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श्री दुर्गा सप्तशती पञ्चमोऽध्यायः (Shri Durga Saptashati Adhyaya 5)

श्री दुर्गा सप्तशती पञ्चमोऽध्यायः (Shri Durga Saptashati Adhyaya 5)
॥ पञ्चमोऽध्यायः (देवीदूतसंवादं) ॥

॥ उत्तम चरितम् ॥
विनियोगः (Viniyoga)अस्य श्री उत्तमचरितस्य रुद्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजं, सूर्यस्तत्त्वं, सामवेद ध्यानम्, श्रीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तमचरित पारायणे विनियोगः।

ध्यानम् (Dhyanam)घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
-पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

॥ ओं क्लीम् ॥

ऋषिरुवाच॥१॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात्॥२॥
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥३॥
तावेव पवनर्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥४॥
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥५॥
तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥६॥
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥७॥

देवा ऊचुः॥८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥९॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥१०॥
कल्याण्यै प्रणतामृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥११॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥१२॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥१३॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१४-१६॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१७-१९॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२०-२२॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२३-२५॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२६-२८॥
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२९-३१॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥३२-३४॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥३५-३७॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥३८-४०॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥४१-४३॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥४४-४६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥४७-४९॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥५०-५२॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥५३-५५॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥५६-५८॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥५९-६१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥६२-६४॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥६५-६७॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥६८-७०॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥७१-७३॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥७४-७६॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः॥७७॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥७८-८०॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-
-त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥८१॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-
-रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः
सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥८२॥

ऋषिरुवाच॥८३॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन॥८४॥
साऽब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा॥८५॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः॥८६॥
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाऽभूत् साऽपि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः॥८९॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता साऽतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्॥९०॥
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चाऽसुरेश्वर॥९१॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति॥९२॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे॥९३॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥९४॥
विमानं हंससम्युक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥९५॥
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम्॥९६॥
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथाऽयं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत् प्रजापतेः॥९७॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी॥९९॥
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते॥१००॥

ऋषिरुवाच॥१०१॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्॥१०२॥
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु॥१०३॥
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने।
तां च देवीं ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥१०४॥

दूत उवाच॥१०५॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः॥१०६॥
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत्॥१०७॥
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक्॥१०८॥
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः।
तथैव गजरत्नं च हृतं देवेन्द्रवाहनम्॥१०९॥
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः।
उच्चैःश्रवससञ्ज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्॥११०॥
यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च।
रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्।
भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः॥११३॥
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्।
एतद्बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज॥११४॥

ऋषिरुवाच॥११५॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ।
दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्॥११६॥

देव्युवाच॥११७॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः॥११८॥
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात् प्रतिज्ञा या कृता पुरा॥११९॥
यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥१२१॥

दूत उवाच॥१२२॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः॥१२३॥
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका॥१२४॥
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न सम्युगे।
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्॥१२५॥
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।
केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि॥१२६॥

देव्युवाच॥१२७॥
एवमेतद्बली शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा॥१२८॥
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
तदाऽऽचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु यत्॥१२९॥

॥ ओम् ॥
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥

श्री दुर्गा सप्तशती पञ्चमोऽध्यायः - परिचय (Introduction)

पञ्चम अध्याय (Fifth Chapter) के साथ ही दुर्गा सप्तशती का 'उत्तम चरित्र' (Uttama Charitra) प्रारंभ होता है। यह अध्याय केवल एक कथा नहीं है, बल्कि इसमें वह विश्वप्रसिद्ध 'तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्' है, जिसमें "या देवी सर्वभूतेषु..." के मंत्रों से जगदंबा के सर्वव्यापी स्वरूप की वंदना की गई है।

कथा प्रसंग:
महिषासुर के वध के बाद देवता कुछ काल तक सुखी रहे, लेकिन फिर दो महा-बलशाली असुर भाई—शुम्भ और निशुम्भ—प्रकट हुए। उन्होंने इंद्र सहित सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और त्रिलोक पर अपना अधिकार जमा लिया। हारे हुए देवता हिमालय पर गए और उन्हें वह वरदान याद आया जो देवी ने उन्हें दिया था कि "विपत्ति में मुझे याद करोगे तो मैं अवश्य आऊंगी।"

अपराजिता स्तुति (Tantrokta Devi Suktam):
देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवी की जो स्तुति की, वह 'नमो देव्यै महादेव्यै' से प्रारंभ होकर 'या देवी सर्वभूतेषु' तक चलती है। यह स्तुति अद्वैत वेदांत और शाक्त दर्शन का अद्भुत संगम है। इसमें देवताओं ने माना है कि:

  • देवी केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सर्वभूतेषु (सभी प्राणियों में) स्थित हैं।
  • वह केवल 'शक्ति' या 'बुद्धि' ही नहीं, बल्कि 'क्षुधा' (भूख), 'निद्रा' (नींद), 'तृष्णा' (प्यास), 'छाया', 'लज्जा' और 'भ्रांति' (Delusion) के रूप में भी वही विराजमान हैं।
  • हमारा हर भाव, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक (जैसे क्रोध या लोभ), अंततः उसी महाशक्ति का खेल है।

जब देवता स्तुति कर रहे थे, तभी पार्वती जी वहां आईं। उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसे 'कौशिकी' कहा गया। कौशिकी के निकलते ही पार्वती जी काली पड़ गईं और 'कालिका' कहलाईं। शुम्भ-निशुम्भ के सेवक 'चण्ड' और 'मुण्ड' ने कौशिकी के अलौकिक सौंदर्य को देखा और अपने राजा को बताया। शुम्भ ने मोहित होकर अपना दूत 'सुग्रीव' भेजा, जिसने देवी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। देवी ने मुस्कुराते हुए अपनी प्रतिज्ञा सुनाई—"जो मुझे युद्ध में हरा देगा, मेरा गर्व चूर कर देगा, वही मेरा पति होगा।" यहीं से आगामी युद्ध की भूमिका तैयार होती है।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक रहस्य (Significance & Spiritual Meaning)

