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Shri Chandika Stuti – श्रीचण्डिकास्तुतिः (दुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचिता)

Shri Chandika Stuti – श्रीचण्डिकास्तुतिः (दुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचिता)
॥ श्रीचण्डिकास्तुतिः ॥ विविक्ततर-गोमती-जठर-मध्य-सिद्धाश्रमां पुरोगत-सरोवर-स्फुरदगाध-पाथश्छटाम् । विशाल-तलतुङ्ग-भूलुलित-निम्बमूलालयां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ १॥ न लक्ष्य-घटनाश्रयां न च विशेष-वेश्मावहां घटानुकृति-गोमती-वहन-भाव्यमानास्पदाम् । नमज्जन-मनोरथारचन-चारु-चिन्तामणिं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ २॥ निरन्तर-समुल्लसत्कमल-कीर्ण-पाथोजिनी- प्रतान-घनसम्पदा कमपि सम्मदं तन्वतीम् । त्रिकोण-सरसीमयीं, परिणतिं पुरो बिभ्रतीं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ३॥ अनुग्रह-रसच्छटामिव सरःश्रियं यान्तिके विकासयति, पद्मिनीदल-सहस्रसन्दानिताम् । प्रतिक्षण-समुन्मिषत्प्रमद-मेदुरां तामहं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ४॥ प्रचण्डयति विक्रमं, झटिति खण्डयत्यापदः सुमण्डयति वाक्कलां, सदसि दण्डयत्युद्धतान् । करण्डयति रोदसी, गुण-समृद्धिभिर्या हि तां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ५॥ श्रुताऽभिलषिता, मता, सुकलिता, समभ्यर्चिता सुधा-पृषत-वर्षिभिर्नवनवैर्वचोभिः स्तुता । जयाय खलु कल्पते बहुविधादृता, तामहं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ६॥ इतस्तत उदित्वर-व्रततिनद्ध-वृक्षावली- लुलद्विहग-मण्डली-मधुरराव-संसेविताम् । स्खलत्कुसुम-सौरभ-प्रसर-पूर्यमाणाश्रमां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ७॥ द्विषत्कुल-कृपाणिकां, कुटिलकाल-विध्वंसिकां, विपद्वन-कुठारिकां, त्रिविध-दुःख-निर्वासिकाम् । कृपाकुसुम-वाटिकां, प्रणत-भारती-भासिकां, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ८॥ ब्रह्माण्डाधिक-देहापि गोमती-तीर-चङ्क्रमा । जयाय भजतां भूयाच्चण्डिका चण्ड-विक्रमा ॥ ९॥ ॥ इति दुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचिता चण्डिकास्तुतिः समाप्ता ॥

श्रीचण्डिकास्तुतिः : परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Background)

संस्कृत साहित्य और स्तोत्र परंपरा में श्रीचण्डिकास्तुतिः एक अत्यंत विशिष्ट और ओजस्वी रचना है। इसके रचयिता पण्डित दुर्गाप्रसाद द्विवेदी हैं, जो आधुनिक संस्कृत साहित्य के एक लब्धप्रतिष्ठ विद्वान माने जाते हैं। यह स्तुति केवल शब्दों का विन्यास नहीं है, बल्कि भक्त हृदय से निकली एक ऐसी पुकार है जो माँ चण्डिका (अम्बिका) की करुणा और शक्ति को तत्काल आकर्षित करती है।

भौगोलिक और आध्यात्मिक संदर्भ: इस स्तुति के प्रथम श्लोक में ही देवी के स्थान का सुंदर वर्णन है — "विविक्ततर-गोमती-जठर-मध्य-सिद्धाश्रमां"। अर्थात, माँ चण्डिका का वह सिद्ध आश्रम गोमती नदी के अत्यंत पवित्र और एकांत तट पर स्थित है। वहाँ सामने एक अथाह जल वाला सरोवर लहरा रहा है। देवी का निवास स्थान किसी विशाल महल में नहीं, बल्कि "निम्बमूलालयां" (नीम के वृक्ष की जड़ के पास) है। यह वर्णन देवी के 'वनदुर्गा' या प्रकृति-स्वरूप को दर्शाता है, जहाँ वे कृत्रिम आडंबरों से दूर, प्राकृतिक शांति के बीच अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।

