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Navagraha Mangalashtakam – नवग्रह मङ्गलाष्टकम्

Navagraha Mangalashtakam – नवग्रह मङ्गलाष्टकम्
॥ नवग्रह मङ्गलाष्टकम् ॥ ॥ १. सूर्य मङ्गल श्लोक ॥ भास्वान् काश्यपगोत्रजोऽरुणरुचिर्यः सिंहपोऽर्कः समि- -त्षट्त्रिस्थोऽदशशोभनो गुरुशशी भौमाः सुमित्राः सदा । शुक्रो मन्दरिपुः कलिङ्गजनपश्चाग्नीश्वरौ देवते मध्येवर्तुलपूर्वदिग्दिनकरः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ १ ॥ ॥ २. चन्द्र मङ्गल श्लोक ॥ चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भव- -श्चात्रेयश्चतुरश्रवारुणमुखश्चापे उमाधीश्वरः । षट्सप्ताग्नि दशैकशोभनफलो नोरिर्बुधार्कौप्रियौ स्वामी यामुनजश्च पर्णसमिधः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ २ ॥ ॥ ३. मंगल/भौम मङ्गल श्लोक ॥ भौमो दक्षिणदिक्त्रिकोणयमदिग्विन्ध्येश्वरः खादिरः स्वामी वृश्चिकमेषयोस्तु सुगुरुश्चार्कः शशी सौहृदः । ज्ञोऽरिः षट्त्रिफलप्रदश्च वसुधास्कन्दौ क्रमाद्देवते भारद्वाजकुलोद्वहोऽरुणरुचिः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ३ ॥ ॥ ४. बुध मङ्गल श्लोक ॥ सौम्यः पीत उदङ्मुखः समिदपामार्गोऽत्रिगोत्रोद्भवो बाणेशानदिशः सुहृद्रविसुतः शान्तः सुतः शीतगोः । कन्यायुग्मपतिर्दशाष्टचतुरः षण्णेत्रगः शोभनो विष्णुर्देव्यधिदेवते मगधपः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ४ ॥ ॥ ५. बृहस्पति/गुरु मङ्गल श्लोक ॥ जीवश्चाङ्गिरगोत्रजोत्तरमुखो दीर्घोत्तराशास्थितः पीतोऽश्वत्थसमिच्च सिन्धुजनितश्चापोऽथ मीनाधिपः । सूर्येन्दुक्षितिजाः प्रिया बुधसितौ शत्रू समाश्चापरे सप्तद्वे नवपञ्चमे शुभकरः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ५ ॥ ॥ ६. शुक्र मङ्गल श्लोक ॥ शुक्रो भार्गवगोत्रजः सितरुचिः पूर्वामुखः पूर्वदिक् पाञ्चालस्थ वृषस्तुलाधिपमहाराष्ट्राधिपौदुम्बरः । इन्द्राणीमघवा बुधश्च रविजो मित्रोर्क चन्द्रावरी षष्ठत्रिर्दशवर्जिते भृगुसुतः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ६ ॥ ॥ ७. शनि मङ्गल श्लोक ॥ मन्दः कृष्णनिभः सपश्चिममुखः सौराष्ट्रपः काश्यपः स्वामी नक्रसुकुम्भयोर्बुधसितौ मित्रौ कुजेन्दू द्विषौ । स्थानं पश्चिमदिक् प्रजापतियमौ देवौ धनुर्धारकः षट्त्रिस्थः शुभकृच्छनी रविसुतः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ७ ॥ ॥ ८. राहु मङ्गल श्लोक ॥ राहुः सिंहलदेशपोऽपि सतमः कृष्णाङ्गशूर्पासनो यः पैठीनसगोत्रसम्भवसमिद्दूर्वामुखो दक्षिणः । यः सर्पः पशुदैवतोऽखिलगतः सूर्यग्रहे छादकः षट्त्रिस्थः शुभकृच्च सिंहकसुतः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ८ ॥ ॥ ९. केतु मङ्गल श्लोक ॥ केतुर्जैमिनिगोत्रजः कुशसमिद्वायव्यकोणेस्थित- -श्चित्राङ्कध्वजलाञ्छनो हि भगवान् यो दक्षिणाशामुखः । ब्रह्मा चैव तु चित्रगुप्तपतिमान् प्रीत्याधिदेवः सदा षट्त्रिस्थः शुभकृच्च बर्बरपतिः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ ९ ॥ ॥ इति नवग्रह मङ्गलाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

नवग्रह ज्योतिषीय सारणी (Navagraha Astrological Chart)

