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पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र (Pippalada Krutha Shani Stotram) - अर्थ, लाभ और विधि

Pippalada Krutha Sri Shani Stotram

पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र (Pippalada Krutha Shani Stotram) - अर्थ, लाभ और विधि
नमोऽस्तु कोणसंस्थाय पिङ्गलाय नमोऽस्तु ते । नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
हिन्दी भावार्थ: हे कोणसंस्थ (टेढ़ी चाल चलने वाले या कोण में स्थित)! आपको नमस्कार है। हे पिंगल (पीली/भूरी आँखों वाले)! आपको नमस्कार है। हे बभ्रु स्वरूप (तनिक लालिमा लिए हुए) और कृष्ण (काले) वर्ण वाले शनि देव! आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चान्तकाय च । नमस्ते यमसञ्ज्ञाय नमस्ते सौरये विभो ॥ २ ॥
हिन्दी भावार्थ: हे रौद्रदेह (भयानक शरीर वाले)! आपको नमस्कार है। हे अन्तक (काल/मृत्यु स्वरूप)! आपको नमस्कार है। हे यमसञ्ञ (यमराज के समान या यम की संज्ञा वाले) और हे सौरि (सूर्यपुत्र)! हे विभो (सर्वव्यापक)! आपको मेरा नमस्कार है।
नमस्ते मन्दसञ्ज्ञाय शनैश्चर नमोऽस्तु ते । प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च ॥ ३ ॥
हिन्दी भावार्थ: हे मन्दसञ्ञ (मंद गति वाले)! हे शनैश्चर (शनि देव)! आपको नमस्कार है। हे देवेश! मुझ दीन और शरणागत (प्रणत) पर अपनी कृपा (प्रसाद) कीजिए।
॥ इति पिप्पलाद कृत श्री शनि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र

Pippalada Krutha Shani Stotram मात्र 3 श्लोकों का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि पिप्पलाद की तपस्या से प्रसन्न होकर शनि देव ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति उनके (पिप्पलाद) द्वारा रचित इस स्तुति का पाठ करेगा, उसे शनि कभी कष्ट नहीं देंगे। यह स्तोत्र शनि देव के 10 दिव्य नामों (कोण, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मंद, पिप्पलाद) का स्मरण कराता है।

स्तोत्र के लाभ (Benefits)

  • शनि दोष शांति: यह स्तोत्र विशेष रूप से शनि की साढ़े साती (Sade Sati) और ढैया (Dhaiya) के दौरान होने वाली मानसिक और शारीरिक परेशानियों को कम करता है।

  • रोग और भय मुक्ति: 'प्रसादं कुरु देवेश' - इस पंक्ति के माध्यम से भक्त शनि देव से कृपा की याचना करता है, जिससे रोग और अकारण भय दूर होते हैं।

  • दुर्भाग्य का नाश: नियमित पाठ करने से जीवन में आ रही रुकावटें दूर होती हैं और दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाता है।

पाठ विधि (Vidhi)

  • शनिवार के दिन प्रातः स्नान करके काले वस्त्र धारण करना शुभ होता है (यदि संभव हो)।

  • शनि देव की मूर्ति या चित्र के सामने, या पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

  • दीपक में थोड़े काले तिल डालें।

  • एकाग्रचित होकर इन 3 श्लोकों का कम से कम 7 या 11 बार पाठ करें।

  • अंत में 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' मंत्र का जाप करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पिप्पलाद ऋषि ने शनि स्तोत्र की रचना क्यों की?

कथाओं के अनुसार, पिप्पलाद ऋषि ने अपने पिता दधीचि की मृत्यु का कारण शनि की दशा को माना था। उन्होंने शनि को दंड देने के लिए तप किया, लेकिन बाद में शनि देव की महानता को समझा और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस स्तोत्र की रचना की।

2. इस स्तोत्र में शनि देव के किन रूपों को नमन किया गया है?

इसमें शनि देव के विभिन्न गुणों और नामों को नमन किया गया है: कोण (कोणीय/टेढ़े), पिंगल (भूरे), बभ्रु (तनिक लाल), कृष्ण (काले), रौद्रदेह (भयानक शरीर), अन्तका (यम/मृत्यु स्वरूप), यमसञ्ञ (यमराज जैसे), सौरि (सूर्यपुत्र), और शनैश्चर (धीमी गति वाले)।

3. शनि की साढ़े साती में यह स्तोत्र कैसे मदद करता है?

शनि देव ने स्वयं पिप्पलाद ऋषि को वरदान दिया था कि जो भी इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे शनि की दशा, महादशा या साढ़े साती में कष्ट नहीं होगा।

4. पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ विशेष रूप से शनिवार (Saturday) को, प्रातः काल या सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे दिया जलाकर करना अत्यंत फलदायी होता है।

5. "नमस्ते कोणसंस्थाय" का क्या अर्थ है?

"कोणसंस्थाय" का अर्थ है 'कोण में स्थित' या 'टेढ़े चलने वाले'। शनि देव की चाल वक्री (टेढ़ी) होती है, इसलिए उन्हें इस नाम से संबोधित किया गया है।