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Sandhyavali Kritam Lakshmi Stotram – सन्ध्यावलीकृतं लक्ष्मीस्तोत्रम्

Sandhyavali Kritam Lakshmi Stotram – सन्ध्यावलीकृतं लक्ष्मीस्तोत्रम्
॥ सन्ध्यावलीकृतं लक्ष्मीस्तोत्रम् ॥ (विन्ध्यावलीकृतं लक्ष्मीस्तोत्रम्) स(वि)न्ध्यावली प्राञ्जलिस्तां नत्वा हृदि जगाद च । नमो मात्रे महालक्ष्म्यै त्राहि भक्तं च मे पतिम् ॥ ४॥ नमः प्रकृतिसंज्ञायै मूलायै ते नमो नमः । संहर्त्र्यै ब्रह्ममात्रे ते कुक्षिसृष्ट्यै नमो नमः ॥ ५॥ वामना वापि दीर्घाश्च नारायणास्तु ते मुखे । महाकालादयश्चापि सन्ति ग्रासाश्च ते नमः ॥ ६॥ सङ्कर्षणास्तथा रुद्रा यमाश्चैव तवानने । दंष्ट्रैकचर्वणाः सर्वे महामात्रे नमो नमः ॥ ७॥ वासुदेवस्तथा भूमा नारायणाश्च पूरुषाः । त्वत्पल्लताताडितास्ते महाशक्त्यै नमो नमः ॥ ८॥ त्वत्तो लक्ष्मीः समुत्पन्ना महाविष्णुस्त्वदङ्कजः । ब्रह्माण्डानि च ते रोम्णि रक्ष लक्ष्म्यै नमो नमः ॥ ९॥ महाग्नयस्तु ते गुप्ते त्वत्स्वेदे वाडवाऽनलाः । भगवन्तश्च ते गर्भे चण्डलक्ष्म्यै नमोऽस्तु ते ॥ १०॥ जृम्भे ते प्रलयाः सन्ति चण्डे कालः प्रकम्पते । चूर्णायन्ते महाण्डानि पृष्ठम्रीडे नमोऽस्तु ते ॥ ११॥ रक्ष रक्ष महामाये पतिं मे परमेश्वरि । चण्डी तण्डी महामुण्डी घमण्डी डिण्डिकादिकाः ॥ १२॥ कालीकरालीप्रज्वालीलिहालीरक्तिलादिकाः । शक्तयस्ते रक्तलेशः पाहि कान्तं द्रुतं कुरु ॥ १३॥ पाहि शीघ्रं चान्यथा त्वां गलं निकृत्य पूजये । यद्यहं विधवा स्यां चेत्पूर्वं त्वं विधवा भव ॥ १४॥ यद्यहं राज्यशून्यां स्यां त्वं वैकुण्ठं विना भव । यद्यवमानितो राजा स्यात्पतिस्तेऽप्यमानितः ॥ १५॥ मद्यज्ञे चेद्भवेद्विघ्नं तव यज्ञे तथाऽस्तु वै । वदत्येवं चण्डवेगा श‍ृण्वन्त्यपि सभासदः ॥ १६॥ मा मेत्येवं तदा देवा निवारयन्ति तां स्त्रियम् । तावत्तत्रागता पत्नी महालक्ष्मीर्महाप्रभोः ॥ १७॥ सान्त्वयित्वा च तां राज्ञीं पतितां खर्वपादयोः । मा मैवं देव चात्यन्तं मा भक्तस्य हर प्रभो ॥ १८॥ वामनश्च तदा प्राह नैनं वै मारयाम्यहम् । राज्यभ्रष्टं च नैवाऽहं करोम्येनं सुसेवकम् ॥ १९॥ स(वि)न्ध्यावली सदैवाऽस्तु सुसौभाग्यवती प्रिये । दैत्योऽयं दैत्यराज्यं वै करोतु सुतले प्रिये ॥ २०॥ ॥ इति श्रीलक्ष्मीनारायणीयसंहितायां प्रथमे कृतयुगसन्ताने १५५-अध्यायान्तर्गतं स(वि)न्ध्यावलीकृतं लक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

