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Shri Chandi Pathah (Tantroktam Devi Suktam) – श्रीचण्डीपाठः (या देवी सर्वभूतेषु)

Shri Chandi Pathah (Tantroktam Devi Suktam) – श्रीचण्डीपाठः (या देवी सर्वभूतेषु)
॥ श्रीचण्डीपाठः (तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्) ॥ ॥ ॐ श्री देव्यै नमः ॥ ॥ अथ चंडीपाठः ॥ या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-१६॥ या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-१९॥ या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२२॥ या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२५॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२८॥ या देवी सर्वभूतेषु च्छायारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३१॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३४॥ या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३७॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४०॥ या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४३॥ या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४६॥ या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४९॥ या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५२॥ या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५५॥ या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५८॥ या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६१॥ या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६४॥ या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६७॥ या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७०॥ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७३॥ या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७६॥ इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानाञ्चाखिलेषु या । भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ ५-७७॥ चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-८०॥ ॥ इति चंडीपाठः (तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्) ॥

श्रीचण्डीपाठः (तन्त्रोक्त देवी सूक्त): परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Background)

श्रीचण्डीपाठः, जिसे लोकप्रसिद्ध रूप में 'या देवी सर्वभूतेषु' या 'तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्' कहा जाता है, मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाली 'श्री दुर्गा सप्तशती' के पंचम अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जब शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से निकाल दिया था, तब सभी देवता हिमालय पर्वत पर एकत्रित हुए और उन्होंने 'अपराजिता' देवी का आह्वान किया। यह स्तोत्र उसी समय देवताओं द्वारा की गई स्तुति है।

दार्शनिक गहराई (Philosophical Depth): यह पाठ केवल भक्ति का गीत नहीं है, बल्कि अद्वैत वेदांत और शाक्त दर्शन का निचोड़ है। इसमें यह स्वीकार किया गया है कि देवी कहीं दूर आकाश में बैठी कोई सत्ता मात्र नहीं हैं, बल्कि वे 'सर्वभूतेषु' (सभी प्राणियों में) स्थित हैं। चाहे वह चेतना हो, बुद्धि हो, नींद हो, भूख हो, या यहाँ तक कि भ्रान्ति (Confusion) भी हो—यह सब उसी एक महाशक्ति की अभिव्यक्ति हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि हमारे भीतर और बाहर जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह सब 'माँ' ही हैं।

'नमस्तस्यै' का रहस्य: प्रत्येक श्लोक के अंत में तीन बार "नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः" का उच्चारण किया गया है। यह त्रिवार नमन कायिक (शरीर से), वाचिक (वाणी से) और मानसिक (मन से) समर्पण का प्रतीक है। इसका अर्थ है—"उन देवी को नमस्कार है, नमस्कार है, बारंबार नमस्कार है।"

विभिन्न रूपों की व्याख्या और महत्व (Significance of Various Forms)

इस सूक्त में देवी के 20 से अधिक रूपों को नमन किया गया है। प्रत्येक रूप का हमारे जीवन में गहरा महत्व है:

  • विष्णुमाया (Vishnumaya): यह वह शक्ति है जो चराचर जगत को मोहित करती है और संचालित करती है। इसे स्वीकार करना ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है।
  • चेतना (Chetana): हर जीवित प्राणी में जो प्राण-शक्ति और चेतना है, वह देवी का ही रूप है। इसके बिना जीवन असंभव है।
  • बुद्धि और स्मृति (Intellect & Memory): निर्णय लेने की क्षमता (बुद्धि) और अनुभव को संजोने की शक्ति (स्मृति) देवी की कृपा है। विद्यार्थी और साधक इन रूपों की विशेष उपासना करते हैं।
  • क्षुधा और तृष्णा (Hunger & Thirst): भूख और प्यास को अक्सर कष्ट माना जाता है, लेकिन यह स्तोत्र सिखाता है कि ये भी देवी के रूप हैं क्योंकि इन्हीं से जीवन और सृष्टि का चक्र चलता है। अन्न ग्रहण करना भी एक यज्ञ बन जाता है।
  • छाया और शक्ति (Shadow & Power): छाया का अर्थ है प्रतिबिम्ब। यह जगत उस परमात्मा का प्रतिबिम्ब है। शक्ति का अर्थ है सामर्थ्य। निर्बलता को त्यागकर शक्ति की उपासना करना ही धर्म है।
  • लज्जा, शांति और क्षमा (Modesty, Peace, Forgiveness): ये सात्विक गुण हैं जो समाज और व्यक्ति को संतुलित रखते हैं। 'क्षान्ति' (क्षमा) रूप में देवी क्रोध पर विजय दिलाती हैं।
  • मातृरूप (Motherhood): "या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता" — यह पंक्ति सबसे अधिक लोकप्रिय है। हर स्त्री में माँ का रूप देखना और प्रकृति को माँ मानना ही शाक्त धर्म का सार है।
  • भ्रान्ति (Delusion): अंत में देवी को 'भ्रान्ति' रूप में भी नमन किया गया है। यह अद्भुत है। यह स्वीकार करना कि हमारी गलतियाँ और भ्रम भी उनकी लीला का हिस्सा हैं, अहंकार को नष्ट कर देता है।

फलश्रुति: पाठ के लाभ (Benefits of Recitation)