अध्यात्म की दृष्टि से, यह अध्याय हमें 'समदृष्टि' (Equanimity) सिखाता है।

  • सर्वव्यापकता का बोध: जब हम बोलते हैं—"या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण... दयारूपेण... क्षुधारूपेण...", तो हम स्वीकार करते हैं कि हमारे सामने खड़ा हर व्यक्ति, हर पशु, हर स्थिति उसी माँ का रूप है। भूख में भी वही है, तुष्टि में भी वही है।

  • मैं कौन हूँ? (Self-Inquiry): पार्वती के शरीर कोष्ठ से 'कौशिकी' का निकलना यह दर्शाता है कि हमारे भौतिक शरीर (Gross Body) के भीतर एक सूक्ष्म, दिव्य चेतना (Subtle Consciousness) छिपी है। साधना के द्वारा उस 'कौशिकी' शक्ति को जगाना ही जीवन का लक्ष्य है।

  • अहंकार का प्रस्ताव: शुम्भ का विवाह प्रस्ताव 'अहंकार' (Ego) का प्रयास है 'आत्मा' (Self) पर अधिकार करने का। लेकिन आत्मा (देवी) केवल उसे मिलती है जो अहंकार को 'मार' (Victory in battle) देता है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

"तंत्रोक्त देवी सूक्त" (श्लोक 9-82) का पाठ स्वतंत्र रूप से भी अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।

काम्य प्रयोग

  • सर्व-सिद्धि हेतु: यदि बहुत प्रयास के बाद भी कार्य न बन रहे हों, तो प्रतिदिन "या देवी सर्वभूतेषु..." के पूरे 21 नमस्कार मंत्रों का पाठ करें।
  • दिशा और आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके, लाल आसन पर बैठकर पाठ करें।
  • नैवेद्य: देवी को अनार (Pomegranate) या नारियल का भोग प्रिय है।
  • विद्या प्राप्ति: "बुद्धिरूपेण संस्थिता" मंत्र का 108 बार जाप करें।
  • धन प्राप्ति: "लक्ष्मीरूपेण संस्थिता" मंत्र का 108 बार जाप करें।

पञ्चम अध्याय के लाभ (Phala Shruti)

इस अध्याय के पाठ से साधक के जीवन में अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं।

  • तंत्र-बाधा निवारण: यह अध्याय 'तन्त्रोक्त' है, अतः किसी भी प्रकार के ऊपरी साये, नजर दोष या तंत्र प्रयोग को काटने में यह रामबाण है।
  • सौंदर्य और आकर्षण: देवी के "अतिसौम्य" रूप की आराधना से साधक में तेज और आकर्षण (Charisma) बढ़ता है।
  • मनोकामना पूर्ति: देवता जो "अभीष्ट" (Desire) चाहते थे, वह उन्हें मिला। यह पाठ रुकी हुई मनोकामनाओं को पूर्ण करता है।
  • पारिवारिक शांति: "शांतिरूपेण संस्थिता" का जाप घर के कलह को समाप्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. "या देवी सर्वभूतेषु" मंत्र का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - "जो देवी सभी प्राणियों में (विशिष्ट रूप) से स्थित हैं, उन्हें मेरा नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।"

2. कौशिकी देवी कौन हैं?

पार्वती जी के शरीर कोष (Physical Sheath) से जो शक्ति निकली, वह 'कौशिकी' कहलाई। इन्हीं ने शुम्भ-निशुम्भ का वध किया।

3. क्या केवल 'नमस्तस्यै' वाला भाग पढ़ सकते हैं?

हाँ, इसे 'तंत्रोक्त देवी सूक्त' कहते हैं। समयाभाव में केवल श्लोक 9 से 82 तक का पाठ भी पूर्ण फलदायी है।

4. देवी ने शुम्भ के विवाह प्रस्ताव पर क्या कहा?

देवी ने कहा, "मेरा प्रण है कि जो मुझे युद्ध में जीत लेगा, वही मेरा पति होगा।" यह अहंकारी को चुनौती थी।

5. इस अध्याय में कितने 'नमस्तस्यै' श्लोक हैं?

कुल 21 बार अलग-अलग रूपों (बुद्धि, निद्रा, छाया आदि) के लिए 'नमस्तस्यै' मंत्र आया है।

6. क्या यह पाठ रात्रि में करना चाहिए?

हाँ, तंत्रोक्त सूक्त होने के कारण रात्रि (विशेषकर महानिशा) का पाठ शीघ्र फल देता है।

7. क्या पुरुष यह पाठ कर सकते हैं?

बिलकुल। देवता पुरुष ही थे जिन्होंने यह स्तुति की थी। यह पाठ स्त्री-पुरुष सभी के लिए है।

8. 'भ्रान्तिरूपेण' का क्या अर्थ है?

भ्रांति (Confusion/Delusion) भी देवी का ही रूप है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तो हम अपनी गलतियों के प्रति सजग हो जाते हैं और देवी हमें उनसे बाहर निकालती हैं।

9. पाठ के बाद क्या करें?

पाठ के बाद कुछ देर मौन रहें और देवी के उस रूप का ध्यान करें जिसकी आपको आवश्यकता है (जैसे शांति या लक्ष्मी)।

10. क्या इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सप्तशती पाठ के लिए सामान्यतः श्रद्धा ही पर्याप्त है, यद्यपि शापोद्धार आदि कर लेना उत्तम होता है।