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Ruchi Kruta Pitru Stotram – 1 (Garuda Puranam) – पितृ स्तोत्रम् – १ (रुचि कृतम्)

Ruchi Kruta Pitru Stotram – 1 (Garuda Puranam) – पितृ स्तोत्रम् – १ (रुचि कृतम्)
रुचिरुवाच । नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या ये वसन्त्यधिदेवताः । देवैरपि हि तर्प्यन्ते ये श्राद्धेषु स्वधोत्तरैः ॥ १ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे ये तर्प्यन्ते महर्षिभिः । श्राद्धैर्मनोमयैर्भक्त्या भुक्तिमुक्तिमभीप्सुभिः ॥ २ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे सिद्धाः सन्तर्पयन्ति यान् । श्राद्धेषु दिव्यैः सकलैरुपहारैरनुत्तमैः ॥ ३ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या येऽर्च्यन्ते गुह्यकैर्दिवि । तन्मयत्वेन वाञ्छद्भिरृद्धिर्यात्यन्तिकीं पराम् ॥ ४ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् मर्त्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । श्राद्धेषु श्रद्धयाभीष्टलोकपुष्टिप्रदायिनः ॥ ५ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । वाञ्छिताभीष्टलाभाय प्राजापत्यप्रदायिनः ॥ ६ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् ये वै तर्प्यन्तेऽरण्यवासिभिः । वन्यैः श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकल्मषैः ॥ ७ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैर्नैष्ठिकैर्धर्मचारिभिः । ये सम्यतात्मभिर्नित्यं सन्तर्प्यन्ते समाधिभिः ॥ ८ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् श्राद्धै राजन्यास्तर्पयन्ति यान् । कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकद्वयफलप्रदान् ॥ ९ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् वैश्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । स्वकर्माभिरतैर्नित्यं पुष्पधूपान्नवारिभिः ॥ १० ॥ नमस्येऽहं पितॄन् श्राद्धे शूद्रैरपि च भक्तितः । सन्तर्प्यन्ते जगत्कृत्स्नं नाम्ना ख्याताः सुकालिनः ॥ ११ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् श्राद्धे पाताले ये महासुरैः । सन्तर्प्यन्ते सुधाहारास्त्यक्तदम्भमदैः सदा ॥ १२ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् श्राद्धैरर्च्यन्ते ये रसातले । भोगैरशेषैर्विधिवन्नागैः कामानभीप्सुभिः ॥ १३ ॥ नमस्येऽहं पितॄन् श्राद्धैः सर्पैः सन्तर्पितान्सदा । तत्रैव विधिवन्मन्त्रभोगसम्पत्समन्वितैः ॥ १४ ॥ पितॄन्नमस्ये निवसन्ति साक्षा- -द्ये देवलोकेऽथ महीतले वा । तथाऽन्तरिक्षे च सुरारिपूज्या- -स्ते मे प्रतीच्छन्तु मनोपनीतम् ॥ १५ ॥ पितॄन्नमस्ये परमार्थभूता ये वै विमाने निवसन्त्यमूर्ताः । यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभि- -र्योगीश्वराः क्लेशविमुक्तिहेतून् ॥ १६ ॥ पितॄन्नमस्ये दिवि ये च मूर्ताः स्वधाभुजः काम्यफलाभिसन्धौ । प्रदानशक्ताः सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु ॥ १७ ॥ तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरः समस्ता इच्छावतां ये प्रदिशन्ति कामान् । सुरत्वमिन्द्रत्वमितोऽधिकं वा गजाश्वरत्नानि महागृहाणि ॥ १८ ॥ सोमस्य ये रश्मिषु येऽर्कबिम्बे शुक्ले विमाने च सदा वसन्ति । तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयै- -र्गन्धादिना पुष्टिमितो व्रजन्तु ॥ १९ ॥ येषां हुतेऽग्नौ हविषा च तृप्ति- -र्ये भुञ्जते विप्रशरीरसंस्थाः । ये पिण्डदानेन मुदं प्रयान्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैः ॥ २० ॥ ये खड्गमांसेन सुरैरभीष्टैः कृष्णैस्तिलैर्दिव्य मनोहरैश्च । कालेन शाकेन महर्षिवर्यैः सम्प्रीणितास्ते मुदमत्र यान्तु ॥ २१ ॥ कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टा- -न्यतीव तेषां मम पूजितानाम् । तेषाञ्च सान्निध्यमिहास्तु पुष्प- -गन्धाम्बुभोज्येषु मया कृतेषु ॥ २२ ॥ दिने दिने ये प्रतिगृह्णतेऽर्चां मासान्तपूज्या भुवि येऽष्टकासु । ये वत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्याः प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तुष्टिम् ॥ २३ ॥ पूज्या द्विजानां कुमुदेन्दुभासो ये क्षत्रियाणां ज्वलनार्कवर्णाः । तथा विशां ये कनकावदाता नीलीप्रभाः शूद्रजनस्य ये च ॥ २४ ॥ तेऽस्मिन्समस्ता मम पुष्पगन्ध- -धूपाम्बुभोज्यादिनिवेदनेन । तथाऽग्निहोमेन च यान्ति तृप्तिं सदा पितृभ्यः प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥ २५ ॥ ये देवपूर्वाण्यभितृप्तिहेतो- -रश्नन्ति कव्यानि शुभाहृतानि । तृप्ताश्च ये भूतिसृजो भवन्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥ २६ ॥ रक्षांसि भूतान्यसुरांस्तथोग्रा- -न्निर्नाशयन्तु त्वशिवं प्रजानाम् । आद्याः सुराणाममरेशपूज्या- -स्तृप्यन्तु तेऽस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्यः ॥ २७ ॥ अग्निस्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपास्तथा । व्रजन्तु तृप्तिं श्राद्धेऽस्मिन्पितरस्तर्पिता मया ॥ २८ ॥ अग्निस्वात्ताः पितृगणाः प्राचीं रक्षन्तु मे दिशम् । तथा बर्हिषदः पान्तु याम्यां मे पितरः सदा । प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपि सोमपाः ॥ २९ ॥ रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः । सर्वतः पितरो रक्षां कुर्वन्तु मम नित्यशः ॥ ३० ॥ विश्वो विश्वभुगाराध्यो धर्मो धन्यः शुभाननः । भूतिदो भूतिकृद्भूतिः पितॄणां ये गणा नव ॥ ३१ ॥ कल्याणः कल्यदः कर्ता कल्यः कल्यतराश्रयः । कल्यताहेतुरनघः षडिमे ते गणाः स्मृताः ॥ ३२ ॥ वरो वरेण्यो वरदस्तुष्टिदः पुष्टिदस्तथा । विश्वपाता तथा धाता सप्तैते च गणाः स्मृताः ॥ ३३ ॥ महान्महात्मा महितो महिमावान्महाबलः । गणाः पञ्च तथैवैते पितॄणां पापनाशनाः ॥ ३४ ॥ सुखदो धनदश्चान्यो धर्मदोऽन्यश्च भूतिदः । पितॄणां कथ्यते चैव तथा गणचतुष्टयम् ॥ ३५ ॥ एकत्रिंशत्पितृगणा यैर्व्याप्तमखिलं जगत् । त एवात्र पितृगणास्तुष्यन्तु च मदाहितम् ॥ ३६ ॥ इति श्री गरुडपुराणे ऊननवतितमोऽध्याये रुचिकृत पितृ स्तोत्रम् ।
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गुरुड़ पुराणोक्त रुचि कृत पितृ स्तोत्रम्: परिचय (Introduction)

