Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Janakaja Prapattisara Stotram – श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्रम्

Sri Janakaja Prapattisara Stotram – श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्रम्
॥ श्रीजनकजाप्रपत्तिसारस्तोत्रं ॥ न वाग्वपुर्बुद्धिभिरेव कस्यचित् कदापि हिंसाऽस्तु शरीरिणो वृथा । भवत्पदाम्भोरुहचिन्तनं विना न चापयात्वम्बुजवीक्षणे क्षणः ॥ १॥ हसन्तु निन्दन्तु वदन्तु दुर्वचो जना नियुक्ता हृदयस्थितेन वै । केनापि देवेन यदाश्रितं सदा न संस्थितिं स्वां प्रजहातु मे मनः ॥ २॥ निन्दा भयं मेऽस्तु तथा न जातुचिद् यथेह निन्द्याचरणान्ममोरसि । परोपकाराय सदाऽस्तु मे मतिर्न चापकाराय कदापि कस्यचित् ॥ ३॥ न क्रूरदृष्टिर्मम सत्सु भूयान्निरीक्ष्ण्यमाणोऽस्य सकोपनेत्रैः । मासेवतस्तानविपकबुद्धया साधून् मदो मे हृदयं वृणोतु ॥ ४॥ अपात्रपूजा न च पात्रहेलनं तिरस्क्रिया नाप्यपराध्यतां सताम् । अदण्ड्यदण्डोऽस्तु न मे कृतघ्नतामयी क्रिया कापि विदेहनन्दिनि ॥ ५॥ योषित्सु सर्वासु च मातृबुद्धिस्तथाऽस्तु मे स्वसृमतिः प्ररूढा । बालेषु सर्वेषु च बन्धुबुद्धिर्मा नीचबुद्धिः सततं ममास्तु ॥ ६॥ विश्वासघातो न तथा कदर्यता नाभक्ष्यपेयाशनपानमस्तु मे । न शास्त्रसंवर्जितकर्मसु स्पृहा कदापि भूयान्महिते महीयसाम् ॥ ७॥ सहिष्णुता क्षान्तिरमन्दशेमुषी वात्सल्यताऽव्याजकृपा विनम्रता । उदारता ही मृदुता सुशीलता न जातु चैता हृदयं त्यजन्तु मे ॥ ८॥ मदाश्रिता क्लेशयता न सन्तु वै विशेषतो भागवता उपेक्षया । नाभ्यागताः क्रूरगिरा दृशार्दिताः समुच्छ्वसन्तु स्मयदूषितात्मनः ॥ ९॥ ऋते त्वदुच्छिष्टमथान्यवस्तुषु स्याद् भोगबुद्धिर्न कदापि मामकी । त्वदर्थमेवाखिलचेष्टितं हि मे भक्तापराधो न कदापि मां स्पृशेत् ॥ १०॥ रतिः प्रवृत्तौ विरतिर्निवृत्तौ सङ्गोऽसतां नास्तु सतामसङ्गः । सर्वेषु सर्वास्वनुरागदृष्टिर्मा दोषदृष्टिर्मम कर्हिचित् स्यात् ॥ ११॥ स्वभृत्यसम्पोषणसक्तचेतसा नोपेक्षिताः सन्तु मया त्वदाश्रिताः । लोभाद् भयाद् वा निजधर्मवर्जिता क्रियाऽस्तु नो काऽपि तवानुकम्पया ॥ १२॥ स्वप्नोपमं मानुषमेत्य जन्म स्वर्वासिमृग्यं क्षणभङ्गुरञ्च । वैरं न कुर्यां तव तुष्टिकामः केनाप्यहं श्रीनिमिवंशभूषे ॥ १३॥ न्यायालयं ते क्षमताप्रधानं न्यायप्रधानं न वदन्ति सन्तः । क्षान्तिप्रधाना मतिरस्तु तस्मान् न मम क्षमाब्धे ॥ १४॥ भयं न मे स्याच्चरतः स्वधर्मं कालादपि प्राप्तविवेकदृष्टेः । मत्तस्तथा तन्न पिपीलिकानां सौभाग्यमेतत् कृपया प्रयच्छ ॥ १५॥ स्वशिक्षयैवादृढयन् स्वधर्मं समाश्रितान् भागवते प्रधाने । अनेकसांसारिक भोगसक्तं न काङ्क्षितं जन्म चिराय लोके ॥ १६॥ त्वद्धामवासस्तव कीर्तिगानं त्वन्नामसङ्कीर्त्तनमेव नित्यम् । अम्बाशुभोत्सङ्गविहारशीले त्वद्रूपसञ्चिन्तनमस्तु मह्यम् ॥ १७॥ अन्यान्यदेवार्चनवन्दनस्मृतिस्तव प्रपत्तिः श्रवणानुरागिता । स्वप्नेऽपि भूयादिह भक्तिकण्टकं नानन्यता पाठपरायणस्य मे ॥ १८॥ पूज्यानुवन्द्या परिभावनीया ज्ञेयानुगेया समुपासनीया । श्रेयः परं काङ्क्षिभिरात्मनिष्ठैस्त्वामेव हित्वाऽखिलकर्मजालम् ॥ १९॥ स मे पिता सा जननी स बन्धुः सखा स दाता स पतिर्गुरुः सः । कृपालुतोपेक्षितसर्वदोषः सेवासहायो य इहास्त्वनीहः ॥ २०॥ परमलालनैः पाल्यते त्वया निरयकर्मकृन्मादृशो जनः । करुणया यया हेतुहीनया कुरु न मां तया सेवयोज्झितम् ॥ २१॥ विनय एव मेऽयं हि साञ्जलिः सुनयनाङ्कभूषे प्रसीदताम् । अनुदिनं तवोच्छिष्टजीवतो वनरुहाक्षि नो चेत्तु का गतिः ॥ २२॥ ॥ इति श्रीखोजीदेवाचार्यविरचितं श्रीजनकजाप्रपत्तिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्रम्: परिचय एवं वैचारिक पृष्ठभूमि

