Lopamudra Kruta Sri Lakshmi Stotram – लोपामुद्रा कृत लक्ष्मी स्तोत्र

॥ श्री लक्ष्मीनारायणसंहितायां ॥
॥ श्री लोपामुद्रा कृत लक्ष्मी स्तोत्रम् ॥
१. विश्वमाता वंदना (Salutation to the Universal Mother)
मातर्नमामि कमले पद्माऽऽयतसुलोचने ।
श्रीविष्णुहृत्कमलस्थे विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
२. क्षीरसागर पुत्री (Daughter of the Ocean)
क्षीरसागरसत्पुत्रि पद्मगर्भाभसुन्दरि ।
लक्ष्मि प्रसीद सततं विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥
३. सर्वव्यापी शक्ति (Omnipresent Power)
महेन्द्रसदने त्वं श्रीः रुक्मिणी कृष्णभामिनी ।
चन्द्रे ज्योत्स्ना प्रभा सूर्ये विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥
४. अग्नि और आनंद (Fire & Bliss)
स्मितानने जगद्धात्रि शरण्ये सुखवर्धिनि ।
जातवेदसि दहने विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥
५. त्रिदेवी स्वरूप (The Trinity Form)
ब्रह्माणि त्वं सर्जनाऽसि विष्णौ त्वं पोषिका सदा ।
शिवे संहारिका शक्तिर्विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥
६. गुणों का स्रोत (Source of Virtues)
त्वया शूरो गुणी विज्ञो धन्यो मान्यः कुलीनकः ।
कलाशीलकलापाढ्यो विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥
७. चराचर जगत (The Manifested World)
त्वया गजस्तुरङ्गश्च स्त्रैणस्तृणं सरः सदः ।
देवो गृहं कणः श्रेष्ठा विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥
८. सकल सृष्टि (All Beings)
त्वया पक्षी पशुः शय्या रत्नं पृथ्वी नरो वधूः ।
श्रेष्ठाः शुद्धा महालक्ष्मि विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥
९. प्रार्थना (Final Prayer)
लक्ष्मि श्री कमले पद्मे रमे पद्मोद्भवे सति ।
अब्धिजे विष्णुपत्नि त्वं प्रसीद सततं प्रिये ॥ ९ ॥
॥ इति श्रीलोपामुद्रा कृत श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
ऋषिका लोपामुद्रा: एक परिचय (Who was Lopamudra?)
भारतीय परंपरा में केवल ऋषि ही नहीं, 'ऋषिकाएं' (Women Seers) भी हुई हैं। लोपामुद्रा उनमें शिरोमणि हैं। वे विदर्भ राज की कन्या थीं जिन्होंने राजसी वैभव त्याग कर महर्षि अगस्त्य से विवाह किया।
श्रीविद्या गुरु: लोपामुद्रा केवल एक पत्नी नहीं, बल्कि महान दार्शनिक थीं। 'श्रीविद्या' साधना (ललिता त्रिपुरसुंदरी) के तीन प्रमुख मतों में से एक 'लोपामुद्रा क्रम' (हादी विद्या) इन्हीं के नाम पर है। यह स्तोत्र उनकी उच्च आध्यात्मिक चेतना का प्रमाण है।
श्लोकों का मर्म (Deep Meaning)
यह स्तोत्र अद्वितीय है क्योंकि यह लक्ष्मी को केवल 'धन' तक सीमित नहीं रखता।
- ब्रह्माणि... शिवे संहारिका (श्लोक 5): लोपामुद्रा कहती हैं कि ब्रह्मा जो सृजन करते हैं, विष्णु जो पालन करते हैं, और शिव जो संहार करते हैं - वह सब 'शक्ति' (लक्ष्मी) के बिना असंभव है। लक्ष्मी ही वह ऊर्जा है जो त्रिमूर्ति को संचालित करती है।
- चन्द्रे ज्योत्स्ना... (श्लोक 3): चाँद में जो ठंडक (चांदनी) है और सूर्य में जो तेज (प्रभा) है, वह भौतिक विज्ञान नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी का ही रूप है।
- त्वया शूरो... (श्लोक 6): किसी भी व्यक्ति का शूरवीर, ज्ञानी या कुलीन होना उसके अपने गुण नहीं, बल्कि उस पर लक्ष्मी की कृपा का परिणाम है।
सुहागिन स्त्रियों के लिए पूजा (Ritual for Suvasinis)
चूंकि इसकी रचयिता एक आदर्श पत्नी (लोपामुद्रा) हैं, यह स्तोत्र वैवाहिक सुख के लिए 'अमृत' समान है।
| चरण (Step) | विधि (Procedure) |
|---|---|
| 1. संकल्प | शुक्रवार को 'अखंड सौभाग्य' का संकल्प लें। |
| 2. श्रृंगार | स्वयं 16 श्रृंगार करें और माँ लक्ष्मी को सिन्दूर, हल्दी और कुमकुम चढ़ाएं। |
| 3. पाठ | लोपामुद्रा स्तोत्र का 11 बार पाठ करें। |
| 4. दान | किसी सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री (चूड़ियाँ, बिंदी) और मिठाई भेंट करें। |
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह स्तोत्र अन्य लक्ष्मी स्तोत्रों से अलग कैसे है?
