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श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् (Runa Hartru Ganesha Stotram)

Runa Hartru Ganesha Stotram

श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् (Runa Hartru Ganesha Stotram)
॥ श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् ॥ ॥ अथ प्रयोगः ॥ अस्य श्री ऋणहर्तृगणपतिस्तोत्र महामन्त्रस्य । सदाशिव ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीऋणहर्तृगणपतिर्देवता । ग्लौं बीजम् । गः शक्तिः । गं कीलकम् । मम सकल ऋणनाशने जपे विनियोगः । करन्यासः । ओं गणेश अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं ऋणं छिन्दि तर्जनीभ्यां नमः । ओं वरेण्यं मध्यमाभ्यां नमः । ओं हुं अनामिकाभ्यां नमः । ओं नमः कनिष्टिकाभ्यां नमः । ओं फट् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । षडङ्गन्यासः । ओं गणेश हृदयाय नमः । ओं ऋणं छिन्दि शिरसे स्वाहा । ओं वरेण्यं शिखायै वषट् । ओं हुं कवचाय हुम् । ओं नमः नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं फट् अस्त्राय फट् । ध्यानम् - सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् । ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं सिद्ध्यैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ॥ सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक्पूजितः फलसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ १ ॥ त्रिपुरस्य वधात्पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ २ ॥ हिरण्यकशिप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ३ ॥ महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ४ ॥ तारकस्य वधात्पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ५ ॥ भास्करेण गणेशो हि पूजितश्छविसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ६ ॥ शशिना कान्तिवृद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ७ ॥ पालनाय स्वतपसां विश्वामित्रेण पूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ८ ॥ इदं ऋणहरस्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम् । एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ॥ ९ ॥ दारिद्र्याद्दारुणान्मुक्तः कुबेरसम्पदं व्रजेत् । फडन्तोऽयं महामन्त्रः सार्थपञ्चदशाक्षरः ॥ १० ॥ ओं गणेश ऋणं छिन्दि वरेण्यं हुं नमः फट् । इमं मन्त्रं पठेदन्ते ततश्च शुचिभावनः ॥ ११ ॥ एकविंशतिसङ्ख्याभिः पुरश्चरणमीरितम् । सहस्रावर्तनात्सम्यक् षण्मासं प्रियतां व्रजेत् ॥ १२ ॥ बृहस्पतिसमो ज्ञाने धने धनपतिर्भवेत् । अस्यैवायुतसङ्ख्याभिः पुरश्चरणमीरितम् ॥ १३ ॥ लक्षमावर्तनात्सम्यग्वाञ्छितं फलमाप्नुयात् । भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं स्मृतिमात्रतः ॥ १४ ॥ इति श्रीकृष्णयामलतन्त्रे उमामहेश्वरसंवादे ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् ।
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स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् (Runa Hartru Ganesha Stotram) प्राचीन श्रीकृष्णयामल तन्त्र से उद्धृत एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। 'ऋणहर्तृ' (Runa + Hartru) का अर्थ है - 'ऋण को हरने वाला' या 'कर्ज को छीन लेने वाला'। यह स्तोत्र केवल साधारण मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि स्वयं देवताओं द्वारा भी समय-समय पर प्रयोग किया गया है।

इस स्तोत्र की पृष्ठभूिका अत्यंत रोचक है। इसमें बताया गया है कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी, त्रिपुर वध से पूर्व भगवान शिव, महिषासुर वध के समय माँ दुर्गा, और हिरण्यकश्यप वध से पूर्व भगवान विष्णु ने अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए इसी स्तोत्र के द्वारा गणेश जी की आराधना की थी।

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance)

साधारणतः लोग 'ऋण' का अर्थ केवल 'धन का कर्ज' समझते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसका अर्थ व्यापक है। यह स्तोत्र तीन प्रकार के ऋणों से मुक्ति दिलाता है:

  • देव ऋण: देवताओं के पूजन में हुई कमियों का दोष।
  • पितृ ऋण: पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों में हुई चूक।
  • ऋषि ऋण: ज्ञान और विद्या के प्रति असम्मान का दोष।

