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Mathru Panchakam – मातृ पञ्चकम्

Mathru Panchakam – मातृ पञ्चकम्
आस्तां तावदियं प्रसूतिसमये दुर्वारशूलव्यथा नैरुज्यं तनुशोषणं मलमयी शय्या च सांवत्सरी । एकस्यापि न गर्भभारभरणक्लेशस्य यस्य क्षमः दातुं निष्कृतिमुन्नतोऽपि तनयस्तस्यै जनन्यै नमः ॥ १ ॥ गुरुकुलमुपसृत्य स्वप्नकाले तु दृष्ट्वा यतिसमुचितवेषं प्रारुदो मां त्वमुच्चैः । गुरुकुलमथ सर्वं प्रारुदत्ते समक्षं सपदि चरणयोस्ते मातरस्तु प्रणामः ॥ २ ॥ न दत्तं मातस्ते मरणसमये तोयमपि वा स्वधा वा नो दत्ता मरणदिवसे श्राद्धविधिना । न जप्तो मातस्ते मरणसमये तारकमनुः अकाले सम्प्राप्ते मयि कुरु दयां मातरतुलाम् ॥ ३ ॥ मुक्तामणिस्त्वं नयनं ममेति राजेति जीवेति चिरं सुत त्वम् । इत्युक्तवत्यास्तव वाचि मातः ददाम्यहं तण्डुलमेष शुष्कम् ॥ ४ ॥ अम्बेति तातेति शिवेति तस्मिन् प्रसूतिकाले यदवोच उच्चैः । कृष्णेति गोविन्द हरे मुकुन्दे- -त्यहो जनन्यै रचितोऽयमञ्जलिः ॥ ५ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं मातृ पञ्चकम् ॥
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मातृ पञ्चकम् का परिचय (Introduction)

मातृ पञ्चकम् (Mathru Panchakam) आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत भावुक और मर्मस्पर्शी रचना है। यह उन्होंने अपनी माता आर्याम्बा के अंतिम संस्कार के समय रची थी।

शंकराचार्य एक संन्यासी थे, और संन्यास धर्म के अनुसार वे किसी के अंतिम संस्कार में भाग नहीं ले सकते थे। लेकिन अपनी माता को दिए गए "अंतिम समय में साथ रहने" के वचन को निभाने के लिए उन्होंने सभी रूढ़ियों को तोड़ दिया। यह पांच श्लोक एक पुत्र की वेदना, पश्चाताप और अपनी माँ के प्रति असीम कृतज्ञता को दर्शाते हैं।

भावना

इसमें शंकराचार्य जी स्वीकार करते हैं कि प्रसव पीड़ा सहने वाली और मल-मूत्र साफ़ करने वाली माँ के ऋण को एक पुत्र कभी नहीं चुका सकता, चाहे वह कितना भी महान क्यों न बन जाए।

पाठ के लाभ (Significance & Benefits)

यद्यपि यह एक शोकगीत जैसा प्रतीत होता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसके पाठ के गहरे लाभ हैं:

  • मातृ ऋण से मुक्ति: यह स्तोत्र माँ के दूध और त्याग के ऋण को स्वीकार करने और क्षमा मांगने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
  • मानसिक शांति: जिन लोगों की माता का देहांत हो चुका है और वे अंतिम समय में सेवा नहीं कर पाए, उन्हें इस पाठ से भारी मानसिक बोझ से मुक्ति मिलती है।
  • कृतज्ञता का भाव: यह हमें माता-पिता के त्याग के प्रति विनम्र और कृतज्ञ बनाता है।
  • मोक्ष की प्रार्थना: यह पाठ दिवंगत माता की आत्मा की शांति और सद्गति के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
  • संस्कार: आने वाली पीढ़ियों को माता-पिता के महत्व और सेवा का पाठ पढ़ाता है।

पाठ विधि (Recitation Method)

इस स्तोत्र का पाठ विशेष श्रद्धा और भाव के साथ किया जाना चाहिए:

  • कब करें?माता की पुण्यतिथि (श्राद्ध दिवस) पर, अमावस्या पर, या जब भी माँ की याद आए, इसका पाठ करें।
  • दाहिना हाथ उठाकरजैसे शंकराचार्य जी ने मुट्ठी भर सूखे चावल (तण्डुल) अर्पित किए थे, आप भी मानसिक रूप से या वास्तव में चावल अर्पित करते हुए पाठ करें।
  • क्षमा प्रार्थनाअंत में "नारायण" या अपने इष्ट देव का नाम लेकर माँ से अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शंकराचार्य जी ने संन्यासी होते हुए भी माँ का दाह संस्कार क्यों किया?

शंकराचार्य जी ने संन्यास लेते समय अपनी माँ को वचन दिया था कि वे उनके अंतिम समय में अवश्य आएंगे। उन्होंने धर्म/नियम से ऊपर "मातृ धर्म" को रखा और अपना वचन निभाया।

2. "तण्डुलमेष शुष्कम्" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "सूखे चावल"। जब विरोध के कारण उन्हें अंतिम संस्कार के लिए आग नहीं मिली, तो उन्होंने मंत्र शक्ति और सूखे चावलों से ही संस्कार संपन्न किया था। यह पंक्ति उनकी असमर्थता और भक्ति दोनों दर्शाती है।

3. क्या जीवित माता के लिए यह पाठ कर सकते हैं?

यह मुख्य रूप से एक शोकगीत (लमेंट) है, लेकिन इसके कुछ श्लोक (जैसे पहला श्लोक) माता के त्याग को याद करने के लिए कभी भी पढ़े जा सकते हैं।

4. क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, पुत्रियां भी अपनी माँ की याद में और उनकी आत्मा की शांति के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।

5. क्या यह पितृ दोष को दूर करता है?

"मातृ ऋण" पितृ ऋण का ही एक हिस्सा है। इस पाठ से मातृ पक्ष के पूर्वज प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं।

6. इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

यह बहुत छोटा है (5 श्लोक)। इसे एक बार या 11 बार पढ़ना पर्याप्त है। मुख्य बात भाव और आँखों में आंसू (पश्चाताप के) होना है।

7. क्या संस्कृत न जानने वाले इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। आप इसका भावार्थ (हिंदी अनुवाद) पढ़कर भी अपनी माँ को श्रद्धांजलि दे सकते हैं। भाषा से अधिक भावना महत्वपूर्ण है।