैं, उनमें सब कुछ समाहित है। 'अरुणा करुणा' (लाल करुणा) का अर्थ है — ऐसी दया जो निष्क्रिय नहीं है, जिसमें 'रजस' (क्रिया) का तेज है। माँ की दया केवल आँसू बहाना नहीं, बल्कि राक्षसों का संहार करके भक्तों को बचाना भी है। यह 'सक्रिय करुणा' (Active Compassion) ही जगत की रक्षा करती है।
कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥ ९४॥
भावार्थ: हे माँ! चंद्रमा का बिम्ब मरकत-मणि का बना एक 'जल-पात्र' (डिब्बी) है, जिसमें भरा पानी 'शहद/सुधा' है; उसका धब्बा (कलंक) उसमें रखी 'कस्तूरी' है; और उसकी किरणें (कलाएं) उसमें ठसाठस भरा 'कपूर' हैं। आप प्रतिदिन इसका उपभोग करती हैं (पान या सौंदर्य प्रसाधन के रूप में), जिससे यह खाली हो जाता है। इसीलिए विधाता (ब्रह्मा) आपके लिए इसे रोज (कृष्ण पक्ष में खाली, शुक्ल पक्ष में भरा) फिर से भर देते हैं।
विवेचन: यहाँ चंद्र-कलाओं के घटने-बढ़ने (Waning/Waxing) का तांत्रिक कारण बताया गया है। चंद्रमा 'सोम' (अमृत) का स्रोत है। माँ ललिता उस सोम का पान करती हैं (सहस्रार से टपकने वाला अमृत)। जब योगी अपनी साधना से कुण्डलिनी को सहस्रार में ले जाता है, तो वह भी इसी 'सोम-पान' का अधिकारी बनता है। ब्रह्मा का बार-बार भरना यह दर्शाता है कि यह 'ऊर्जा का स्रोत' (Source of Energy) कभी समाप्त नहीं होता; यह एक सतत ब्रह्मांडीय चक्र (Cosmic Cycle) है जो माँ की लीला के लिए चल रहा है।
पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥ ९५॥
भावार्थ: हे माँ! आप त्रिपुरारी (शिव) का 'अंतःपुर' (Inner Apartment/Rani-vas) हैं। इसलिए चंचल चित्त वाले देवताओं (इंद्र आदि) के लिए आपके चरणों की सीधी पूजा करना सुलभ नहीं है। यही कारण है कि 'शतमख' (सौ यज्ञ करने वाले इंद्र) और अन्य देवता केवल आपके 'द्वार' (Gate) पर खड़ी 'अणिमा' आदि सिद्धियों की उपासना करके ही अतुलनीय शक्तियों को प्राप्त कर संतुष्ट हो गए हैं (वे भीतर प्रवेश नहीं कर पाए)।
विवेचन: यह श्लोक 'श्रीविद्या' की सर्वोच्चता स्थापित करता है। इंद्र आदि देवता केवल 'बाहरी' शक्तियों (सिद्धियों) के स्वामी हैं जो माँ के द्वारपाल हैं। माँ का वास्तविक स्वरूप 'अंतःपुर' (गर्भगृह) में है, जो शिव के साथ एकाकार है। चंचल मन (तरल-करण) वाले साधक केवल चमत्कार/सिद्धियों में उलझ कर रह जाते हैं; केवल स्थिर-चित्त योगी ही द्वार पार करके अंतःपुर में 'माँ' को पा सकता है। सिद्धियाँ (Anima, Mahima etc.) बाधा भी बन सकती हैं यदि वे लक्ष्य बन जाएं।