जब साधक देवताओं के उदाहरण का अनुसरण करते हुए इसका पाठ करता है, तो उसके जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं (Hurdles) - चाहे वह धन की हो या शत्रु की - वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे देवताओं के संकट दूर हुए थे।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (Benefits & Phalashruti)

इस स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में स्वयं इसकी फलश्रुति दी गई है, जो निम्न है:

  • कुबेर के समान धन

    श्लोक कहता है - "दारिद्र्याद्दारुणान्मुक्तः कुबेरसम्पदं व्रजेत्"। अर्थात, इसका पाठ करने वाला व्यक्ति भीषण दरिद्रता से मुक्त होकर धन के देवता कुबेर के समान ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

  • कार्य सिद्धि (Success in Tasks)

    चूंकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने कार्यों (सृष्टि, पालन, संहार) से पहले इसका पाठ किया था, इसलिए जो भी साधक किसी नये और बड़े कार्य की शुरुआत से पहले इसे पढ़ता है, उसकी सफलता निश्चित मानी जाती है।

  • अकाल मृत्यु भय निवारण

    यह स्तोत्र 'तीव्रदारिद्र्यनाशनम्' (घोर गरीबी का नाश करने वाला) तो है ही, साथ ही यह साधक के कुल और परिवार की रक्षा भी करता है।

पाठ करने की विधि और संकल्प (Method of Recitation)

इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए शास्त्रों में एक वर्ष (1 Year) का विधान बताया गया है।

1. एक वर्ष का नियम

पाठ में निर्देश है - "एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः"। जो व्यक्ति पूरी एकाग्रता के साथ लगातार 1 वर्ष तक प्रतिदिन इसका पाठ करता है, उसका कर्ज चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, उतर जाता है।

2. विशिष्ट मंत्र प्रयोग

स्तोत्र के अंत में एक विशेष मंत्र दिया गया है: "ओं गणेश ऋणं छिन्दि वरेण्यं हुं नमः फट्"
स्तोत्र पाठ के बाद इस मंत्र की कम से कम 1 माला (108 बार) जाप करने से यह 'महामंत्र' सिद्ध हो जाता है और तत्काल फल देता है।

3. सामान्य विधि

  • बुधवार या चतुर्थी तिथि से आरम्भ करें।
  • पीले वस्त्र धारण करना शुभ होता है।
  • गणेश जी को दूर्वा (घास) अर्पित करें।
  • भोग में लड्डू या मोदक चढ़ाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. 'ऋणहर्तृ' और 'ऋणविमोचन' स्तोत्र में क्या अंतर है?

दोनों का उद्देश्य समान (कर्ज मुक्ति) है। 'ऋणविमोचन' में गणेश जी के वर्णों (रंगों) के ध्यान पर जोर है और इसे 6 माह में फलदायी बताया गया है। 'ऋणहर्तृ' में देवताओं द्वारा की गई स्तुति है और इसे 1 वर्ष के अनुष्ठान के रूप में बताया गया है। साधक अपनी श्रद्धा अनुसार कोई भी चुन सकता है।

Q2. क्या मैं 1 वर्ष से कम समय के लिए पाठ कर सकता हूँ?

जी हाँ, नित्य पूजा में इसे शामिल करने के लिए समय सीमा की बाध्यता नहीं है। 1 वर्ष का नियम 'विशिष्ट सिद्धि' के लिए है। सामान्य लाभ के लिए आप इसे जीवन भर भी पढ़ सकते हैं।

Q3. मंत्र में 'फट्' (Phat) शब्द क्यों है?

'फट्' एक अस्त्र बीज (Weapon Seed Sound) है। इसका प्रयोग बंधनों को काटने और तोड़ने के लिए किया जाता है। यहाँ इसका प्रयोग 'ऋण के बंधन' को काटकर फेंकने के भाव में किया गया है। यह उग्र प्रयोग है, अतः इसे शुद्धता से करना चाहिए।

Q4. क्या स्त्रियां यह पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल, स्त्रियां भी यह पाठ कर सकती हैं। माँ पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र को यह आशीर्वाद दिया है। बस मासिक धर्म के समय 4-5 दिनों का विराम दें और मानसिक जाप करें।