'भयखण्डिका' स्वरूप: इस स्तुति की सबसे बड़ी विशेषता इसका पुनरावृत्त होने वाला पद (Refrain) है — "भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम्"। कवि बार-बार देवी को 'भयखण्डिका' कहते हैं, जिसका अर्थ है 'भय के टुकड़े-टुकड़े कर देने वाली' या 'भय का पूर्णतः खंडन करने वाली'। जीवन में जब व्यक्ति अज्ञात भय, शत्रुओं के प्रकोप या विपत्तियों से घिर जाता है, तब 'सपदि' (तत्काल/तुरंत) रक्षा करने वाली केवल माँ चण्डिका ही हैं। यह स्तुति भक्त के मन से मृत्यु, रोग और दरिद्रता के भय को निकालकर उसे निर्भीक बनाती है।

काव्य सौंदर्य और विशिष्ट महत्व (Poetic Beauty & Significance)

द्विवेदी जी की यह रचना अनुप्रास और उपमा अलंकारों से सुसज्जित है। श्लोक 5 में 'ण्ड' वर्ण की आवृत्ति (प्रचण्डयति, खण्डयति, सुमण्डयति, दण्डयति, करण्डयति) अद्भुत नाद सौंदर्य उत्पन्न करती है, जो पाठ करते समय एक वीर रस और उत्साह का संचार करता है।

  • चिन्तामणि स्वरूप: दूसरे श्लोक में देवी को 'नमज्जन-मनोरथारचन-चारु-चिन्तामणिं' कहा गया है। जैसे चिंतामणि रत्न सभी इच्छाओं को पूरा करता है, वैसे ही जो भक्त देवी को नमन करते हैं, उनके मनोरथों की रचना (पूर्ति) करने में माँ अत्यंत कुशल हैं।
  • प्रकृति का रमणीय वर्णन: श्लोक 3, 4 और 7 में आश्रम की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन है। कमलों से भरा सरोवर (पाथोजिनी), पक्षियों का मधुर कलरव (विहग-मण्डली-मधुरराव) और फूलों की सुगंध (कुसुम-सौरभ) से भरा वातावरण मन को शांत करता है। यह दर्शाता है कि शक्ति की उपासना प्रकृति के सान्निध्य में शीघ्र फलदायी होती है।
  • त्रिविध ताप का नाश: श्लोक 8 में देवी को 'त्रिविध-दुःख-निर्वासिकाम्' कहा गया है। यह तीन प्रकार के दुखों — आध्यात्मिक (शारीरिक/मानसिक), आधिभौतिक (प्राणियों से प्राप्त), और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं) — को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली शक्ति हैं।

फलश्रुति: स्तुति पाठ के लाभ (Benefits of Recitation)

इस स्तुति के श्लोकों में ही इसके पाठ के चमत्कारिक लाभ छिपे हुए हैं। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से साधक को निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • शत्रु और विपत्ति नाश: श्लोक 8 स्पष्ट करता है कि देवी 'द्विषत्कुल-कृपाणिकां' (शत्रुओं के कुल के लिए तलवार के समान) और 'विपद्वन-कुठारिकां' (विपत्तियों के जंगल को काटने वाली कुल्हाड़ी) हैं। इसके पाठ से शत्रु और संकट टिक नहीं पाते।
  • वाक-सिद्धि और सभा में विजय: श्लोक 5 के अनुसार, देवी 'सुमण्डयति वाक्कलां' (वाणी की कला को सुशोभित करती हैं) और 'सदसि दण्डयत्युद्धतान्' (सभा में उद्दंड विरोधियों को दंडित करती हैं)। वाद-विवाद, मुकदमे या साक्षात्कार (Interview) में यह स्तुति विजय दिलाती है।
  • विक्रम और साहस में वृद्धि: 'प्रचण्डयति विक्रमं' — यह पाठ साधक के भीतर के पौरुष और पराक्रम को प्रचंड कर देता है, जिससे वह कठिन परिस्थितियों का सामना साहस से करता है।
  • मनोकामना पूर्ति: जो भी भक्त झुककर (नमज्जन) माँ से प्रार्थना करता है, वे उसके लिए चिंतामणि बनकर सभी सात्विक मनोरथों को पूर्ण करती हैं।
  • कुटिल काल का विध्वंस: देवी 'कुटिलकाल-विध्वंसिकां' हैं, अर्थात वे बुरे समय और अकाल मृत्यु के योग को भी नष्ट करने में सक्षम हैं।

पाठ विधि एवं साधना (Ritual Method)

यद्यपि यह स्तुति भाव-प्रधान है, फिर भी विधिपूर्वक पाठ करने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