सन्ध्यावली (विन्ध्यावली) कृत लक्ष्मी स्तोत्र — पौराणिक कथा

पौराणिक संदर्भ: यह अद्वितीय स्तोत्र 'श्रीलक्ष्मीनारायणीय संहिता' से लिया गया है। कथा के अनुसार, जब दैत्यराज बलि (प्रह्लाद के पौत्र) ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने 'वामन अवतार' धारण किया। वामन भगवान ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी के बाद भी बलि ने दान का संकल्प लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप (त्रिविक्रम) धारण कर दो पग में स्वर्ग और पृथ्वी नाप ली। जब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा, तो बलि को पाश में बांध दिया गया और उनका जीवन व राज्य घोर संकट में आ गया।

पतिव्रता का उग्र आह्वान (The Fierce Ninda-Stuti): अपने पति राजा बलि को प्राणों के संकट में और राज्य-विहीन होता देख, उनकी पतिव्रता पत्नी विन्ध्यावली (सन्ध्यावली) का हृदय क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने सीधे परमशक्ति महामाया (महालक्ष्मी) का आह्वान किया। यह कोई साधारण स्तुति नहीं थी, बल्कि एक पतिव्रता की 'निंदा-स्तुति' (एक प्रकार का ताना) थी। विन्ध्यावली ने श्लोक 14-16 में जो कहा, वह अध्यात्म के इतिहास में अद्भुत है।

"यद्यहं विधवा स्यां चेत्पूर्वं त्वं विधवा भव" — विन्ध्यावली कहती हैं, "हे माँ! मेरे पति की रक्षा करो! यदि आपने ऐसा नहीं किया और मैं विधवा हुई, तो याद रखना मेरे सतीत्व के तेज से पहले आपको विधवा होना पड़ेगा। यदि मैं राज्यविहीन हुई, तो आप अपना वैकुंठ खो देंगी। यदि मेरे पति का अपमान हुआ, तो आपके पति (विष्णु) भी अपमानित होंगे।"

माँ लक्ष्मी का प्राकट्य: एक सती की इस भयंकर गर्जना और चेतावनी को सुनकर देवता भी कांप उठे (मा मेत्येवं तदा देवा निवारयन्ति)। वे विन्ध्यावली को रोकने लगे कि ऐसा मत बोलो! तभी ब्रह्मांड को संतुलित करने के लिए साक्षात महालक्ष्मी वहां प्रकट हुईं। उन्होंने विन्ध्यावली को शांत किया और वामन (विष्णु) से कहा — "मा मैवं देव चात्यन्तं मा भक्तस्य हर प्रभो" (हे प्रभो! अपने भक्त के साथ ऐसा कठोर व्यवहार न करें, उसका सब कुछ मत छीनें)। इसके बाद भगवान वामन ने बलि को मृत्युदंड नहीं दिया और उन्हें 'सुतल लोक' का अखंड साम्राज्य प्रदान किया।

स्तोत्र के लाभ और फलश्रुति (Benefits of the Stotram)

इस स्तोत्र की ऊर्जा अत्यंत तीक्ष्ण और फलदायी है। यह एक पतिव्रता की वाणी है, इसलिए जो भी स्त्री या पुरुष इसका पाठ करते हैं, उनके जीवन के सबसे बड़े संकट टल जाते हैं:

  • पति की प्राण रक्षा: यदि किसी महिला के पति गंभीर रूप से अस्वस्थ हों, किसी भयंकर दुर्घटना के शिकार हों, या उन पर कोई प्राणघातक संकट (मुकदमा आदि) हो, तो यह पाठ उनके लिए "संजीवनी" का कार्य करता है।
  • अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: भगवान वामन ने श्लोक 20 में वरदान दिया — "सन्ध्यावली सदैवाऽस्तु सुसौभाग्यवती प्रिये"। इस स्तोत्र का पाठ करने वाली स्त्री का सुहाग हमेशा सुरक्षित रहता है।
  • खोया हुआ राज्य और धन: जब बलि का सब कुछ छिन गया था, तब इस स्तुति के प्रभाव से उन्हें 'सुतल लोक' मिला, जो इंद्र के स्वर्ग से भी अधिक ऐश्वर्यशाली था। यदि आपका व्यापार, नौकरी या पैतृक संपत्ति छिन गई हो, तो यह पाठ उसे वापस दिलाता है।
  • तंत्र-मंत्र और शत्रुओं से बचाव: श्लोक 12-13 में विन्ध्यावली ने माँ की 'चण्डी, महामुण्डी, काली, कराली' जैसी भयंकर शक्तियों को पुकारा है। यह घर और परिवार को हर प्रकार की तांत्रिक बाधाओं और गुप्त शत्रुओं से बचाता है।

साधना विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method)