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥ ९६॥
भावार्थ: हे सती-शिरोमणि! कितने ही कवि 'विधाता की पत्नी' (सरस्वती) को नहीं भजते? (अनेक भजते हैं)। और थोड़े से धन से कौन 'श्री देवी' (लक्ष्मी) का पति (स्वामी) नहीं बन जाता? (अनेक बन जाते हैं)। किन्तु, हे माँ! महादेव (शिव) को छोड़कर आपके स्तनों का आलिंगन (समीप्य) किसी को भी सुलभ नहीं है — यहाँ तक कि उस 'कुरबक' वृक्ष को भी नहीं, जो आलिंगन से ही खिलता है।
विवेचन: ज्ञान (सरस्वती) और धन (लक्ष्मी) प्राप्त करना फिर भी सरल है, और अनेक लोग इसे पा लेते हैं। पर 'परा-शक्ति' का सायुज्य (Intimacy) केवल शिव-तुल्य योगी को ही मिलता है। 'कुरबक' वृक्ष की दोहद-क्रिया है 'स्त्री का आलिंगन'। माँ के आलिंगन के लिए वह वृक्ष भी तरसता है, पर वह सौभाग्य केवल महादेव का है। भाव यह है कि माँ की 'भक्ति' (Intimacy) ज्ञान और धन से भी दुर्लभ और श्रेष्ठ है। यह 'मोक्ष' (कैवल्य) की स्थिति है जो विरलों को मिलती है।
गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥ ९७॥
भावार्थ: वेद-शास्त्र (आगम) के ज्ञाता आपको ब्रह्मा की पत्नी 'वाणी' (सरस्वती) कहते हैं; कोई आपको विष्णु की पत्नी 'पद्मा' (लक्ष्मी) कहता है; और कोई शिव की पत्नी 'पार्वती' कहता है। किन्तु हे परब्रह्म-महिषि (परब्रह्म की रानी)! आप इन तीनों से परे कोई 'चौथी' (तुरीया) ही अनिर्वचनीय शक्ति हैं। आप असीम महिमा वाली 'महामाया' हैं जो अपनी लीला से पूरे विश्व को भ्रमित (संचालित) करती हैं।
विवेचन: यह आदिशंकराचार्य का सबसे गूढ़ दार्शनिक श्लोक है। देवी केवल त्रिमूर्ति की पत्नियां नहीं हैं। वे 'तुरीया' (The Fourth State) हैं जो जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे 'समाधि' अवस्था है। वे 'महामाया' हैं — जो स्वयं ब्रह्म को भी ढक लेती हैं और विश्व का नाटक रचती हैं। साधक को समझना चाहिए कि वह किसी एक रूप (लक्ष्मी/सरस्वती) में सीमित नहीं हैं; वे वह 'परम-तत्व' हैं जिससे सब कुछ निकलता है और उसी में लीन होता है।
कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥ ९८॥
भावार्थ: हे माँ! बताइये, वह समय कब आएगा जब मैं विद्या का अर्थी (विद्यार्थी) बनकर आपके चरणों को धोने वाले उस 'जल' (चरणामृत) का पान करूँगा, जो महावर (अलक्तक) के लाल रंग से युक्त है? वह जल, जो जन्मजात गूंगों को भी कविता करने की शक्ति देता है, मेरे मुख में जाकर सरस्वती (वाणी) के मुख-कमल के 'ताम्बूल-रस' (पान के रस) जैसी विद्वता कब धारण करेगा?