सामान्य विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में या किसी देवी मंदिर (विशेषकर नीम के वृक्ष के समीप स्थित देवी) में आसन ग्रहण करें। माँ दुर्गा या चण्डिका के चित्र के समक्ष दीपक जलाएं। सबसे पहले गणेश जी और गुरु का ध्यान करें।

संकल्प और पाठ: हाथ में जल लेकर अपने भय या संकट के निवारण का संकल्प लें। फिर पूरी एकाग्रता और स्पष्ट उच्चारण के साथ इन 9 श्लोकों का पाठ करें। श्लोक 5 (प्रचण्डयति विक्रमं...) और श्लोक 8 (द्विषत्कुल-कृपाणिकां...) को विशेष बल देकर कम से कम 3 बार पढ़ें।

विशेष अवसर: मंगलवार, अष्टमी, चतुर्दशी और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी है। शत्रु बाधा निवारण के लिए लाल पुष्प अर्पित करते हुए 11 बार पाठ करना अचूक उपाय माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीचण्डिकास्तुतिः के रचयिता कौन हैं?
इस अद्भुत स्तुति की रचना पण्डित दुर्गाप्रसाद द्विवेदी जी ने की है। वे संस्कृत साहित्य के एक प्रख्यात विद्वान और कवि थे।
2. 'भयखण्डिका' का क्या अर्थ है?
'भयखण्डिका' का अर्थ है 'भय का खंडन करने वाली' या 'डर के टुकड़े-टुकड़े कर देने वाली'। इस स्तुति में देवी को इसी विशेषण से पुकारा गया है क्योंकि वे भक्तों को तत्काल निर्भय करती हैं।
3. इस स्तुति में किस नदी और वृक्ष का उल्लेख है?
इसमें गोमती नदी और नीम के वृक्ष (निम्बमूल) का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि देवी किसी कृत्रिम भवन के बजाय प्रकृति की गोद में, नदी किनारे नीम के नीचे वास करती हैं।
4. क्या यह स्तुति शत्रुओं का नाश करने में सक्षम है?
जी हाँ। श्लोक 8 में स्पष्ट कहा गया है कि देवी 'द्विषत्कुल-कृपाणिकां' हैं, अर्थात् शत्रुओं के वंश का नाश करने के लिए वे तलवार के समान हैं। यह पाठ शत्रुओं को परास्त करने में अत्यंत प्रभावी है।
5. 'सुमण्डयति वाक्कलां' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि देवी साधक की वाणी (वाक कला) को सुशोभित और प्रभावी बनाती हैं। जो लोग भाषण, लेखन या वाद-विवाद के क्षेत्र में हैं, उनके लिए यह वरदान स्वरूप है।
6. क्या साधारण लोग इस संस्कृत स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?
बिल्कुल। यद्यपि इसकी भाषा उच्च कोटि की संस्कृत है, परंतु यह लयात्मक (Rhythmic) है। श्रद्धापूर्वक शुद्ध उच्चारण के साथ कोई भी इसका पाठ कर सकता है।
7. 'विपद्वन-कुठारिकां' का अर्थ क्या है?
विपत् (विपत्ति/संकट) रूपी वन (जंगल) को काटने के लिए देवी कुठारिका (कुल्हाड़ी) के समान हैं। अर्थात, संकटों का जंगल कितना भी घना क्यों न हो, देवी उसे क्षण भर में काट देती हैं।
8. इस पाठ को कब करना चाहिए?
इसे नित्य प्रातः या सायं पूजा के समय किया जा सकता है। विशेष संकट के समय, कोर्ट-कचहरी जाते समय, या भय लगने पर इसका तत्काल ('सपदि') स्मरण करना चाहिए।
9. क्या इस स्तुति का संबंध किसी विशेष स्थान से है?
हाँ, श्लोक 1 और 9 में 'गोमती-तीर' का वर्णन है, जो संभवतः गोमती नदी के तट पर स्थित किसी सिद्ध पीठ या आश्रम का संकेत करता है जहाँ कवि ने साधना की होगी।
10. 'त्रिकोण-सरसीमयीं' का क्या तांत्रिक अर्थ है?
श्लोक 3 में यह शब्द आया है। त्रिकोण (Triangle) शक्ति उपासना का मूल यन्त्र है। देवी को त्रिकोण रूपी सरोवर मयी कहा गया है, जो उनके यन्त्र-स्वरूप और सृजन शक्ति का प्रतीक है।