ग्रहगोत्रदिशारंगराशिमित्र ग्रहशत्रु ग्रहअधिदेवता
सूर्यकाश्यपपूर्वअरुण (लाल)सिंहगुरु, चन्द्र, मंगलशुक्र, शनिअग्नि, ईश्वर
चन्द्रआत्रेयवायव्यसित (सफेद)कर्कबुध, सूर्य-उमा, ईश्वर
मंगलभारद्वाजदक्षिणअरुण (लाल)मेष, वृश्चिकसूर्य, चन्द्र, गुरुबुधवसुधा, स्कन्द
बुधआत्रेयउत्तरपीत (पीला)मिथुन, कन्याशनि-विष्णु, देवी
बृहस्पतिआङ्गिरसईशानपीत (पीला)धनु, मीनसूर्य, चन्द्र, मंगलबुध, शुक्रइन्द्र, ब्रह्मा
शुक्रभार्गवपूर्वसित (सफेद)वृष, तुलाबुध, शनिसूर्य, चन्द्रइन्द्राणी, इन्द्र
शनिकाश्यपपश्चिमकृष्ण (काला)मकर, कुम्भबुध, शुक्रमंगल, चन्द्रप्रजापति, यम
राहुपैठीनसदक्षिणकृष्ण (काला)---सर्प, पशु
केतुजैमिनिवायव्यचित्र (बहुरंगी)---ब्रह्मा, चित्रगुप्त

प्रत्येक श्लोक का विस्तृत अर्थ (Detailed Meaning of Each Verse)

श्लोक १ - सूर्य (Surya)

मुख्य विशेषताएं: भास्वान् (प्रकाशमान), काश्यप गोत्र, अरुण (लाल) रंग, सिंह राशि के स्वामी। गुरु-चन्द्र-मंगल मित्र हैं, शुक्र-शनि शत्रु। कलिंग देश के अधिपति। अग्नि और ईश्वर अधिदेवता। 3, 6, 10वें भाव में शुभ। पूर्व दिशा के स्वामी।

श्लोक २ - चन्द्र (Chandra)

मुख्य विशेषताएं: कर्क राशि के स्वामी, सित (सफेद) रंग, आत्रेय गोत्र। चतुरश्र (चौकोर) आकार, अरुण मुख। उमा और ईश्वर अधिदेवता। 6, 7, 3, 10, 1वें भाव में शुभ। कोई शत्रु नहीं। बुध और सूर्य मित्र। यमुना नदी के स्वामी।

श्लोक ३ - मंगल (Mars)

मुख्य विशेषताएं: दक्षिण दिशा, त्रिकोण यम दिशा, विन्ध्याचल के ईश्वर। खदिर (खैर) वृक्ष की समिधा। मेष-वृश्चिक राशि के स्वामी। सूर्य-चन्द्र-गुरु मित्र, बुध शत्रु। भारद्वाज गोत्र, अरुण रंग। वसुधा (पृथ्वी) और स्कन्द अधिदेवता। 3, 6वें भाव में शुभ।

श्लोक ४ - बुध (Mercury)

मुख्य विशेषताएं: सौम्य (शांत), पीला रंग, उत्तर मुख। अपामार्ग की समिधा, आत्रेय गोत्र। ईशान दिशा, शनि मित्र, चन्द्र पुत्र। कन्या-मिथुन राशि के स्वामी। 10, 8, 4, 6वें भाव में शुभ। विष्णु और देवी अधिदेवता। मगध देश के अधिपति।

श्लोक ५ - बृहस्पति (Jupiter)

मुख्य विशेषताएं: जीव (प्राणदाता), आङ्गिरस गोत्र, उत्तर मुख। दीर्घ उत्तर दिशा में स्थित, पीला रंग। अश्वत्थ (पीपल) की समिधा, सिन्धु प्रदेश। धनु-मीन राशि स्वामी। सूर्य-चन्द्र-मंगल मित्र, बुध-शुक्र शत्रु। 7, 2, 9, 5वें भाव में शुभ।

श्लोक ६ - शुक्र (Venus)

मुख्य विशेषताएं: भार्गव (भृगु) गोत्र, सित (सफेद) रंग, पूर्व मुख और दिशा। पांचाल प्रदेश, वृष-तुला राशि स्वामी, महाराष्ट्र अधिपति। औदुम्बर (गूलर) वृक्ष। इन्द्राणी और इन्द्र अधिदेवता। बुध-शनि मित्र, सूर्य-चन्द्र शत्रु। 6, 3, 10 को छोड़कर सभी भावों में शुभ।

श्लोक ७ - शनि (Saturn)

मुख्य विशेषताएं: मन्द (धीमी गति), कृष्ण (काला) रंग, पश्चिम मुख और दिशा। सौराष्ट्र के अधिपति, काश्यप गोत्र। मकर-कुम्भ राशि स्वामी। बुध-शुक्र मित्र, मंगल-चन्द्र शत्रु। प्रजापति-यम अधिदेवता। धनुर्धारक। सूर्य पुत्र। 3, 6वें भाव में शुभ।

श्लोक ८ - राहु (Rahu)