विवेचन: यहाँ 'चरणामृत' को साक्षात् 'ज्ञान-रस' माना गया है। भक्त 'सरस्वती' की उपासना अलग से नहीं करना चाहता; वह माँ के चरणों का धोवन पीकर ही सरस्वती-तुल्य बनना चाहता है। 'ताम्बूल-रस' का अर्थ है — ज्ञान का आनंद और माधुर्य। जब ज्ञान नीरस न होकर आनंदमय (Juicy/Blissful) हो जाए, तब वह सच्ची 'वाक्-सिद्धि' है। यह श्लोक अज्ञानता (मूकता) से पूर्ण ज्ञान (कतित्व) की यात्रा को केवल 'कृपा' के माध्यम से तय करने की प्रार्थना है।
सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥ ९९॥
भावार्थ: हे माँ! आपका भक्त (त्वद्भजनवान) सरस्वती और लक्ष्मी के साथ विहार करता है (ज्ञान और धन उसके पास सहज आते हैं), जिससे ब्रह्मा और विष्णु को भी (प्रेमी जैसी) ईर्ष्या होती है। वह अपने दिव्य रूप से रति (कामदेव की पत्नी) के भी पातिव्रत्य को डगमगा देता है। वह 'पशु-पाश' (अज्ञान के बंधन) को काटकर चिरकाल तक जीता है (जीवनमुक्त) और 'परमानंद' (Supreme Bliss) नामक रस का निरंतर आस्वादन करता है।
व विवेचन: यह 'साधना-फल' का श्लोक है। माँ के भक्त को भौतिक (लक्ष्मी), बौद्धिक (सरस्वती) और शारीरिक (रति-तुल्य सौंदर्य) — तीनों सुख मिलते हैं, पर वह उनमें फंसता नहीं है। मुख्य बात है — 'क्षपित-पशु-पाश'। वह 'पशु' (बद्ध जीव) से 'पति' (शिव-तुल्य) बन जाता है। उसे इन सुखों में नहीं, बल्कि 'परमानंद रस' (Brahmananda) में ही असली तृप्ति मिलती है। यह 'भोग और मोक्ष' दोनों की एक साथ प्राप्ति (भुक्ति-मुक्ति प्रदायिनी) का वर्णन है।
प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ १००॥
भावार्थ: हे जननी! जैसे सूर्य (दिवसकर) की आरती उसी के प्रकाश (दीपक) से की जाए; जैसे चंद्रमा (सुधासूति) को अर्घ्य उसी से टपके हुए चंद्रकांत मणि के जल से दिया जाए; या जैसे समुद्र (सलिल-निधि) का तर्पण उसी के जल से किया जाए; वैसे ही, हे वाणी की देवी! आप ही के द्वारा दी गई वाणी (शब्दों) से मैंने यह स्तुति रची है और आप ही को समर्पित कर रहा हूँ। (मेरा इसमें कुछ भी नहीं है)।
विवेचन: यह 'समर्पण' (Surrender) की पराकाष्ठा है। आदिशंकराचार्य, जो महान विद्वान हैं, वे स्वीकार करते हैं कि यह स्तोत्र उन्होंने नहीं लिखा। शब्द भी माँ के हैं, बुद्धि भी माँ की है। जैसे गंगा जल से गंगा की पूजा होती है, वैसे ही माँ की वाणी से माँ की स्तुति हुई है। 'त्वदीयाभिर्वाग्भिः' (आपकी ही वाणी से) — यह अहंकार-शून्य (Ego-less) अवस्था है। सौंदर्य लहरी का समापन इसी अद्वैत भाव से होता है कि भक्त और भगवान अलग नहीं हैं; सब कुछ उसी एक शक्ति का विस्तार है।
॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ सौन्दर्यलहरी सम्पूर्णा ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥
(अनुबन्धः Addendum
समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
(variations भयादास्य स्निग्धस्त्मित, भयादास्यस्यान्तःस्त्मित)
दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥ १०१॥
भावार्थ: हे माँ! आपके चरणों के सौन्दर्य को देखने के लिए सूर्य (अम्बर-मणि) ने अपनी किरणों को समेट लिया है (ताकि आपको ताप न लगे) और स्वयं को एक स्वछंद 'मणि-दर्पण' (Crystal Mirror) बना लिया है। उस दर्पण में आपका मुख-कमल जब प्रतिबिंबित होता है, तो वह सूर्य के 'हृदय-कमल' जैसा लगता है — ऐसा अद्भुत कमल जो चंद्रमा को देखकर भी कभी मुरझाता नहीं (अश्रान्त-विकच), बल्कि सदा खिला रहता है।