रुचि कृत पितृ स्तोत्रम् (Garuda Puranam Version) एक विस्तृत और अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जिसका वर्णन गरुड़ पुराण के 89वें अध्याय में मिलता है। यह स्तोत्र प्रजापति रुचि द्वारा अपने पितरों को प्रसन्न करने और वंश वृद्धि के लिए गया था।

इस स्तोत्र में पितरों की 31 श्रेणियों (गणों) का वर्णन है और उन्हें ब्रह्मांड के रक्षक और पोषक के रूप में पूजा गया है। जहाँ लघु संस्करण (Markandeya Purana) संक्षिप्त है, वहीं यह गरुड़ पुराण वाला संस्करण अधिक विस्तृत और तांत्रिक महत्व रखता है। इसमें पितरों की रक्षात्मक शक्तियों (जैसे दिशाओं की रक्षा) का भी आह्वान किया गया है।

स्तोत्र का महत्व

यह स्तोत्र केवल पितरों की तृप्ति ही नहीं करता, बल्कि घर से नकारात्मक शक्तियों, भूत-प्रेत बाधा और असुर दोषों को भी दूर करता है (श्लोक ३० देखिए)।

पाठ के 12 दिव्य लाभ (Benefits)

गरुड़ पुराण के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ करने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • पूर्ण पितृ दोष शांति: यह स्तोत्र सबसे जटिल पितृ दोषों को भी शांत करने में सक्षम है।
  • सुरक्षा कवच: यह स्तोत्र घर और परिवार के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाता है, जिससे बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं ("रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः")।
  • वंश और संतान सुख: प्रजापति रुचि की तरह, निस्संतान दंपत्तियों को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
  • अष्टका श्राद्ध का फल: इसका नित्य पाठ करने से तीर्थों में किए गए श्राद्ध के समान पुण्य मिलता है।
  • धन और धान्य: पितृ प्रसन्न होकर "भुक्ति" (धन-संपत्ति) और "मुक्ति" (मोक्ष) दोनों प्रदान करते हैं।
  • मनोकामना पूर्ति: जो भी मन में इच्छा लेकर इसका पाठ किया जाए, पितृ उसे अवश्य पूरा करते हैं।
  • रोग नाश: परिवार में चल रही लंबी बीमारियों का अंत होता है।
  • शत्रु विजय: गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं द्वारा उत्पन्न बाधाएं समाप्त होती हैं।
  • ब्रह्मराक्षस मुक्ति: यदि परिवार का कोई सदस्य अतृप्त आत्मा बनकर भटक रहा हो, तो उसे भी इस पाठ से मुक्ति मिलती है।
  • सम्मान और यश: समाज में मान-सम्मान और यश की वृद्धि होती है।
  • पारिवारिक एकता: भाइयों और परिवार के बीच प्रेम बढ़ता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ "क्लेशविमुक्तिहेतून्" है, अर्थात यह सांसारिक क्लेशों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है।

पाठ विधि (Recitation Method)

इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए विशेष नियमों का पालन आवश्यक है:

  • विशिष्ट दिनअमावस्या, पितृ पक्ष (Mahalaya), संक्रांति, और ग्रहण काल इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
  • आसन और मुद्रादक्षिण दिशा की ओर मुख करें। कुशा के आसन पर बैठें। यदि संभव हो तो जनेऊ को अपसव्य (दाएं कंधे पर) कर लें।
  • नैवेद्यपितरों को दूध, गंगाजल, काले तिल, और शहद मिलाकर तर्पण देना चाहिए। सफेद फूल अर्पित करें।
  • सावधानीपाठ के दौरान बीच में न बोलें। मन को एकाग्र रखें और पितरों का ध्यान अपने हृदय में करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गरुड़ पुराण वाले रुचि कृत स्तोत्र और अन्य में क्या अंतर है?

गरुड़ पुराण का यह संस्करण (36 श्लोक) अधिक विस्तृत है और इसमें पितरों के साथ-साथ दिशाओं की रक्षा और नकारात्मक शक्तियों के नाश की प्रार्थना भी शामिल है। यह अधिक तांत्रिक और रक्षात्मक प्रकृति का है।

2. क्या इसे घर में रोज़ पढ़ सकते हैं?

हाँ, इसे रोज़ पढ़ा जा सकता है। नित्य पाठ करने से घर "पितृ-रक्षा-कवच" से सुरक्षित रहता है।

3. क्या संतान प्राप्ति के लिए इसका विशेष प्रयोग है?

जी हाँ। प्रजापति रुचि ने विवाह और संतान के लिए ही इसकी रचना की थी। जो दंपति संतान चाहते हैं, वे हर अमावस्या को पति-पत्नी साथ बैठकर इसका पाठ करें।

4. क्या स्त्रियां इस बड़े स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल। स्त्रियां भी इसे पूरी श्रद्धा के साथ पढ़ सकती हैं। वे तर्पण न करें (परंपरानुसार), पर पाठ का अधिकार सबको है।

5. पितृ पक्ष में इसका पाठ कितनी बार करना चाहिए?

संभव हो तो पितृ पक्ष के 16 दिनों में प्रतिदिन एक बार पाठ अवश्य करें। सर्वपितृ अमावस्या के दिन 11 बार पाठ करना विशेष फलदायी है।

6. किस समय पाठ करना वर्जित है?

रात्रि के समय (सूर्यास्त के बाद) और अशुद्धि की अवस्था में (सूतक या मासिक धर्म) पाठ नहीं करना चाहिए।

7. क्या यह स्तोत्र प्रेत बाधा दूर करता है?

हाँ, श्लोक 30 में स्पष्ट लिखा है—"रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः"। यह भूत-प्रेत और ऊपरी बाधाओं को घर से दूर रखता है।

8. अग्निष्वात्ता और बर्हिषद पितृ कौन हैं?

'अग्निष्वात्ता' वे पितृ हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन नहीं जिया (संन्यासी आदि), और 'बर्हिषद' वे हैं जो गृहस्थ रहकर पितृ लोक गए। यह स्तोत्र सभी प्रकार के पितरों को तृप्त करता है।

9. क्या पाठ के बाद दान देना ज़रूरी है?

दान (विशेषकर अन्न दान) से पाठ का फल पूर्ण होता है। पाठ के बाद किसी भूखे को भोजन कराना या गाय को रोटी देना उत्तम है।

10. क्या इसे मोबाइल या पुस्तक से देखकर पढ़ सकते हैं?

हाँ, देखकर पढ़ने में कोई दोष नहीं है। मुख्य बात शुद्ध उच्चारण और सच्ची श्रद्धा है।