इस 'चण्डीपाठ' या 'देवी सूक्त' का नित्य पाठ साधक के व्यक्तित्व का पूर्ण रूपांतरण कर देता है:

  • आत्म-बल और निर्भयता: जब साधक यह अनुभव करता है कि 'शक्ति' रूप में देवी उसी के भीतर स्थित हैं, तो उसका आत्म-विश्वास (Self-confidence) जाग उठता है और भय समाप्त हो जाता है।
  • मानसिक शांति और क्लेश निवारण: "शान्तिरूपेण संस्थिता" मंत्र का जप मानसिक तनाव, अवसाद और गृह-क्लेश को शांत करने में रामबाण औषधि का काम करता है।
  • धन और समृद्धि: "लक्ष्मीरूपेण संस्थिता" — इस मंत्र के जप से घर में दरिद्रता का नाश होता है और स्थायी लक्ष्मी का वास होता है।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: भूख, नींद और भ्रम जैसी सामान्य शारीरिक क्रियाओं में भी देवी का दर्शन करने से जीवन के प्रति दृष्टि सकारात्मक और पवित्र हो जाती है।
  • सर्वत्र विजय: यह 'अपराजिता स्तुति' है। इसका पाठ करने वाला साधक जीवन के किसी भी क्षेत्र (वाद-विवाद, युद्ध, करियर) में पराजित नहीं होता।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method)

इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत सरल और सौम्य है। इसे किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु विधिपूर्वक करने से विशेष लाभ मिलता है।

दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से पवित्र होकर देवी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें। दीपक जलाएं। सबसे पहले "ॐ श्री देव्यै नमः" का उच्चारण करें। फिर धीरे-धीरे, अर्थ का चिंतन करते हुए प्रत्येक श्लोक का पाठ करें। "नमस्तस्यै..." बोलते समय मानसिक रूप से देवी को नमन करें।

नवरात्रि विशेष: नवरात्रि में इस सूक्त का पाठ अनिवार्य माना जाता है। यदि आप पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते, तो केवल 'सप्तश्लोकी दुर्गा' और इस 'तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्' का पाठ करने से भी पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

विशिष्ट कामना हेतु (Samput Path): यदि किसी विशेष गुण की आवश्यकता हो (जैसे विद्या के लिए 'बुद्धिरूपेण' या धन के लिए 'लक्ष्मीरूपेण'), तो उस विशिष्ट श्लोक की 108 बार माला जपने से वह गुण साधक के भीतर जाग्रत हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह 'चण्डीपाठ' दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय में है?
यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में स्थित है। यह देवताओं द्वारा देवी महासरस्वती (अम्बिका) की स्तुति है। इसे 'तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्' भी कहते हैं।
2. 'नमस्तस्यै' शब्द का तीन बार प्रयोग क्यों किया गया है?
तीन बार 'नमस्तस्यै' कहने का अर्थ है—कायिक (शरीर से), वाचिक (वाणी से) और मानसिक (मन से) नमन। यह त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) माया को नमन करने का भी प्रतीक है।
3. क्या हम केवल अपनी पसंद के श्लोक का पाठ कर सकते हैं?
जी हाँ। इसे 'मंत्र साधना' कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपको शांति चाहिए, तो केवल "या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता..." श्लोक का 108 बार जप करना अत्यंत लाभकारी होता है।
4. 'विष्णुमाया' का क्या अर्थ है?
विष्णुमाया भगवान की वह अचिंत्य शक्ति है जो इस संसार को चलाती है और जीवों को मोह में डालती है। इसे 'योगमाया' भी कहते हैं। देवी ही वह शक्ति हैं जो विष्णु की इच्छा को क्रियान्वित करती हैं।
5. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ा जा सकता है?
हाँ, लेकिन अर्थ जानकर पढ़ने से भाव प्रबल होता है। "या देवी सर्वभूतेषु..." का अर्थ बहुत सरल है—"जो देवी सभी प्राणियों में (अमुक) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है।" यह भाव मन में रखकर पाठ करें।
6. क्या यह पाठ घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है?
बिल्कुल। यह एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इसके नियमित पाठ से घर में सात्विक तरंगें (Vibrations) उत्पन्न होती हैं और कलह, भय या नकारात्मकता समाप्त हो जाती है।
7. 'व्याप्तिदेव्यै' (श्लोक 77) का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "जो सब जगह व्याप्त हैं"। देवी केवल मंदिर में नहीं, बल्कि कण-कण में और हर इन्द्रिय के विषय में व्याप्त हैं। यह सर्वव्यापकता का बोध कराता है।
8. क्या इस पाठ के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?
सामान्य पाठ के लिए माला की आवश्यकता नहीं है। यदि आप किसी विशिष्ट श्लोक का जप (सिद्धि हेतु) कर रहे हैं, तो रुद्राक्ष या स्फटिक की माला उत्तम रहती है।
9. क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाएं इसका मानसिक पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ। मानसिक जप (मन ही मन) के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है, क्योंकि आत्मा सदैव पवित्र होती है। केवल मूर्ति स्पर्श या पूजा अनुष्ठान वर्जित होता है।
10. 'चितिरूपेण' (श्लोक 80) का क्या तात्पर्य है?
'चिति' का अर्थ है शुद्ध चेतना (Pure Consciousness)। यह श्लोक कहता है कि देवी ही वह परम चेतना हैं जो इस संपूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं। यह वेदांत का महावाक्य है।