अधिकांश स्तोत्र धन (Gold/Money) माँगते हैं. लोपामुद्रा स्तोत्र 'सम्पूर्णता' (Completeness) माँगता है - पति का सुख, घर में अन्न, पशुधन, और बुद्धि। यह एक गृहस्थ महिला की प्रार्थना है।
2. 'विश्वमातर्नमोऽस्तु ते' मंत्र का क्या लाभ है?
हर श्लोक के अंत में यह पंक्ति आती है। इसका बार-बार उच्चारण करने से मन में 'अहंकार' (Ego) नष्ट होता है और हम महसूस करते हैं कि हम उस 'विश्व माँ' की गोद में सुरक्षित बालक हैं। यह मानसिक तनाव (Anxiety) दूर करता है।
3. क्या कुंवारी कन्याएं इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ। लोपामुद्रा और अगस्त्य जैसा आदर्श और समझदार जीवनसाथी पाने के लिए कुंवारी कन्याओं को यह पाठ अवश्य करना चाहिए।
4. लोपामुद्रा और कावेरी नदी का क्या सम्बन्ध है?
पौराणिक कथाओं में लोपामुद्रा को ही 'कावेरी' नदी का रूप माना गया है। वे जन-कल्याण के लिए नदी बनकर बह निकलीं। इसलिए यह स्तोत्र जल की तरह पवित्र और जीवनदायी माना जाता है।
5. पाठ करने का उत्तम समय क्या है?
शुक्रवार की संध्या (गोधूलि वेला) या ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) सर्वोत्तम है। यदि नित्य संभव न हो, तो कम से कम हर शुक्रवार को स्नान के बाद पाठ करें।
6. किस दिशा में मुख करना चाहिए?
पाठ करते समय अपना मुख 'पूर्व' (East) या 'उत्तर' (North) दिशा की ओर रखें। एक शुद्ध आसन (लाल या ऊनी) पर बैठकर ही पाठ करें।
7. नैवेद्य (प्रसाद) क्या चढ़ाएं?
माँ लक्ष्मी को 'खीर' या दूध से बनी मिठाइयाँ अत्यंत प्रिय हैं। सुहागिन स्त्रियाँ हल्दी, कुमकुम और पुष्प भी अवश्य अर्पित करें।
8. 'क्षीरसागर सत्पुत्रि' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है - 'क्षीर सागर (Ocean of Milk) की श्रेष्ठ पुत्री'। समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए समुद्र को उनका पिता और चंद्रमा को उनका भाई माना जाता है।
9. क्या मासिक धर्म (Period) में पाठ कर सकते हैं?
नहीं। शास्त्रों के अनुसार मासिक धर्म के दौरान 3-4 दिन शरीर 'अशुद्धि' (Resting phase) में रहता है। इस दौरान मानसिक जाप कर सकते हैं, लेकिन मूर्ति स्पर्श या विधिवत पूजा 5वें दिन स्नान के बाद ही करें।
10. 'जातवेदसि' शब्द का क्या महत्व है?
'जातवेदस' अग्नि का नाम है। श्लोक 4 में लक्ष्मी को अग्नि रूप में नमन किया गया है। यह दर्शाता है कि घर की रसोई की अग्नि (जिससे परिवार का पोषण होता है) भी साक्षात लक्ष्मी ही है।
11. क्या पुरुष अपनी पत्नी के लिए पाठ कर सकते हैं?
अवश्य। यदि पत्नी अस्वस्थ हो, तो पति अपनी पत्नी और घर की सुख-शांति के लिए संकल्प लेकर यह पाठ कर सकते हैं। यह दाम्पत्य प्रेम को बढ़ाता है।