Logoपवित्र ग्रंथ

श्री शनि देव जी की आरती

Shree Shani Dev Ji Ki Aarti (Jai Jai Shri Shanidev)

श्री शनि देव जी की आरती
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥

श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥

किरीट मुकुट शीश रजित दीपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥

देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी" आरती न्याय के देवता (lord of justice) और कर्मफल दाता, भगवान शनिदेव (Lord Shani Dev) को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह को एक कठोर और दंडाधिकारी ग्रह माना जाता है, जिनकी 'वक्र दृष्टि' से सभी भयभीत रहते हैं। परंतु वास्तव में, वे व्यक्ति को उसके कर्मों का फल देकर उसे शुद्ध करते हैं और सही मार्ग पर लाते हैं। यह आरती शनिदेव के इसी 'हितकारी' अर्थात भक्तों का कल्याण करने वाले स्वरूप की स्तुति करती है। इस आरती का पाठ करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और उनकी क्रूर दृष्टि के दुष्प्रभावों से सुरक्षा (protection) मिलती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती शनिदेव के स्वरूप और उनकी पूजा-विधि का सरल वर्णन करती है:

  • दिव्य स्वरूप का वर्णन (Description of the Divine Form): "श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी" - आरती में उनके श्याम वर्ण, चार भुजाओं, और वक्र दृष्टि का वर्णन है, जो उनके न्यायकारी स्वरूप का प्रतीक है। "नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी" - वे नीले वस्त्र धारण करते हैं और हाथी या कौए पर सवार होते हैं।
  • प्रिय वस्तुएं (Favorite Offerings): "लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी" - यह पंक्ति शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का उल्लेख करती है, जिनमें लोहा, काला तिल, सरसों का तेल, और उड़द की दाल प्रमुख हैं।
  • सर्व पूजनीय (Worshipped by All): "देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी" - इसका अर्थ है कि केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देवता, दानव, ऋषि-मुनि सभी उनका स्मरण करते हैं, क्योंकि कर्म का फल सभी को भोगना पड़ता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • शनिदेव की आरती करने का सबसे उत्तम दिन शनिवार (Saturday) है। इस दिन संध्याकाल में शनि मंदिर में या घर पर ही उनकी पूजा करनी चाहिए।
  • आरती करते समय सरसों के तेल का दीपक जलाना अनिवार्य माना जाता है। इससे शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
  • जिन जातकों पर शनि की साढ़ेसाती (Sade Sati) या ढैय्या चल रही हो, उन्हें दुष्प्रभावों को कम करने के लिए इस आरती का नियमित पाठ करना चाहिए।
  • इस आरती का भक्तिपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को अपने कर्मों को सुधारने की प्रेरणा मिलती हैं। जीवन में अनुशासन (discipline) आता है और शनिदेव की कृपा से उसे अपने परिश्रम का उचित फल प्राप्त होता है।
Back to aartis Collection