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श्रीहनुमत्सूक्तम्

Shri Hanumat Suktam

श्रीहनुमत्सूक्तम्
॥ श्रीहनुमत्सूक्तम् ॥
श्रीमन्तो सर्वलक्षणसम्पन्नो जयप्रदः । सर्वाभरणभूषित उदारो महोन्नतोष्ट्रारूढः । केसरीप्रियनन्न्दनो वायुतनूजो यथेच्छं पम्पातीरविहारी । गन्धमादनसञ्चारी हेमप्राकाराञ्चितकनककदलीवनान्तरनिवासी । परमात्मा वनेचरशापविमोचनो । हेमकनकवर्णो नानारत्नखचिताममूल्यां मेखलां च स्वर्णोपवीतं । कौशेयवस्त्रं च बिभ्राणः सनातनो परमपुरषो । महाबलो अप्रमेयप्रतापशाली रजितवर्णः । शुद्धस्पटिकसङ्काशः पञ्चवदनः । पञ्चदशनेत्रस्सकलदिव्यास्त्रधारी । श्रीसुवर्चलारमणो महेन्द्राद्यष्टदिक्पालक- त्रयस्त्रिंशद्गीर्वाणमुनिगणगन्धर्वयक्षकिन्नरपन्नगासुरपूजित पादपद्मयुगलः । नानावर्णः कामरूपः कामचारी योगिध्येयः श्रीहनुमान् । आञ्जनेयः विराट्रूपी विश्वात्मा विश्वरूपः । पवननन्दनः पार्वतीपुत्रः । ईश्वरतनूजः सकलमनोरथान्नो ददातु ॥
॥ फलश्रुति ॥
इदं श्रीहनुमत्सूक्तं यो धीमानेकवारं पठेद्यदि । सर्वेभ्यः पापेभ्यो विमुक्तो भूयात् ॥

श्रीहनुमत्सूक्तम् परिचय

श्रीहनुमत्सूक्तम् (Shri Hanumat Suktam) एक अत्यंत प्रभावशाली गद्यमय (Prose style) स्तुति है। वेदों में 'सूक्त' मंत्रों के समूह को कहा जाता है, लेकिन बाद के साहित्य में किसी देवता के विशेष गुणों का वर्णन करने वाले गद्य पाठ को भी 'सूक्त' कहा जाने लगा।

यह पाठ हनुमान जी के भव्य और दिव्य स्वरूप का दर्शन कराता है। इसमें उन्हें "सुवर्चला-रमण" (देवी सुवर्चला के पति) और "पञ्चवदन" (पांच मुख वाले) के रूप में नमन किया गया है।

पाठ के लाभ

  • पाप मुक्ति: फलश्रुति में कहा गया है कि जो बुद्धिमान व्यक्ति एक बार भी इसका पाठ करता है ("एकवारं पठेद्यदि"), वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
  • मनोकामना पूर्ति: पाठ के अंत में प्रार्थना की गई है - "सकलमनोरथान्नो ददातु", अर्थात हनुमान जी हमारी सभी इच्छाएं पूरी करें।
  • भय निवारण: इसमें हनुमान जी को "महोन्नतोष्ट्रारूढः" (विशाल ऊंट पर सवार) और "दिव्यास्त्रधारी" बताया गया है, जो शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न करता है और भक्त की रक्षा करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

१. यह पाठ गद्य (Paragraph) में क्यों है?

संस्कृत साहित्य में दो विधाएं हैं - पद्य (Verse/Shloka) और गद्य (Prose)। गद्य स्तुतियां (जिसे 'गद्यम' भी कहते हैं) देवता के गुणों का निरंतर, बिना रुके वर्णन करती हैं, जिससे एक विशिष्ट प्रवाह और ऊर्जा उत्पन्न होती है।

२. "श्रीसुवर्चलारमणो" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "देवी सुवर्चला के पति"। पराशर संहिता और कुछ अन्य ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी का विवाह सूर्य देव की पुत्री 'सुवर्चला' से हुआ था, जो ज्ञान और विद्या का प्रतीक हैं। वे नित्य ब्रह्मचारी माने जाते हैं क्योंकि यह विवाह केवल विद्या प्राप्ति के लिए था।

३. "पञ्चवदनः" और "पञ्चदशनेत्रः" का रहस्य क्या है?

इसमें हनुमान जी के 'पंचमुखी' रूप का वर्णन है, जिनके ५ मुख (वानर, नृसिंह, गरुड़, वराह, हयग्रीव) और १५ नेत्र (हर मुख में ३ नेत्र) हैं। यह उनका विश्वरूप है।

४. "महोन्नतोष्ट्रारूढः" - हनुमान जी ऊंट पर क्यों सवार हैं?

यह एक दुर्लभ वर्णन है। युद्ध क्षेत्र में या यात्रा करते समय देवताओं को विभिन्न वाहनों पर दिखाया जाता है। ऊंट (Ustra) रेगिस्तान और कठिन मार्गों में भी चलने का प्रतीक है, जो दर्शाता है कि हनुमान जी दुर्गम स्थानों में भी भक्त की रक्षा करते हैं।

५. "ईश्वरतनूजः" क्यों कहा गया है?

"ईश्वर" भगवान शिव का नाम है और "तनूज" का अर्थ है पुत्र। हनुमान जी भगवान शिव के ११वें रुद्र अवतार माने जाते हैं, इसलिए उन्हें ईश्वर-पुत्र या शिव-अंश कहा गया है।

६. "कामरूपः कामचारी" का क्या मतलब है?

"कामरूपः" का अर्थ है जो इच्छा अनुसार कोई भी रूप धारण कर सकें (जैसे सुरसा के सामने बड़ा या लंकिनी के सामने छोटा रूप)। "कामचारी" का अर्थ है जो कहीं भी स्वतंत्र रूप से जा सकें।

७. इस पाठ को कब करना चाहिए?

इसे विशेष विपत्ति में या किसी बड़ी मनोकामना की पूर्ति के लिए पढ़ा जाता है। चूंकि इसमें "सकलमनोरथान्नो ददातु" की प्रार्थना है, इसे संकल्प लेकर 41 दिन तक पढ़ना लाभकारी है।

८. "गन्धमादनसञ्चारी" का महत्व क्या है?

गंधमादन पर्वत वह स्थान है जहां हनुमान जी कलयुग में निवास करते हैं। इस विशेषण का उच्चारण करके हम उन्हें उनके निवास स्थान से अपने पास बुलाते हैं।

९. क्या इसके लिए विशेष पूजा की जरूरत है?

सामान्य पूजा (धूप, दीप, नैवेद्य) पर्याप्त है। मुख्य बात है "भाव"। पाठ करते समय हनुमान जी के विराट स्वरूप (स्वर्ण वर्ण, आभूषणों से लदे हुए) का मानसिक ध्यान करना अनिवार्य है।

१०. "वनेचरशापविमोचनो" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "वन में रहने वाले यक्ष/किन्नर आदि के शाप से मुक्ति दिलाने वाले"। यह इंगित करता है कि हनुमान जी आकस्मिक और अज्ञात शापों या दुर्भाग्य को भी दूर कर सकते हैं।