विवेचन: यहाँ सूर्य का अहंकार मिटकर 'समर्पण' बन गया है। सूर्य जगत को प्रकाश देता है, पर माँ के सामने वह केवल एक 'दर्पण' है। 'निरातंकं चन्द्रान्' (चंद्रमा से भय रहित) का अर्थ है कि यह 'ज्ञान-सूर्य' (Illumination) है जो द्वैत (दिन-रात) से परे है। माँ का मुख ही वह 'परम-प्रकाश' है जो सूर्य को भी प्रकाशित करता है। यह 'प्रकाश-विमर्श' सामरस्य का प्रतीक है।
समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं
कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः
variations जनयामास मदनो, जनयन्तः समतुलां, जनयन्ता सुवदने
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥ १०२॥
भावार्थ: हे उमे! आपके समुन्नत स्तन-भार, सुंदर वक्षस्थल, मंद मुस्कान, कटाक्ष (तिरछी चितवन) और कदम्ब-पुष्प जैसी कांति वाले शरीर को आधार बनाकर, कामदेव (कन्दर्प) ने भगवान शिव (हर) के मन में भी 'भ्रांति' (प्रेम-विभ्रम) उत्पन्न कर दी थी। आपके जो भक्त इस रूप का ध्यान करते हैं, उनकी 'परिणति' (अंतिम गति) भी यही होती है (वे शिव-तुल्य होकर आप में लीन हो जाते हैं)।
विवेचन: यह श्लोक 'काम-विजय' का नहीं, बल्कि 'काम-परिष्कार' (Sublimation) का है। शिव, जो काम-दहन करने वाले हैं, वे भी माँ के सौंदर्य (दिव्य प्रेम) के वश में हैं। भक्त जब माँ की सौंदर्य उपासना करता है, तो उसका काम (Lust) 'प्रेम' (Divine Love) में बदल जाता है। 'परिणति' का अर्थ है — सायुज्य मुक्ति। भक्त और शिव में कोई भेद नहीं रह जाता; दोनों ही 'शक्ति' के उपासक और प्रिय बन जाते हैं।
निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥ १०३॥
भावार्थ: हे गुणों की निधि (निधे)! हे नित्य मुस्काने वाली (नित्यस्मेरे)! हे सीमारहित गुणों वाली (निरवधिगुणे)! हे नीति-निपुण! हे बाधा-रहित ज्ञान वाली (निराघातज्ञाने)! हे संयमी चित्त में निवास करने वाली! हे भाग्य (नियति) के बंधनों से मुक्त! हे समस्त वेदों (निगम) द्वारा स्तुत! हे भयरहित (निरातंके)! हे नित्ये! मेरी इस स्तुति को 'निगमय' (पूर्ण/स्वीकार) करें।
विवेचन: यह 'पूर्णाहूति' श्लोक है। इसमें माँ के विशेषण (Epithets) साधक के लक्ष्य हैं। 'निराघात-ज्ञाने' = अबाधित ज्ञान। 'नियति-निर्मुक्ते' = कर्म-बंधन से मुक्ति। 'निगमय' शब्द श्लेष है — इसका अर्थ 'वेदों (निगम) में मिला दो' भी है और 'समाप्त करो' भी। आचार्य प्रार्थना कर रहे हैं कि उनकी यह वाणी माँ मे विलीन हो जाए। यह अहं का पूर्ण समर्पण है। ॐ तत्सत्।
॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ सौन्दर्यलहरी ॥
सौन्दर्यलहरी - परिचय (Introduction)
संस्कृत साहित्य और भारतीय अध्यात्म के आकाश में 'सौंदर्य लहरी' एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान है, जिसने सदियों से भक्तों, साधकों और कवियों को समान रूप से मंत्रमुग्ध किया है।
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित यह ग्रंथ न केवल भगवती त्रिपुर सुंदरी की स्तुति है, बल्कि यह श्रीविद्या, तंत्र शास्त्र और अद्वैत वेदांत का एक अद्भुत समन्वय है। 'सौंदर्य लहरी' का शाब्दिक अर्थ है "सौंदर्य की लहर"। यह सौ श्लोकों का एक ऐसा संग्रह है, जिसमें पराशक्ति के स्वरूप, उनकी कृपा और ब्रह्मांडीय शक्ति के रहस्यों को काव्य की भाषा में पिरोया गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रचना की कथा
