Shattrimshannavamallikastavah – षट्त्रिंशन्नवमल्लिकास्तवः

परिचय: 36 पुष्पों में कुंडलिनी का रहस्य
षट्त्रिंशन्नवमल्लिकास्तवः एक असाधारण रूप से गूढ़ और सुंदर स्तोत्र है, जिसका शीर्षक ही इसके रहस्य को प्रकट करता है - "छत्तीस नई चमेली की कलियों की माला की स्तुति"। यह ३६ श्लोकों की एक काव्यात्मक माला है, जिसे श्री आनंदनाथ के शिष्य, आंध्र प्रदेश के काश्यप गोत्रीय श्री त्यागराज ने रचा है। प्रत्येक श्लोक एक सुगंधित पुष्प के समान है, जिसे उन्होंने देवी त्रिपुरसुन्दरी के चरणों में अर्पित किया है। यह स्तोत्र केवल भक्ति और प्रशंसा का ग्रंथ नहीं है, बल्कि श्रीविद्या और कौल मार्ग की उच्चतम साधना, यानी कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया का एक व्यवस्थित और प्रतीकात्मक वर्णन है।
स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति एक ध्रुवपद (refrain) पर समाप्त होती है: "तां नौमि त्रिपुरां परापरमयीं स्वानन्दसंवित्तये"। इसका अर्थ है, "मैं उन त्रिपुरा को नमन करता हूँ, जो परा (दिव्य, पारलौकिक) और अपरा (सांसारिक, भौतिक) दोनों हैं, ताकि मैं अपने स्वयं के आनंदमय बोध (आत्म-साक्षात्कार) को प्राप्त कर सकूँ।" यह ध्रुवपद बार-बार साधक को स्तोत्र के अंतिम लक्ष्य की याद दिलाता है - केवल देवी की स्तुति नहीं, बल्कि उस स्तुति के माध्यम से स्वयं के शिव-शक्तिमय, आनंदपूर्ण स्वरूप को जानना।
इस स्तोत्र की संरचना अद्वितीय है। पहले कई श्लोक (२ से लेकर लगभग १६ तक) साधक को एक तांत्रिक ध्यान यात्रा पर ले जाते हैं, जो मूलाधार चक्र से शुरू होती है और विभिन्न चक्रों और ग्रंथियों से होते हुए सहस्रार और उससे भी परे के लोकों तक पहुँचती है। प्रत्येक श्लोक में, कवि उस विशेष चक्र में देवी की उपस्थिति, उनके स्वरूप और उनके ध्यान से प्राप्त होने वाले विशिष्ट फल का वर्णन करते हैं। इसके बाद के श्लोक देवी के अद्वैत, दार्शनिक स्वरूप का वर्णन करते हैं, जो उन्हें समय, स्थान और गुणों से परे स्थापित करता है। यह भक्ति, ज्ञान और योग का एक अद्भुत संगम है।
विशिष्ट महत्व: कुंडलिनी जागरण का काव्यात्मक मानचित्र
इस स्तोत्र का मुख्य महत्व इसकी संरचना में निहित है, जो कुंडलिनी योग की साधना का अनुसरण करती है। यह देवी को एक बाहरी इकाई के रूप में नहीं, बल्कि साधक के अपने सूक्ष्म शरीर में स्थित चेतना के रूप में पूजता है।
- मूलाधार चक्र (श्लोक २): यात्रा "मूलाम्बुजकर्णिका" (मूलाधार कमल के केंद्र) से शुरू होती है, जहाँ देवी 'बाला' के रूप में स्थित हैं। उनके ध्यान से "कवितापाण्डित्यम्" (अद्भुत काव्य और विद्वत्ता) की प्राप्ति होती है।
- स्वाधिष्ठान/मणिपूर चक्र (श्लोक ३-४): स्तोत्र "ओड्याणे" (उड्डियान बंध से संबंधित क्षेत्र) और "मणिपूरके" चक्र का उल्लेख करता है, जहाँ वे 'पश्यन्ती' वाक् के रूप में साधक की रचनात्मकता को बढ़ाती हैं।
- अनाहत चक्र (श्लोक ५): "हृत्पुण्डरीकाम्बरे" (हृदय कमल के आकाश में) उनके ध्यान से परकाया प्रवेश जैसी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
- विशुद्धि और आज्ञा चक्र (श्लोक ६-७): "चक्रे विशुद्धौ" और "भ्रूमध्यद्विदलाम्बुजे" (आज्ञा चक्र) में उनका ध्यान साधक को अमरत्व और नित्य आनंद की अनुभूति कराता है।