चूँकि यह स्तोत्र उग्र भक्ति और समर्पण का प्रतीक है, अतः इसे पूर्ण विश्वास और मानसिक संकल्प के साथ पढ़ना चाहिए।

  • शुभ दिन: भगवान वामन और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इसे 'एकादशी', 'द्वादशी' या 'शुक्रवार' के दिन आरंभ करना श्रेष्ठ है।
  • संकल्प: यदि पति पर कोई संकट है, तो पत्नी सुबह स्नान कर, लाल वस्त्र धारण करके माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के समक्ष घी का दीपक जलाए। हाथों में जल और अक्षत लेकर अपने पति की रक्षा का संकल्प लें।
  • पाठ की संख्या: संकट काल में 11 दिनों तक प्रतिदिन 11 बार इसका पाठ करना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में अखंड सौभाग्य के लिए नित्य 1 पाठ पर्याप्त है।
  • अन्न दान: पाठ पूरा होने के पश्चात् किसी सुहागिन स्त्री या कन्या को मीठा भोजन (खीर या हलवा) खिलाना और सुहाग की सामग्री (सिंदूर, चूड़ियाँ) भेंट करना अत्यंत शुभ फल देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सन्ध्यावली (विन्ध्यावली) कौन थीं?

सन्ध्यावली (जिन्हें विन्ध्यावली भी कहा जाता है) महान असुर सम्राट राजा बलि की धर्मपत्नी और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद की पौत्रवधू थीं। वे एक अत्यंत महान पतिव्रता स्त्री थीं।

2. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह दुर्लभ स्तोत्र 'श्रीलक्ष्मीनारायणीय संहिता' के प्रथम खण्ड (कृतयुग सन्तान), अध्याय 155 से उद्धृत किया गया है।

3. विन्ध्यावली ने यह स्तोत्र क्यों गाया था?

जब भगवान वामन ने राजा बलि का सारा राज्य तीन पग में नाप लिया और उन्हें पाश में बांध दिया, तब अपने पति के प्राणों और राज्य को संकट में देखकर विन्ध्यावली ने महालक्ष्मी का आह्वान किया था।

4. इस स्तोत्र की भाषा इतनी उग्र क्यों है?

यह एक 'पतिव्रता' का अपनी इष्ट देवी के प्रति अधिकार है। विन्ध्यावली ने माँ लक्ष्मी से कहा कि 'यदि मेरा सुहाग उजड़ा तो मैं आपके सुहाग को भी नहीं रहने दूँगी।' यह क्रोध नहीं, बल्कि पतिव्रत धर्म की असीम शक्ति की पराकाष्ठा थी।

5. इस स्तोत्र का मुख्य लाभ क्या है?

यह स्तोत्र विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा अपने पति के प्राणों की रक्षा, गंभीर बीमारियों से बचाव, और अखंड सौभाग्य (सुहाग) की प्राप्ति के लिए पढ़ा जाता है।

6. क्या यह खोया हुआ धन वापस दिला सकता है?

हाँ, स्तोत्र के अंत में भगवान वामन ने बलि को स्वर्ग से भी अधिक समृद्ध 'सुतल लोक' का राज्य दिया था। यह पाठ छिना हुआ अधिकार, व्यापार और संपत्ति वापस दिलाता है।

7. श्लोक 12-13 में किन शक्तियों का नाम है?

इसमें चण्डी, महामुण्डी, काली, कराली जैसी उग्र शक्तियों का आह्वान किया गया है, जो महामाया (लक्ष्मी) के ही संहारक रूप हैं, जिन्हें विन्ध्यावली ने अपने पति की रक्षा के लिए बुलाया था।

8. माता लक्ष्मी ने इस स्तुति पर क्या प्रतिक्रिया दी?

विन्ध्यावली का यह उग्र संकल्प सुनकर माता लक्ष्मी स्वयं वहां प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान वामन (विष्णु) से अपने भक्त (बलि) को क्षमा करने और उसका सर्वस्व न छीनने का अनुरोध किया।

9. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

एकादशी, द्वादशी (विशेषकर वामन द्वादशी) और शुक्रवार का दिन इस स्तोत्र के पाठ के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

10. क्या पुरुष भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यद्यपि यह सौभाग्य प्राप्ति के लिए स्त्रियों में अधिक लोकप्रिय है, किंतु पुरुष भी अपने खोए हुए पद, राज्य (करियर) और विपत्तियों से रक्षा के लिए माता लक्ष्मी और वामन भगवान का स्मरण कर इसे पढ़ सकते हैं।