श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्रम् (Sri Janakaja Prapattisara Stotram) रामानन्द सम्प्रदाय के महान आचार्य और परम विरक्त संत श्री खोजीदेवाचार्य (Shri Khojidevacharya) द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और आध्यात्मिक रूप से गहन रचना है। इस स्तोत्र का शीर्षक ही इसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है — 'जनकजा' का अर्थ है राजा जनक की पुत्री माता सीता, और 'प्रपत्ति' का अर्थ है 'अनन्य शरणागति' (Total Surrender)। भक्ति मार्ग में प्रपत्ति को मोक्ष का सबसे सुगम और तीव्र फलदायी मार्ग माना गया है। आचार्य खोजीदेवाचार्य जी ने इस स्तोत्र के माध्यम से एक भक्त की मनोदशा, उसके आचरण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की आह्लादिनी शक्ति माँ जानकी के प्रति पूर्ण समर्पण को २२ श्लोकों में पिरोया है।

यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह एक 'आदर्श जीवन दर्शन' है। इसमें साधक माँ सीता से केवल भौतिक सुखों की याचना नहीं करता, बल्कि वह अपने चरित्र की शुद्धि, अहिंसा का संकल्प और सभी प्राणियों में ईश्वरीय चेतना देखने की शक्ति मांगता है। श्री खोजीदेवाचार्य जी, जिन्हें राम भक्ति शाखा का प्रकाण्ड विद्वान माना जाता है, उन्होंने इस पाठ में 'प्रपत्ति' के छह अंगों (आनुकूल्यस्य संकल्पः, प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्, रक्षिष्यतीति विश्वासो, गोप्तृत्व वरणं तथा, आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षडविधा शरणागतिः) का सार समाहित किया है।

