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Brahma Kruta Pitru Stotram – पितृ स्तोत्रम् – ३ (ब्रह्म कृतम्)

Brahma Kruta Pitru Stotram – पितृ स्तोत्रम् – ३ (ब्रह्म कृतम्)
ब्रह्मोवाच । नमः पित्रे जन्मदात्रे सर्वदेवमयाय च । सुखदाय प्रसन्नाय सुप्रीताय महात्मने ॥ १ ॥ सर्वयज्ञस्वरूपाय स्वर्गाय परमेष्ठिने । सर्वतीर्थावलोकाय करुणासागराय च ॥ २ ॥ नमः सदाऽऽशुतोषाय शिवरूपाय ते नमः । सदाऽपराधक्षमिणे सुखाय सुखदाय च ॥ ३ ॥ दुर्लभं मानुषमिदं येन लब्धं मया वपुः । सम्भावनीयं धर्मार्थे तस्मै पित्रे नमो नमः ॥ ४ ॥ तीर्थस्नानतपोहोमजपादीन् यस्य दर्शनम् । महागुरोश्च गुरवे तस्मै पित्रे नमो नमः ॥ ५ ॥ यस्य प्रणाम स्तवनात् कोटिशः पितृतर्पणम् । अश्वमेधशतैस्तुल्यं तस्मै पित्रे नमो नमः ॥ ६ ॥ इदं स्तोत्रं पितृः पुण्यं यः पठेत् प्रयतो नरः । प्रत्यहं प्रातरुत्थाय पितृश्राद्धदिनेऽपि च ॥ ७ ॥ स्वजन्मदिवसे साक्षात् पितुरग्रे स्थितोऽपि वा । न तस्य दुर्लभं किञ्चित् सर्वज्ञत्वादि वाञ्छितम् ॥ ८ ॥ नानापकर्म कृत्वाऽपि यः स्तौति पितरं सुतः । स धृवं प्रविधायैव प्रायश्चित्तं सुखी भवेत् । पितृप्रीतिकरैर्नित्यं सर्वकर्माण्यथार्हति ॥ ९ ॥ इति बृहद्धर्मपुराणान्तर्गत ब्रह्मकृत पितृ स्तोत्रम् ।
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ब्रह्म कृत पितृ स्तोत्र का परिचय (Introduction)

ब्रह्म कृत पितृ स्तोत्र (Brahma Kruta Pitru Stotram) बृहद्धर्म पुराण में वर्णित एक संक्षिप्त किन्तु अत्यंत फलदायी स्तोत्र है। इस स्तोत्र की रचना स्वयं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी ने पितरों की महिमा और उनके महत्व को स्थापित करने के लिए की थी।

इस स्तोत्र में पिता को साक्षात देवता, स्वर्ग, और धर्म का स्वरूप माना गया है। यह स्तोत्र न केवल दिवंगत पितरों की शांति के लिए है, बल्कि जीवित पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का भी एक माध्यम है। इसमें पिता को "महागुरु" और "करुणा सागर" कहा गया है।

विशेष महत्व

यह स्तोत्र मुख्य रूप से उन संतानों के लिए है जो अपने पिता के ऋण से मुक्त होना चाहते हैं और उन्हें प्रसन्न देखना चाहते हैं। यह 'पितृ दोष' और 'पितृ ऋण' दोनों से मुक्ति दिलाता है।

स्तोत्र पाठ के 10 प्रमुख लाभ (Benefits)

बृहद्धर्म पुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के नियमित पाठ से निम्नलिखित फल मिलते हैं:

  • अश्वमेध यज्ञ का फल: प्रतिदिन पाठ करने से सौ अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है (श्लोक ६)।
  • कोटि पितृ तर्पण: केवल प्रणाम और स्तुति करने से करोड़ों बार पितृ तर्पण करने का फल मिलता है।
  • प्रायश्चित और पाप नाश: यदि जाने-अनजाने में पिता के प्रति कोई अपराध हुआ हो, तो यह स्तोत्र उसका प्रायश्चित करता है और मन को शांति देता है।
  • दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति: पाठ करने वाले के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता, उसे सब कुछ प्राप्त होता है।
  • पिता की प्रसन्नता: यह स्तोत्र पिता (जीवित या दिवंगत) को अत्यंत प्रिय है और वे इससे शीघ्र प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
  • सर्वज्ञता: साधक को ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है ("सर्वज्ञत्वादि वाञ्छितम्")।
  • सुख और समृद्धि: घर में सुख-शांति बनी रहती है और क्लेशों का नाश होता है।
  • पितृ ऋण मुक्ति: यह स्तोत्र पितृ ऋण चुकाने का सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है।
  • आत्मबल में वृद्धि: पिता के आशीर्वाद से आत्मविश्वास और आत्मबल बढ़ता है।
  • मोक्ष का मार्ग: अंततः यह जीव को सद्गति और मोक्ष की ओर ले जाता है।

पाठ विधि (Recitation Method)

इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ उठाने के लिए सही विधि का पालन करें:

  • नित्य कर्मरोज़ सुबह उठकर (प्रातरुत्थाय) स्नान के बाद इसका पाठ करना श्रेष्ठ है। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
  • विशेष अवसरपिता के जन्मदिन पर, श्राद्ध पक्ष में, और अमावस्या को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
  • जीवित पिता के लिएयदि पिता जीवित हैं, तो उनके सामने खड़े होकर या उन्हें मन में प्रणाम करके यह स्तोत्र पढ़ें।
  • दिवंगत पितरों के लिएदक्षिण दिशा की ओर मुख करके और पितरों का स्मरण करते हुए पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या यह स्तोत्र केवल दिवंगत पितरों के लिए है?

नहीं, यह स्तोत्र जीवित पिता के सम्मान में भी पढ़ा जा सकता है। श्लोक 8 में कहा गया है—"स्वजन्मदिवसे साक्षात् पितुरग्रे स्थितोऽपि वा" (अपने जन्मदिन पर पिता के सामने खड़े होकर पाठ करें)।

2. क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, पुत्रियाँ भी अपने पिता के लिए यह पाठ कर सकती हैं। पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अधिकार सबको है।

3. क्या इसे बिना स्नान किए पढ़ सकते हैं?

स्तोत्र का पाठ पवित्रता की मांग करता है। स्नान के बाद ही पाठ करना उचित है। आपातकाल में हाथ-मुंह धोकर मानसिक पाठ कर सकते हैं।

4. ब्रह्मा कृत स्तोत्र और रुचि कृत स्तोत्र में क्या अंतर है?

रुचि कृत स्तोत्र मुख्य रूप से पितृ लोक के पितरों को प्रसन्न करने और वंश वृद्धि के लिए है, जबकि ब्रह्मा कृत स्तोत्र पिता-पुत्र के संबंध, कृतज्ञता और प्रायश्चित पर अधिक केंद्रित है।

5. क्या इससे पितृ दोष कम होता है?

हाँ, पिता (सूर्य) के कारक को मजबूत करने और पूर्वजों के आशीर्वाद से पितृ दोष के प्रभाव में कमी आती है।

6. पाठ के लिए कौन सा दिन सबसे अच्छा है?

रविवार (सूर्य का दिन), अमावस्या, और पिता का जन्मदिन इस पाठ के लिए सर्वोत्तम हैं।

7. क्या इसे पढ़ने से "अश्वमेध यज्ञ" का फल सच में मिलता है?

शास्त्रों में "फलश्रुति" का अर्थ है कि उस कर्म की महत्ता (Magnitude) उतनी है। यह दर्शाता है कि पितृ सेवा का पुण्य सबसे बड़े यज्ञों के बराबर है।

8. क्या बच्चे यह पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, बच्चों को बचपन से ही यह पाठ सिखाना चाहिए ताकि उनमें माता-पिता के प्रति संस्कार और आदर भाव बना रहे।

9. पाठ हिंदी में करें या संस्कृत में?

संस्कृत श्लोकों का उच्चारण अधिक प्रभावशाली है। यदि कठिन लगे, तो भावार्थ को समझकर प्रार्थना करें।

10. क्या इसके साथ तर्पण करना ज़रूरी है?

इस स्तोत्र के लिए तर्पण अनिवार्य नहीं है। केवल श्रद्धापूर्वक पाठ और नमन ("नमो नमः") ही पर्याप्त है (श्लोक ६)।