परंपरागत रूप से 'सौंदर्य लहरी' के रचयिता आदि शंकराचार्य माने जाते हैं। लोकश्रुति है कि जब शंकराचार्य कैलाश पर्वत की यात्रा पर थे, तब भगवान शिव ने उन्हें स्वयं ये श्लोक भेंट किए थे। कथा के अनुसार, जब वे इन श्लोकों को लेकर नीचे उतर रहे थे, तब मार्ग में नंदी ने उनसे वे पृष्ठ छीनने का प्रयास किया, जिससे कुछ श्लोक नष्ट हो गए। बाद में शंकराचार्य ने लुप्त हुए श्लोकों को अपनी दिव्य दृष्टि से पुनः रचा।
विद्वानों के अनुसार, इस ग्रंथ के दो मुख्य भाग हैं:
- आनंद लहरी (श्लोक 1 से 41): इसे स्वयं भगवान शिव द्वारा रचित माना जाता है। यह भाग अत्यंत गूढ़ और तांत्रिक रहस्यों से भरा है।
- सौंदर्य लहरी (श्लोक 42 से 100): इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है, जिसमें देवी के शारीरिक सौंदर्य का नख-शिख वर्णन है।
संरचना और विभाजन
सौंदर्य लहरी में कुल 100 श्लोक हैं (कुछ संस्करणों में 103)। इन्हें 'शिखरिणी' छंद में लिखा गया है, जो अपनी लयात्मकता के लिए प्रसिद्ध है।
1. आनंद लहरी: तंत्र और योग का सार
पहले 41 श्लोक 'आनंद लहरी' कहलाते हैं। यहाँ देवी को केवल एक प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा के रूप में चित्रित किया गया है। इसमें 'श्रीचक्र' (श्री यंत्र) की व्याख्या, षट्चक्र भेदन और कुंडलिनी जागरण का विस्तृत विवरण मिलता है। प्रथम श्लोक ही इस ग्रंथ की महानता को स्थापित कर देता है:
"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं..."
अर्थात्, शिव तभी सृष्टि की रचना करने में समर्थ होते हैं जब वे शक्ति से युक्त होते हैं। शक्ति के बिना शिव 'शव' के समान हैं। यह पंक्ति शाक्त दर्शन के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करती है।
2. सौंदर्य लहरी: रूप और सौंदर्य की पराकाष्ठा
42वें श्लोक से अंत तक देवी के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन है। यहाँ कवि की कल्पना और भक्ति अपने शिखर पर है। देवी के केश, मस्तक, भौहें, नेत्र, वाणी, मुस्कान और चरणों का ऐसा वर्णन किया गया है कि पाठक के हृदय में साक्षात भगवती की छवि अंकित हो जाती है। यह वर्णन कामुकता से परे, दिव्य और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराने वाला है।
दार्शनिक महत्व: अद्वैत और शक्तिवाद का मिलन
आदि शंकराचार्य मुख्य रूप से अद्वैत वेदांत के प्रतिपादक थे, जो 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' की बात करते हैं। लेकिन सौंदर्य लहरी में वे सगुण ब्रह्म (शक्ति) की उपासना करते दिखते हैं। यहाँ वे दर्शाते हैं कि निर्गुण ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग 'शक्ति' के माध्यम से ही संभव है।
इस ग्रंथ में 'श्री विद्या' का दर्शन समाहित है। श्री विद्या के अनुसार, यह जगत मिथ्या नहीं बल्कि देवी का ही विलास है। साधक जब सौंदर्य लहरी का पाठ करता है, तो वह जगत का त्याग नहीं करता, बल्कि हर वस्तु में सौंदर्य और दिव्यता का दर्शन करता है।
श्रीयंत्र और तांत्रिक रहस्य
सौंदर्य लहरी मात्र एक काव्य नहीं, बल्कि एक 'मंत्र शास्त्र' है। इसके प्रत्येक श्लोक का अपना एक विशिष्ट यंत्र और विनियोग है। तांत्रिक परंपरा में माना जाता है कि प्रत्येक श्लोक में एक विशेष सिद्धि छिपी है।