ऐतिहासिक और शैक्षणिक दृष्टि से, यह स्तोत्र मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की उस विचारधारा को पुष्ट करता है जहाँ 'शील' और 'भक्ति' का समन्वय अनिवार्य माना गया। खोजीदेवाचार्य जी का व्यक्तित्व स्वयं 'खोज' (तलाश) का प्रतीक था — सत्य की खोज और आत्मा की खोज। उन्होंने इस स्तोत्र में स्पष्ट किया है कि जब तक वाणी, शरीर और बुद्धि से अहिंसा का पालन नहीं होता, तब तक सच्ची 'प्रपत्ति' या शरणागति संभव नहीं है। यह पाठ वैराग्य और प्रेम का एक अद्भुत दस्तावेज है, जो आधुनिक युग के भ्रमित मनुष्य को नैतिकता और शांति का मार्ग दिखाता है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance of Prapatti)

श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्र का दार्शनिक आधार 'विशिष्टाद्वैत' और 'रामानन्द दर्शन' पर टिका है। इसमें माँ सीता को साक्षात 'ब्रह्म' की कारुणिक शक्ति के रूप में देखा गया है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • अहिंसा और परोपकार: प्रथम और तृतीय श्लोक में 'अहिंसा' को शरणागति की पहली सीढ़ी बताया गया है। साधक प्रार्थना करता है कि उसकी बुद्धि कभी किसी के अपकार में न लगे। यह नैतिकता का सर्वोच्च स्तर है।
  • समता का भाव: दूसरे श्लोक में समता (Equanimity) का अद्भुत वर्णन है — "चाहे लोग हँसें, निंदा करें या दुर्वचन कहें, मेरा मन माँ के चरणों से विचलित न हो।" यह स्थिति किसी भी आध्यात्मिक साधक के लिए चरम लक्ष्य है।
  • नैतिक शुचिता (Moral Purity): छठे श्लोक में 'मातृवत परदारेषु' का भाव है — "सभी स्त्रियों में मेरी मातृ-बुद्धि हो।" यह न केवल एक धार्मिक निर्देश है, बल्कि समाज की सुरक्षा और मर्यादा का मूल आधार है।
  • पूर्ण निर्भरता: २०वें श्लोक में साधक माँ सीता को ही माता, पिता, बन्धु, सखा, गुरु और सर्वस्व मान लेता है। यह 'गोप्तृत्व वरण' है, जहाँ भक्त अपनी सारी चिंताएं भगवान के भरोसे छोड़ देता है।

यह स्तोत्र साधक को 'अहंकार' (Ego) से मुक्त कर 'कार्पण्य' (Humility) की ओर ले जाता है। इसमें बार-बार माँ के 'उच्छिष्ट' (कृपा प्रसाद) पर जीवन व्यतीत करने की बात कही गई है, जो जीव की ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता का प्रतीक है।

फलश्रुति: श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्र के लाभ (Benefits)

इस दिव्य स्तोत्र के मनन और पाठ से साधक को निम्नलिखित मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

चित्त की शुद्धि (Purification of Mind): इसके नियमित पाठ से मन के द्वेष, ईर्ष्या और क्रोध जैसे तामसिक विकार नष्ट हो जाते हैं और सात्विक विचारों का उदय होता है।
अखंड मानसिक शांति: निंदा और अपमान में सम रहने की शक्ति मिलने से साधक बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है, जिससे उसे स्थाई शांति मिलती है।
भय से मुक्ति (Abhaya): जब भक्त यह मान लेता है कि माँ सीता उसकी रक्षक हैं (श्लोक १५), तो उसे मृत्यु और काल का भय भी नहीं सताता।
सद्गुणों का विकास: स्तोत्र के ८वें श्लोक के अनुसार सहिष्णुता, उदारता, विनम्रता और कोमलता जैसे दैवीय गुण साधक के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं।
मोक्ष का मार्ग: प्रपत्ति (शरणागति) के माध्यम से साधक बिना किसी कठिन तपस्या के सीधे ईश्वरीय कृपा का पात्र बन जाता है, जो अंततः मुक्ति प्रदायक है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

