Logoपवित्र ग्रंथ

Shri Dakshayani Stotram – श्रीदाक्षायणीस्तोत्रम्

Shri Dakshayani Stotram – श्रीदाक्षायणीस्तोत्रम्
॥ श्रीदाक्षायणीस्तोत्रम् ॥ गम्भीरावर्तनाभिर्मृगमदतिलका वामबिम्बाधरोष्ठी श्रीकान्ता काञ्चिदाम्ना परिवृतजघना कोकिलालापवाणी । कौमारी कम्बुकण्ठी प्रहसितवदना धूर्जटिप्राणकान्ता रम्भोरूः सिंहमध्या हिमगिरितनया शाम्भवी नः पुनातु ॥ १॥ दद्यात् कल्मषहारिणी शिवतनुः पाशाङ्कुशालङ्कृता शर्वाणी शशिसूर्यवह्निनयना कुन्दाग्रदन्तोज्ज्वला । कारुण्यामृतपूर्णवाग्विलसिता मत्तेभकुम्भस्तनी लोलाक्षी भवबन्धमोक्षणकरी निश्रेयसं सन्ततम् ॥ २॥ मध्येसुधाब्धि मणिमण्टपरत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमाल्यविचित्रगात्रीं देवीं भजामि दृढबुद्धतलेडजिह्वाम् ॥ ३॥ सन्नद्धां विविधायुधैः परिवृतामालीकुमारीगणैः ध्यायेदीप्सितदायिनीं त्रिनयनां सिंहाधिरूढां सिताम् । शङ्खं चक्रधनूंषि चारु दधतीं दिव्यायुधां तर्जनीं वामे शक्तिमसिं महेषुभितरे श्रीशक्तिशूलं भजे ॥ ४॥ किंशुकच्छदविशाललोचनीं किञ्च नागरसवल्लिसंयुताम् । अङ्गचम्पकसमानवर्णिनीं शङ्करप्रियसतीं नमाम्यहम् ॥ ५॥ आरुह्य सिंहमसिचर्मरथाङ्गशङ्ख- शक्तित्रिशूलशरचापधरा पुरास्तात् । गच्छ त्वमम्ब दुरिते पथि दुष्टसत्त्वात् संरक्षणाय सततं मम देवि दुर्गे ॥ ६॥ दिनकरशशिनेत्रे दिव्यते रुद्रगात्रे घनसमुचितगात्रे कल्पवल्लीसवित्रि । अनवरतपवित्रे ह्यम्बिके कालरात्रे मुनिविनुतचरित्रे मोहने शैलपुत्रि ॥ ७॥ जलरुहसमपाणे सत्कलाबाणतूणे सुललितमुखवीणे सर्वविद्याप्रवीणे । अलघुनुतपुराणे ह्यर्थभाषाधुरीणे- प्यलिसमुदयवेणि ग्रावजे शम्भुराज्ञि ॥ ८॥ विविधगुणकराली विश्वतत्त्वावराली शिवहृदयसमेली स्वयभवामथाली । नवमणिमयमौली नागरक्षोविभाली धवलभसितधूलीधारिणी भद्रकाली ॥ ९॥ जननमरणहारी सर्वलोकोपकारी जननजतविहारी चारुवक्षोरुहारी । कनकगिरिविहारी कालगर्वोपहारी घनफणधरहारी कालि कौमारि गौरि ॥ १०॥ मलहरुनिमतङ्गी मन्त्रयन्त्रप्रसङ्गी वलयितसुभुजङ्गी वाङ्मयी मौनसङ्गी । विलयभयविहङ्गी विश्वतो रक्षपाङ्गी कलितजयतुरङ्गी खण्डचन्द्रोत्तमाङ्गी ॥ ११॥ अम्ब त्वदाराधनतत्पराणां मुखारविन्दे सरसं कवित्वम् । करारविन्दे वरकल्पवल्ली पदारविन्दे नृपमौलिराजिः ॥ १२॥ पुरवैरिधात्रि मुरवैरिपूजिते जलदालिवेणि फलदायिके शिवे । सदयं ससम्पदुदयं कुरुष्व मे जगदम्ब शाम्भवि कदम्बवासिनि ॥ १३॥ विजयविभवदात्री विश्वकल्याणगात्री मधुकरशुभवेणी मङ्गलापासवाणी । शतमखविधिगीता शाम्भवी लोकमाता कलिरिपुजयघोटी कामकोटिः सहाया ॥ १४॥ मधुपमहितमौर्वी मल्लिकामञ्जुलोर्वी- धरपतिवरकन्या धर्मभूतेषु धन्या । मणिमयघनवीणा मञ्जरीदिव्यबाणा कलिरिपुजयघोटी कामकोटिः सहाया ॥ १५॥ अम्ब त्वदंशोरणुरंशुमाली तवैव मन्दस्मितबिन्दुरिन्दुः । यादृच्छिकं संल्लपितं त्रयी ते पुम्भावलीला पुरुषत्र यान्ति ॥ १६॥ दर्वेदनानभवनैः परिदयमाना निर्वेदमेति नितरां कलना मदीया । पर्वेन्दुसुन्दरमुखि प्रणतानुकम्पे सर्वेश्वरि त्रिपुरसुन्दरि मे प्रसीद ॥ १७॥ यत्प्रभापटलपाटलं जगत् पद्मरागमणिमण्डपायते । पाशपाणि सणिपाणि भावये चापपाणि शरपाणि दैवतम् ॥ १८॥ ऐश्वर्यमष्टविधमष्टदिगीश्वरत्व- मष्टात्मता च फलमाश्रयिणामितीव । मुद्रां वहन् घनधियो वटमूलवासी मोदं तनोतु मम मुग्धशशाङ्कचूडः ॥ १९॥ गेहं नाकति गर्वितः प्रणमति स्त्रीसङ्गमो मोक्षति द्वेषी मित्रति पातकं सकतति क्षमावल्लभो दासति । मृत्युर्वैद्यति दूषणं सुगुणति त्वत्पादसेवनात् त्वां वन्दे भवभीतिभञ्जनकरीं गौरीं गिरीशप्रिये ॥ २०॥ पातय वा पाताले स्थापय वा सकललोकसाम्राज्ये । मातस्तव पदयुगलं नाहं मुञ्चामि नैव मुञ्चामि ॥ २१॥ आपदि किं करणीयं स्मरणीयं चरणयुगलमम्बायाः । तत्स्मरणं किं कुरुते ब्रह्मादीनपि च किङ्करीकुरुते ॥ २२॥ मातर्मे मधुकैटभन्नि महिषप्राणापहारोद्यमे हेलानिर्मितधूम्रलोचनवधे हे चण्डमुण्डार्दिनि । निश्शेषीकृतरक्तबीजदनुजे नित्ये निशुम्भापहे शुम्भध्वंसिनि संहराशु दुरितं दुर्गे नमस्तेऽम्बिके ॥ २३॥ रक्ताभामरुणांशुकाम्बरधरामानन्दपूर्णाननां मुक्ताहारविभूषितां कुचभरक्लान्तां सकाञ्चीगुणाम् । देवीं दिव्यरसान्नपात्रकरकामम्भोजदर्वीकरां ध्याये शङ्करवल्लभां त्रिणयनामन्बां सदानप्रदाम् ॥ २४॥ उद्यद्भानुनिभां दुकूलवसनां क्षीरोदमध्ये शुभे मूले कल्पतरोः स्फुरन्मणिमये सिंहासने संस्थिताम् । बिभ्राणां करयोः सुवर्णचषकं बीजं च शाल्युद्भवं भक्ताभीष्टवराभयाञ्जलिपुटां ध्यायेऽन्नपूर्णेश्वरीम् ॥ २५॥ वामे पायसपूर्णहेमकलशं पाणौ वहन्ती मुदा चान्ये पाणितले सुवर्णरचितां दर्वी च भूषोज्ज्वलाम् । अम्बा शुद्धदुकूलचित्रवसना कारुण्यपूर्णेक्षणा श्यामा काचन शङ्करप्रियतमा शातोदरी दृश्यते ॥ २६॥ करेण चञ्चन्मणिकङ्कणेन दर्वी दधानां धवलान्नपूर्णाम् । कदावलोके करुणालवालां काशीपुरीकल्पलतां भवानीम् ॥ २७॥ या माणिक्यमनोज्ञहारविभुना (सहिता) सिन्दूरभासान्विता तारानायकशेखरा त्रिनयना पीनस्तनोद्भासिता । बन्धूकप्रसवारुणाम्बरधरा मार्ताण्डकोट्युज्ज्वला सा दद्याद्भुवनेश्वरी भगवती श्रेयांसि भूयांसि नः ॥ २८॥ माणिक्यनूपुरविभूषितपादपद्मां हस्तारविन्दकरुणारसपूर्णदर्वीम् । सन्ध्यारुणांशुकधरां नवचन्द्रचूडां मन्दस्मितां गिरिसुते भवतीं भजामि ॥ २९॥ ॥ इति श्रीदाक्षायणीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्रीदाक्षायणीस्तोत्रम्: परिचय एवं स्वरूप (Introduction & Forms)