- सहस्रार और उससे परे (श्लोक ८-१६): इसके बाद के श्लोक बिंदु, अर्धेंदु, रोधिनी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना जैसे उच्चतर तांत्रिक चक्रों और अवस्थाओं का वर्णन करते हैं, जो साधक को समाधि और कैवल्य की ओर ले जाते हैं।
- अद्वैत वेदांत का सार (श्लोक १७-३६): यात्रा के समापन के बाद, स्तोत्र देवी के शुद्ध दार्शनिक स्वरूप का वर्णन करता है। वे सत् और असत् से परे हैं, तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) की साक्षी हैं, और निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप में लीला करती हैं। यह श्रीविद्या के अद्वैतवादी दर्शन का शिखर है।
फलश्रुति और स्तोत्र के लाभ
इस स्तोत्र की फलश्रुति अंतिम दो श्लोकों (३६ और ३७) में दी गई है, लेकिन वास्तविक लाभ पूरे स्तोत्र में बिखरे हुए हैं:
- मुख्य फल (श्लोक ३७): जो इस ३६ पुष्पों की माला को, जो प्रज्ञा (ज्ञान) के धागे में पिरोई गई है और गुरु कृपा के अमृत से सिंचित है, अपने हृदय, सिर, कान या वाणी में धारण करता है, उसे देवी "शिवपदं" (शिव का परम पद, यानी मोक्ष), "सत्पुत्रसम्पत्सुखम्" (अच्छी संतान, संपत्ति और सुख) प्रदान करती हैं।
- आत्म-साक्षात्कार: स्तोत्र का ध्रुवपद ही इसका सबसे बड़ा लाभ है - "स्वानन्दसंवित्तये" अर्थात स्वयं के आनंदमय स्वरूप का बोध।
- वाक् सिद्धि और विद्वत्ता: मूलाधार में देवी के ध्यान से साधक को अद्भुत काव्य-कौशल और पाण्डित्य प्राप्त होता है (श्लोक २)।
- अमृतत्व और यौवन: उड्डियान बंध में ध्यान से "पीयूषवर्षा" (अमृत की वर्षा) और विशुद्धि चक्र में ध्यान से "चिरञ्जीवितां" (दीर्घायु या अमरता) की प्राप्ति होती है (श्लोक ३, ६)।
- सिद्धियाँ: अनाहत चक्र में ध्यान से परकाया प्रवेश जैसी अणिमादि सिद्धियों को प्राप्त करने की क्षमता मिलती है (श्लोक ५, १६)।
- परम आनंद की अनुभूति: आज्ञा चक्र और उससे ऊपर के चक्रों में ध्यान करने से साधक "नित्यानन्दसुधासमुद्र" (नित्य आनंद के अमृत सागर) में क्रीड़ा करने की अनुभूति प्राप्त करता है (श्लोक ७)।
पाठ और ध्यान की विधि (Method)
यह स्तोत्र एक गहन ध्यान-पद्धति है। इसका पाठ केवल मुख से उच्चारण करने के बजाय, आंतरिक यात्रा के रूप में किया जाना चाहिए।
- तैयारी: एक शांत स्थान पर, आरामदायक मुद्रा में बैठें। अपनी रीढ़ को सीधा रखें। कुछ गहरी साँसें लेकर मन को शांत करें।
- आंतरिक यात्रा: स्तोत्र का पाठ करते समय, विशेषकर पहले 16 श्लोकों के दौरान, अपने ध्यान को अपने सूक्ष्म शरीर के उन चक्रों पर ले जाएं जिनका वर्णन किया जा रहा है।
- मानसिक चित्रण: प्रत्येक श्लोक में वर्णित देवी के स्वरूप, उनकी कांति, और उस चक्र के वातावरण की मानसिक कल्पना करने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, श्लोक २ का पाठ करते समय, अपना ध्यान मूलाधार चक्र पर केंद्रित करें और वहाँ एक बालिका रूपी देवी की कल्पना करें जिनका तेज सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान है।
- भावनात्मक जुड़ाव: प्रत्येक श्लोक के अंत में ध्रुवपद "तां नौमि त्रिपुरां..." का उच्चारण करते समय, पूर्ण समर्पण और भक्ति के साथ देवी को नमन करें, और प्रार्थना करें कि वे आपको आपके आनंदमय स्वरूप का बोध कराएं।
- नियमितता: इस स्तोत्र का नियमित, विशेषकर सुबह या शाम की साधना के समय, पाठ करने से चेतना धीरे-धीरे परिष्कृत होती है और साधक कुंडलिनी ऊर्जा के सूक्ष्म प्रवाह का अनुभव करने लगता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)