- चक्र साधना: आनंद लहरी के श्लोकों में मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक की यात्रा का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि कैसे कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठती है और सहस्रार में शिव से मिलन करती है।
- श्री चक्र: सौंदर्य लहरी को श्री चक्र (Sri Yantra) का गीतात्मक रूप माना जाता है। श्रीचक्र के नौ चक्रों और उनकी अधिष्ठात्री देवियों का सूक्ष्म वर्णन यहाँ मिलता है।
साहित्यिक और काव्यगत विशेषताएँ
साहित्यिक दृष्टि से सौंदर्य लहरी संस्कृत साहित्य का एक 'अलंकार शास्त्र' है। इसमें उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
- नेत्रों का वर्णन: देवी के नेत्रों की तुलना कमल के पत्तों से, मछलियों से और हिरणी की आंखों से की गई है। एक श्लोक में कहा गया है कि देवी के तीन नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के प्रतीक हैं, जो ब्रह्मांड के समय चक्र को नियंत्रित करते हैं।
- वाणी का माधुर्य: देवी की वाणी इतनी मधुर है कि जब वे बोलती हैं, तो सरस्वती की वीणा की झंकार भी फीकी पड़ जाती है।
- चरण कमल: साधक देवी के चरणों की धूल को भी अपने माथे पर लगाकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उन चरणों की वंदना करते हैं।
सौंदर्य लहरी का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रभाव
आधुनिक समय में भी सौंदर्य लहरी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। मनोवैज्ञानिक रूप से, इसका पाठ मन को शांत और एकाग्र करता है। सौंदर्य के वर्णन के माध्यम से यह नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मकता का संचार करता है।
आध्यात्मिक रूप से, यह एक 'साधना मार्ग' है। यह भक्त को द्वैत (साधक और साध्य का अलग होना) से अद्वैत (एक्य) की ओर ले जाता है। जब साधक देवी के सौंदर्य में डूबता है, तो अंततः उसे यह बोध होता है कि वह सौंदर्य उसके अपने अंतर्मन की ही प्रतिध्वनि है।
प्रत्येक श्लोक का विशिष्ट फल
सौंदर्य लहरी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके विभिन्न श्लोकों का उपयोग विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।
- श्लोक 1: बाधाओं को दूर करने और शक्ति प्राप्त करने के लिए।
- श्लोक 3: ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति के लिए।
- श्लोक 12: रूप और व्यक्तित्व में निखार के लिए।
- श्लोक 27: यह श्लोक 'आत्म-निवेदन' का चरम है, जहाँ भक्त कहता है कि मेरी हर बात आपका मंत्र हो, मेरा हर चलना आपकी प्रदक्षिणा हो।
सौन्दर्यलहरी पाठ विधि और साधना (Recitation Method)
सौन्दर्यलहरी का पाठ केवल श्लोक पठन नहीं, बल्कि साक्षात् देवी त्रिपुरसुन्दरी की उपासना है। इसकी पूर्ण फल प्राप्ति के लिए निम्नलिखित विधि और नियमों का पालन करें:
1. पवित्रता और आसन (Purity & Asana)
- स्नान कर स्वच्छ और धुले हुए वस्त्र धारण करें। शक्ति साधना में लाल (Red) या श्वेत (White) वस्त्र विशेष शुभ माने जाते हैं।
- ऊनी या रेशमी आसन पर बैठें। कुशा का आसन भी उत्तम है।
- दिशा: पूर्व दिशा (ज्ञान प्राप्ति हेतु) या उत्तर दिशा (शांति व मोक्ष हेतु) की ओर मुख करके बैठें।
2. सर्वोत्तम समय (Best Time)
- ब्रह्म मुहूर्त: सूर्योदय से पूर्व (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) का समय सात्विक साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इस समय वातावरण शांत और दैवीय ऊर्जा से युक्त होता है।