श्रीदाक्षायणीस्तोत्रम् केवल एक नाम स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह माता पार्वती (दाक्षायणी/सती) के विभिन्न दिव्य स्वरूपों का एक अलंकृत और भक्तिपूर्ण संग्रह है। 'दाक्षायणी' का अर्थ है दक्ष प्रजापति की पुत्री, जो बाद में 'सती' और फिर 'पार्वती' (हिमगिरि तनया) के रूप में अवतरित हुईं। इस स्तोत्र की रचना शैली और भाव प्रवणता इसे शंकराचार्य रचित स्तोत्रों के समकक्ष रखती है। इसमें सौंदर्य लहरी के समान लावण्य वर्णन और अन्नपूर्णा स्तोत्र जैसी करुणा की पुकार है।

अन्नपूर्णा और भुवनेश्वरी का संगम: स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (24 से 29) में देवी का अन्नपूर्णा स्वरूप विशेष रूप से वर्णित है। उनके हाथों में 'स्वर्ण चषक' (सोने का कटोरा) और 'रत्न दर्वी' (रत्नों से जड़ी कड़छी/चम्मच) है, जिससे वे भक्तों को पायस (खीर) और ज्ञान का दान करती हैं। वहीं, श्लोक 28 में उन्हें भुवनेश्वरी कहा गया है, जो 'मार्ताण्डकोट्युज्ज्वला' (करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी) हैं और लाल वस्त्र (अरुणाम्बर) धारण करती हैं।

रक्षक दुर्गा: श्लोक 6 में देवी का वनदुर्गा या रक्षक रूप है। भक्त प्रार्थना करता है — "गच्छ त्वमम्ब दुरिते पथि... संरक्षणाय" — "हे माँ! आप सिंह पर सवार होकर, अस्त्र-शस्त्र लेकर मेरे आगे-आगे चलें और कठिन रास्तों पर मेरी रक्षा करें।" यह भाव आर्त पुकार का है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)

यह स्तोत्र देवी के 'सगुण' और 'निर्गुण' दोनों पक्षों को छूता है। इसमें भक्ति, प्रेम और पूर्ण समर्पण का भाव है।

  • विराट स्वरूप का दर्शन: श्लोक 16 में कवि कहते हैं — "त्वदंशोरणुरंशुमाली" — "हे माँ! यह सूर्य तो आपके तेज का एक छोटा सा अणु मात्र है, और चंद्रमा आपकी मंद मुस्कान का एक बिंदु है।" यह देवी के विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप को दर्शाता है।
  • कवित्व और वाकसिद्धि: श्लोक 12 में कहा गया है कि जो आपकी आराधना करते हैं, उनके मुखारविंद में "सरसं कवित्वम्" (रसपूर्ण कविता) का वास हो जाता है। यह देवी के वाग्वादिनी (सरस्वती) स्वरूप का द्योतक है।
  • पूर्ण शरणागति (Surrender): श्लोक 21 इस स्तोत्र का हृदय है — "पातय वा पाताले स्थापय वा सकललोकसाम्राज्ये... नाहं मुञ्चामि" — "हे माँ! चाहे मुझे पाताल में गिरा दो या त्रिलोकी का साम्राज्य दे दो, मैं आपके चरण कभी नहीं छोड़ूँगा।" यह निस्वार्थ भक्ति का चरम है।
  • कामकोटि और श्रीविद्या: श्लोक 14 और 15 में देवी को 'कामकोटि' (कामाक्षी) कहा गया है। यह कांचीपुरम् की अधिष्ठात्री देवी और श्रीविद्या साधना का संकेत है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Recitation)

दाक्षायणी के इस स्तोत्र का पाठ जीवन के हर अभाव को भरने में समर्थ है:

  • अन्न और धन की पूर्णता: चूंकि इसमें अन्नपूर्णा के श्लोक (24-27) प्रमुख हैं, इसका पाठ घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होने देता। यह दरिद्रता का नाश करता है।
  • शत्रु और भय से रक्षा: श्लोक 6 और 23 के पाठ से, जिसमें देवी को महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ की हंत्री बताया गया है, शत्रुओं का भय और दुर्गम मार्गों का संकट दूर होता है।
  • असंभव को संभव बनाना: श्लोक 20 में एक अद्भुत बात कही गई है — "गेहं नाकति... मृत्युर्वैद्यति" — आपकी कृपा से घर स्वर्ग बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और स्वयं मृत्यु वैद्य (डॉक्टर) बनकर जीवन देने लगती है।
  • ज्ञान और मेधा: विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए यह स्तोत्र वाक-सिद्धि और रचनात्मकता (Creativity) प्रदान करने वाला है।
  • मोक्ष और शिवलोक: श्लोक 2 में देवी को 'भवबन्धमोक्षणकरी' कहा गया है। अंततः यह स्तोत्र जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर शिव सायुज्य प्रदान करता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