आचार्य खोजीदेवाचार्य जी की इस रचना का पाठ अत्यंत विनम्रता और भावुकता के साथ किया जाना चाहिए। इसकी विधि इस प्रकार है:

  • शुभ मुहूर्त: इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, लेकिन जानकी नवमी (सीता नवमी) और विवाह पंचमी के दिन इसका अनुष्ठान करना विशेष फलदायी है।
  • समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात या रात्रि में सोने से पूर्व एकाग्र चित्त होकर पाठ करें।
  • शुद्धि: पाठ से पूर्व आचमन करें और पीले या सफेद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • अर्पण: माँ सीता और प्रभु श्री राम के चित्र के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें श्वेत पुष्प या फल अर्पित करें।
  • ध्यान: श्लोक २२ के अनुसार, करबद्ध (हाथ जोड़कर) विनयपूर्वक माँ के चरणों में स्वयं को समर्पित करने का भाव रखें।

विशेष: यदि कोई व्यक्ति गृह-कलह या मानसिक अशांति से पीड़ित है, तो उसे लगातार ४१ दिनों तक इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह पाठ परिवार में प्रेम और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री जनकजा प्रपत्तिसार स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र की रचना रामानन्द सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य श्री खोजीदेवाचार्य जी (Shri Khojidevacharya) ने की थी।

2. 'प्रपत्ति' शब्द का क्या अर्थ है?

प्रपत्ति का अर्थ है 'पूर्ण शरणागति' (Absolute Surrender)। इसमें भक्त अपने अहंकार को त्यागकर पूरी तरह भगवान की इच्छा और सुरक्षा पर निर्भर हो जाता है।

3. क्या यह स्तोत्र नैतिकता सिखाता है?

हाँ, इस स्तोत्र में हिंसा का त्याग, परोपकार, स्त्रियों को माता मानना और बालकों को भाई समझना जैसे उच्च नैतिक आदर्शों पर बल दिया गया है।

4. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। माँ सीता स्वयं स्त्री शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। स्त्रियाँ अपने सौभाग्य, चारित्रिक दृढ़ता और सुख-शांति के लिए इसका पाठ अवश्य कर सकती हैं।

5. इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन कौन सा है?

जानकी नवमी (सीता नवमी) और शुक्रवार का दिन माँ सीता की उपासना के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।

6. क्या इस स्तोत्र से मानसिक तनाव दूर होता है?

जी हाँ, समता का भाव जाग्रत होने और ईश्वरीय सुरक्षा का विश्वास मिलने से गहरे से गहरा मानसिक तनाव और चिंता समाप्त हो जाती है।

7. 'न वाग्वपुर्बुद्धिभिरेव' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि वाणी (Word), शरीर (Body) और बुद्धि (Mind) तीनों माध्यमों से कभी किसी की हिंसा न हो। यह पूर्ण अहिंसा का संकल्प है।

8. क्या इस पाठ के लिए कोई विशेष माला चाहिए?

यह एक स्तुति पाठ है, इसके लिए माला की आवश्यकता नहीं है। यदि आप मंत्र जप करना चाहें, तो स्फटिक की माला श्रेष्ठ है।

9. क्या इस स्तोत्र का हिंदी अनुवाद उपलब्ध है?

हाँ, इस स्तोत्र के भावार्थ में हमने इसके मुख्य संदेशों को स्पष्ट किया है, जिससे साधक इसके अर्थ को समझकर पाठ कर सकें।

10. 'जनकजा' नाम का क्या अर्थ है?

'जनकजा' का अर्थ है राजा जनक से उत्पन्न (उनकी पुत्री), जो माता सीता का एक अत्यंत प्रिय नाम है।