मुख्य विशेषताएं: सिंहल (श्रीलंका) देश के अधिपति, 7वें भाव से सम्बंधित। कृष्ण (काला) अंग, शूर्प (सूप) आसन। पैठीनस गोत्र, दूर्वा (दूब) समिधा। दक्षिण मुख। सर्प स्वरूप, पशु अधिदेवता। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य को ढकने वाला। सिंहिका का पुत्र। 3, 6वें भाव में शुभ।

श्लोक ९ - केतु (Ketu)

मुख्य विशेषताएं: जैमिनि गोत्र, कुश समिधा। वायव्य कोण में स्थित। चित्र (बहुरंगी) अंक और ध्वज चिह्न। दक्षिण मुख। ब्रह्मा और चित्रगुप्त अधिदेवता। बर्बर (विदेशी/म्लेच्छ) देश के अधिपति। 3, 6वें भाव में शुभ।

पाठ विधि और लाभ (Method and Benefits)

पाठ का शुभ समय:
  • प्रातःकाल: सूर्योदय के समय, स्नान के बाद
  • संध्या काल: सूर्यास्त के समय
  • विशेष अवसर: ग्रहण, अमावस्या, पूर्णिमा, नवग्रह जयंती

इस स्तोत्र के लाभ:
  • समस्त ग्रह दोष शांति: सभी 9 ग्रहों का एक साथ आशीर्वाद
  • ज्योतिष ज्ञान: प्रत्येक ग्रह की विशेषताओं का ज्ञान
  • मंगल कामना: 'कुर्यात् सदा मंगलम्' से निरंतर कल्याण
  • कुंडली दोष निवारण: जन्म कुंडली के ग्रह दोषों में राहत
  • ग्रह गोचर: ग्रह गोचर (Transit) के समय शांति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'मङ्गलाष्टकम्' का क्या अर्थ है?

'मङ्गल' (शुभ) + 'अष्टक' (आठ) = आठ मंगल श्लोक। हालांकि इसमें 9 श्लोक हैं (प्रत्येक ग्रह के लिए), परंपरागत रूप से इसे अष्टक कहा जाता है क्योंकि राहु-केतु को एक इकाई माना जाता था।

2. 'कुर्यात् सदा मङ्गलम्' का क्या अर्थ है?

'कुर्यात्' (करें) + 'सदा' (सदैव) + 'मङ्गलम्' (कल्याण) = 'सदैव मेरा कल्याण करें'। यह प्रत्येक श्लोक का समापन वाक्य है जो ग्रह से आशीर्वाद की प्रार्थना है।

3. इस स्तोत्र में ग्रहों का गोत्र क्यों बताया गया है?

वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह का एक ऋषि गोत्र है। जैसे सूर्य - काश्यप, चन्द्र - आत्रेय, मंगल - भारद्वाज। गोत्र जानने से ग्रह पूजा में संकल्प सही होता है।

4. ग्रहों की दिशा का क्या महत्व है?

प्रत्येक ग्रह एक दिशा का स्वामी है। सूर्य - पूर्व, चन्द्र - वायव्य, मंगल - दक्षिण, बुध - उत्तर, गुरु - ईशान, शुक्र - पूर्व, शनि - पश्चिम। वास्तु और पूजा में यह जानकारी उपयोगी है।

5. मित्र-शत्रु ग्रह का ज्योतिष में क्या प्रभाव है?

यदि कुंडली में दो मित्र ग्रह एक साथ हैं तो शुभ फल मिलता है। शत्रु ग्रहों की युति अशुभ होती है। यह स्तोत्र प्रत्येक ग्रह के मित्र-शत्रु बताता है।

6. 'षट्त्रिस्थः शुभकृत्' का क्या अर्थ है?

6 और 3 (षट् + त्रि) स्थान में ग्रह शुभ फलकारी (शुभकृत्) होता है। यह ज्योतिष का नियम है - पाप ग्रह 3, 6, 11वें भाव में अच्छे फल देते हैं।

7. सूर्य को 'सिंहप' क्यों कहा गया है?

'सिंहप' = सिंह राशि का प (अधिपति/स्वामी)। सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं, इसलिए उन्हें सिंहप कहा गया।

8. राहु को 'सिंहलदेशप' क्यों कहा गया?

प्राचीन ज्योतिष में राहु को सिंहल (श्रीलंका) देश का अधिपति माना गया। यह भौगोलिक संबंध ग्रह और देश के बीच स्थापित करता है।

9. केतु का गोत्र 'जैमिनि' क्यों है?

जैमिनि ऋषि ने केतु के विशेष प्रभाव पर ग्रंथ लिखे। जैमिनि ज्योतिष में केतु को विशेष महत्व दिया गया है, इसलिए केतु का गोत्र जैमिनि है।

10. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

प्रातःकाल स्नान के बाद या संध्या समय। विशेषकर ग्रहण, अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रह गोचर के समय इसका पाठ अत्यंत फलदायी है।