- प्रदोष काल: सूर्यास्त के समय भी पाठ किया जा सकता है।
- विशेष दिन: शुक्रवार, पूर्णिमा, अष्टमी और नवरात्रि के दिनों में पाठ का विशेष महत्त्व और फल है।
3. उच्चारण और भाव (Pronunciation & Devotion)
- प्रयास करें कि संस्कृत उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट हो। यदि संस्कृत पढ़ना कठिन हो, तो भावार्थ को समझते हुए माँ का ध्यान करें। भाव की शुद्धता ही सर्वोपरि है।
- पाठ मध्यम स्वर में करें, बहुत तेज या बहुत धीमे नहीं।
4. संकल्प और समर्पण (Intention)
- सकाम पाठ: यदि किसी विशेष कामना (जैसे आरोग्य, धन, विद्या) के लिए पाठ कर रहे हैं, तो आरम्भ में जल लेकर संकल्प लें।
- निष्काम पाठ: यदि आत्म-शुद्धि और भक्ति के लिए पाठ कर रहे हैं, तो अंत में फल माँ के चरणों में समर्पित कर दें: "तत् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु"। इससे चित्त की शुद्धि होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है।
विशेष नोट: पाठ आरम्भ करने से पूर्व गणेश जी और अपने गुरु का स्मरण अवश्य करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. सौन्दर्यलहरी की रचना किसने की?
सौन्दर्यलहरी की रचना आदि शङ्कराचार्य ने की। कहा जाता है कि प्रथम 41 श्लोक (आनन्दलहरी) कैलास से प्राप्त हुए थे और शेष 62 श्लोक आचार्य ने स्वयं रचे।
2. इसमें कुल कितने श्लोक हैं?
मूल सौन्दर्यलहरी में 100 श्लोक हैं, परन्तु कुछ पाठों में 103 श्लोक मिलते हैं। इसे दो भागों में बाँटा जाता है - आनन्दलहरी (1-41) और सौन्दर्यलहरी (42-100/103)।
3. इसके पाठ का मुख्य लाभ क्या है?
प्रत्येक श्लोक का अपना विशेष फल है - वशीकरण, आकर्षण, रोग निवारण, धन प्राप्ति, विद्या, मोक्ष आदि। यह तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र तीनों का संगम है।
4. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?
स्तोत्र के रूप में इसे कोई भी भक्त पढ़ सकता है। किन्तु यन्त्र सिद्धि और विशेष प्रयोगों के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।
5. 'आनन्दलहरी' और 'सौन्दर्यलहरी' में क्या अंतर है?
आनन्दलहरी (1-41) में कुण्डलिनी योग, चक्र ध्यान और श्रीविद्या का वर्णन है। सौन्दर्यलहरी (42-103) में देवी के अंग-प्रत्यंग का काव्यात्मक वर्णन है।
6. इसका सम्बन्ध श्रीविद्या से कैसे है?
श्लोक 32 में श्रीविद्या के पंचदशाक्षरी मन्त्र के बीजाक्षरों का वर्णन है। यह ग्रन्थ श्रीविद्या उपासकों के लिए मूल ग्रन्थ माना जाता है।
7. पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?
शुक्रवार, पूर्णिमा, नवरात्रि और ललिता जयंती के दिन विशेष फलदायी हैं। प्रातःकाल या मध्यरात्रि में पाठ करना उत्तम है।
8. क्या इसके यन्त्र भी होते हैं?
हाँ, प्रत्येक श्लोक के लिए एक विशेष यन्त्र है जिसे 'श्रीचक्र यन्त्र' पर अंकित किया जाता है। इनका प्रयोग विशेष सिद्धियों के लिए होता है।
9. महाकाव्य में इसका क्या स्थान है?
यह भारतीय साहित्य की श्रेष्ठतम रचनाओं में से एक है। इसकी काव्य शैली, अलंकार और भक्ति का संगम अद्वितीय है।
10. देवी का कौन सा स्वरूप वर्णित है?
मुख्यतः माँ त्रिपुरसुन्दरी (ललिता) का स्वरूप वर्णित है। साथ ही शाक्त दर्शन के अनुसार आदिशक्ति का सम्पूर्ण विवरण है।