इस स्तोत्र का पाठ नित्य पूजा में या विशेष कामना पूर्ति के लिए किया जा सकता है।

अन्नपूर्णा साधना (भोजन से पूर्व): श्लोक 25-26 (उद्यद्भानुनिभां...) को भोजन पकाने से पहले या भोजन ग्रहण करने से पहले पढ़ने से अन्न में दिव्यता आती है और वह प्रसाद बन जाता है। रसोई घर में माँ अन्नपूर्णा के चित्र के सामने इसका पाठ शुभ है।

संकट निवारण प्रयोग: जब कोई घोर संकट हो, तो श्लोक 21 और 22 (आपदि किं करणीयं...) का 108 बार जप करें। यह मंत्र ब्रह्मा आदि देवताओं को भी किकर (सेवक) बना देने की क्षमता रखता है।

नवरात्रि विशेष: नवरात्रि में प्रतिदिन इस पूरे स्तोत्र का पाठ करने से नवदुर्गा के सभी रूपों की पूजा का फल एक साथ मिल जाता है। शुक्रवार को खीर का भोग लगाकर इसका पाठ करना धन-धान्य वर्धक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'दाक्षायणी' नाम का क्या महत्व है?
दाक्षायणी का अर्थ है 'दक्ष की पुत्री'। यह नाम सती के उस स्वरूप को दर्शाता है जिसने अपने पति (शिव) के अपमान पर यज्ञ में देह त्याग दी थी। यह नाम पतिव्रता धर्म और शक्ति का प्रतीक है।
2. क्या यह स्तोत्र अन्नपूर्णा स्तोत्र से अलग है?
यह अन्नपूर्णा स्तोत्र से अलग है, लेकिन इसमें अन्नपूर्णा के कई श्लोक और भाव समाहित हैं। यह अन्नपूर्णा, दुर्गा और ललिता का एक मिश्रित और दुर्लभ स्तोत्र है।
3. 'मृत्युर्वैद्यति' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि देवी की कृपा से स्वयं 'मृत्यु' भी 'वैद्य' (चिकित्सक) बन जाती है। अर्थात, जो काल प्राण हरने आता है, वही प्राणों की रक्षा करने वाला बन जाता है। यह अकाल मृत्यु निवारण का मंत्र है।
4. 'कामकोटि' पीठ कहाँ है?
'कामकोटि' कांचीपुरम् (तमिलनाडु) में स्थित कामाक्षी देवी का शक्तिपीठ है। यह स्तोत्र दक्षिण भारतीय शाक्त परंपरा से भी प्रभावित जान पड़ता है।
5. क्या इसे यात्रा के समय पढ़ा जा सकता है?
जी हाँ। श्लोक 6 में प्रार्थना है कि "हे माँ! आप मेरे आगे-आगे चलो"। यात्रा शुरू करने से पहले इस श्लोक का पाठ सुरक्षा कवच का काम करता है।
6. 'शाम्भवी' का क्या अर्थ है?
शाम्भवी का अर्थ है 'शम्भु (शिव) की पत्नी' या 'शिव की शक्ति'। तंत्र में 'शाम्भवी मुद्रा' भी होती है। यहाँ यह देवी के कल्याणकारी और मोक्षदात्री रूप को दर्शाता है।
7. क्या पुरुष इसका पाठ कर सकते हैं?
बिल्कुल। इसमें माँ के चरण कमलों की भक्ति है। कोई भी पुत्र अपनी माँ की स्तुति कर सकता है। शंकराचार्य जी ने भी ऐसे ही भावपूर्ण स्तोत्र रचे हैं।
8. 'दर्वी' और 'कलश' का प्रतीक क्या है?
कलश (पात्र) अक्षय भंडार का प्रतीक है और दर्वी (कड़छी) उस भंडार को बांटने (वितरण) का प्रतीक है। अन्नपूर्णा माँ केवल धन रखती नहीं, बल्कि उसे भक्तों में बांटती भी हैं।
9. 'नागरसवल्लि' (श्लोक 5) क्या है?
'नागरसवल्लि' का अर्थ है 'पान का पत्ता'। देवी ताम्बूल (पान) ग्रहण करती हैं, जो सौभाग्य और राजसी ऐश्वर्य का प्रतीक है।
10. इस स्तोत्र का मुख्य रस (Ras) क्या है?
इसमें भक्ति रस और शांत रस की प्रधानता है, लेकिन दुर्गा के वर्णन में वीर रस और सौंदर्य वर्णन में शृंगार रस का भी समावेश है।